Adv shyamsundar singh Babbu Yadav

Adv shyamsundar singh Babbu Yadav गांव अनघोरा कटंगी मझौली विधान सभा पाटन95 जिला जबलपुर मध्य प्रदेश भारत

आजादी के इतने साल बाद भी दो गज जमीन के मोहताज हैं बहादुरशाह जफर !---------------------------------------------बहादुरशाह ...
24/10/2025

आजादी के इतने साल बाद भी
दो गज जमीन के मोहताज हैं बहादुरशाह जफर !
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बहादुरशाह जफर सच्चे देशभक्त ही नहीं, अपने वक्त के नामवर शायर भी थे। उन्होंने गालिब, दाग, मोमिन, जौक जैसे उर्दू शायरों को हौसला दिया। गालिब तो उनके दरबार में शायरी करते थे। उन दिनो उर्दू शायरी अपनी बुलंदियों पर थी। जफर की मौत के बाद उनकी शायरी कुल्लियात-ए-जफर के नाम से संकलित हुई। वर्ष 1857 में बहादुर शाह जफर एक ऐसी शख्सियत थे, जिनका बादशाह के तौर पर ही नहीं एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के रूप में भी सम्मान था। मेरठ से विद्रोह कर, जो सैनिक दिल्ली पहुंचे, उन्होंने सबसे पहले बहादुर शाह जफर को अपना बादशाह माना। बहादुर शाह जफर ने अंग्रेजों की कैद में रहते हुए भी गजलें लिखना नहीं रोका। वह जली हुई तिल्लियों से जेल की दीवारों पर गजलें लिखते थे। उनका जन्म 24 अक्तूबर, 1775 में हुआ था। पिता अकबर शाह द्वितीय की मृत्यु के बाद उनको 18 सितंबर, 1837 में मुगल बादशाह बनाया गया। यह दीगर बात थी कि उस समय तक दिल्ली की सल्तनत बेहद कमजोर हो गई थी और मुगल बादशाह नाममात्र का सम्राट रह गया था।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की बहादुर शाह जफर को भारी कीमत चुकानी पड़ी। उनके पुत्रों और प्रपौत्रों को ब्रिटिश अधिकारियों ने सरेआम गोलियों से भून डाला। अंग्रेजों ने जुल्म की सभी हदें पार कर दीं। जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं। उन्हें बंदी बनाकर रंगून ले गए, जहां उन्होंने सात नवंबर, 1862 में एक बंदी के रूप में दम तोड़ दिया। उन्हें वहीं दफ्ना दिया गया। देश से बाहर रंगून में भी उनकी उर्दू कविताओं का जलवा रहा। आज भी कोई देशप्रेमी व्यक्ति जब तत्कालीन बर्मा (म्यंमार) की यात्रा करता है तो वह जफर की मजार पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देना नहीं भूलता है। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है।

मरते दम तक बहादुरशाह जफर को हिंदुस्तान की फिक्र रही। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह अपने जीवन की अंतिम सांस हिंदुस्तान में ही लें और वहीं उन्हें दफनाया जाए लेकिन अंग्रेजों ने ऐसा नहीं होने दिया। उनके जैसे कम ही शासक रहे, जो अपने देश को महबूब की तरह चाहते थे। जब रंगून में कारावास के दौरान अपनी आखिरी सांस उन्होंने ली तो शायद उनके लबों पर अपनी ही यह मशहूर गजल कितनी तकलीफ देती रही होगी। अपने वतन से तन्हाई के उन्हीं दिनो में उन्होने लिखा था -

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,

किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में।

बुलबुल को बागबां से न सैयाद से गिला,

किस्मत में कैद लिखी थी फसल-ए-बहार में।

कह दो इन हसरतों से, कहीं और जा बसें,

इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में।

एक शाख गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमान,

कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लाल-ए-ज़ार में।

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन,

दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में।

दिन ज़िन्दगी खत्म हुए शाम हो गई,

फैला के पांव सोएंगे कुंज-ए-मज़ार में।

कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफ्न के लिए,

दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।

कहा जाता है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद जब बादशाह जफर को गिरफ्तार किया गया तो उर्दू जानने वाले एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी ने उन पर कटाक्ष करते हुए कहा- 'दम में दम नहीं, अब खैर मांगो जान की ए जफर, अब म्यान हो चुकी है, शमशीर हिन्दुस्तान की!' इस पर जफर ने करारा जवाब देते हुए कहा था- 'हिंदीओ में बू रहेगी जब तलक इमान की, तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की!' रंगून में उन दिनो सुभाषचंद्र बोस ने बहादुर शाह ज़फर की क़ब्र को पूरी इज़्ज़त दिलवाई थी। ज़फर की कब्र को नेताजी ने पक्का करवाया। वहाँ कब्रिस्तान में गेट लगवाया और उनकी क़ब्र के सामने चारदीवारी बनवाई। आज दिल्ली में बहादुर शाह जफर मार्ग पर दिल्ली गेट के निकट उनकी स्मृतियां जीवित हैं। यह दिल्ली के बचे हुए 13 ऐतिहासिक दरवाजों में से एक है। यही वह दरवाजा है, जहां अंतिम मुगल बादशाह जफर के दोनों बेटों और एक पोते को अंग्रेजों ने गोली से उड़ाया था। एडवोकेट श्याम सुंदर सिंह

अमर शहीद भारत सच्चे सपूत अशफ़ाक़उल्लाह ख़ाँ जी जन्मदिन २२ अक्टूबर १९००शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरन...
23/10/2025

अमर शहीद भारत सच्चे सपूत अशफ़ाक़उल्लाह ख़ाँ जी
जन्मदिन २२ अक्टूबर १९००
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा"

एक क्रांतिकारी की कहानी जिसने धार्मिक विभाजन को ठुकराकर भारत माता की आज़ादी के लिए फाँसी का फंदा चूमा

शाहजहाँपुर के एक पठान परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ, जिसे किसी ने नहीं सोचा था कि वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में साम्प्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बन जाएगा। शफ़ीक़उल्लाह ख़ाँ और मझरून्निसा के सबसे छोटे बेटे अशफ़ाक़उल्लाह ख़ाँ की कहानी सिर्फ़ एक क्रांतिकारी की नहीं, बल्कि उस युग की है जब हिंदू-मुस्लिम एकता ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ़ सबसे बड़ा हथियार थी।

१९१८ में जब पुलिस ने मैनपुरी षड्यंत्र केस के दौरान उनके स्कूल में छापा मारा और एक साथी छात्र को गिरफ्तार किया, तो १८ वर्षीय अशफ़ाक़ की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई। यह घटना उनके क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत थी।

शाहजहाँपुर में ही उनकी मुलाक़ात राम प्रसाद 'बिस्मिल' से हुई। एक मुस्लिम और एक हिंदू दोनों कवि, दोनों देशभक्त, दोनों क्रांतिकारी। अशफ़ाक़ 'हसरत' के नाम से उर्दू शायरी लिखते थे, जबकि बिस्मिल हिंदी के कवि थे। उनकी दोस्ती सिर्फ़ व्यक्तिगत नहीं थी यह भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण था।

९ अगस्त १९२५। काकोरी स्टेशन के पास एक ट्रेन। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों ने सरकारी खज़ाने से भरी ट्रेन को रोका। उद्देश्य था हथियार खरीदने के लिए धन इकट्ठा करना।

यह डकैती नहीं थी यह अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ सशस्त्र विद्रोह का प्रतीक था। चंद्रशेखर आज़ाद, राजेंद्र लाहिड़ी, और अन्य साथियों के साथ मिलकर अशफ़ाक़ ने वह कार्य किया जो भारतीय इतिहास में 'काकोरी काण्ड' के नाम से अमर हो गया।

डकैती के बाद ब्रिटिश पुलिस ने व्यापक तलाशी अभियान शुरू किया। अशफ़ाक़ नेपाल गए और बाद में डालटनगंज में एक इंजीनियरिंग फ़र्म में छद्म नाम से क्लर्क के रूप में काम किया। लेकिन दिल्ली में एक विश्वासघाती ने उन्हें धोखा दिया और वे गिरफ़्तार हो गए।

क़ैद में ब्रिटिश अधिकारियों ने एक नापाक खेल खेला। उन्होंने अशफ़ाक़ को समझाने की कोशिश की कि बिस्मिल, हिंदू होने के नाते, केवल हिंदुओं की आज़ादी चाहते हैं, और मुसलमानों का भला अंग्रेज़ी शासन में ही है।

लेकिन अशफ़ाक़ और बिस्मिल दोनों ने इस विभाजनकारी चाल को ठुकरा दिया। दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ़ गवाही देने से इनकार कर दिया। उनकी दोस्ती धार्मिक और सांप्रदायिक सीमाओं से परे थी

अप्रैल १९२७ में मुकदमे का फ़ैसला आया। अशफ़ाक़, बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी, और रोशन सिंह को मौत की सज़ा सुनाई गई। अशफ़ाक़ के भाई रियासतउल्लाह ने उनके वकील के रूप में काम किया, लेकिन अंग्रेज़ों का फ़ैसला पहले से तय था।

१९ दिसंबर १९२७। फ़ैज़ाबाद जेल। मात्र २७ वर्ष की उम्र में अशफ़ाक़उल्लाह ख़ाँ ने फाँसी का फंदा चूमा। वे शहीद हो गए भारत की आज़ादी के लिए, हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए, एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के सपने के लिए।

अशफ़ाक़उल्लाह ख़ाँ की कहानी उस भारत की कहानी है जो धर्म, जाति, और सांप्रदायिकता से ऊपर उठकर एक साथ खड़ा हुआ था। उनकी और बिस्मिल की दोस्ती आज भी हमें याद दिलाती है कि असली देशभक्ति में कोई धार्मिक विभाजन नहीं होता। इंकलाब जिंदाबाद इंकलाब जिंदाबाद
एड श्याम सुंदर सिंह यादव बब्बू

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जय जवान-जय किसान🙏

हर जन्म में साथ मिले एक-दूजे का,चन्द्रमाँ की चाँदनी से सदा माँगे हम यही आशीष...श्री चंद्र देव के दर्शन के साथ नारीशक्ति ...
10/10/2025

हर जन्म में साथ मिले एक-दूजे का,
चन्द्रमाँ की चाँदनी से सदा माँगे हम यही आशीष...

श्री चंद्र देव के दर्शन के साथ नारीशक्ति की आस्था तथा अखण्ड सौभाग्य का पर्व 'करवा चौथ' विधिवत रूप से संपन्न हुआ।

अखण्ड सौभाग्य के पर्व करवाचौथ की मेरी जीवन संगिनी तथा समस्त माताओं-बहनों को हार्दिक शुभकामनाएं।
श्याम सुंदर सिंह यादव बब्बू जानकी यादव

सत सत नमन विनम्र श्रद्धांजलिसमाजवाद के जनक   धरती पुत्र3 बार के मुख्यमंत्री7 बार के सांसद 8 बार के विद्यायक भारत के रक्ष...
10/10/2025

सत सत नमन विनम्र श्रद्धांजलि
समाजवाद के जनक धरती पुत्र
3 बार के मुख्यमंत्री7 बार के सांसद 8 बार के विद्यायक भारत के रक्षा मंत्री
आदरणीय मुलायम सिंह यादव जी की पुण्य तिथि पर कोटी कोटी नमन 💐

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