Shri Mahaveer Ayurved Hospital

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राष्ट्रीय पोषण माह विशेष।“पोषण भी, सीखना भी”गर्भ से बाल्यावस्था तक—संतुलित आहार, स्वस्थ शरीर और सक्षम मस्तिष्क की आधारशि...
01/09/2026

राष्ट्रीय पोषण माह विशेष।
“पोषण भी, सीखना भी”
गर्भ से बाल्यावस्था तक—संतुलित आहार, स्वस्थ शरीर और सक्षम मस्तिष्क की आधारशिला
लेखक : डॉ॰ रवीन्द्र गौतम
आयुर्वेद चिकित्साधिकारी
राजकीय आयुर्वेद औषधालय, सवाई मानसिंह चिकित्सालय, जयपुर
सितम्बर का महीना आते ही राष्ट्रीय पोषण माह के माध्यम से देशभर में पोषण के प्रति जन-जागरूकता का अभियान प्रारम्भ होता है। पोषण को केवल भूख मिटाने या पेट भरने का विषय समझना पर्याप्त नहीं है। पोषण का सम्बन्ध बच्चे की वृद्धि, शरीर की शक्ति, रोग-प्रतिरोधक क्षमता, मानसिक विकास, सीखने की क्षमता और भविष्य के स्वास्थ्य से है।
भारत सरकार के पोषण अभियानों में “पोषण भी, पढ़ाई भी” जैसी अवधारणा इसी व्यापक सोच को सामने रखती है कि प्रारम्भिक बाल्यावस्था में पोषण, देखभाल और सीखने का वातावरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
आयुर्वेद ने भी आहार को जीवन के प्रमुख आधारों में स्थान दिया है। इसलिए पोषण माह केवल यह पूछने का अवसर नहीं है कि “क्या खाएँ?” बल्कि यह समझने का अवसर भी है कि कितना खाएँ, कब खाएँ, कैसे खाएँ और किस व्यक्ति के लिए कौन-सा आहार उचित है।
पोषण की शुरुआत जन्म के बाद नहीं, गर्भकाल से होती है
बच्चे के स्वस्थ विकास की आधारभूमि गर्भकाल से ही तैयार होने लगती है। गर्भवती माता का स्वास्थ्य, उसका भोजन, पर्याप्त विश्राम, नियमित स्वास्थ्य-जाँच तथा मानसिक प्रसन्नता—इन सभी का महत्व है।
गर्भावस्था में भोजन पर्याप्त, विविध, स्वच्छ, ताजा और सुपाच्य होना चाहिए। दालें और अन्य प्रोटीन स्रोत, अनाज, मौसमी फल एवं सब्जियाँ, उपयुक्त दुग्ध पदार्थ, मेवे एवं बीज तथा आवश्यकतानुसार उचित वसा भोजन में सम्मिलित किए जा सकते हैं।
गर्भवती महिला के लिए लौह, फोलेट, कैल्शियम, विटामिन डी, विटामिन बी-12 आदि पोषक तत्त्वों की आवश्यकता व्यक्ति की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए इनकी पूर्ति चिकित्सकीय सलाह एवं आवश्यक जाँच के आधार पर करना अधिक उचित है।
यह भ्रान्ति भी दूर होनी चाहिए कि गर्भवती महिला को “दो व्यक्तियों का भोजन” करना चाहिए। इसका अर्थ भोजन की मात्रा को अनावश्यक रूप से दुगुना करना नहीं, बल्कि भोजन की गुणवत्ता और पोषकता को बेहतर बनाना है।
जन्म के बाद शिशु का पहला आहार—माँ का दूध
शिशु के जीवन की पोषण-यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण चरण जन्म के बाद प्रारम्भ होता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की वर्तमान अनुशंसाओं के अनुसार स्वस्थ शिशु को जन्म के प्रथम घंटे में स्तनपान प्रारम्भ कराने तथा जीवन के पहले छह महीने तक केवल माँ का दूध देने की सलाह दी जाती है। इस अवधि में सामान्यतः पानी सहित अन्य खाद्य या पेय देने की आवश्यकता नहीं होती। छह महीने की आयु के आसपास सुरक्षित और पौष्टिक पूरक आहार प्रारम्भ करते हुए स्तनपान दो वर्ष या उससे अधिक समय तक जारी रखा जा सकता है।
इसलिए परिवारों को एक सरल बात याद रखनी चाहिए—
जन्म से छह माह तक—माँ का दूध।
छह माह के बाद—माँ का दूध और पूरक आहार।
यह जानकारी प्रत्येक परिवार तक पहुँचना राष्ट्रीय पोषण अभियान की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
छह महीने के बाद पूरक आहार क्यों आवश्यक है?
लगभग छह महीने की आयु के बाद बच्चे की ऊर्जा और पोषक तत्त्वों की आवश्यकता बढ़ने लगती है। केवल स्तनपान उसकी बढ़ती हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं रहता। इसलिए स्तनपान जारी रखते हुए पूरक आहार प्रारम्भ किया जाता है।
शुरुआत में भोजन—
अच्छी तरह पका हुआ,
नरम,
स्वच्छ,
आसानी से निगलने योग्य
होना चाहिए।
घर में उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों से मूंग की खिचड़ी, दलिया, अच्छी तरह पकी दाल, मसली हुई सब्जियाँ, उपयुक्त फल तथा अनाज-दाल के संयोजन दिए जा सकते हैं।
बच्चे की आयु और क्षमता बढ़ने के साथ भोजन की मात्रा, गाढ़ापन और विविधता धीरे-धीरे बढ़ाई जानी चाहिए। बच्चे को भूख और तृप्ति के संकेतों के अनुसार खिलाना चाहिए; भोजन के लिए प्रोत्साहित करें, लेकिन जबरदस्ती न करें।
बच्चे को केवल पेट भरना नहीं है; उसे वृद्धि और विकास के लिए विविध पोषण देना है।
आयुर्वेद में आहार—केवल खाद्य पदार्थ नहीं, पूरी आहार-पद्धति
आयुर्वेद की विशेषता यह है कि उसने केवल “क्या खाना चाहिए” नहीं बताया, बल्कि भोजन की प्रकृति, निर्माण-विधि, संयोजन, मात्रा, देश, काल, भोजन करने की विधि तथा भोजन करने वाले व्यक्ति की स्थिति को भी महत्व दिया।
चरकसंहिता में इसे अष्टाहारविधिविशेषायतन के माध्यम से समझाया गया है—
प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोगसंस्था और उपयोक्ता।
सरल भाषा में इसका अर्थ है—
भोजन अच्छा है या नहीं, इसका निर्णय केवल खाद्य पदार्थ देखकर नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि वह किस व्यक्ति के लिए, कितनी मात्रा में, किस समय, किस ऋतु में और किस प्रकार तैयार करके ग्रहण किया जा रहा है।
इसलिए आयुर्वेद का पोषण-विज्ञान अत्यन्त व्यावहारिक है।
उचित आहार + उचित मात्रा + उचित समय + उचित विधि + व्यक्ति के अनुकूलता = वास्तविक पोषण।
“बुद्धिवर्धक भोजन” के नाम पर भ्रम से बचें
आज बाजार और सामाजिक माध्यमों पर अनेक खाद्य पदार्थों एवं औषधियों को “बुद्धि बढ़ाने”, “स्मरणशक्ति बढ़ाने” या “बच्चे को असाधारण रूप से तेज बनाने” के नाम पर प्रचारित किया जाता है।
यहाँ सावधानी आवश्यक है।
बच्चे की मेधा और सीखने की क्षमता किसी एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर नहीं करती। इसके निर्माण में पर्याप्त पोषण के साथ आनुवंशिकता, नींद, शारीरिक गतिविधि, खेल, मानसिक सुरक्षा, पारिवारिक स्नेह, संवाद, शिक्षा और सीखने का वातावरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए किसी एक खाद्य पदार्थ को “चमत्कारी बुद्धिवर्धक” कहना उचित नहीं है।
बच्चे के लिए वास्तविक मेध्य आहार वह है जो उसके शरीर और मस्तिष्क को आवश्यक पोषक तत्त्व उपलब्ध कराए और उसके साथ स्वस्थ दिनचर्या भी हो।
बच्चे की थाली में विविधता ही वास्तविक शक्ति है
पोषण का अर्थ महँगा भोजन करना नहीं है। हमारी भारतीय रसोई में ही अनेक प्रकार के पौष्टिक खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं।
अनाज
गेहूँ, चावल, जौ, बाजरा, ज्वार, मक्का आदि।
दालें एवं दलहन
मूंग, मसूर, चना, अरहर, उड़द आदि।
सब्जियाँ
हरी पत्तेदार सब्जियों सहित विभिन्न रंगों की मौसमी सब्जियाँ।
फल
स्थानीय एवं मौसमी फल।
दुग्ध पदार्थ
दूध, दही आदि—यदि व्यक्ति को अनुकूल हों।
मेवे एवं बीज
बादाम, अखरोट, तिल, अलसी आदि का उचित मात्रा में उपयोग।
स्वास्थ्यकर वसा
घी एवं उपयुक्त खाद्य तेलों का संतुलित उपयोग।
इस विविधता का उद्देश्य किसी एक खाद्य पदार्थ को “सर्वश्रेष्ठ” घोषित करना नहीं, बल्कि अलग-अलग खाद्य समूहों से शरीर को आवश्यक पोषक तत्त्व उपलब्ध कराना है।
आयुर्वेद के छह रस और भोजन की विविधता
आयुर्वेद ने आहार में—
मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय
इन छह रसों का वर्णन किया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक भोजन में छहों रस समान मात्रा में लेने ही चाहिए। इसका व्यापक संदेश भोजन में विविधता, संतुलन और व्यक्ति-ऋतु के अनुसार उचित चयन से है।
एक ही प्रकार का भोजन लगातार करते रहना उचित नहीं। स्थानीय, मौसमी और विविध खाद्य पदार्थों का संतुलित उपयोग अधिक व्यावहारिक है।
पोषण केवल “क्या खाएँ” नहीं—“कैसे खाएँ” भी है
आयुर्वेद की आहार-विधि का यह अत्यन्त महत्वपूर्ण पक्ष है।
भोजन—
ताजा हो, स्वच्छ हो, उचित मात्रा में हो, अच्छी तरह चबाकर खाया जाए और पाचनशक्ति के अनुकूल हो।
भोजन करते समय अत्यधिक जल्दी, तनाव और अनावश्यक ध्यान-विभाजन से बचना चाहिए।
विशेषकर बच्चों को भोजन कराते समय मोबाइल या दूरदर्शन का सहारा लेकर उन्हें अनजाने में लगातार खिलाते रहना उचित आदत नहीं है।
बच्चे को भोजन का स्वाद, भूख और तृप्ति पहचानना भी सीखना चाहिए।
भोजन का समय केवल खिलाने का समय नहीं है; यह परिवार, संवाद और संस्कार का समय भी है।
पेट भरना और पोषण पाना—दो अलग बातें हैं
आज समाज में कुपोषण के दो रूप दिखाई देते हैं।
एक ओर पर्याप्त भोजन न मिलने से अल्पपोषण की समस्या है, तो दूसरी ओर अत्यधिक ऊर्जा वाले लेकिन पोषकता में कमजोर खाद्य पदार्थों के कारण अधिक वजन और मोटापे की समस्या बढ़ रही है।
अत्यधिक मिठाइयाँ, मीठे पेय, तले हुए पदार्थ, अत्यधिक नमकीन खाद्य पदार्थ और पैकेट वाले अल्पपोषक खाद्य पदार्थ यदि नियमित भोजन का स्थान लेने लगें, तो पेट तो भर सकता है, लेकिन शरीर को संतुलित पोषण नहीं मिल पाता।
इसलिए याद रखें—
“पेट भरना ही पोषण नहीं है।”
विरुद्ध आहार को भी सही अर्थ में समझें
विरुद्ध आहार के विषय में आज सामाजिक माध्यमों पर अनेक प्रकार की सूचियाँ प्रचलित हैं। किन्तु आयुर्वेद का विरुद्ध आहार सिद्धान्त केवल “यह चीज उसके साथ कभी नहीं खानी चाहिए” जैसी छोटी सूची तक सीमित नहीं है।
चरकसंहिता में आहार की अनुकूलता और प्रतिकूलता को देश, काल, अग्नि, मात्रा, संस्कार, वीर्य, संयोग, क्रम और उपयोग की विधि आदि अनेक आधारों पर समझाया गया है।
अर्थात् भोजन के प्रति भय उत्पन्न करना आयुर्वेद का उद्देश्य नहीं है।
उद्देश्य है—
भोजन के संयोजन, मात्रा, समय, तैयारी और व्यक्ति की पाचनशक्ति को समझकर उचित आहार लेना।
इसलिए इंटरनेट पर प्रसारित प्रत्येक “विरुद्ध आहार सूची” को शास्त्रीय सिद्धान्त मान लेना उचित नहीं है।
आज बच्चों की थाली के सामने सबसे बड़ी चुनौती
बच्चा खाना नहीं खाता—मोबाइल चला दिया जाता है।
सब्जी नहीं खाता—पैकेट वाला खाद्य पदार्थ दे दिया जाता है।
रोता है—चॉकलेट दे दी जाती है।
प्यास लगती है—मीठा पेय दे दिया जाता है।
धीरे-धीरे बच्चा घर के भोजन की अपेक्षा अत्यधिक स्वाद वाले पैकेट खाद्य पदार्थों का अभ्यस्त होने लगता है।
इस आदत को बदलने के लिए किसी महँगी औषधि की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है परिवार की भोजन-पद्धति में सुधार की।
घर का भोजन बढ़ाइए।
पैकेट वाले खाद्य पदार्थ घटाइए।
मीठे पेय कम कीजिए।
फल-सब्जियों की विविधता बढ़ाइए।
बच्चे को भोजन के लिए प्रोत्साहित कीजिए, जबरदस्ती मत कीजिए।
भोजन के समय मोबाइल को दूर रखिए।
पोषण की पहली पाठशाला—परिवार
बच्चे को स्वस्थ भोजन सिखाने का सबसे प्रभावी तरीका माता-पिता का अपना आचरण है।
यदि घर में माता-पिता स्वयं फल-सब्जियाँ खाते हैं, समय पर भोजन करते हैं, अत्यधिक तले-पैकेट वाले खाद्य पदार्थों से बचते हैं, पर्याप्त नींद लेते हैं और शारीरिक गतिविधि को जीवन का हिस्सा बनाते हैं, तो बच्चा भी स्वाभाविक रूप से वही सीखता है।
इसलिए बच्चे को केवल पौष्टिक भोजन देना पर्याप्त नहीं है।
उसे स्वस्थ भोजन की संस्कृति भी देनी होगी।
पोषण और सीखना—दोनों साथ-साथ
एक बच्चा केवल भोजन से स्वस्थ नहीं बनता।
उसे चाहिए—
पौष्टिक भोजन, पर्याप्त नींद, खेल-कूद, शारीरिक गतिविधि, परिवार का स्नेह, संवाद, मानसिक सुरक्षा और सीखने का अवसर।
प्रारम्भिक बाल्यावस्था विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत सरकार के 2026 के पोषण अभियान में भी जीवन के प्रथम वर्षों में मस्तिष्क विकास, पोषण, उत्तरदायी देखभाल और प्रारम्भिक सीखने को परस्पर जुड़ा हुआ माना गया है।
अर्थात्—
थाली में पोषण हो और वातावरण में सीखना।
शरीर को भोजन मिले और मन को स्नेह।
मस्तिष्क को पोषण मिले और जीवन को संस्कार।
यही “पोषण भी, पढ़ाई भी” की वास्तविक भावना है।
राष्ट्रीय पोषण माह में पाँच सरल संकल्प
इस पोषण माह में प्रत्येक परिवार पाँच संकल्प ले सकता है—
पहला— घर के ताजे, स्थानीय और विविध भोजन को प्राथमिकता देंगे।
दूसरा— बच्चों के भोजन में अनाज, दाल एवं अन्य प्रोटीन स्रोत, सब्जियाँ, फल, उपयुक्त दुग्ध पदार्थ तथा मेवे एवं बीजों की विविधता रखेंगे।
तीसरा— अत्यधिक मीठे पेय, तले हुए खाद्य पदार्थ और पैकेट वाले खाद्य पदार्थों को नियमित भोजन का आधार नहीं बनने देंगे।
चौथा— बच्चे को भोजन के लिए प्रोत्साहित करेंगे, लेकिन जबरदस्ती नहीं करेंगे और भोजन के समय मोबाइल की आदत को कम करेंगे।
पाँचवाँ— भोजन के साथ पर्याप्त नींद, खेल, शारीरिक गतिविधि, अध्ययन और पारिवारिक संवाद को भी बच्चे के स्वास्थ्य का हिस्सा मानेंगे।
राष्ट्रीय पोषण माह का वास्तविक संदेश
पोषण माह केवल पोस्टर लगाने या एक महीने तक जागरूकता कार्यक्रम करने का अवसर नहीं है। यह अपने घर की रसोई और अपनी थाली को पुनः देखने का अवसर है।
हम स्वयं से पूछें—
क्या हमारे घर का भोजन विविध है?
क्या बच्चों को प्रतिदिन पर्याप्त पौष्टिक भोजन मिल रहा है?
क्या उनके भोजन में दाल एवं अन्य प्रोटीन स्रोत पर्याप्त हैं?
क्या फल और सब्जियाँ नियमित रूप से शामिल हैं?
क्या पैकेट वाले खाद्य पदार्थ आवश्यकता से अधिक तो नहीं?
क्या भोजन के समय मोबाइल चलता है?
क्या बच्चे पर्याप्त सोते और खेलते हैं?
क्या गर्भवती माता को पर्याप्त और संतुलित आहार मिल रहा है?
क्या शिशु को पहले छह महीने केवल स्तनपान मिला?
क्या छह महीने के बाद समय पर पूरक आहार प्रारम्भ किया गया?
यदि इनमें कहीं सुधार की आवश्यकता दिखाई देती है, तो परिवर्तन आज और अपने घर से प्रारम्भ होना चाहिए।
अन्ततः—पोषण की सही परिभाषा क्या है?
पोषण केवल पेट भरना नहीं है।
पोषण केवल वजन बढ़ाना नहीं है।
पोषण केवल कैलोरी गिनना नहीं है।
पोषण केवल विटामिन की गोली लेना नहीं है।
पोषण महँगा भोजन करना भी नहीं है।
पोषण है—शरीर की आवश्यकता के अनुसार विविध, स्वच्छ, संतुलित और उचित मात्रा में भोजन ग्रहण करना; उसे उचित विधि से लेना; अपनी पाचनशक्ति, आयु, ऋतु और स्वास्थ्य की स्थिति को समझना तथा उसके साथ स्वस्थ जीवनशैली अपनाना।
आयुर्वेद का आहार-विज्ञान हमें यही व्यापक दृष्टि देता है।
गर्भ से लेकर बाल्यावस्था तक उचित पोषण बच्चे के स्वस्थ विकास की आधारभूमि तैयार करता है। जब बच्चे स्वस्थ होंगे, वे बेहतर ढंग से सीखेंगे; जब परिवार स्वस्थ होंगे, समाज अधिक सक्षम होगा; और जब समाज स्वस्थ होगा, तब राष्ट्र अधिक सशक्त होगा।
इसलिए इस राष्ट्रीय पोषण माह का संकल्प केवल इतना न हो कि “हम अच्छा भोजन खाएँगे।”
संकल्प यह हो—
“हर घर की थाली बने स्वास्थ्य की पाठशाला।”
“पोषण भी—पढ़ाई भी।”
“स्वस्थ बालक—स्वस्थ परिवार—स्वस्थ समाज—स्वस्थ राष्ट्र।”
— डॉ॰ रवीन्द्र गौतम
आयुर्वेद चिकित्साधिकारी
राजकीय आयुर्वेद औषधालय, सवाई मानसिंह चिकित्सालय, जयपुर

महर्षि चरक : चिकित्सा को शास्त्र, सेवा को साधना और मानव-जीवन को आयुर्वेद का केन्द्र बनाने वाले महामनीषीचरक जयंती विशेष —...
17/08/2026

महर्षि चरक : चिकित्सा को शास्त्र, सेवा को साधना और मानव-जीवन को आयुर्वेद का केन्द्र बनाने वाले महामनीषी
चरक जयंती विशेष — आचार्य चरक के जीवन, कृतित्व और चिकित्सा-दर्शन को नमन
आज श्रावण शुक्ल पंचमी, नागपञ्चमी के पावन अवसर पर आयुर्वेद-जगत् के महान आचार्य महर्षि चरक का स्मरण केवल एक महान चिकित्सक के जन्मदिवस के रूप में करना पर्याप्त नहीं है। यह दिन उस विराट चिकित्सा-दृष्टि के प्रति कृतज्ञ होने का दिन है, जिसने हजारों वर्ष पूर्व मनुष्य को केवल रोगों का समूह न मानकर शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा के समन्वित अस्तित्व के रूप में देखा।
चरक जयंती की परंपरा श्रावण शुक्ल पंचमी से जुड़ी हुई है। आधुनिक भारतीय आयुर्वेदिक संस्थानों और प्रकाशनों में भी इस दिन को चरक जयंती के रूप में मनाने का उल्लेख मिलता है।
किन्तु महर्षि चरक को समझने के लिए एक बात अत्यंत आवश्यक है—
चरक का इतिहास केवल जन्मस्थान, जन्मतिथि और राजदरबार से जुड़ी कथाओं का इतिहास नहीं है। उनका वास्तविक जीवन उनकी रचना, उनके चिकित्सा-सिद्धान्तों, उनके चिकित्सकीय विवेक, उनके शिष्य-निर्माण और मानवकल्याण की उनकी दृष्टि में सुरक्षित है।
और यही कारण है कि आज भी चरक जीवित हैं—
ग्रंथ के अक्षरों में, चिकित्सक के विवेक में और रोगी की सेवा में।
🕉️ चरक कौन थे?
आयुर्वेद की परंपरा में महर्षि चरक का स्थान अत्यंत ऊँचा है। किंतु वर्तमान चरकसंहिता को समझते समय उसके ग्रंथ-निर्माण की परंपरा को समझना भी आवश्यक है।
चरकसंहिता स्वयं अपने ज्ञान-परंपरा का संबंध भगवान् पुनर्वसु आत्रेय → अग्निवेश → चरक → दृढबल की परंपरा से जोड़ती है। आधुनिक पाठ-इतिहास भी यह मानता है कि उपलब्ध चरकसंहिता मूलतः अग्निवेशतन्त्र पर आधारित है, जिसका चरक ने प्रतिसंस्कार किया और बाद में दृढबल ने उपलब्ध पाठ को पुनः पूर्ण किया।
अर्थात्—
चरक केवल एक ग्रंथ के लेखक नहीं थे; वे एक विशाल चिकित्सा-परंपरा के महान सम्पादक, चिकित्सक, विचारक और संवाहक थे।
यह बात उनकी महानता को कम नहीं करती; बल्कि और अधिक बढ़ाती है।
क्योंकि किसी प्राचीन ज्ञान-संपदा को नष्ट होने से बचाकर, उसका परीक्षण करके, उसे व्यवस्थित करके और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित कर देना स्वयं एक महान वैज्ञानिक कार्य है।
चरक के जन्म और जीवन के विषय में सत्य क्या है?
महर्षि चरक के व्यक्तिगत जीवन का विस्तृत ऐतिहासिक वृत्तांत आज उपलब्ध नहीं है।
उनके जन्मस्थान, माता-पिता, जन्मवर्ष और जीवन की प्रत्येक घटना के बारे में जो अनेक कथाएँ आज प्रचलित हैं, उनमें से सभी को समान ऐतिहासिक प्रमाण प्राप्त नहीं हैं।
कुछ परंपराएँ उन्हें कश्मीर क्षेत्र से जोड़ती हैं और कुछ परंपराओं में उन्हें कुषाण सम्राट कनिष्क के राजवैद्य के रूप में भी वर्णित किया गया है। किंतु आधुनिक इतिहासलेखन में चरक की तिथि और राजकीय संबंध को लेकर पूर्ण एकमत नहीं है। कुछ विद्वान उन्हें लगभग ईसा-पूर्व दूसरी शताब्दी के आसपास रखते हैं, जबकि चरकसंहिता का वर्तमान पाठ एक दीर्घकालीन संहिताकरण एवं पुनर्संस्कार की प्रक्रिया का परिणाम माना जाता है।
इसलिए चरक जयंती के अवसर पर हमें लोकपरंपरा का सम्मान करते हुए इतिहास और परंपरा के बीच का अंतर भी ईमानदारी से बनाए रखना चाहिए।
यही तो चरक की शिक्षा है—
“परीक्षा” के बिना किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार न करो कि वह प्रसिद्ध है।
चरकसंहिता में चिकित्सक के लिए बार-बार युक्ति, प्रत्यक्ष, अनुमान, आप्तोपदेश और परीक्षा को महत्त्व दिया गया है।
🔱 चरक की ज्ञान-परंपरा : ब्रह्मा से आत्रेय और आत्रेय से अग्निवेश
चरकसंहिता के प्रथम अध्याय में आयुर्वेद की परंपरा का वर्णन अत्यंत सुंदर ढंग से आता है।
ब्रह्मा → प्रजापति → अश्विनीकुमार → इन्द्र → आत्रेय → अग्निवेश
और फिर इस ज्ञानधारा को चरक ने आगे व्यवस्थित किया।
चरकसंहिता का प्रथम अध्याय स्वयं प्रारंभ होता है—
“अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः।”
अर्थात् अब दीर्घ जीवन के विज्ञान का विवेचन किया जाएगा।
यह संयोग नहीं है कि चरकसंहिता का प्रारंभ ही दीर्घजीवन से होता है।
चरक के लिए चिकित्सा का उद्देश्य केवल रोग हटाना नहीं था।
उनके लिए प्रश्न था—
मनुष्य स्वस्थ कैसे रहे?
उसका जीवन दीर्घ कैसे हो?
उसका शरीर समर्थ कैसे रहे?
उसकी बुद्धि और इन्द्रियाँ स्वस्थ कैसे रहें?
और वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की सार्थक यात्रा कैसे कर सके?
चरकसंहिता आयुर्वेद का प्रयोजन स्पष्ट करती है—
“प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम्
आतुरस्य विकारप्रशमनं च।”
अर्थात् आयुर्वेद के दो मूल प्रयोजन हैं—
स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के विकार का शमन।
(चरकसंहिता, सूत्रस्थान 1/26)
यही चरक की चिकित्सा-दृष्टि का मूल है।
🩺 चरक ने रोगी को केवल “रोग” नहीं माना
आज चिकित्सा-विज्ञान में patient-centred care की चर्चा होती है।
लेकिन चरक के यहाँ रोगी केवल रोग का नाम नहीं है।
वह एक विशिष्ट पुरुष, एक विशिष्ट प्रकृति, विशिष्ट दोष-दूष्य, विशिष्ट देश, काल, वय, बल, आहार, सात्म्य, मन और जीवनचर्या वाला व्यक्ति है।
इसलिए एक ही रोग के लिए प्रत्येक व्यक्ति की चिकित्सा एक जैसी नहीं हो सकती।
चरक का चिकित्सा-विज्ञान हमें सिखाता है—
रोग का नाम देखकर नहीं, रोगी को देखकर चिकित्सा करो।
यही कारण है कि आयुर्वेद में—
प्रकृति,
विकृति,
अग्नि,
दोष,
धातु,
मल,
स्रोतस,
देश,
काल,
वय,
बल,
सात्म्य,
आहार,
मन
आदि अनेक कारकों का परीक्षण किया जाता है।
यह चिकित्सा-दृष्टि आज के personalised medicine के विमर्श में भी अत्यंत महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत करती है।
त्रिदोष : चरक की चिकित्सा-दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण आधार
आज चरक का नाम लेते ही सबसे पहले वात-पित्त-कफ की चर्चा होती है।
किन्तु चरक का त्रिदोष सिद्धान्त केवल “तीन दोषों को बराबर कर देना” नहीं है।
वात, पित्त और कफ शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं से जुड़े सिद्धान्तात्मक नियामक हैं। उनकी प्रकृति, स्थान, कर्म, वृद्धि, क्षय, विकृति और चिकित्सा का विशद विवेचन चरकसंहिता में मिलता है।
चरक का संदेश था—
दोष स्वयं शत्रु नहीं हैं; उनका विकृत होना रोगकारक है।
इसीलिए चिकित्सा का उद्देश्य शरीर से वात-पित्त-कफ को समाप्त करना नहीं, बल्कि विकृत दोषों का युक्तिपूर्वक शमन और धातु-साम्य की स्थापना है।
🔥 अग्नि : चरक की चिकित्सा-दृष्टि का प्राण
महर्षि चरक ने शरीर के स्वास्थ्य में अग्नि को अत्यंत महत्त्व दिया।
आहार केवल पेट में जाने वाली वस्तु नहीं है।
उसका उचित पाचन, अवशोषण, परिवर्तन और शरीर के लिए उपयोगी होना स्वास्थ्य की मूल प्रक्रिया है।
इसीलिए चरक की चिकित्सा में—
अग्नि → आहारपाक → धातुपोषण → बल → ओज → स्वास्थ्य
की व्यापक अवधारणा दिखाई देती है।
आज जब विश्वभर में पाचन, चयापचय, आंत-मस्तिष्क संबंध, पोषण और metabolic health पर चर्चा हो रही है, तब चरक की अग्नि-संकल्पना को उसके अपने शास्त्रीय संदर्भ में समझना विशेष रूप से उपयोगी है।
🌾 आहार : चरक के लिए भोजन ही चिकित्सा का प्रथम आधार
चरकसंहिता में आहार का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आचार्य स्पष्ट करते हैं कि शरीर आहार से निर्मित होता है—
“परीक्ष्य हितमश्नीयाद् देहो ह्याहारसम्भवः।”
अर्थात् हित-अहित की परीक्षा करके भोजन करना चाहिए, क्योंकि शरीर आहार से उत्पन्न होता है।
(चरकसंहिता, सूत्रस्थान 28/41)
यहाँ चरक केवल “क्या खाएँ?” नहीं बताते।
वे पूछते हैं—
कितना खाएँ?
कब खाएँ?
किस प्रकृति का व्यक्ति क्या खाए?
किस देश में क्या खाए?
किस ऋतु में क्या खाए?
किस रोग में क्या खाए?
किस भोजन का किस द्रव्य के साथ संयोग उचित है?
यानी भोजन को उन्होंने एक व्यक्तिनिष्ठ चिकित्सा-विज्ञान का विषय बनाया।
🌍 चरक और जनपदोध्वंस : हजारों वर्ष पहले महामारी-विज्ञान की दृष्टि
चरकसंहिता का विमानस्थान, जनपदोध्वंस विमान आज विशेष ध्यान देने योग्य है।
चरक ने ऐसी परिस्थितियों का वर्णन किया है जिसमें बड़े भूभाग में रहने वाले अनेक लोगों को एक साथ रोग प्रभावित कर सकता है।
उन्होंने वायु, जल, देश और काल के विकार को जनस्वास्थ्य के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।
यह आधुनिक महामारी-विज्ञान का प्रतिरूप नहीं है, इसलिए दोनों को जबरन समान कहना उचित नहीं होगा; लेकिन यह अवश्य आश्चर्यजनक है कि प्राचीन आयुर्वेदिक चिंतन ने व्यक्तिगत रोग से आगे बढ़कर सामुदायिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय कारणों को भी चिकित्सा के दायरे में रखा।
चरक की दृष्टि में स्वास्थ्य केवल व्यक्ति की चारदीवारी के भीतर नहीं था।
स्वस्थ व्यक्ति + स्वस्थ पर्यावरण + स्वस्थ समाज = वास्तविक आरोग्य।
🧠 चरक ने मन को शरीर से अलग नहीं किया
चरकसंहिता में शारीरिक और मानसिक रोगों का विशद विवेचन मिलता है।
रजस् और तमस्, प्रज्ञापराध, शोक, भय, क्रोध, मोह, चिंता जैसे मानसिक कारकों का शरीर और स्वास्थ्य से संबंध स्वीकार किया गया है।
यहाँ चरक का दृष्टिकोण अत्यंत समग्र है—
मन शरीर को प्रभावित करता है और शरीर मन को।
आज psychosomatic medicine, stress physiology और mind-body medicine जिन विषयों पर काम कर रहे हैं, उनका शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य चरक के ग्रंथ में अनेक स्थानों पर दिखाई देता है।
🧪 चिकित्सा में “युक्ति” — चरक का वैज्ञानिक विवेक
चरक का सबसे बड़ा योगदान शायद यही है कि उन्होंने अंधानुकरण की चिकित्सा नहीं सिखाई।
एक ही द्रव्य अलग व्यक्ति में अलग प्रभाव दे सकता है।
एक ही औषधि का प्रभाव—
मात्रा,
काल,
देश,
अग्नि,
प्रकृति,
रोग,
रोगीबल,
औषधसंयोग
के अनुसार बदल सकता है।
इसीलिए चरक की चिकित्सा में युक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वह चिकित्सक को केवल शास्त्र याद करने वाला व्यक्ति नहीं बनाते।
वह उससे पूछते हैं—
**क्या तुम परिस्थिति को समझते हो?
क्या तुम रोगी को समझते हो?
क्या तुम औषधि को समझते हो?
क्या तुम देश-काल को समझते हो?
क्या तुम निर्णय ले सकते हो?**
यही कारण है कि चरक का वैद्य केवल “औषधि देने वाला” व्यक्ति नहीं है।
वह जीवन-रक्षा का विवेकी साधक है।
👨‍⚕️ चरक ने चिकित्सक के चरित्र को चिकित्सा का अंग बनाया
चरकसंहिता के विमानस्थान 8/13 में चिकित्सा-शिक्षा और शिष्य के आचार का विस्तृत वर्णन मिलता है।
शिष्य से सत्य बोलने, संयम रखने, गुरु का सम्मान करने, विनम्र रहने, एकाग्र होकर अध्ययन करने और रोगीहित को सर्वोच्च रखने जैसी अपेक्षाएँ की गई हैं।
यहाँ चिकित्सा केवल तकनीकी ज्ञान नहीं है।
चरक के अनुसार—
अशुद्ध आचरण वाला चिकित्सक, चाहे कितना भी ज्ञान रखता हो, समाज के लिए सुरक्षित चिकित्सक नहीं बन सकता।
आज जब चिकित्सा में medical ethics की चर्चा होती है, तब चरकसंहिता का यह पक्ष अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है।
🤲 वैद्य : रोगी का जीवन-सहचर
चरकसंहिता योग्य चिकित्सक को प्राणाभिसर अर्थात् प्राणों का सहचर मानती है और अयोग्य चिकित्सक को रोग का सहचर बताती है।
कितनी गहरी बात है!
वैद्य की पहचान केवल उसके ज्ञान से नहीं—
उसके विवेक, करुणा, कौशल, सत्यनिष्ठा और रोगी के प्रति उत्तरदायित्व से होती है।
आज भी प्रत्येक चिकित्सक को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए—
“मैं रोगी का उपचार कर रहा हूँ या केवल रोग का?”
चरक का उत्तर स्पष्ट है—
रोगी का।
चरक और रसायन चिकित्सा
महर्षि चरक ने चिकित्सा को केवल रोग हटाने तक सीमित नहीं रखा।
उन्होंने रसायन को जीवन की गुणवत्ता, बल, ओज, बुद्धि, स्मृति, आयु और स्वास्थ्य के व्यापक संदर्भ में रखा।
चरकसंहिता के चिकित्सास्थान, रसायन अध्याय में रसायन चिकित्सा का विस्तृत विवेचन मिलता है।
इसी परंपरा में च्यवनप्राश का भी प्रसिद्ध वर्णन मिलता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि आज बाजार में उपलब्ध प्रत्येक “च्यवनप्राश” को सीधे चरकसंहिता का मूल सूत्र मान लिया जाए। शास्त्रीय योग और वर्तमान व्यावसायिक उत्पादों में अंतर समझना आवश्यक है।
लेकिन इतना निर्विवाद है कि चरक परंपरा ने रसायन चिकित्सा को आयुर्वेद के प्रमुख अंग के रूप में व्यवस्थित किया।
📚 चरकसंहिता : केवल चिकित्सा की पुस्तक नहीं, एक ज्ञानकोश
चरकसंहिता में—
आयु और दीर्घजीवन,
शरीर और मन,
दोष-धातु-मल,
अग्नि,
आहार,
औषधि,
निदान,
चिकित्सा,
रसायन,
वाजीकरण,
चिकित्सक-शिक्षा,
रोगी-चिकित्सक संबंध,
चिकित्सा-नीति,
जनस्वास्थ्य,
पर्यावरण,
महामारी-सदृश परिस्थितियाँ,
चिकित्सा-तर्क,
अनुसंधानात्मक विचार
का विस्तृत संसार मिलता है।
इसीलिए चरकसंहिता का अध्ययन केवल “कुछ औषधियों के नाम याद करना” नहीं है।
चरक को पढ़ना अर्थात् चिकित्सा-दर्शन को पढ़ना है।
🔬 चरक और आधुनिक विज्ञान : तुलना नहीं, संवाद आवश्यक है
चरक को महान सिद्ध करने के लिए यह कहना आवश्यक नहीं कि आधुनिक विज्ञान की प्रत्येक खोज पहले ही चरकसंहिता में लिखी हुई थी।
यह दृष्टिकोण न तो शास्त्र के साथ न्याय करता है, न विज्ञान के साथ।
सही दृष्टिकोण यह है—
चरक के सिद्धान्तों को उनके मूल संदर्भ में समझें, और जहाँ आधुनिक विज्ञान के साथ संवाद सम्भव हो वहाँ वैज्ञानिक अनुसंधान करें।
चरक की अग्नि को आधुनिक metabolism से जोड़कर अध्ययन किया जा सकता है।
प्रकृति और personalised medicine के बीच शोध किया जा सकता है।
जनपदोध्वंस के पर्यावरणीय चिंतन का public health के संदर्भ में अध्ययन किया जा सकता है।
रसायन अवधारणा को healthy ageing के संदर्भ में शोधित किया जा सकता है।
आहार-विधि का nutrition science के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।
यही चरक को आधुनिक बनाने का सही मार्ग है—
चरक को बदलना नहीं, चरक को गहराई से समझना।
🪔 चरक का सबसे बड़ा संदेश : चिकित्सा व्यवसाय नहीं, लोकसेवा है
चरकसंहिता में चिकित्सक की शिक्षा, आचार, रोगीहित और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का जिस प्रकार वर्णन मिलता है, उससे स्पष्ट है कि चिकित्सा को केवल धनार्जन का साधन नहीं माना गया।
चरक की चिकित्सा-दृष्टि में—
ज्ञान का उद्देश्य अहंकार नहीं, प्राणरक्षा है।
औषधि का उद्देश्य व्यापार नहीं, रोगशमन है।
चिकित्सक का उद्देश्य प्रसिद्धि नहीं, रोगीहित है।
इसीलिए चरक का वैद्य पहले मनुष्य है, फिर चिकित्सक।
🌺 चरक जयंती पर आज हमें क्या संकल्प लेना चाहिए?
चरक जयंती केवल प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करने का पर्व नहीं होना चाहिए।
यदि हम वास्तव में चरक को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो—
संहिताएँ पढ़ें।
श्लोकों को समझें।
उनका संदर्भ जानें।
युक्ति विकसित करें।
अनुसंधान करें।
औषधीय वनस्पतियों का संरक्षण करें।
रोगी के प्रति करुणा रखें।
आहार और दिनचर्या के विज्ञान को समाज तक पहुँचाएँ।
मिथ्या चिकित्सा-दावों से जनता को बचाएँ।
और आयुर्वेद को प्रमाण, तर्क और शास्त्रीय मर्यादा के साथ प्रस्तुत करें।
चरक का सम्मान केवल “महर्षि चरक अमर रहें” कहने से नहीं होगा।
**चरक का सम्मान तब होगा जब चिकित्सक चरक की तरह सीखना शुरू करेगा।
जब विद्यार्थी चरक की तरह प्रश्न पूछेगा।
जब वैद्य चरक की तरह रोगी को समझेगा।
जब शोधकर्ता चरक के सिद्धान्तों को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से परखेगा।
और जब समाज स्वास्थ्य को केवल बीमारी न होने की अवस्था न मानकर जीवन की समग्र गुणवत्ता समझेगा।**
चरक : एक व्यक्ति से आगे बढ़कर एक परंपरा
महर्षि चरक का व्यक्तिगत जीवन इतिहास के धुँधले पृष्ठों में कहीं सीमित हो सकता है।
लेकिन उनका बौद्धिक जीवन आज भी हमारे सामने खुला हुआ है।
वह जीवन हमें बताता है—
आयुर्वेद केवल औषधि नहीं।
आयुर्वेद केवल पंचकर्म नहीं।
आयुर्वेद केवल रोगों की सूची नहीं।
आयुर्वेद केवल प्राचीन चिकित्सा-पद्धति भी नहीं।
आयुर्वेद है—
जीवन को समझने का विज्ञान।
और इस विज्ञान को व्यवस्थित करने वाले महान मनीषियों में चरक का स्थान अत्यंत ऊँचा है।
इसलिए चरक जयंती पर हमें केवल चरक का स्मरण नहीं करना चाहिए—
हमें चरक-दृष्टि को पुनः जीवित करना चाहिए।
🕉️ चरक की वाणी में आयुर्वेद का सार
चरकसंहिता के प्रारंभ से लेकर अंत तक एक विचार निरंतर दिखाई देता है—
जीवन की रक्षा करो।
स्वास्थ्य की रक्षा करो।
रोग को समझो।
कारण को समझो।
रोगी को समझो।
देश-काल को समझो।
औषधि को समझो।
और चिकित्सा को विवेकपूर्वक करो।
यही कारण है कि हजारों वर्षों की यात्रा के बाद भी चरकसंहिता आज आयुर्वेद के मूलभूत ग्रंथों में प्रतिष्ठित है।
चरकसंहिता का वर्तमान स्वरूप अग्निवेश की परंपरा पर चरक के प्रतिसंस्कार और दृढबल के पुनर्संस्कार से निर्मित हुआ माना जाता है; अतः इसे एक दीर्घकालीन ज्ञान-परंपरा का जीवित दस्तावेज समझना अधिक उचित है।
🙏 चरक जयंती पर विनम्र नमन
न धन की आकांक्षा,
न यश की लालसा,
न प्रसिद्धि का मोह—
यदि चिकित्सा का केन्द्र मानव-जीवन का संरक्षण बन जाए, तो वही चरक की वास्तविक परंपरा है।
आज चरक जयंती के पावन अवसर पर उस महान परंपरा को शत-शत नमन—
जिसने कहा—
“स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम्, आतुरस्य विकारप्रशमनम्।”
और जिसने चिकित्सा को केवल रोग हटाने की कला न बनाकर—
स्वस्थ जीवन की रक्षा, रोगी के दुःख का शमन और समस्त प्राणिजगत् के हित की साधना बनाया।
महर्षि चरक को कोटि-कोटि नमन।
चरकसंहिता को प्रणाम।
आयुर्वेद की गुरु-परंपरा को प्रणाम।
चरक को पढ़िए नहीं—चरक को समझिए।
चरक को मानिए नहीं—चरक की दृष्टि को जीवन में उतारिए।
और आयुर्वेद को केवल परंपरा नहीं—प्रमाण, तर्क, करुणा और अनुसंधान के साथ आगे बढ़ाइए।**
॥ आयुर्वेदाय नमः ॥
📜 प्रमुख शास्त्रीय आधार
१. चरकसंहिता — सूत्रस्थान 1/1–30
आयुर्वेद का प्रयोजन, आयुर्वेद की परंपरा, अष्टाङ्ग आयुर्वेद तथा चिकित्सा-दर्शन।
२. चरकसंहिता — सूत्रस्थान 28
आहार, हित-अहित, परीक्षा, शरीर और आहार का संबंध।
३. चरकसंहिता — सूत्रस्थान 29–30
वैद्य के गुण, प्राणरक्षा तथा संपूर्ण तन्त्र के मूल चिकित्सा-सिद्धान्त।
४. चरकसंहिता — विमानस्थान 3
जनपदोध्वंस एवं सामुदायिक स्वास्थ्य की अवधारणा।
५. चरकसंहिता — विमानस्थान 8/13
चिकित्साशिक्षा, गुरु-शिष्य परंपरा एवं वैद्यकीय आचार।
६. चरकसंहिता — चिकित्सास्थान 1
रसायन चिकित्सा एवं च्यवनप्राश परंपरा।
७. चरकसंहिता — संपूर्ण ग्रंथ-परंपरा
पुनर्वसु आत्रेय की शिक्षाएँ, अग्निवेश का तन्त्र, चरक का प्रतिसंस्कार तथा दृढबल का पुनर्संस्कार—वर्तमान चरकसंहिता के निर्माण की प्रमुख परंपरा।
डॉ॰ रवीन्द्र गौतम
आयुर्वेद चिकित्साधिकारी
“स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम् — आतुरस्य विकारप्रशमनम्”
#आयुर्वेद #स्वस्थजीवनशैली #दिनचर्या #दीर्घायु #स्वास्थ्य #आयुर्वेदिकजीवनशैली #योग #प्राणायाम #नशामुक्तजीवन #स्वस्थवृद्धावस्था

🌺 आचार्य चरक जयंती : केवल स्मरण नहीं, संकल्प का पर्व 🌺आचार्य चरक जयंती की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏🌿भारतीय आयुर्वे...
16/08/2026

🌺 आचार्य चरक जयंती : केवल स्मरण नहीं, संकल्प का पर्व 🌺
आचार्य चरक जयंती की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏🌿
भारतीय आयुर्वेद परम्परा के महान आचार्य, चिकित्साशास्त्र के मनीषी एवं चरक संहिता के प्रणेता आचार्य चरक केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं हैं; वे चिकित्सक-धर्म, रोगी-सेवा, स्वास्थ्य-संरक्षण, ज्ञान-साधना और जनकल्याण की उस महान परम्परा के प्रतीक हैं, जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है।
परम्परानुसार श्रावण शुक्ल पंचमी, नागपञ्चमी के पावन अवसर पर आचार्य चरक जयंती का स्मरण किया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन तिथि 17 अगस्त, सोमवार को है। 🌿
🙏 आइए, इस बार चरक जयंती केवल शुभकामना देकर न मनाएँ—इसे संकल्प और सेवा का पर्व बनाएँ।
मेरा सभी चिकित्सक बंधुओं, आयुर्वेदाचार्यों, स्वास्थ्यकर्मियों, विद्यार्थियों, शिक्षकों तथा स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्यरत सभी साथियों से विनम्र आग्रह है कि अपने-अपने—
🏥 चिकित्सालयों
🌿 औषधालयों
🏫 शिक्षण संस्थानों
🩺 चिकित्सकीय प्रतिष्ठानों
🏢 कार्यालयों एवं कार्यस्थलों
पर आचार्य चरक जयंती के अवसर पर छोटे-बड़े कार्यक्रम अवश्य आयोजित करें।
कार्यक्रम भव्य होना आवश्यक नहीं है।
भावना बड़ी होनी चाहिए।
संकल्प सच्चा होना चाहिए।
और उद्देश्य जनकल्याण का होना चाहिए।
एक छोटा-सा आयोजन भी हो सकता है—
🌺 आचार्य चरक के चित्र पर पुष्पार्चन एवं दीप प्रज्वलन।
📖 चरक संहिता के किसी सूत्र का वाचन एवं अर्थ-चर्चा।
🩺 चिकित्सक-धर्म एवं चरक की चिकित्सा-दृष्टि पर परिचर्चा।
🌿 आयुर्वेद एवं स्वस्थ जीवनशैली पर स्वास्थ्य-जागरण कार्यक्रम।
👨‍⚕️ युवा चिकित्सकों एवं विद्यार्थियों के लिए चरक-चिन्तन।
👨‍👩‍👧‍👦 जनसामान्य के लिए स्वास्थ्य-जागरूकता व्याख्यान।
🌿 चरक को केवल चित्र में नहीं, चरित्र में उतारें
आचार्य चरक को केवल इतिहास के पन्नों में सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं है।
उनकी रोगी-सेवा की भावना,
उनकी ज्ञान-साधना,
उनकी चिकित्सकीय दृष्टि,
उनका चिकित्सक-धर्म,
उनकी वैज्ञानिक जिज्ञासा
और जनकल्याण की भावना को अपने कार्य में उतारना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
🇮🇳 आइए, अपने दायित्व का बोध करें।
माँ भारती की सेवा का यह कार्य किसी एक व्यक्ति का कार्य नहीं है।
यह हम सबका सामूहिक संकल्प है।
हम—
आपसी सहयोग से आगे बढ़ें,
समन्वय से कार्य करें,
तालमेल से शक्ति बढ़ाएँ,
सूझबूझ से निर्णय लें,
और आत्मीयता से कार्यकर्ताओं को जोड़ें।
क्योंकि कभी-कभी—
एक छोटा-सा चरक जयंती कार्यक्रम
एक चिकित्सक को प्रेरित कर सकता है,
एक विद्यार्थी को आयुर्वेद से जोड़ सकता है,
एक परिवार को स्वस्थ जीवनशैली के लिए प्रेरित कर सकता है,
और अनेक लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता जगा सकता है।
इसलिए किसी भी प्रयास को छोटा न समझें।
आपके कार्यस्थल पर जलाया गया एक दीपक,
चरक संहिता का पढ़ा गया एक सूत्र,
किसी रोगी के साथ की गई एक संवेदनशील बातचीत,
किसी विद्यार्थी को दी गई एक प्रेरणा—
आयुर्वेद की महान परम्परा को आगे बढ़ाने की दिशा में एक कदम हो सकता है।
🌺 आइए, इस चरक जयंती पर एक संकल्प लें—
आयुर्वेद को जानेंगे।
आयुर्वेद को समझेंगे।
आचार्य चरक के सिद्धान्तों को अपने आचरण में उतारेंगे।
रोगी को केवल रोगी नहीं, बल्कि सेवा के पात्र के रूप में देखेंगे।
और स्वास्थ्य-संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुँचाएँगे।
चरक जयंती केवल एक तिथि नहीं—
यह चिकित्सक के ज्ञान, सेवा, नैतिकता और राष्ट्रधर्म को पुनः स्मरण करने का अवसर है। 🌿
🙏 आइए, आचार्य चरक को नमन करें और उनके ज्ञान-दीप को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लें।
आचार्य चरक जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ। 🌺🙏
— आपका अपना
वैद्य रवीन्द्र गौतम
आयुर्वेद चिकित्साधिकारी
राजकीय आयुर्वेद औषधालय
सवाई मानसिंह चिकित्सालय
, जयपुर
🇮🇳 “माँ भारती की सेवा में—स्वास्थ्य जागरण का संकल्प, जन-जन के आरोग्य का प्रयास।”
वन्दे मातरम्।
भारत माता की जय। 🇮🇳🌿
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Address

श्री महावीर आयुर्वेद चिकित्सालय, मैन काँटा चौराहा, कालवाड़ रोड़, झोटवाड़ा जयपुर, राजस्थान।
Jaipur
302001

Opening Hours

Monday 9am - 8pm
Tuesday 9am - 8pm
Wednesday 9am - 8pm
Thursday 9am - 8pm
Friday 9am - 8pm
Saturday 9am - 8pm
Sunday 9am - 8pm

Telephone

+919414752038

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