10/07/2025
25 जून 1975 . . . यह तारीख सिर्फ एक राजनीतिक निर्णय नहीं थी, बल्कि हमारे लोकतंत्र की आत्मा पर हमला था। यह वो काला दिन था जब संविधान को ताक पर रखकर आपातकाल थोपा गया, और एक पूरे राष्ट्र की आवाज़ को कुचलने की कोशिश की गई।
मेरी अम्मा महाराज, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, को बिना अपराध के 9 महीनों तक तिहाड़ जेल में कैद रखा गया। उन्हें तोड़ने की हर कोशिश हुई। लेकिन वे न डरीं, न झुकीं।
उन्होंने प्रार्थना से शक्ति पाई, और हर दिन का उपयोग साथियों का मनोबल बढ़ाने और राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा को और गहरा करने में किया।
जेल में उनके और अन्य लोकतंत्र सेनानियों और नेताओं के बीच हुई चर्चाओं ने उस जनआंदोलन की नींव रखी, जिसने इंदिरा गांधी की तानाशाही को चुनौती दी।
आपातकाल के बाद जब लोकतंत्र को पुनर्स्थापित करने का वक्त आया, तब जनता सरकार ने 1977 में शाह आयोग का गठन किया। न्यायमूर्ति जे.सी. शाह के नेतृत्व में इस आयोग ने स्पष्ट रूप से बताया कि किस तरह अधिकार छीने गए, प्रेस पर ताले लगे, और न्यायपालिका को मूक दर्शक बना दिया गया।
शाह आयोग के समक्ष राजमाता सिर्फ एक पीड़ित नहीं, बल्कि सत्य की साक्षी बनकर खड़ी हुईं। उनके साहसिक बयान आज भी गवाही देते हैं कि जब कोई डर के आगे सच बोलता है, तब इतिहास की दिशा बदलती है।
शाह आयोग की रिपोर्ट आज भी हमें आगाह करती है कि लोकतंत्र स्थायी नहीं होता, उसकी रक्षा के लिए हर पीढ़ी को सतर्क और संकल्पित रहना होता है। आज उन सभी लोकतंत्र सेनानियों को कोटिशः नमन, जिन्होंने अपने साहस से हमें अभिव्यक्ति, अधिकार और आज़ादी का अधिकार दिलाया।
FILE PHOTO : 14 नवम्बर 1977 | शाह आयोग के समक्ष उपस्थित होने के लिए दिल्ली पहुँचीं राजमाता विजयाराजे सिंधिया।