19/12/2025
कर्नल अचलाराम पंवार, से. नि.
अध्यक्ष, मूल ओबीसी, जैसलमेर की कलम 🔏 से
*मूल ओबीसी व आज के लोकतान्त्रिक राजघराने*
मूल ओबीसी यानी हिन्दुस्तान का शदीयों पुराना कामगार समाज जो आजाद भारत तक बिना बदलाव सभी समाजों, विशेष रूप से उच्च वर्ग की सेवा में रहा। 1931 की जातीगत जनसुमारी के आंकड़ों के अनुसार भारत की आधे से ज्यादा यानी 52% जनसंख्या आज की मूल ओबीसी तथा तब की ओबीसी की थी । 1989 में संविधान के अनुच्छेद 340 के अनुसार, मंडल कमीशन की अनुशंसा के अनुरूप उस समय की श्री वीपी सिंह सरकार ने केन्द्रीय सरकार के सरकारी विभागों में 27% आरक्षण उस समय की ओबीसी तथा आज की मूल ओबीसी को दिया। कुछ राजनेतिक पार्टीयों को नहीं सुहाया तथा सुप्रीम कोर्ट का भारी भरकम वकीलों की फौज के साथ दरवाजा खटखटाया। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने श्री वीपी सिंह सरकार का फैसला बरकरार रखा। जब भाजपा पावर में आई तब उन्होंने जनरल वर्ग से कुछ जातीयों को 1998 में ओबीसी में ले आये। ताकी गरीब, वंचित, शोशित, शैक्षणिक व सामाजिक स्तर से बहुत कमजोर 1931 वाली ओबीसी को उच्च वर्ग से ओबीसी दर्जे में लाई जाने वाली जातियां अपने शैक्षणिक कोशल्, सामाजिक/ शौशियली मजबूती तथा राजनैतिक उच्च क्षमता के कारण इस 27% आरक्षण का शत प्रतिशत फायदा ले सके तथा 1931 वाली ओबीसी आरक्षण के लिये हाथ मलती रहे क्योंकि 1998 वाली ओबीसी आरक्षण के बड़े हिस्से को अपनी क्षमताओं से प्राप्त करती रहे। यहीं से शब्द मूल ओबीसी का जन्म हुवा तथा 1931 वाली ओबीसी अपने ही खेमें में मूल ओबीसी कहाई जिसका दर्द आज तक राजनैतिक पार्टियों को नजर नहीं आया तथा उनका अपना हक व, एक सपना ही रह गया ।
इस प्रकार तय आरक्षण से आज तक वंचित रह रही मूल ओबीसी राजनैतिक प्रतिस्पर्धा में भी 1998 वाली ओबीसी जो राजनीती, शिक्षा, शमर्धी, तथा सामाजिक तौर पर अति सक्षम होने के कारण मूल ओबीसी को कहीं नजदिक नहीं लगने दिया। 1998 में लाई गई ओबीसी में काफी दबंग जातीयों में अन्य के साथ साथ लोकतांत्रिक भारत में कई राजनीतिक राजघराने आजादी के बाद से पनपते गये तथा साथ साथ परिवारवाद पनपता गया जहां वार्ड पंच से लेकर सरकारों में मंत्री तक चुने जाने लगे इन लोकतांत्रिक राजनैतिक राजघरानों की सह व मदद से ओबीसी कोटे के कारण व मूल ओबीसी मूंह ताकती ही रह गई तथा पिछड़ती गई क्योंकि आरक्षण का फायदा गरीब मूल ओबीसी जातों को सरकारों में बैठे 1998 वाली ओबीसी के लोगों के संरक्षण व आशीर्वाद के कारण नहीं लेने दिया गया तथा इसी कारण मूल ओबीसी राजनीति व सरकारी नोकरीयों के अभाव में जीने के लिए मजबूर होती रही। राजनीति के दो ज्वलंत उदाहरण नीचे दिए गये हैं।
*एक*: पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों से हमारे मूल ओबीसी संगठन जैसलमेर ने विधान सभा जैसलमेर, पोकरण व शिव के लिये मांग की थी कि इनमें से किसी एक विधानसभा में एक एक टिकट दोनों पार्टियां मूल ओबीसी प्रत्याशी को दे परन्तु दोनों पार्टियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। दोनों पार्टीयों की इस नकारात्मकता पर मूल ओबीसी संगठन में चर्चाओं के बाद जैसलमेर विधानसभा के लिये निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में श्री श्री 1008 श्री बाल भारती जी का पर्चा दाखिल किया। इस पर मूल ओबीसी संगठन जैसलमेर व प्रत्याशी के साथ क्या क्या हुवा वह जग जाहिर है।
*दुसरा*: हाल ही में राजस्थान में कांग्रेस के जिला अध्यक्षों की चयन प्रक्रिया केन्द्रीय व राज्य स्तरीय प्रवेक्षक मंडलों द्वारा की गई । प्रत्याशियों ने अपनी अपनी दावेदारी पेश की। मूल ओबीसी की दावेदारी संगठन निर्णय के बाद, अलग अलग पृष्ठभूमी से, अलग अलग उम्र के पड़ाव से, अलग अलग शैक्षणिक योग्यता से, अलग अलग प्रशासनिक व राजनेतिक क्षमताओं से तथा जैसलमेर की आधी आबादी से ज्यादा समर्थन प्राप्त तीन कोमन केन्डीडेट फीड किये गये । तीनों दावेदार, मूल ओबीसी व अन्य समाजों जिसमें जनरल, 1998 ओबीसी, अनुसूचित जनजाति व जन जाती ने एक ही आवाज में *तीन में से किसी एक को जैसलमेर जिले का कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाने का दावा पेश किया*। इसमें दो बिन्दूओं की कमी रही। एक हूटिंग करने वालों का न होना तथा दूसरा, तीन में से किसी दावेदार का किसी लोकतांत्रिक राजघराने से न होना और यही मूल ओबीसी के आड़े आई।
*मंथन* : पार्टीयों, खासकर भाजपा व कांग्रेस को मानना ही पड़ेगा कि मूल ओबीसी है तो आपका सिंहासन तक पहू़चना तय है । मूल ओबीसी के बिना आप जिन जिन समाजों के बल पर आपकी जीत अर्जित करना चाहते हैं, एक सपना ही रहेगा, जब तक एक पार्टी की आपसी फूट दूसरी को मदद न करें । यह सोचने वाली बात है कि आधे में लोमड़ी और आधे में पूंछ, यानी भारत की आधी से भी ज्यादा जनसंख्या मूल ओबीसी की है । आज मूल ओबीसी जाग गई है। अतः मुख्य दो पार्टीयों को मूल ओबीसी के उत्थान के लिये सोचना ही होगा अन्यथा पार्टीयों का पावर में रहना एक सवालीया निशान होगा।
मूल ओबीसी भाई बहिनों से निवेदन है कि आप अपने आप को पहचानो, आपकी संख्या बल को याद रखो, आपको लोग अपनी जेब में डालकर बैठे हैं, बाहर निकलो। हमें यह समझ में आ गया है कि आजादी के 78 वर्षों में हमें झूठे वादों के अलावा कुछ नहीं मिला चाहे श्री मोदी जी के वादे हो चाहे श्री राहुल गांधी जी या उनकी पार्टी के 60 वर्ष के वादे। मिला है तो ऊपर लिखे दो उदाहरणों जैसा तिरस्कार । अब हमें जरुरत है अपने खुद के वजूद को तलाशने की या फिर तीसरे रास्ते की जिसमें राष्ट्रीय हित सुरक्षित हो, हमारे जैसे गरीब तबके का उद्धार हो ताकि भाजपा व कांग्रेस जैसी पार्टियां समझ पाये व लोकतांत्रिक राजघरानों की जगह कुछेक परिवारवाद रहित मजबूत नेता पनप पाये।
अतः दोनों मुख्य राजनैतिक पार्टीयों को अपने व मूल ओबीसी के हित के मध्य नजर प्रगति पथ सोचने निहायत जरुरी है।
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