20/09/2026
# # # **ईदगाह**
**— मुंशी प्रेमचंद**
रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद आज ईद आई है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है! वृक्षों पर कुछ अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक़ है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गांव में कितनी हलचल है! ईदगाह जाने की तैयारियां हो रही हैं।
किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर से सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना। दोपहर के पहले लौटना असंभव है। लड़के सबसे ज़्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं; लेकिन ईदगाह जाने की ख़ुशी उनके हिस्से की चीज़ है। रोज़े बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे, इनके लिए तो ईद है। रोज़ ईद का नाम जपते थे, आज वह आ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इनकी जेबों में तो कुबेर का धन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना ख़ज़ाना निकालकर गिनते हैं और ख़ुश होकर फिर रख लेते हैं।
महमूद गिनता है— एक, दो, दस, बारह। उसके पास बारह पैसे हैं। मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीज़ें लाएंगे— खिलौने, मिठाइयां, बिगुल, गेंद और न जाने क्या-क्या। और सबसे ज़्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पांच साल का दुबला-पतला, लकीर-सा लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैज़े की भेंट हो गया और मां न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता न चला, क्या बीमारी है। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके पांव में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है; फिर भी वह प्रसन्न है।
जब अभागी अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन और उसके घर में दाना नहीं! इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही थी। किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को! इस घर में उसका काम नहीं। लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने से क्या मतलब? उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद की आनंदमयी चितवन उसका विध्वंस कर देगी।
हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है— "तुम डरना नहीं अम्मां, मैं सबसे पहले आऊंगा। बिल्कुल न डरना।"
अमीना का दिल कचोट रहा है। गांव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है? उसे अकेले कैसे मेले जाने दे? उस भीड़-भाड़ में बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यूं न जाने देगी। नन्हीं-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे? पैर में छाले पड़ जाएंगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद ले लेती; लेकिन यहां सेवइयां कौन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहां तो घंटे-घंटों सामग्री बटोरते लगेंगे।
गांव से मेला चला। और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सब-के-सब दौड़कर आगे निकल जाते, फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर पीछे वालों का इंतज़ार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे चल रहे हैं! हामिद के पैरों में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता था?
शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीर के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ों में आम और लीचियां लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशाना लगाता है। माली अंदर से गाली देता हुआ निकलता है। लड़के वहां से एक फ़रलांग पर हैं, ख़ूब हंस रहे हैं।
आगे चले। अदालत आ गई, कॉलेज आ गया, क्लब आ गया। इतने बड़े कॉलेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी, बड़े-बड़े आदमी हैं, मूंछों वाले! इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ने जाते हैं! न जाने कब तक पढ़ेंगे और क्या करेंगे इतना पढ़कर!
अब हलवाइयों की दुकानें शुरू हुईं। इतनी मिठाइयां कौन खाता है? देखो न, एक-एक दुकान पर मनंों होंगी। सुना है, रात को जिन्नात आकर ख़रीद ले जाते हैं।
आगे ईदगाह नज़र आई। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है। नीचे पक्का फ़र्श है, जिस पर जाजम बिछी हुई है। और रोज़ेदारों की पंक्तियां एक के पीछे दूसरी न जाने कहां तक चली गई हैं, पक्के फ़र्श के नीचे तक, जहां जाजम भी नहीं है। नए आने वाले आकर पीछे की क़तार में खड़े हो जाते हैं। यहां कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की नज़र में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वज़ू किया और पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुंदर संचालन है, कितनी सुंदर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सब-के-सब एक साथ खड़े हो जाते हैं... मानो भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है।
नमाज़ ख़त्म हो गई। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौनों की दुकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला है। एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होगे, कभी ज़मीन पर गिरते हुए। यह चरखी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊंट छड़ों से बंधे हुए हैं। एक पैसा देकर बैठ जाओ और पच्चीस चक्करों का मज़ा लो। महमूद और मोहसिन और नूरे और सम्मी इन घोड़ों और ऊंटों पर बैठते हैं। हामिद दूर खड़ा है। उसके पास तीन ही पैसे हैं। अपने कोश का एक-तिहाई ज़रा-सा चक्कर खाने के लिए वह नहीं दे सकता।
सब चरखियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। इधर दुकानों की क़तार लगी हुई है। तरह-तरह के खिलौने हैं— सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, धोबिन और साधु। वाह! कितने सुंदर खिलौने हैं! अब बोला ही चाहते हैं।
महमूद सिपाही लेता है, ख़ाकी वर्दी और लाल पगड़ी वाला, कंधे पर बंदूक रखे हुए, मालूम होता है अभी क़वायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए है। मशक का मुंह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है! शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी उंडेलना ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम है। कैसी विद्वत्ता है उसके मुख पर! काला चोग़ा, नीचे सफ़ेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में क़ानून का पोथा लिए हुए। मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे हैं।
यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने महंगे खिलौने वह कैसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए। ज़रा-सा पानी पड़े तो सारा रंग धुल जाए। ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के?
मोहसिन कहता है— "मेरा भिश्ती रोज़ शाम-सुबह पानी दे जाएगा।"
महमूद कहता है— "मेरा सिपाही घर की पहरेदारी करेगा। कोई चोर आएगा तो फ़ौरन बंदूक से मार देगा।"
नूरे कहता है— "मेरा वकील अदालत में मुकदमा लड़ेगा।"
सम्मी कहता है— "मेरी धोबिन रोज़ कपड़े धोएगी।"
हामिद खिलौनों की निंदा करता है— "मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जाएं।" लेकिन उसकी आंखें ललचाई हुई हैं। वह चाहता है कि कुछ देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हैं, लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते, विशेषकर जब अभी नया शौक़ हो। हामिद ललचाता रह जाता है।
खिलौनों के बाद मिठाइयां आती हैं। किसी ने रेवड़ियां ली हैं, किसी ने गुलाबजामुन, किसी ने सोहनहलवा। मज़े से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक है। अभागों के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई आंखों से सबकी ओर देखता है।
मोहसिन कहता है— "हामिद, रेवड़ी ले जा, कितनी ख़ुशबूदार है!"
हामिद को संदेह हुआ, यह केवल क्रूर विनोद है, मोहसिन इतना उदार नहीं है। फिर भी वह उसके पास गया। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुंह में रख लेता है। महमूद, नूरे और सम्मी ख़ूब ताली बजा-बजाकर हंसते हैं। हामिद खिसिया जाता है।
मोहसिन— "अच्छा, अबकी ज़रूर देंगे हामिद, अल्ला क़सम, ले जा।"
हामिद— "रखे रहो, क्या मेरे पास पैसे नहीं हैं?"
सम्मी— "तीन ही पैसे तो हैं, तीन पैसे में क्या-क्या लोगे?"
महमूद— "हमसे गुलाबजामुन ले जा हामिद, मोहसिन बदमाश है।"
हामिद— "मिठाई कौन बड़ी चीज़ है। किताब में इसकी कितनी बुराइयां लिखी हैं!"
मोहसिन— "लेकिन दिल में तो कह रहे होगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?"
महमूद— "हम समझते हैं इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे ख़र्च हो जाएंगे, तो यह ललचा-ललचाकर खाएगा।"
मिठाइयों के बाद कुछ दुकानें लोहे की चीज़ों की, कुछ गिलट और कुछ नक़ली गहनों की थीं। लड़कों के लिए यहां कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं। हामिद लोहे की दुकान पर रुक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख़्याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियां उतारती हैं तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितनी प्रसन्न होंगी! फिर उनकी उंगलियां कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज़ हो जाएगी। खिलौने से क्या फ़ायदा? व्यर्थ में पैसे ख़राब होते हैं। ज़रा देर ही तो ख़ुशी होती है, फिर तो खिलौने की ओर कोई आंख उठाकर भी नहीं देखता। या तो घर पहुंचते-पहुंचते टूट-फूटकर बराबर हो जाएंगे। चिमटा कितना काम की चीज़ है! रोटियां तवे से उतार लो, चूल्हे में सेंक लो। कोई आग मांगने आए तो चटपट चूल्हे से अंगारा निकालकर उसे दे दो। अम्मां बेचारी को कहां फ़ुरसत है कि बाज़ार आएं और इतने पैसे ही कहां मिलते हैं? रोज़ हाथ जला लेती हैं।
हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबी़ल पर सब-के-सब शरबत पी रहे हैं। देखो, सब कितने लालची हैं! इतनी मिठाइयां लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते हैं, मेरे साथ खेलो; मेरा यह काम करो। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूंगा। खाएं मिठाइयां, उनका मुंह सड़ेगा, फोड़े-फुंसियां निकलेंगी, आप ही ज़बान चटोरी हो जाएगी, तब घर से पैसे चुराएंगे और मार खाएंगे। किताब में झूठी बातें थोड़ी ही लिखी हैं। मेरी ज़बान क्यों ख़राब होगी? अम्मां चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी— "मेरा बच्चा अम्मां के लिए चिमटा लाया है।" हज़ारों दुआएं देंगी। फिर पड़ोस की औरतों को दिखाएंगी। सारे गांव में चर्चा होने लगेगी, हामिद चिमटा लाया है, कितना अच्छा लड़का है! इन बड़ों की दुआएं सीधे अल्लाह के दरबार में पहुंचती हैं और तुरंत सुनी जाती हैं। मेरे पास पैसे नहीं हैं, तभी तो मोहसिन और महमूद मिज़ाज दिखाते हैं। मैं भी इनसे मिज़ाज दिखाऊंगा। खेलें खिलौने, खाएं मिठाइयां! मैं खिलौने की निंदा नहीं करता, पर चिमटा तो बंदूक है, अगर कंधे पर रख लो तो बंदूक हो गई, हाथ में ले लिया तो फ़कीरों का चिमटा हो गया। चाहूं तो इससे मंजीरे का काम ले सकता हूं। एक चिमटा जमा दूं तो तुम सबके सारे खिलौनों की जान निकल जाए! तुम्हारे खिलौने कितना ही ज़ोर लगाएं, मेरे चिमटे का बाल भी बांका नहीं कर सकते। बहादुर शेर है— मेरा चिमटा!
हामिद ने दुकानदार से पूछा— "यह चिमटा कितने का है?"
दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा— "यह तुम्हारे काम का नहीं है जी!"
"बिकाऊ है कि नहीं?"
"बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहां क्यों लाएं हैं?"
"तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?"
"छह पैसे लगेंगे।"
हामिद का दिल बैठ गया।
"ठीक-ठीक बताओ।"
"ठीक-ठीक पांच पैसे लगेंगे, लेना हो तो लो, नहीं चलते बनो।"
हामिद ने कलेजा मज़बूत करके कहा— "तीन पैसे लोगे?"
और वह आगे बढ़ गया कि कहीं दुकानदार की घुड़कियां न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियां नहीं दीं। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया।
ज़रा सुनें, सब के सब क्या-क्या बकवास करते हैं!
मोहसिन ने हंसकर कहा— "यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा?"
हामिद ने चिमटे को ज़मीन पर पटककर कहा— "ज़रा अपना भिश्ती ज़मीन पर गिरा दो, सारी पसली चूर-चूर हो जाएगी बच्चे की!"
महमूद बोला— "तो यह कोई खिलौना है?"
हामिद— "खिलौना क्यों नहीं है! अभी कंधे पर रखा, बंदूक हो गई; हाथ में ले लिया, फ़क़ीरों का चिमटा हो गया। चाहूं तो इससे मंजीरे का काम ले सकता हूं। एक चिमटा जमा दूं, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना ही ज़ोर लगाएं, वह मेरे चिमटे का बाल भी बांका नहीं कर सकते। मेरा बहादुर शेर है— चिमटा!"
सम्मी ने टपरी मारी थी— "मेरी खंजरी से बदलोगे? दो आने की है।"
हामिद ने खंजरी की ओर उपेक्षा से देखा— "मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खंजरी का पेट फाड़ डाले! बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। ज़रा-सा पानी लगे तो ख़त्म हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आंधी में, तूफ़ान में बराबर डटा रहेगा।"
चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, लेकिन अब पैसे किसके पास धरे हैं? फिर मेले से दूर निकल आए हैं, धूप तेज़ हो रही है। घर पहुंचने की जल्दी है। बाप से सिफ़ारिश करें तो भी चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए उसने अपने पैसे बचा रखे थे।
अब बालकों के दो दल हो गए। एक ओर मोहसिन, महमूद, नूरे और सम्मी हैं; दूसरी ओर अकेला हामिद। बहस हो रही है। सम्मी तो पट्ठ हो गया, एक तरफ़ हो गया। मोहसिन ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया— "तुम्हारे चिमटे का मुंह तो रोज़ आग में जलेगा।"
हामिद के पास जवाब तैयार था— "आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब! आपके यह वकील, सिपाही और भिश्ती तो घर में घुस जाएंगे। आग में कूदना वह काम है जो यह रुस्तमे-हिंद ही कर सकता है।"
महमूद ने एक ज़ोर लगाया— "वकील साहब कुर्सी-मेज़ पर बैठेंगे, आपका चिमटा तो बावर्चीख़ाने में ज़मीन पर पड़ा रहेगा।"
इस तर्क ने सम्मी और नूरे को भी सजीव कर दिया। कितना अच्छा प्रस्ताव है! चिमटा बावर्चीख़ाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?
हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा तो उसने धांधली शुरू की— "मेरा चिमटा बावर्चीख़ाने में नहीं रहेगा। वकील साहब कुर्सी पर बैठेंगे तो जाकर उन्हें ज़मीन पर पटक देगा और उनका क़ानून उनके पेट में डाल देगा!"
बात कुछ बनी नहीं, ख़ासी गाली-गलौज थी, लेकिन क़ानून को पेट में डालने वाली बात ऐसी उमंग-भरी निकली कि दोनों बाल-वीर मुंह तकते रह गए। क़ानून पेट में डालने की बात बिल्कुल नई और अनोखी थी।
मोहसिन ने मुंह बनाकर कहा— "हमारे भिश्ती को तो कोई हाथ भी न लगाएगा।"
हामिद— "मेरा चिमटा एक ललकार मारेगा तो तुम्हारा भिश्ती पानी भरकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।"
मोहसिन की पराजय हो गई। महमूद ने मदद पहुंचाई— "अगर बच्चा पकड़ जाए, तो अदालत में बंधे-बंधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के ही पैरों पड़ेंगे।"
हामिद इस अकाट्य तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा— "हमें पकड़ने कौन आएगा?"
नूरे ने अकड़कर कहा— "यह सिपाही बंदूक वाला!"
हामिद ने मुंह चिढ़ाकर कहा— "यह बेचारों को पकड़ेंगे? यह आप ही डरकर भागेंगे! अच्छा, आओ ज़रा कुश्ती हो जाए। इसकी सूरत देखकर ही इनकी सीटी-पिटी गुम हो जाएगी।"
महमूद ने चिमटे की ओर देखकर कहा— "इसकी दुम में तो आग लगती है।"
हामिद— "आग में कूदना बहादुरों का काम है। तुम्हारे यह सिपाही-वकील गीदड़ हैं, आग में न कूद सकेंगे।"
जीत हामिद की हुई। उसका चिमटा 'रुस्तमे-हिंद' है। इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता। मोहसिन, महमूद, नूरे, सम्मी किसी को भी इसमें आपत्ति न थी। विजेताओं को जो सम्मान पराजितों से मिलता है, वह हामिद को भी मिला। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे ख़र्च किए, पर कोई काम की चीज़ न ला सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाएंगे। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों।
संधि की शर्तें तय होने लगीं।
मोहसिन ने कहा— "ज़रा अपना चिमटा दो, हम भी देखें। तुम हमारा भिश्ती लेकर देखो।"
महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए। हामिद को इन शर्तों के मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने ख़ूबसूरत खिलौने हैं!
हामिद ने हारने वालों के आंसू पोंछे— "मैं तुम्हें चिढ़ा रहा था, सच! यह लोहे का चिमटा इन खिलौनों की क्या बराबरी करेगा? मालूम होता है, अभी बोला कि बोला।"
लेकिन मोहसिन की मंडली को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिक्का बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।
मोहसिन— "लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा?"
महमूद— "दुआ को लिए फिरते हो, उल्टे मार न पड़े। अम्मां ज़रूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले?"
हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की मां इतनी प्रसन्न न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसे ही में तो सब कुछ करना था, और उन पैसों के इस उपयोग पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी? फिर अब तो 'रुस्तमे-हिंद' है और सभी खिलौनों का बादशाह!
ग्यारह बजे सारे गांव में हलचल मच गई। मेले वाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे ख़ुशी के जो उछली, तो मियां भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दोनों ख़ूब रोए। उनकी अम्मां यह शोर सुनकर बिगड़ीं और दोनों को ऊपर से दो-दो चांटे और लगाए।
नूरे के वकील का अंत इससे भी ज़्यादा गौरवपूर्ण हुआ। वकील साहब के लिए टॉंड पर या दीवार में दो खूंटियां गाड़ी गईं। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर काग़ज़ का कालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की भांति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने पंखा झलना शुरू किया। अदालत में पंखे की फ़ीस मिलती है, तो क्या घर में पंखा न हो! हवा का झोंका आया या पंखे की चोट लग गई, वकील साहब ऊपर से नीचे आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया! फिर बड़े ज़ोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थियां घूरे पर फेंक दी गईं।
अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गांव की रक्षा करने का काम सौंप दिया गया। लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो था नहीं, जो अपने पैरों चले। वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल कपड़े बिछाए गए। सिपाही साहब उसमें लेटे। महमूद ने टोकरी उठाई और अपने द्वार पर चक्कर लगाने लगा। उसके दोनों छोटे भाई 'सोने वाले, जागते रहो' पुकारते चलते हैं। महमूद को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियां सिपाही अपनी बंदूक लिए ज़मीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टांग टूट जाती है।
महमूद को आज मालूम हुआ कि वह एक अच्छा डॉक्टर है। उसे ऐसा मरहम मिल गया है जिससे वह टूटी टांग को आनन-फानन जोड़ सकता है। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध लाया जाता है। टांग जोड़ने की कोशिश की जाती है, पर दूध जवाब दे देता है। टांग नहीं जुड़ती। तब उसकी दूसरी टांग भी तोड़ दी जाती है। अब कम से कम एक जगह बैठकर आराम से तो रह सकता है!
अब मियां हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज़ सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।
"यह चिमटा कहां था?"
"मैंने मोल लिया है।"
"कै पैसे में?"
"तीन पैसे में।"
अमीना ने छाती पीट ली— "यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, न कुछ खाया, न पिया। लाया क्या? यह चिमटा! सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?"
हामिद ने अपराधी भाव से कहा— "तुम्हारी उंगलियां तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैंने इसे ले लिया।"
बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी की सारी बात कह डालता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना ज़ब्त इससे हुआ कैसे? वहां भी इसे अपनी बूढ़ी दादी की याद बनी रही! अमीना का मन गद्गद हो गया।
और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र! बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बूढ़ी अमीना बच्ची अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएं देती जाती थी और आंसू की बड़ी-बड़ी बूंदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!