14/08/2017
*क्रांतिकारी--भगतसिंह*
*राख का हर कण मेरी गर्मी से गतिमान है। मैं एक ऐसा पागल हूं। जो जेल में भी आजाद है। भगतसिंह एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि युवाओं के लिए आज भी एक जुनून एक जज्बा है। 23 मार्च 1931 का वो दिन था, जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी दे दी गई थी*।
जरा सोचिए, उस स्थिति के बारे में जब आपको अपने ही घर में कोई बाहरी व्यक्ति आकर सजा दे देता है और आप लाख प्रयास के बाद भी स्थिति पूरी तरह नहीं बदल पाते। कुछ ऐसा ही हुआ भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव जैसे उन अनगिनत क्रांतिकारियों के साथ जिन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। उनके जीवन के ना जाने कितने ही ऐसे प्रसंग है, जो हम लोगों तक पहुंच भी नहीं पाए।ऐसा ही प्रसंग है भगत सिंह की जिंदगी से जुड़ा हुआ। जब उन्हें सुखदेव ने ऐसी बात कह दी थी, जिससे उनका मन भारी हो गया था। बात उन दिनों की है, जब भगत सिंह लाहौर कॉलेज में पढ़ा करते हैं। यहां पर उनके साथ पढ़ने वाली एक लड़की उन्हें पसंद किया करती थी। भगत सिंह उन दिनों के क्रांतिकारी दल का हिस्सा थे। वो लड़की ने दल से प्रभावित होकर उसमें शामिल हो गई। जब ब्रिटिश असेंबली में बम फेंकने की योजना बनाई जा रही थी, तो किसी दूसरी योजना को अंजाम देने के लिए भगत सिंह ने बम फेंकने वाले लोगों में अपना नाम नहीं दिया। ये देखकर उनके साथ और करीबी मित्र ने उन्हें छेड़ते हुए कहा ‘भगत को अब अपनी मौत का डर होने लगा है इसलिए भगत अपना नाम नहीं दे रहा है।मजाक में ही कही गई इस बात से भगत सिंह आहत हो गए। उन्होंने ये सुनते ही जबर्दस्ती अपना नाम बम फेंकने वाले मिशन में शामिल कर लिया। असल में बम फेंकने के बाद अदालत में अपनी बात रखने के गिरफ्तारी देनी थी। जिससे अदालत में पेशी के दौरान वो अपनी बात और देश के नाम संदेश को सबके सामने रख सके।8 अप्रैल, 1929 को असेंबली में बम फेंकने से पहले 5 अप्रैल को भगत ने सुखदेव को एक पत्र लिखा था, जिसे शिववर्मा ने उन तक पहुंचाया था। 13 अप्रैल को जब सुखदेव गिरफ्तार हुए तो ये खत उनके पास मिला और बाद में कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश किया गया। जिससे ये साबित हो गया कि बम फेंकने वालों में भगत सिंह का नाम भी था। माना जाता है इस खत को अदालत ने एक सरकारी दस्तावेज के तौर पर अपने पास रख लिया था।पढ़िए भगत ने क्या लिखा था उस पत्र में… जैसे ही ये पत्र तुम्हें मिलेगा, मैं दूर एक मंजिल की तरफ जा चुका होऊंगा। मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि मैं आज बहुत खुश हूं। हमेशा से ज्यादा। मैं यात्रा के लिए तैयार हूं। अनेक मधुर स्मृतियां और अपने जीवन की सब खुशियां होते हुए भी एक बात जो मेरे मन में चुभ रही थी कि मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझा और मुझ पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाया: कमजोरी का। आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं। पहले से कहीं अधिक। आज मैं महसूस करता हूं कि वो बात कुछ भी नहीं थी, एक गलतफहमी थी। मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन समझा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी। मैं कमजोर नहीं हूं। अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं।भाई! मैं साफ दिल से विदा होऊंगा। क्या तुम भी साफ होगे? यह तुम्हारी बड़ी दयालुता होगी, लेकिन ख्याल रखना कि तुम्हें जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। गंभीरता और शांति से तुम्हें काम को आगे बढ़ाना है, जल्दबाजी में मौका पा लेने का प्रयत्न न करना। जनता के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य है, उसे निभाते हुए काम को निरंतर सावधानी से करते रहना।सलाह के तौर पर मैं कहना चाहूंगा कि शास्त्री मुझे पहले से ज्यादा अच्छे लग रहे हैं। मैं उन्हें मैदान में लाने की कोशिश करूंगा, बशर्ते वो स्वेच्छा से और साफ बात ये है कि निश्चित रूप से, एक अंधेरे भविष्य के प्रति समर्पित होने को तैयार हों। उन्हें दूसरों के साथ मिलने दो और उनके हाव-भाव का अध्य्यन होने दो। यदि वो ठीक भावना से अपना काम करेंगे तो उपयोगी और बहुत मूल्यवान सिद्ध होंगे, लेकिन जल्दी न करना। तुम स्वयं अच्छे निर्णायक होगे। जैसी सुविधा हो, वैसी व्यवस्था करना। आओ भाई, अब हम बहुत खुश हो लें।खुशी के वातावरण में मैं कह सकता हूं कि जिस प्रश्न पर हमारी बहस है, उसमें अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता। मैं पूरे जोर से कहता हूं कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर हूं और जीवन की आनंदमयी रंगीनियों से ओत-प्रोत हूं, लेकिन जरूरत के वक्त सब कुछ कुर्बान कर सकता हूं और यही वास्तविक बलिदान है। ये चीजें कभी मनुष्य के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह मनुष्य हो। निकट भविष्य में ही तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा।जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं ये कह सकता हूं कि ये अपने में कुछ नहीं है। सिवाय एक आवेग के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय और बहुत मधुर भावना है। प्यार अपने-आप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है। प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाता है। सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता। वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब।