06/07/2025
लॉयन ऑफ डेजर्ट!!
सोलुच के कॉनसन्ट्रेशन कैम्प में ऊंची मचान पर फांसी का तख्ता सजा था। 73 बरस के उस बूढ़े के हाथ पैरों की बेड़ियां खोली गई।
आखरी बार उसने चश्मा लगाया। जेब से कुरान निकाल कर पढ़ी। कुछ मिनटों तक इंतजार बाद, पास खड़े अफसर ने इशारा किया। बूढ़ा शांति से तख्ते की ओर बढ़ा ..
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ओमर मुख्तार को 50 हजार लीरा की पेंशन ऑफर की गई थी।शर्त ये कि इटली के औपनिवेशिक शासन का विरोध छोड़ देगा।साथियों के नाम पते बतायेगा।
वरना फांसी!!
ओमर ने फांसी कबूल की। कहा- मेरी जिंदगी, मेरे जल्लाद से लम्बी होगी।
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दुनिया मे पहली बार युद्धक विमानों ने बम, लीबिया में गिराए गए। पहली बार टैंकों का थोक में इस्तेमाल हुआ।
किसी फौज के ऊपर नही.. लीबिया की सिविलयन आबादी पर। जनता को रेगिस्तान में बनाये गए कन्सन्ट्रेशन कैम्पों में बन्द किया गया। खेत जला दिए गए, कुओ में जहर डाला गया।
इसका सूत्रधार जनरल रोडोल्फो ग्रजियानी, मुसोलिनी का 5 वर्षों में भेजा 5 वां गवर्नर था। ग्रजियानी को ओमर चाहिए था।
उसने पूरे लीबिया को जेल, बना दिया। रेगिस्तान में कांटेदार बाड़ बनाई। जासूसों का जाल बिछा दिया।
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लीबिया 20 सालो से इटालियन कब्जे में था। रोम में फासिस्ट राज आने के बाद, मुसोलिनी ने रोमन दौर वाला विश्व विजेता बनने का सपना देखा था।
उसने इरिट्रिया,सोमालिया, इथोपिया पर कब्जा किया। दिक्कत लीबिया में हो रही थी।
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उमर छोटे थे, जब उनके पिता की हज के दौरान मृत्यु हो गई थी। उनकी शिक्षा और पालन पोषण रीजीलियस माहौल में, एक पारिवारिक मित्र के संरक्षण में हुई।
इसी क्रम में वे पूर्वी लीबिया के एक कस्बे में पहुंचे, जो अल-सेनुसी के बनाये एक धार्मिक मिलिशिया सँगठन का मुख्यालय था। यहां से शिक्षित लोग लीबिया के कबीलाई प्रशासन में ऊंचे पदों पर जाते।
उमर भी इसमे शामिल हुए। आसपास के देशो में घूमें। काफी इज्जत कमाई। 1911 में जब इटली ने ऑटोमन साम्राज्य से लीबिया को छीनकर, अपनी कालोनी घोषित कर दिया, हालात बदल गए।
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इटली के विरुद्ध छापामार संघर्ष हो रहा था।
उमर इसके लीडर बनकर के उभरे। रेगिस्तानी जीवन, मौसम, हवा, पानी, इलाके की पहचान, पहाड़ी रास्ते, गार- उमर लीबिया के भूगोल के एनसाइक्लोपीडिया थे।
इसका उपयोग युद्ध में करते। पुरानी बन्दूको, और तेज अरबी घोड़ो पर चलते मुख्तार के लश्कर, इटालियन फौजो के प्राण सुखा देते।
दुश्मन उन्हें उन्हें घोस्ट, भूत, गॉड कहते। और दुनिया लायन ऑफ डेजर्ट कहने लगी।
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परेशान मुसोलिनी ने सारे अधिकार देकर, ग्रजियानी को लीबिया भेजा। उसने यहां आते ही उसने पीस टॉक्स का नाटक शुरू किया।
ओमर को पैसे, सेफ पैसेज, पद ऑफर किये। ओमर लीबियन जनता के भूमि अधिकार चाहते थे। समझौता वार्ता चलती रही। इधर इटली से फौज, टैक,जहाज आते रहे।
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और फिर ग्रजियानी ने पूरे देश पर कहर बरपा दिया गया। उमर को मिलने वाली मदद कम हुई। जासूसों ने खबरें पहुचाई,
20 साल इटलियन्स को छकाने वाले के ओमर को अंततः पहाड़ियों में घेर लिया गया। बेड़ियों में जकड़कर ग्रजियानी के सामने लाया गया।
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50 हजार लीरा की पेंशन ऑफर की गई थी। शर्त यह कि इटली के औपनिवेशिक शासन का विरोध छोड़ देगा, साथियों के नाम पते बतायेगा.. वरना फांसी!!
ओमर ने फांसी कबूल की और कहा- मेरी जिंदगी, मेरे जल्लाद से लम्बी होगी।
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16 सितंबर, 1931 को सोलुच के कॉनसन्ट्रेशन कैम्प, हजारो लीबियन कैदियों के सामने, उमर मुख्तार को फांसी दे दी गयी।
उन पर "लॉयन ऑफ द डेजर्ट" नाम से फ़िल्म बनी है। अंतिम दृश्य में उनकी हाथों से छूटा चश्मा, तख्ते पर गिरा दिखता है। वायर रिम्ड, गोल चश्मा..
जैसा गांधी पहनते थे।
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गांधी का संघर्ष अहिंसा का था, ओमर ने सशस्त्र संघर्ष किया। मौत का डर तो दोनों को ही नही था, दोनों के लिए अपने सुख, धन, जीवन से ज्यादा विदेशी शासन से मुक्ति प्यारी थी।
दोनों ही अपने हत्यारो से ज्यादा जिये। गांधी को गोडसे की तीन गोलियों ने जिंदा किवदन्ती बना दिया। औऱ ओमर मुख्तार लीबिया के राष्ट्रीय हीरो हैं।
उनके जल्लाद का नाम किसी को नही मालूम।
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रुडाल्फो ग्रजियानी अंत तक मुसोलिनी का वफादार रहा। युद्ध पश्चात एक इटलियन कोर्ट ने उसे 19 साल की सजा दी। वह 1955 में मरा।
आने वाले दौर में लीबिया में फिर उपद्रव हुए। वह आगे भी क्रांति और तानाशाही के दौर से गुजरा।
आज भी अशांत है।
सँघर्ष रत है।
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यहां गांधी का सँघर्ष आज भी फल दे रहा है। उनके फलसफों ने सिर्फ विदेशी राज को ही नही उखाड़ा, साथ ही भारत को एक सूत्र में बांध भी दिया।
आज भी भारत के शांतिपूर्ण, सुदृढ लोकतन्त्रात्मक देश है। भले ही अशांतिप्रेमी, लोकतन्त्रविरोधी शक्तियां इसके फल खा रही हैं।
रेगिस्तान के शेर ओमर को खिराज ए अकीदत।
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