जन युवा मंच

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एकता अखंडता और भाईचारे के साथ सम्पूर्ण देशवासियों  तथा बहनों और भाईयो को स्वतन्त्रता दिवस की अग्रिम तथा रक्षाबधंन की बहु...
11/08/2022

एकता अखंडता और भाईचारे के साथ सम्पूर्ण देशवासियों तथा बहनों और भाईयो को स्वतन्त्रता दिवस की अग्रिम तथा रक्षाबधंन की बहुत बहुत बहुत शुभकामनाये 💐🇮🇳🌹🇮🇳🌹🇮🇳🌷🇮🇳🌹🇮🇳🌷🇮🇳🌹🌷🌼🇮🇳🌼🌸🇮🇳🌸🏵️🇮🇳🏵️
Happy Rakshabandhan Day & Independence Day in advance to all the countrymen and sisters and brothers with unity, integrity and brotherhood. 🌹🇮🇳🌹🇮🇳🌷🇮🇳🌹🇮🇳🌷🇮🇳🌹🌷🌼🇮🇳🌼🌸🇮🇳🌸🏵️🇮🇳🏵️

आज जबलपुर स्थित वार्ड क्रमांक-54 पंडित जवाहरलाल नेहरू वार्ड में भीषण गंदगी और खुले हुऐ बड़े नालों के कारण पानी उत्प्लावन ...
30/06/2019

आज जबलपुर स्थित वार्ड क्रमांक-54 पंडित जवाहरलाल नेहरू वार्ड में भीषण गंदगी और खुले हुऐ बड़े नालों के कारण पानी उत्प्लावन की समस्याओं को लेकर क्षेत्रीय पार्षद और वर्तमान विधायक तथा नगर निगम के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया गया जिसमें क्षेत्र की महिलाएं बहुत बड़ी संख्या में उपस्थित थी, इस वार्ड में खुले नालों के कारण बहुत संक्रमक बीमारियां फ़ैल रही है विगत कुछ वर्ष पहले नाले में एक बच्चे की डूब के मौत हो गईं थी परंतु उसके बाद भी प्रशासन और पार्षद ने इस ओर ध्यान नहीं दिया ,वार्ड में कई जगह नगर निगम की पानी की पाइप लाइन नहीं है तथा बिजली के पोल नाले से लगे है यदि यह गिरे तो पूरे नाले में करंट फ़ैल जायेगा जिससे बड़ी घटना हो सकती है यहाँ के लोगो का जीवन बहुत दयनीय हो चूका है आज नाले को ढकने और साफ सफाई को लेकर प्रदर्शन कर महापौर की अनुपस्थिति में नगर निगम आयुक्त को ज्ञापन प्रेषित किया गया

21/12/2018
सरदार भगत सिंह, एक ऐसा नाम जिसे सुनते ही हम हिन्दुस्तानियों के रगों में देशभक्ति का खून दौड़ने लगता है। एक ऐसा जांबाज वीर...
22/03/2018

सरदार भगत सिंह, एक ऐसा नाम जिसे सुनते ही हम हिन्दुस्तानियों के रगों में देशभक्ति का खून दौड़ने लगता है। एक ऐसा जांबाज वीर योद्धा जिसने मात्र २३ साल की उम्र में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए और अपने आप को देश के लिए बलिदान कर दिया।

आइये आज हम उसी महान देशभक्त के क्रांतिकारी विचारों को जानते हैं।
1-प्रेमी, पागल, और कवी एक ही चीज से बने होते हैं।
2-राख का हर एक कण मेरी गर्मी से गतिमान है मैं एक ऐसा पागल हूँ जो जेल में भी आज़ाद है.
3-यदि बहरों को सुनना है तो आवाज़ को बहुत जोरदार होना होगा. जब हमने बम गिराया तो हमारा धेय्य किसी को मारना नहीं थ. हमने अंग्रेजी हुकूमत पर बम गिराया था . अंग्रेजों को भारत छोड़ना चाहिए और उसे आज़ाद करना चहिये
4-किसी को “क्रांति ” शब्द की व्याख्या शाब्दिक अर्थ में नहीं करनी चाहिए। जो लोग इस शब्द का उपयोग या दुरूपयोग करते हैं उनके फायदे के हिसाब से इसे अलग अलग अर्थ और अभिप्राय दिए जाते है.
5-जो व्यक्ति भी विकास के लिए खड़ा है उसे हर एक रूढ़िवादी चीज की आलोचना करनी होगी , उसमे अविश्वास करना होगा तथा उसे चुनौती देनी होगी.
6-मैं इस बात पर जोर देता हूँ कि मैं महत्त्वाकांक्षा , आशा और जीवन के प्रति आकर्षण से भरा हुआ हूँ. पर मैं ज़रुरत पड़ने पर ये सब त्याग सकता हूँ, और वही सच्चा बलिदान है
7-अहिंसा को आत्म-बल के सिद्धांत का समर्थन प्राप्त है जिसमे अंतत: प्रतिद्वंदी पर जीत की आशा में कष्ट सहा जाता है . लेकिन तब क्या हो जब ये प्रयास अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो जाएं ? तभी हमें आत्म -बल को शारीरिक बल से जोड़ने की ज़रुरत पड़ती है ताकि हम अत्याचारी और क्रूर दुश्मन के रहमोकरम पर ना निर्भर करें .
8-व्यक्तियो को कुचल कर , वे विचारों को नहीं मार सकते।
9-क्रांति मानव जाती का एक अपरिहार्य अधिकार है. स्वतंत्रता सभी का एक कभी न ख़त्म होने वाला जन्म-सिद्ध अधिकार है. श्रम समाज का वास्तविक निर्वाहक है.
10-निष्ठुर आलोचना और स्वतंत्र विचार ये क्रांतिकारी सोच के दो अहम् लक्षण हैं.
11-मैं एक मानव हूँ और जो कुछ भी मानवता को प्रभावित करता है उससे मुझे मतलब है.
12-ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती हे … दूसरो के कन्धों पर तो सिर्फ जनाजे उठाये जाते हैं .
ईजी. तनवीर हर्ष ईजी. हिमांशु सेन

आज जन्मदिन पर विशेष: खूब लड़ी मर्दानी झांसी वाली रानी19 नवम्बर 1835 को बनारस में मोरोपंत तांबे व भगीरथी बाई की पुत्री के...
19/11/2017

आज जन्मदिन पर विशेष: खूब लड़ी मर्दानी झांसी वाली रानी
19 नवम्बर 1835 को बनारस में मोरोपंत तांबे व भगीरथी बाई की पुत्री के रूप में लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ। उनका बचपन का नाम मणिक्रर्णिका था, पर प्यार से लोग उन्हें मनु कह कर पुकारते थे। काशी में रानी लक्ष्मीबाई के जन्म पर प्रथम वीरांगना रानी चेनम्मा को याद करना लाजिमी है। 1824 में कित्तूर (कर्नाटक) की रानी चेनम्मा ने अंग्रेजों को मार-भगाने के लिए ‘फिरंगियो भारत छोड़ो’ की ध्वनि गुंजित की थी और रणचंडी का रूप धर कर अपने अदम्य साहस व फौलादी संकल्प की बदौलत अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व रानी चेनम्मा काशीवास करना चाहती थीं पर उनकी यह चाह पूरी न हो सकी थी।

यह संयोग ही था कि रानी चेनम्मा की मौत के 6 साल बाद काशी में ही लक्ष्मीबाई अपने पिता के साथ बिठूर आ गईं। वस्तुत: 1818 में तृतीय मराठा युद्ध के अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय की पराजय के पश्चात उनको 8 लाख रुपए की वार्षिक पैंशन मुकर्रर कर बिठूर भेज दिया गया। पेशवा बाजीराव द्वितीय के साथ उनके सरदार मोरोपंत तांबे भी अपनी पुत्री लक्ष्मीबाई के साथ बिठूर आ गए। लक्ष्मीबाई का बचपन नाना साहब के साथ कानपुर में बिठूर में ही बीता। लक्ष्मीबाई की शादी झांसी के राजा गंगाधर राव से हुई।

1853 में अपने पति गंगाधर राव की मौत के पश्चात रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी का शासन संभाला पर अंग्रेजों ने उन्हें और उनके दत्तक पुत्र को शासक मानने से इंकार कर दिया। अंग्रेजी सरकार ने रानी लक्ष्मीबाई को पांच हजार रुपए मासिक पैंशन लेने को कहा पर महारानी ने इसे लेने से मना कर दिया।

पर बाद में उन्होंने इसे लेना स्वीकार किया तो अंग्रेजी हुकूमत ने यह शर्त जोड़ दी कि उन्हें अपने स्वर्गीय पति के कर्ज को भी इसी पैंशन से अदा करना पड़ेगा, अन्यथा यह पैंशन नहीं मिलेगी। इतना सुनते ही महारानी का स्वाभिमान ललकार उठा और अंग्रेजी हुकूमत को उन्होंने संदेश भिजवाया कि जब मेरे पति की उत्तराधिकारी न मुझे माना गया और न ही मेरे पुत्र को तो फिर इस कर्ज के उत्तराधिकारी हम कैसे हो सकते हैं? उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को स्पष्टतया बता दिया कि कर्ज अदा करने की बारी अब अंग्रेजों की है न कि भारतीयों की।

इसके बाद घुड़सवारी और हथियार चलाने में माहिर रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर देने की तैयारी आरंभ कर दी और उद्घोषणा की कि, ‘‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।’’

रानी लक्ष्मीबाई द्वारा गठित सैनिक दल में तमाम महिलाएं शामिल थीं। उन्होंने महिलाओं की एक अलग ही टुकड़ी ‘दुर्गा दल’ नाम से बनाई थी। इसका नेतृत्व कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में माहिर झलकारीबाई के हाथों में था।

झलकारीबाई ने कसम उठाई थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैं शृंगार करूंगी और न ही सिंदूर लगाऊंगी। अंग्रेजों ने जब झांसी का किला घेरा तो झलकारी बाई जोशो-खरोश के साथ लड़ी। चूंकि उनका चेहरा और कद-काठी रानी लक्ष्मीबाई से काफी मिलता-जुलता था, सो जब उसने रानी लक्ष्मीबाई को घिरते देखा तो उन्हें महल से बाहर निकल जाने को कहा और स्वयं घायल सिंहनी की तरह अंग्रेजों पर टूट पड़ी और शहीद हो गई।

रानी लक्ष्मीबाई अपने बेटे को कमर में बांधे घोड़े पर सवार किले से बाहर निकल गई और कालपी पहुंचीं, जहां तांत्या टोपे के साथ मिलकर ग्वालियर के किले पर कब्जा कर लिया।

अंतत: 18 जून 1858 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की इस अद्भुत वीरांगना ने अंतिम सांस ली पर अंग्रेजों को अपने पराक्रम का लोहा मनवा दिया। सिर्फ पन्नों पर ही नहीं बल्कि लोकमानस के कंठ में, गीतों और किंवदंतियों इत्यादि के माध्यम से यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहता है। वैसे भी इतिहास की वही लिपिबद्धता सार्थक और शाश्वत होती है जो बीते हुए कल को उपलब्ध साक्ष्यों और प्रमाणों के आधार पर यथावत प्रस्तुत करती है। बुंदेलखंड की वादियों में आज भी दूर-दूर तक लोक लय सुनाई देती है:

खूब लड़ी मरदानी, अरे झांसी वारी रानी/ पुरजन पुरजन तोपें लगा दई, गोला चलाए असमानी/ अरे झांसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी/ सबरे सिपाइन को पैरा जलेबी, अपन चलाई गुरधानी/ छोड़ मोरचा जसकर कों दौरी, ढूढेहूं मिले नहीं पानी/ अरे झांसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी।।

माना जाता है कि इसी से प्रेरित होकर ‘झांसी की रानी’ नाम अपनी कविता में सुभद्रा कुमारी चौहान ने 1857 की उनकी वीरता का बखान किया है। चमक उठी सन् सत्तावन में/ वह तलवार पुरानी थी/ बुंदेलों हरबोलों के मुंह/ हमने सुनी कहानी थी/ खूब लड़ी मरदानी वह तो/ झांसी वाली रानी थी।
ईजी. हिमांशु सेन

क्रांतिय़ाँ कभी पराजित नहीं होती
07/11/2017

क्रांतिय़ाँ कभी पराजित नहीं होती

AISF ने मानकुंवर बाई महिला महाविद्यालय जबलपुर मे रचा इतिहास प्रशासन एवं सत्ता के  विरोध के  बावजूद अपने प्रतिनिधि को जित...
01/11/2017

AISF ने मानकुंवर बाई महिला महाविद्यालय जबलपुर मे रचा इतिहास प्रशासन एवं सत्ता के विरोध के बावजूद अपने प्रतिनिधि को जिताया, महाविद्यालय की छात्राएं निश्चित ही बधाई की पात्र है जिन्होंने ने विषम परिस्थिति मे संघर्ष का दामन नही छोड़ा न ही धमकियों से डरी, एक बार सभी साथियों का क्रांतिकारी अभिवादन तथा लाल सलाम, जय भीम ✊🙏🌼✊🙏🌼
ईजी. तनवीर हर्ष, ईजी. हिमांशु सेन✊🌼✊🌼✊🙏🌼🙏🌼🙏🌼🙏🌼

110 वी जयंती पर हृदय से 🌼 नमन 🌼 नमन 🌼नमन 🌼🌼🌼🌼🌼 "लिख रहा हूं मै अजांम जिसका कल आगाज आयेगा,मेरे लहू का हर एक कतरा इकंलाब ल...
28/09/2017

110 वी जयंती पर हृदय से 🌼 नमन 🌼 नमन 🌼नमन 🌼🌼🌼🌼🌼

"लिख रहा हूं मै अजांम जिसका कल आगाज आयेगा,
मेरे लहू का हर एक कतरा इकंलाब लाऐगा,

मै रहू या ना रहू पर ये वादा है तुमसे मेरा कि,मेरे बाद वतन पर मरने वालो का सैलाब आयेगा"

“इतिहास में गूँजता एक नाम हैं भगत सिंह
शेर की दहाड़ सा जोश था जिसमे वे थे भगत सिंह
छोटी सी उम्र में देश के लिए शहीद हुए जवान थे भगत सिंह
आज भी जो रोंगटे खड़े करदे ऐसे विचारो के धनि थे भगत सिंह ..”
"सामान्यत: लोग परिस्थती के आदि हो जाते हैं और उनमे बदलाव करने की सोच मात्र से डर जाते हैं . अतः हमें इस भावना को क्रांति की भावना से बदलने की आवश्यकता हैं .

*क्रांतिकारी--भगतसिंह**राख का हर कण मेरी गर्मी से गतिमान है। मैं एक ऐसा पागल हूं। जो जेल में भी आजाद है। भगतसिंह एक क्रा...
14/08/2017

*क्रांतिकारी--भगतसिंह*

*राख का हर कण मेरी गर्मी से गतिमान है। मैं एक ऐसा पागल हूं। जो जेल में भी आजाद है। भगतसिंह एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि युवाओं के लिए आज भी एक जुनून एक जज्बा है। 23 मार्च 1931 का वो दिन था, जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी दे दी गई थी*।

जरा सोचिए, उस स्थिति के बारे में जब आपको अपने ही घर में कोई बाहरी व्यक्ति आकर सजा दे देता है और आप लाख प्रयास के बाद भी स्थिति पूरी तरह नहीं बदल पाते। कुछ ऐसा ही हुआ भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव जैसे उन अनगिनत क्रांतिकारियों के साथ जिन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। उनके जीवन के ना जाने कितने ही ऐसे प्रसंग है, जो हम लोगों तक पहुंच भी नहीं पाए।ऐसा ही प्रसंग है भगत सिंह की जिंदगी से जुड़ा हुआ। जब उन्हें सुखदेव ने ऐसी बात कह दी थी, जिससे उनका मन भारी हो गया था। बात उन दिनों की है, जब भगत सिंह लाहौर कॉलेज में पढ़ा करते हैं। यहां पर उनके साथ पढ़ने वाली एक लड़की उन्हें पसंद किया करती थी। भगत सिंह उन दिनों के क्रांतिकारी दल का हिस्सा थे। वो लड़की ने दल से प्रभावित होकर उसमें शामिल हो गई। जब ब्रिटिश असेंबली में बम फेंकने की योजना बनाई जा रही थी, तो किसी दूसरी योजना को अंजाम देने के लिए भगत सिंह ने बम फेंकने वाले लोगों में अपना नाम नहीं दिया। ये देखकर उनके साथ और करीबी मित्र ने उन्हें छेड़ते हुए कहा ‘भगत को अब अपनी मौत का डर होने लगा है इसलिए भगत अपना नाम नहीं दे रहा है।मजाक में ही कही गई इस बात से भगत सिंह आहत हो गए। उन्होंने ये सुनते ही जबर्दस्ती अपना नाम बम फेंकने वाले मिशन में शामिल कर लिया। असल में बम फेंकने के बाद अदालत में अपनी बात रखने के गिरफ्तारी देनी थी। जिससे अदालत में पेशी के दौरान वो अपनी बात और देश के नाम संदेश को सबके सामने रख सके।8 अप्रैल, 1929 को असेंबली में बम फेंकने से पहले 5 अप्रैल को भगत ने सुखदेव को एक पत्र लिखा था, जिसे शिववर्मा ने उन तक पहुंचाया था। 13 अप्रैल को जब सुखदेव गिरफ्तार हुए तो ये खत उनके पास मिला और बाद में कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश किया गया। जिससे ये साबित हो गया कि बम फेंकने वालों में भगत सिंह का नाम भी था। माना जाता है इस खत को अदालत ने एक सरकारी दस्तावेज के तौर पर अपने पास रख लिया था।पढ़िए भगत ने क्या लिखा था उस पत्र में… जैसे ही ये पत्र तुम्हें मिलेगा, मैं दूर एक मंजिल की तरफ जा चुका होऊंगा। मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि मैं आज बहुत खुश हूं। हमेशा से ज्यादा। मैं यात्रा के लिए तैयार हूं। अनेक मधुर स्मृतियां और अपने जीवन की सब खुशियां होते हुए भी एक बात जो मेरे मन में चुभ रही थी कि मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझा और मुझ पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाया: कमजोरी का। आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं। पहले से कहीं अधिक। आज मैं महसूस करता हूं कि वो बात कुछ भी नहीं थी, एक गलतफहमी थी। मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन समझा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी। मैं कमजोर नहीं हूं। अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं।भाई! मैं साफ दिल से विदा होऊंगा। क्या तुम भी साफ होगे? यह तुम्हारी बड़ी दयालुता होगी, लेकिन ख्याल रखना कि तुम्हें जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। गंभीरता और शांति से तुम्हें काम को आगे बढ़ाना है, जल्दबाजी में मौका पा लेने का प्रयत्न न करना। जनता के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य है, उसे निभाते हुए काम को निरंतर सावधानी से करते रहना।सलाह के तौर पर मैं कहना चाहूंगा कि शास्त्री मुझे पहले से ज्यादा अच्छे लग रहे हैं। मैं उन्हें मैदान में लाने की कोशिश करूंगा, बशर्ते वो स्वेच्छा से और साफ बात ये है कि निश्चित रूप से, एक अंधेरे भविष्य के प्रति समर्पित होने को तैयार हों। उन्हें दूसरों के साथ मिलने दो और उनके हाव-भाव का अध्य्यन होने दो। यदि वो ठीक भावना से अपना काम करेंगे तो उपयोगी और बहुत मूल्यवान सिद्ध होंगे, लेकिन जल्दी न करना। तुम स्वयं अच्छे निर्णायक होगे। जैसी सुविधा हो, वैसी व्यवस्था करना। आओ भाई, अब हम बहुत खुश हो लें।खुशी के वातावरण में मैं कह सकता हूं कि जिस प्रश्न पर हमारी बहस है, उसमें अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता। मैं पूरे जोर से कहता हूं कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर हूं और जीवन की आनंदमयी रंगीनियों से ओत-प्रोत हूं, लेकिन जरूरत के वक्त सब कुछ कुर्बान कर सकता हूं और यही वास्तविक बलिदान है। ये चीजें कभी मनुष्य के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह मनुष्य हो। निकट भविष्य में ही तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा।जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं ये कह सकता हूं कि ये अपने में कुछ नहीं है। सिवाय एक आवेग के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय और बहुत मधुर भावना है। प्यार अपने-आप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है। प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाता है। सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता। वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब।

अत्यंत दुखद समाचार है मजदूरो, गरीबों, मेहनतकशों, उपेक्षित, वंचित, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, शोषित वर्ग के लिये संघर्ष क...
08/08/2017

अत्यंत दुखद समाचार है मजदूरो, गरीबों, मेहनतकशों, उपेक्षित, वंचित, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, शोषित वर्ग के लिये संघर्ष करने वाले
जन युवा मंच के अध्यक्ष Er Tanvir Harsh, Ad. Sameer imraan ji के पिताजी कामरेड रहीम शाह एडवोकेट अब हमारे बीच नही रहे ।कितनी खुशियों के साथ उनके सार्वजनिक जीवन के पचास वर्ष होने पर उन्हे नागरिक अभिनंदन कर सम्मानित करने जा रहे थे और वह सम्मान लेने के पूर्व चले गये, यह हम जानते है कि वह कभी भी सम्मान कराने के पक्ष मे नही रहे है, उनका कहना था कि हम अपना कर्तव्य निभाते है और कर्तव्य के निर्वहन के बदले सम्मान नही लिया जाता है ।उनके सम्मान का पत्र अब उनके बिना यादों के रूप मे रखा रह जायेगा.
अलविदा रहीम शाह जी
रहीम शाह को लाल सलाम

02/06/2017

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Jabalpur
482003

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