01/09/2026
राष्ट्रीय पोषण माह विशेष।
“पोषण भी, सीखना भी”
गर्भ से बाल्यावस्था तक—संतुलित आहार, स्वस्थ शरीर और सक्षम मस्तिष्क की आधारशिला
लेखक : डॉ॰ रवीन्द्र गौतम
आयुर्वेद चिकित्साधिकारी
राजकीय आयुर्वेद औषधालय, सवाई मानसिंह चिकित्सालय, जयपुर
सितम्बर का महीना आते ही राष्ट्रीय पोषण माह के माध्यम से देशभर में पोषण के प्रति जन-जागरूकता का अभियान प्रारम्भ होता है। पोषण को केवल भूख मिटाने या पेट भरने का विषय समझना पर्याप्त नहीं है। पोषण का सम्बन्ध बच्चे की वृद्धि, शरीर की शक्ति, रोग-प्रतिरोधक क्षमता, मानसिक विकास, सीखने की क्षमता और भविष्य के स्वास्थ्य से है।
भारत सरकार के पोषण अभियानों में “पोषण भी, पढ़ाई भी” जैसी अवधारणा इसी व्यापक सोच को सामने रखती है कि प्रारम्भिक बाल्यावस्था में पोषण, देखभाल और सीखने का वातावरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
आयुर्वेद ने भी आहार को जीवन के प्रमुख आधारों में स्थान दिया है। इसलिए पोषण माह केवल यह पूछने का अवसर नहीं है कि “क्या खाएँ?” बल्कि यह समझने का अवसर भी है कि कितना खाएँ, कब खाएँ, कैसे खाएँ और किस व्यक्ति के लिए कौन-सा आहार उचित है।
पोषण की शुरुआत जन्म के बाद नहीं, गर्भकाल से होती है
बच्चे के स्वस्थ विकास की आधारभूमि गर्भकाल से ही तैयार होने लगती है। गर्भवती माता का स्वास्थ्य, उसका भोजन, पर्याप्त विश्राम, नियमित स्वास्थ्य-जाँच तथा मानसिक प्रसन्नता—इन सभी का महत्व है।
गर्भावस्था में भोजन पर्याप्त, विविध, स्वच्छ, ताजा और सुपाच्य होना चाहिए। दालें और अन्य प्रोटीन स्रोत, अनाज, मौसमी फल एवं सब्जियाँ, उपयुक्त दुग्ध पदार्थ, मेवे एवं बीज तथा आवश्यकतानुसार उचित वसा भोजन में सम्मिलित किए जा सकते हैं।
गर्भवती महिला के लिए लौह, फोलेट, कैल्शियम, विटामिन डी, विटामिन बी-12 आदि पोषक तत्त्वों की आवश्यकता व्यक्ति की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए इनकी पूर्ति चिकित्सकीय सलाह एवं आवश्यक जाँच के आधार पर करना अधिक उचित है।
यह भ्रान्ति भी दूर होनी चाहिए कि गर्भवती महिला को “दो व्यक्तियों का भोजन” करना चाहिए। इसका अर्थ भोजन की मात्रा को अनावश्यक रूप से दुगुना करना नहीं, बल्कि भोजन की गुणवत्ता और पोषकता को बेहतर बनाना है।
जन्म के बाद शिशु का पहला आहार—माँ का दूध
शिशु के जीवन की पोषण-यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण चरण जन्म के बाद प्रारम्भ होता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की वर्तमान अनुशंसाओं के अनुसार स्वस्थ शिशु को जन्म के प्रथम घंटे में स्तनपान प्रारम्भ कराने तथा जीवन के पहले छह महीने तक केवल माँ का दूध देने की सलाह दी जाती है। इस अवधि में सामान्यतः पानी सहित अन्य खाद्य या पेय देने की आवश्यकता नहीं होती। छह महीने की आयु के आसपास सुरक्षित और पौष्टिक पूरक आहार प्रारम्भ करते हुए स्तनपान दो वर्ष या उससे अधिक समय तक जारी रखा जा सकता है।
इसलिए परिवारों को एक सरल बात याद रखनी चाहिए—
जन्म से छह माह तक—माँ का दूध।
छह माह के बाद—माँ का दूध और पूरक आहार।
यह जानकारी प्रत्येक परिवार तक पहुँचना राष्ट्रीय पोषण अभियान की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
छह महीने के बाद पूरक आहार क्यों आवश्यक है?
लगभग छह महीने की आयु के बाद बच्चे की ऊर्जा और पोषक तत्त्वों की आवश्यकता बढ़ने लगती है। केवल स्तनपान उसकी बढ़ती हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं रहता। इसलिए स्तनपान जारी रखते हुए पूरक आहार प्रारम्भ किया जाता है।
शुरुआत में भोजन—
अच्छी तरह पका हुआ,
नरम,
स्वच्छ,
आसानी से निगलने योग्य
होना चाहिए।
घर में उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों से मूंग की खिचड़ी, दलिया, अच्छी तरह पकी दाल, मसली हुई सब्जियाँ, उपयुक्त फल तथा अनाज-दाल के संयोजन दिए जा सकते हैं।
बच्चे की आयु और क्षमता बढ़ने के साथ भोजन की मात्रा, गाढ़ापन और विविधता धीरे-धीरे बढ़ाई जानी चाहिए। बच्चे को भूख और तृप्ति के संकेतों के अनुसार खिलाना चाहिए; भोजन के लिए प्रोत्साहित करें, लेकिन जबरदस्ती न करें।
बच्चे को केवल पेट भरना नहीं है; उसे वृद्धि और विकास के लिए विविध पोषण देना है।
आयुर्वेद में आहार—केवल खाद्य पदार्थ नहीं, पूरी आहार-पद्धति
आयुर्वेद की विशेषता यह है कि उसने केवल “क्या खाना चाहिए” नहीं बताया, बल्कि भोजन की प्रकृति, निर्माण-विधि, संयोजन, मात्रा, देश, काल, भोजन करने की विधि तथा भोजन करने वाले व्यक्ति की स्थिति को भी महत्व दिया।
चरकसंहिता में इसे अष्टाहारविधिविशेषायतन के माध्यम से समझाया गया है—
प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोगसंस्था और उपयोक्ता।
सरल भाषा में इसका अर्थ है—
भोजन अच्छा है या नहीं, इसका निर्णय केवल खाद्य पदार्थ देखकर नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि वह किस व्यक्ति के लिए, कितनी मात्रा में, किस समय, किस ऋतु में और किस प्रकार तैयार करके ग्रहण किया जा रहा है।
इसलिए आयुर्वेद का पोषण-विज्ञान अत्यन्त व्यावहारिक है।
उचित आहार + उचित मात्रा + उचित समय + उचित विधि + व्यक्ति के अनुकूलता = वास्तविक पोषण।
“बुद्धिवर्धक भोजन” के नाम पर भ्रम से बचें
आज बाजार और सामाजिक माध्यमों पर अनेक खाद्य पदार्थों एवं औषधियों को “बुद्धि बढ़ाने”, “स्मरणशक्ति बढ़ाने” या “बच्चे को असाधारण रूप से तेज बनाने” के नाम पर प्रचारित किया जाता है।
यहाँ सावधानी आवश्यक है।
बच्चे की मेधा और सीखने की क्षमता किसी एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर नहीं करती। इसके निर्माण में पर्याप्त पोषण के साथ आनुवंशिकता, नींद, शारीरिक गतिविधि, खेल, मानसिक सुरक्षा, पारिवारिक स्नेह, संवाद, शिक्षा और सीखने का वातावरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए किसी एक खाद्य पदार्थ को “चमत्कारी बुद्धिवर्धक” कहना उचित नहीं है।
बच्चे के लिए वास्तविक मेध्य आहार वह है जो उसके शरीर और मस्तिष्क को आवश्यक पोषक तत्त्व उपलब्ध कराए और उसके साथ स्वस्थ दिनचर्या भी हो।
बच्चे की थाली में विविधता ही वास्तविक शक्ति है
पोषण का अर्थ महँगा भोजन करना नहीं है। हमारी भारतीय रसोई में ही अनेक प्रकार के पौष्टिक खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं।
अनाज
गेहूँ, चावल, जौ, बाजरा, ज्वार, मक्का आदि।
दालें एवं दलहन
मूंग, मसूर, चना, अरहर, उड़द आदि।
सब्जियाँ
हरी पत्तेदार सब्जियों सहित विभिन्न रंगों की मौसमी सब्जियाँ।
फल
स्थानीय एवं मौसमी फल।
दुग्ध पदार्थ
दूध, दही आदि—यदि व्यक्ति को अनुकूल हों।
मेवे एवं बीज
बादाम, अखरोट, तिल, अलसी आदि का उचित मात्रा में उपयोग।
स्वास्थ्यकर वसा
घी एवं उपयुक्त खाद्य तेलों का संतुलित उपयोग।
इस विविधता का उद्देश्य किसी एक खाद्य पदार्थ को “सर्वश्रेष्ठ” घोषित करना नहीं, बल्कि अलग-अलग खाद्य समूहों से शरीर को आवश्यक पोषक तत्त्व उपलब्ध कराना है।
आयुर्वेद के छह रस और भोजन की विविधता
आयुर्वेद ने आहार में—
मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय
इन छह रसों का वर्णन किया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक भोजन में छहों रस समान मात्रा में लेने ही चाहिए। इसका व्यापक संदेश भोजन में विविधता, संतुलन और व्यक्ति-ऋतु के अनुसार उचित चयन से है।
एक ही प्रकार का भोजन लगातार करते रहना उचित नहीं। स्थानीय, मौसमी और विविध खाद्य पदार्थों का संतुलित उपयोग अधिक व्यावहारिक है।
पोषण केवल “क्या खाएँ” नहीं—“कैसे खाएँ” भी है
आयुर्वेद की आहार-विधि का यह अत्यन्त महत्वपूर्ण पक्ष है।
भोजन—
ताजा हो, स्वच्छ हो, उचित मात्रा में हो, अच्छी तरह चबाकर खाया जाए और पाचनशक्ति के अनुकूल हो।
भोजन करते समय अत्यधिक जल्दी, तनाव और अनावश्यक ध्यान-विभाजन से बचना चाहिए।
विशेषकर बच्चों को भोजन कराते समय मोबाइल या दूरदर्शन का सहारा लेकर उन्हें अनजाने में लगातार खिलाते रहना उचित आदत नहीं है।
बच्चे को भोजन का स्वाद, भूख और तृप्ति पहचानना भी सीखना चाहिए।
भोजन का समय केवल खिलाने का समय नहीं है; यह परिवार, संवाद और संस्कार का समय भी है।
पेट भरना और पोषण पाना—दो अलग बातें हैं
आज समाज में कुपोषण के दो रूप दिखाई देते हैं।
एक ओर पर्याप्त भोजन न मिलने से अल्पपोषण की समस्या है, तो दूसरी ओर अत्यधिक ऊर्जा वाले लेकिन पोषकता में कमजोर खाद्य पदार्थों के कारण अधिक वजन और मोटापे की समस्या बढ़ रही है।
अत्यधिक मिठाइयाँ, मीठे पेय, तले हुए पदार्थ, अत्यधिक नमकीन खाद्य पदार्थ और पैकेट वाले अल्पपोषक खाद्य पदार्थ यदि नियमित भोजन का स्थान लेने लगें, तो पेट तो भर सकता है, लेकिन शरीर को संतुलित पोषण नहीं मिल पाता।
इसलिए याद रखें—
“पेट भरना ही पोषण नहीं है।”
विरुद्ध आहार को भी सही अर्थ में समझें
विरुद्ध आहार के विषय में आज सामाजिक माध्यमों पर अनेक प्रकार की सूचियाँ प्रचलित हैं। किन्तु आयुर्वेद का विरुद्ध आहार सिद्धान्त केवल “यह चीज उसके साथ कभी नहीं खानी चाहिए” जैसी छोटी सूची तक सीमित नहीं है।
चरकसंहिता में आहार की अनुकूलता और प्रतिकूलता को देश, काल, अग्नि, मात्रा, संस्कार, वीर्य, संयोग, क्रम और उपयोग की विधि आदि अनेक आधारों पर समझाया गया है।
अर्थात् भोजन के प्रति भय उत्पन्न करना आयुर्वेद का उद्देश्य नहीं है।
उद्देश्य है—
भोजन के संयोजन, मात्रा, समय, तैयारी और व्यक्ति की पाचनशक्ति को समझकर उचित आहार लेना।
इसलिए इंटरनेट पर प्रसारित प्रत्येक “विरुद्ध आहार सूची” को शास्त्रीय सिद्धान्त मान लेना उचित नहीं है।
आज बच्चों की थाली के सामने सबसे बड़ी चुनौती
बच्चा खाना नहीं खाता—मोबाइल चला दिया जाता है।
सब्जी नहीं खाता—पैकेट वाला खाद्य पदार्थ दे दिया जाता है।
रोता है—चॉकलेट दे दी जाती है।
प्यास लगती है—मीठा पेय दे दिया जाता है।
धीरे-धीरे बच्चा घर के भोजन की अपेक्षा अत्यधिक स्वाद वाले पैकेट खाद्य पदार्थों का अभ्यस्त होने लगता है।
इस आदत को बदलने के लिए किसी महँगी औषधि की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है परिवार की भोजन-पद्धति में सुधार की।
घर का भोजन बढ़ाइए।
पैकेट वाले खाद्य पदार्थ घटाइए।
मीठे पेय कम कीजिए।
फल-सब्जियों की विविधता बढ़ाइए।
बच्चे को भोजन के लिए प्रोत्साहित कीजिए, जबरदस्ती मत कीजिए।
भोजन के समय मोबाइल को दूर रखिए।
पोषण की पहली पाठशाला—परिवार
बच्चे को स्वस्थ भोजन सिखाने का सबसे प्रभावी तरीका माता-पिता का अपना आचरण है।
यदि घर में माता-पिता स्वयं फल-सब्जियाँ खाते हैं, समय पर भोजन करते हैं, अत्यधिक तले-पैकेट वाले खाद्य पदार्थों से बचते हैं, पर्याप्त नींद लेते हैं और शारीरिक गतिविधि को जीवन का हिस्सा बनाते हैं, तो बच्चा भी स्वाभाविक रूप से वही सीखता है।
इसलिए बच्चे को केवल पौष्टिक भोजन देना पर्याप्त नहीं है।
उसे स्वस्थ भोजन की संस्कृति भी देनी होगी।
पोषण और सीखना—दोनों साथ-साथ
एक बच्चा केवल भोजन से स्वस्थ नहीं बनता।
उसे चाहिए—
पौष्टिक भोजन, पर्याप्त नींद, खेल-कूद, शारीरिक गतिविधि, परिवार का स्नेह, संवाद, मानसिक सुरक्षा और सीखने का अवसर।
प्रारम्भिक बाल्यावस्था विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत सरकार के 2026 के पोषण अभियान में भी जीवन के प्रथम वर्षों में मस्तिष्क विकास, पोषण, उत्तरदायी देखभाल और प्रारम्भिक सीखने को परस्पर जुड़ा हुआ माना गया है।
अर्थात्—
थाली में पोषण हो और वातावरण में सीखना।
शरीर को भोजन मिले और मन को स्नेह।
मस्तिष्क को पोषण मिले और जीवन को संस्कार।
यही “पोषण भी, पढ़ाई भी” की वास्तविक भावना है।
राष्ट्रीय पोषण माह में पाँच सरल संकल्प
इस पोषण माह में प्रत्येक परिवार पाँच संकल्प ले सकता है—
पहला— घर के ताजे, स्थानीय और विविध भोजन को प्राथमिकता देंगे।
दूसरा— बच्चों के भोजन में अनाज, दाल एवं अन्य प्रोटीन स्रोत, सब्जियाँ, फल, उपयुक्त दुग्ध पदार्थ तथा मेवे एवं बीजों की विविधता रखेंगे।
तीसरा— अत्यधिक मीठे पेय, तले हुए खाद्य पदार्थ और पैकेट वाले खाद्य पदार्थों को नियमित भोजन का आधार नहीं बनने देंगे।
चौथा— बच्चे को भोजन के लिए प्रोत्साहित करेंगे, लेकिन जबरदस्ती नहीं करेंगे और भोजन के समय मोबाइल की आदत को कम करेंगे।
पाँचवाँ— भोजन के साथ पर्याप्त नींद, खेल, शारीरिक गतिविधि, अध्ययन और पारिवारिक संवाद को भी बच्चे के स्वास्थ्य का हिस्सा मानेंगे।
राष्ट्रीय पोषण माह का वास्तविक संदेश
पोषण माह केवल पोस्टर लगाने या एक महीने तक जागरूकता कार्यक्रम करने का अवसर नहीं है। यह अपने घर की रसोई और अपनी थाली को पुनः देखने का अवसर है।
हम स्वयं से पूछें—
क्या हमारे घर का भोजन विविध है?
क्या बच्चों को प्रतिदिन पर्याप्त पौष्टिक भोजन मिल रहा है?
क्या उनके भोजन में दाल एवं अन्य प्रोटीन स्रोत पर्याप्त हैं?
क्या फल और सब्जियाँ नियमित रूप से शामिल हैं?
क्या पैकेट वाले खाद्य पदार्थ आवश्यकता से अधिक तो नहीं?
क्या भोजन के समय मोबाइल चलता है?
क्या बच्चे पर्याप्त सोते और खेलते हैं?
क्या गर्भवती माता को पर्याप्त और संतुलित आहार मिल रहा है?
क्या शिशु को पहले छह महीने केवल स्तनपान मिला?
क्या छह महीने के बाद समय पर पूरक आहार प्रारम्भ किया गया?
यदि इनमें कहीं सुधार की आवश्यकता दिखाई देती है, तो परिवर्तन आज और अपने घर से प्रारम्भ होना चाहिए।
अन्ततः—पोषण की सही परिभाषा क्या है?
पोषण केवल पेट भरना नहीं है।
पोषण केवल वजन बढ़ाना नहीं है।
पोषण केवल कैलोरी गिनना नहीं है।
पोषण केवल विटामिन की गोली लेना नहीं है।
पोषण महँगा भोजन करना भी नहीं है।
पोषण है—शरीर की आवश्यकता के अनुसार विविध, स्वच्छ, संतुलित और उचित मात्रा में भोजन ग्रहण करना; उसे उचित विधि से लेना; अपनी पाचनशक्ति, आयु, ऋतु और स्वास्थ्य की स्थिति को समझना तथा उसके साथ स्वस्थ जीवनशैली अपनाना।
आयुर्वेद का आहार-विज्ञान हमें यही व्यापक दृष्टि देता है।
गर्भ से लेकर बाल्यावस्था तक उचित पोषण बच्चे के स्वस्थ विकास की आधारभूमि तैयार करता है। जब बच्चे स्वस्थ होंगे, वे बेहतर ढंग से सीखेंगे; जब परिवार स्वस्थ होंगे, समाज अधिक सक्षम होगा; और जब समाज स्वस्थ होगा, तब राष्ट्र अधिक सशक्त होगा।
इसलिए इस राष्ट्रीय पोषण माह का संकल्प केवल इतना न हो कि “हम अच्छा भोजन खाएँगे।”
संकल्प यह हो—
“हर घर की थाली बने स्वास्थ्य की पाठशाला।”
“पोषण भी—पढ़ाई भी।”
“स्वस्थ बालक—स्वस्थ परिवार—स्वस्थ समाज—स्वस्थ राष्ट्र।”
— डॉ॰ रवीन्द्र गौतम
आयुर्वेद चिकित्साधिकारी
राजकीय आयुर्वेद औषधालय, सवाई मानसिंह चिकित्सालय, जयपुर