Narendra Goutam

Narendra Goutam I Am A Person Who Live Life Enjoyable Happy And Be Happy

25/11/2021
25/11/2021

इतने सारे बाबा ढोंगी निकलने पर भी क्या कोई असर पड़ा भारत में भक्तों के ऊपर . हर कोई यही कहते हुए मिलता है ; मेरे बाबा अलग हैं वह इनके तरहं नहीं हैं. मेरे बाबा के मुख पर तो बड़ा तेज है.
वैसे तो मानव इतिहास धार्मिक संतों , बाबाओं , स्वामियों से भरा पड़ा है. गौतम बुद्ध, महावीर, गुरुनानक , जीसस क्राइस्ट, मुहम्मद पैगमबर , इत्यादि महान संतों में गिना जाता है. क्यूंकि उन्होंने उस समय की मौजूद परिस्थितिओं के खिलाफ बोला था और मानव जाती को एक नया रास्ता व दिशा दिखाई थी .

उदहारण के तौर पे गुरु नानकजी ने जब देखा की ब्राह्मण पंडित गंगा का पानी पूर्व दिशा में छिड़क रहे हैं तो वह पश्चिम दिशा में पानी छिड़कने लगे, इस पर पंडित हंसने लगे, तो गुरुनानकजी बोले की आप लोग पूर्व में क्यों फ़ेंक रहे हो वह बोले की पूर्व में हमारे पूर्वज हैं इस पर गुरुनानक जी बोले की इसका क्या प्रमाण है की वह पूर्व में हैं और यह पानी उनतक पहुँच रहा है, और अगर यह पानी वहां तक पहुँच सकता है तो मेरे खेत तो इस धरती पर पश्चिम में हैं, यह पानी कम से कम मेरे खेतों को सींचेगा. इसी तरहं का तर्क व समाज की मान्यताओं के खिलाफ मोहम्मद व जीसस बोले थे.

परन्तु, आजकल के संत तथा बाबा , मौलाना या पादरी पुरानी परम्पराओं को सिर्फ कॉपी पेस्ट ही कर रहे हैं . किसी ने भी कोई नयी दिशा देने की कोशिश नहीं की है.. वह तो सिर्फ भक्तों को रूढ़िवादी बना रहे हैं. किस तरहं से नवाज़ पढ़नी चाहिए, किस तरहं से पूजा या आरती करनी है, किस तेल का दिया जलाना है , शिवजी ने क्या कहा था की जीसस ने क्या बोला था वही राग अलापते रहते हैं.

आज क्या मानव जाती के आगे नयी समस्याएं नहीं हैं जिनका हमें मानसिक व शारीरिक व स्पिरिचुअल तौर पे सामना करना पड़ रहा है. ऐसा कहा जाता है की ; वेयर साइंस एंड्स फिलॉसोफी बिगिन्स अर्थार्थ जहाँ विज्ञान का अंत होता है वहां से फिलोसोफी शुरू होती है. परन्तु आज २१वीं शताब्दी में विज्ञान का दायरा बड़ा हो गया है. क्या yeh ज़रुरत नहीं है की अब हम इस बदले हुए समाज और बदले हुए एनवायरनमेंट में ईश्वर को समझने की कोशिश करें.

जबकि हम यह मानते हैं की यहाँ पे एक पत्ता भी ईश्वर या अल्हा या गॉड की मर्ज़ी के बगैर नहीं हिलता तो अब तक जो हुया है वह उनकी मर्ज़ी से ही हुआ है. यह जो laakhon वर्षों की यात्रा मानव जाती ने की है जिसमे विज्ञानं की खोजें, यह टेक्नॉलजिकल डेवलपमेंट सब उसकी ही मर्ज़ी से हुआ है. तो फिर यह सोचने की ज़रुरत नहीं है की ;
उसका अंडरलाइंग मैसेज क्या है.
ईश्वर मानव जाती से क्या अपेक्षा रखता है.

यह अजीब नहीं लगता की आज हम यह बोलें की उसकी अपेक्षाएं मानव जाती से इतनी छोटी हैं की हम कैसे नमाज़ पढ़ें , कैसे पूजा करें . क्या अल्लाह . ईश्वर जिसने यह सारी विशाल सृष्टि बनायी उसकी सोच इतनी छोटी हो सकती है ?

01/06/2020

Great sir

05/10/2019

संघ की स्थापना: क्यों और कैसे
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰जब डॉ. हेडगेवार को असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण एक वर्ष का सश्रम कारावास मिला, तो उन्होंने बंदीगृह में इस समय का उपयोग चिन्तन और विचार विमर्श के लिए किया। उनके चिन्तन का मूल बिन्दु यह था कि हम हिन्दू बल, विद्या, बुद्धि और कला-कौशल में संसार में किसी से कम न तो कभी थे और न आज हैं। फिर भी क्या कारण है कि दूर-दूर देशों से आये हुए मुट्ठीभर लुटेरों ने भी हमें दास बना लिया और हजारों वर्ष तक हम विदेशियों के गुलाम रहे? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उन्होंने अपने जेल के साथियों, नेताओं तथा अन्य बहुत से लोगों से विचार-विमर्श किया। सभी ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर दिया, परन्तु डाक्टर जी संतुष्ट नहीं हुए। अन्ततः वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हिन्दू समाज का बिखरा होना ही हमारी अधिकांश समस्याओं का मूल कारण है। उन्होंने यह भी सोचा कि जब तक हिन्दू समाज संगठित नहीं होगा, तब तक या तो आजादी मिलेगी ही नहीं और यदि मिल भी गयी तो ज्यादा दिनों तक टिकेगी नहीं। इसलिए हिन्दू समाज का संगठित होना अत्यावश्यक है।

यों तो हिन्दू समाज में तब भी अनेक संगठन कार्य कर रहे थे, परन्तु सबकी दृष्टि संकीर्ण थी अर्थात् वे एक विशेष वर्ग को संगठित करना चाहते थे। परन्तु डाक्टर साहब ने सोचा कि संगठन ऐसा होना चाहिए जिसमें सभी वर्गों के हिन्दू बेखटके आ सकें और साथ-साथ प्रेमपूर्वक कार्य कर सकें। इसलिए उन्होंने संघ की कल्पना की। उनके मस्तिष्क में भगिनी निवेदिता की एक बात गूँज रही थी कि यदि हिन्दू प्रतिदिन केवल 10 मिनट भी सामूहिक प्रार्थना कर लें, तो ऐसी अजेय शक्ति उत्पन्न होगी, जिसे कोई तोड़ नहीं सकेगा। इसलिए डाक्टर साहब ने प्रतिदिन एक निश्चित स्थान पर एकत्र होकर एक घंटे का कार्यक्रम करने का नियम बनाया।

संघ का प्रारम्भ दशहरे के दिन सन् 1925 में किया गया। नागपुर के एक उपेक्षित से मैदान में 10-12 किशोर बालकों के साथ खेलकूद और व्यायाम करके डाक्टर साहब ने संघ प्रारम्भ किया। उस समय तक संघ का कोई नाम भी नहीं रखा गया था। संघ का नाम ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ काफी बाद में सन् 1928 में रखा गया था और तभी डाक्टर साहब को उनके सहयोगियों द्वारा संघ का पहला सरसंघचालक नियुक्त किया गया। मात्र 10-12 बालकों से प्रारम्भ हुआ संघ आज विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है और बीबीसी द्वारा संसार का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना गया है। इस समय भारत भर में 35 हजार से अधिक स्थानों पर संघ की दैनिक शाखायें और 10 हजार से अधिक स्थानों पर साप्ताहिक शाखाएँ लगती हैं। संघ का मूल स्वरूप दैनिक शाखाओं का है, लेकिन साप्ताहिक शाखाएँ ऐसे लोगों के लिए चलायी जाती हैं, जो संघ से जुड़ना तो चाहते हैं, पर प्रतिदिन नहीं आ सकते। इसी प्रकार कहीं-कहीं मासिक एकत्रीकरण भी होते हैं।

संघ में आने वालों को स्वयंसेवक कहा जाता है। इसका अर्थ है- अपनी ही प्रेरणा से समाज की निःस्वार्थ सेवा करने वाला। संघ की कोई सदस्यता नहीं होती। जैसे दूसरे संगठनों में लोग वार्षिक चन्दा देकर पर्ची कटवाकर सदस्य बन जाते हैं, वैसा संघ में नहीं होता। शाखा में आना ही इसकी सदस्यता है। शाखायें सबके लिए खुली हुई हैं। जो भी व्यक्ति इस देश को प्यार करता है और यहाँ की संस्कृति और महापुरुषों का सम्मान करता है, वह संघ की शाखाओं में आ सकता है। संघ में सभी जातियों के हिन्दू और बहुत से मुसलमान-ईसाई भी आते हैं। लेकिन संघ में एक-दूसरे की जाति पूछना या बताना मना है। सभी हिन्दू हैं, इतना ही हमारे लिए पर्याप्त है। इस देश से प्यार करने वाले मुसलमानों और ईसाइयों को भी हम क्रमशः मुहम्मदपंथी और ईसापंथी हिन्दू मानते हैं। इसलिए उन सबका स्वागत है। जो स्वयंसेवक संघ में जितना अधिक नियमित होता है और जितना अधिक समय देता है, वह उतना ही अच्छा स्वयंसेवक माना जाता है। पारिवारिक दायित्वों से मुक्त रहकर अपना पूरा जीवन संघ के कार्य में लगा देने वाले हजारों व्यक्ति भी हैं, जिन्हें प्रचारक कहा जाता है। संघ के खर्च के लिए किसी से चन्दा नहीं लिया जाता, बल्कि साल में एक बार सभी स्वयंसेवक अपनी-अपनी सामथ्र्य के अनुसार गुरुदक्षिणा देते हैं। उसी से संघ का काम चलता है। संघ में किसी व्यक्ति विशेष को गुरु नहीं माना जाता, बल्कि परम पवित्र भगवा ध्वज ही हमारा गुरु है। गुरु दक्षिणा भी उसी को समर्पित की जाती है।

संघ में महिलायें नहीं आतीं। वास्तव में महिलाओं के लिए संघ जैसा ही एक अलग संगठन है, जिसका नाम है राष्ट्र सेविका समिति। उसकी भी तमाम स्थानों पर दैनिक और साप्ताहिक शाखायें लगती हैं।डाक्टर साहब संघ को एक बिजलीघर कहा करते थे, जहाँ बिजली पैदा की जाती है।वह बिजली अलग-अलग जगह जाकर तमाम कार्य करती है। इसी प्रकार संघ के स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में जाकर देश हित में कार्य करते हैं

04/07/2019
03/07/2019
19/04/2019

02/03/2019
25/12/2018

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