21/09/2025
आदिवासी का स्टेटस कोई गरीबी हटाओ योजना नहीं
पिछले कुछ दशकों से भारत में सबको आदिवासी वर्ग में शामिल होने की चाहत होने लगी है। लगभग हर राज्य में ऐसे समुदाय हैं जो आदिवासी बनने की चाहत रखते हैं। मणिपुर, आसाम, बंगाल, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित विभिन्न राज्यों में ऐसी जमात मौजूद है जो आदिवासी बनना चाहता है और आदिवासी बन कर आदिवासी सूची में शामिल होना चाहता है।
2006-07 में राजस्थान में गुर्जर समुदाय जोकि पहले से ओबीसी वर्ग में है उसने आदिवासी वर्ग में शामिल होने के आन्दोलन का रास्ता अपनाया। जिसके प्रतिरोध में राजस्थान का मीणा आदिवासी समुदाय उठ खड़ा हुआ। हाल ही में मणिपुर में इसी तरह का घटानक्रम देखने को मिला है।
वर्तमान में झारखण्ड में कुर्मी/कुडमी जाति जोकि पहले से ओबीसी में शामिल है तो आदिवासी क्यों बनना चाहती है। इस समुदाय को भी 1965 में लोकुर समिति आदिवासियत के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश कर चुकी है। झारखण्ड में कुर्मी/कुडमी समुदाय ही सबसे अधिक पांचवी अनुसूची क्षेत्रों और पेसा कानून का विरोध करने में सबसे आगे रही है।
पिछड़े वर्ग के समुदायों के द्वारा आदिवासी वर्ग में शामिल होने के लिए तत्कालीन जम्मू और कश्मीर सरकार ने वहां निवास करने वाली गुर्जर, बक्करवाल समुदायों को एसटी का दर्जा देने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव डाल कर 1991 में संविधान संशोधन (अनुसूचित जनजाति)1991 पारित कराया।
जबकि 1965 में लोकुर कमेटी ने जम्मू और कश्मीर के गुर्जर, बक्करवाल, हिमाचल प्रदेश की गद्दा ब्राह्मण, कोली समुदायों के बारे में स्पष्ट लिखा था कि ये समुदाय आदिवासियत के दायरे में नहीं आती है। उसके बाद भी इनको शामिल किया गया। इसी को आधार मानकर राजस्थान में 2006-07 में हिंसक आन्दोलन हुआ।
गुजरात में 2020-21 में वहां आदिवासी समुदायों ने गैर आदिवासियों को ST वर्ग के फर्जी तरीके से सर्टिफिकेट जारी करने के खिलाफ आदिवासी नेता Raju Valvai की अगुवाई में व्यापक आंदोलन किया था.
सवाल यह सामने आता है कि सबको आदिवासी क्यों बनना है ?
जबकि ये समुदाय पहले से ही किसी न किसी आरक्षित कोटे में शामिल हैं। इसके बावजूद इसके वे आदिवासी सूची में शामिल क्यों होना चाहते हैं? जबकि देश में आदिवासियों को आरक्षण उनकी आबादी के लिहाज सबसे कम आरक्षण है। केंद्र में ओबीसी को 27 फीसदी, एससी को 16 फीसदी और आदिवासियों के लिए सिर्फ 7.5 फीसदी आरक्षण है।
इस दायरे के भीतर अलग-अलग राज्यों में आरक्षण का प्रतिशत घटता बढ़ता भी है । लेकिन मामला सिर्फ आरक्षण का नहीं है नहीं तो आरक्षण कोटे में सुधार के लिए आंदोलन हुआ होता।
लेकिन पिछले 3 दशकों से जिस तरह से आदिवासी विर्मश के माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक जागरूकता के चलते भाजपा और आरएसएस के फर्जी राष्ट्रवाद को चुनौती आदिवासी संस्कृति से मिलने लगी है उससे सब घबराए हुए हैं।
आदिवासी का दर्जा कोई गरीबी हटाओ योजना नहीं है। यह आदिवासी समुदायों का रक्षा कवच है जिसके लिए ब्रिटिश हुकूमत से आदिवासियों से 300 वर्षों तक संघर्ष किया।
आदिवासी शब्द चेतना का प्रतीक है, इतिहास का आख्यान है, पीढ़ियों से संघर्ष से सृजन की बढ़ता हुआ सशक्त कदम है।
सामाजिक, साँस्कृतिक और युग चेतना के मूल्य हैं।
जिनको आजादी के बाद संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा की अगुवाई में इसे सुरक्षित एवं सरंक्षित किया गया।
यह मामला सिर्फ आरक्षण का नहीं बल्कि आदिवासी संस्कृति के वैशिष्ट को मिटाने का है। जिसमें फर्जी राष्ट्रवादी ताकतें लगी हुई हैं।
कुर्मी/कुड़मी जाति का आदिवासी स्टेटस मांग के खिलाफ
झारखंड के आदिवासी समुदायों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। झारखंड आदिवासियों के साथ राजस्थान एवं अन्य राज्यों के आदिवासियों को पूरी ताकत खड़ा होना चाहिए।