Manish Kumar

Manish Kumar I am a Social worker ,working for Poor Child education.

आख़िरी ख़तराहुल और प्रिया कॉलेज में पहली बार मिले थे।पढ़ाई के दिनों में उनकी दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई।बारिश के ...
10/08/2025

आख़िरी ख़त

राहुल और प्रिया कॉलेज में पहली बार मिले थे।
पढ़ाई के दिनों में उनकी दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई।
बारिश के दिनों में एक ही छतरी, लाइब्रेरी में चुपके से किताब के पन्नों के बीच चॉकलेट,
और स्टेशन पर आख़िरी ट्रेन तक बातें करना—ये सब उनकी यादों का हिस्सा बन गया।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
प्रिया के घर वालों ने उसकी शादी कहीं और तय कर दी।
राहुल ने बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन प्रिया ने सिर्फ़ इतना कहा—
"प्यार सिर्फ़ साथ रहने का नाम नहीं है… कभी-कभी किसी को दूर से खुश देखना भी प्यार होता है।"

शादी के दिन, राहुल स्टेशन पर बैठा था।
जेब में एक छोटा-सा लिफ़ाफ़ा था—उसका आख़िरी ख़त।
उसने ख़त में लिखा था—

"प्रिया, मैं तुम्हें कभी खोना नहीं चाहता था, लेकिन तुम्हारी ख़ुशी मेरे प्यार से बड़ी है।
जब भी बारिश होगी, समझ लेना, मैं तुम्हारे पास हूँ… बस नज़र नहीं आता।"

बरसों बाद, प्रिया अपने बच्चों के साथ बारिश में खड़ी थी।
उसने आसमान की तरफ़ देखा, होंठों पर हल्की मुस्कान और आँखों में आँसू थे…
क्योंकि उसे पता था, राहुल ने अपना वादा निभाया है।

सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघ...
02/08/2025

सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ।

अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जा कर पति का शीश लाने की प्रार्थना की। किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा - कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये। क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।

रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं - "लक्ष्मण! रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है।

परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एक नारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है।

ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सेना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।

मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यक्ति की हो।

ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा - "यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे। भुजा को दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया - "प्राणप्रिये! यह भुजा मेरी ही है।

युद्ध भूमि में श्रीराम के भाई लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कई वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वह तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।

पति की भुजा-लिखित पंक्तियां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावण ने आकर कहा - 'शोक न कर पुत्री।

प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुई सुलोचना बोली - "पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के अभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे। सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।'

किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- "देवी! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो।

जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एक पत्नी व्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"

सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले - "देवी! तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे। किंतु विधि की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी।

श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा - "देवी! मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतित्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ?

सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली - "राघवेन्द्र! मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आई हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।

पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा - "सुमित्रानन्दन! तुम भूलकर भी गर्व मत करना कि मेघनाथ का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी।

यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।

सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वह यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है।

जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुई कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया - "मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुई मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया।

व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे - "निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा - "व्यर्थ बातें मत करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।

श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा - "यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा।

यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते!समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- "भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ।

अत: आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गई। लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई...!!

🌹🙏 जय जय श्रीराम 🙏🌹🌺🙏🌺

Sevacare's Touch”When health feels hard and claims confuse,Sevacare's help is yours to choose.Just ₹499 for peace of min...
25/07/2025

Sevacare's Touch”

When health feels hard and claims confuse,
Sevacare's help is yours to choose.
Just ₹499 for peace of mind,
Support that's caring, prompt, and kind.

Let us handle the claim and stress—
You heal, we’ll take care of the rest.

कौची गुंडा बनित हे रूह आफ़जा और पतंजलि सत्तुआ के आगे कोई बोलतयी रे
13/04/2025

कौची गुंडा बनित हे रूह आफ़जा और पतंजलि

सत्तुआ के आगे कोई बोलतयी रे

Let's Think
09/04/2025

Let's Think

28/03/2025

1 शादीशुदा आदमी का अपनी सेक्रेटरी के साथ अफेयर था.

एक दिन वो लोग डेट पर गए और एक साथ काफी समय बिताया जिसमें रात के 8 बज गए.

घर वापस जाते समय आदमी ने अपने जूते और कपड़े धूल और घास में रगड़ दिए.

घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा 'इतनी देर क्यों हो गई, कहां थे आप ?'

आदमी: मैं तुमसे झूठ नहीं बोल सकता हूं. मेरा एक अफेयर है और मैं अभी एक डेट से ही वापस आ रहा हूं.

पत्नी ने उसकी तरफ देखा और चिल्लाई झूठे क्रिकेट खेल के आ रहे हो ना."
🤣🤣🤣

25/03/2025

एक नौजवान, एक किसान की बेटी से शादी करने की इच्छा लेकर किसान के पास पहुँचा।

किसान ने गौर से उसकी ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा,

"शादी हो सकती है, लेकिन एक शर्त है। अगर तुम इसे पूरा कर सको, तो मेरी बेटी तुम्हारी होगी।"

युवक ने उत्सुकता से पूछा, "क्या शर्त है?"

किसान ने समझाया,

"तुम मेरे खेत में जाओ। मैं तीन बैल छोड़ूँगा—अगर तुम इनमें से किसी भी एक की पूँछ पकड़ लो, तो मेरी बेटी से तुम्हारी शादी पक्की!"

युवक को चुनौती रोमांचक लगी, और वह खुशी-खुशी खेत में जा खड़ा हुआ।

पहला दरवाजा खुला…

जैसे ही किसान ने दरवाजा खोला, एक बेहद विशाल और खतरनाक बैल गरजता हुआ बाहर आया। युवक डर के मारे एक ओर हट गया और सोचने लगा, "चलो, अगला बैल सही रहेगा!"

दूसरा दरवाजा खुला…

इस बार पहले से भी ज़्यादा भयंकर बैल निकला। युवक के पसीने छूट गए! उसने फिर फैसला किया, "इससे भी बचना ही बेहतर है। तीसरे बैल का इंतज़ार करता हूँ!"

तीसरा दरवाजा खुला…

अब युवक के चेहरे पर मुस्कान आ गई। इस बार एक कमजोर, मरियल सा बैल निकला। उसने खुशी-खुशी अपनी मुद्रा बनाई, कमर कसी और पूँछ पकड़ने को तैयार हो गया।

लेकिन… इस बैल की पूँछ ही नहीं थी!

युवक ने अपना सिर पकड़ लिया। अब पछताने के अलावा कोई चारा नहीं था। खाली हाथ उसे लौटना पड़ा।

सीख :-

ज़िन्दगी अवसरों से भरी हुई है—कुछ आसान, कुछ कठिन। लेकिन अगर आप पहला अवसर गँवा देते हैं, तो जरूरी नहीं कि दूसरा या तीसरा आपके लिए सही हो। इसलिए, जो भी मौका मिले, उसे तुरंत पकड़ने की कोशिश करें!

बाकी आपकी समझदारी।।

#है #है #है

Celebrating my 10th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉
01/02/2025

Celebrating my 10th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉

13/08/2024

"बारिश की रात"

बारिश की रात में भीगता हूँ मैं
अपने सपनों को याद करता हूँ मैं
बूंदों की रिमझिम में खो जाता हूँ मैं
और मेरे दिल की गहराईयों में उतरता हूँ मैं

बारिश की रात में तैरता हूँ मैं
अपने ख्वाबों की दुनिया में खो जाता हूँ मैं
बारिश की बूंदों में मेरा दिल खुश होता है
और मैं जीता हूँ अपने सपनों में

बारिश की रात में भीगता हूँ मैं
और मेरे दिल की सारी बातें कहता हूँ मैं
बारिश की रिमझिम में मेरा दिल खुश होता है
और मैं खो जाता हूँ अपने सपनों में।

क्या आपको यह कविता पसंद आई?

रात तक़रीबन नौ बजे ऑफिस से लौटने के क्रम में प्रफुल्ल बाबू की चमचमाती मर्सिडीज कार जैसे ही उनके घर के मुख्य फाटक में घुसी...
09/08/2024

रात तक़रीबन नौ बजे ऑफिस से लौटने के क्रम में प्रफुल्ल बाबू की चमचमाती मर्सिडीज कार जैसे ही उनके घर के मुख्य फाटक में घुसी, ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मी तेज़ी से दौड़कर उनके पास पहुंचा औऱ उन्हें सैल्यूट करते हुए कहा- “साहब ! एक महिला आपके लिए लिखी गई किसी व्यक्ति की एक चिट्ठी लेकर न जाने कब से यहाँ भटक रही है औऱ बार बार आपसे मिलने का अनुरोध कर रही है। मेरे मना करने के बाद भी यहाँ से जा ही नहीं रही है! उसके साथ उसका एक छोटा बच्चा भी है।”
प्रफुल्ल जी ने गार्ड की बातों को सुनकर आश्चर्य से उस महिला को अपने पास बुलाया औऱ उससे जानना चाहा- "आप कहाँ से आई है और मुझसे क्यों मिलना चाहती हैं? किसने मुझें ये चिट्ठी लिखी है?”
कंपकपाते हाथों से महिला ने बिना कुछ ज़्यादा बोले प्रफुल्ल जी को एक चिट्ठी पकड़ाई औऱ फ़िर मद्धिम आवाज़ में सिसकते हुए बोली- "साहब ! मैं अभागन बड़ी भयानक मुसीबत में हूँ, तत्काल आपकी मदद चाहिए, आपके पिताजी ने मुझें ये चिट्ठी देकर आपके पास भेजा है। मेरा इकलौता बेटा बहुत बीमार है। इसे किसी भी तरह किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा दीजिए। आपका जीवन भर उपकार रहेगा। गांव में इसके इलाज की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण मज़बूरी में मैं आपके पास आई हूँ ।"
चिट्ठी देते हुए महिला प्रफुल्ल जी के सामने अपने दोनों हाथ जोड़कर खड़ी हो गई ।
प्रफुल्ल जी ने उस चिट्ठी को ध्यान से पढ़ा और कुछ पल के बाद अत्यंत गंभीर व शांत हो गए।
उसके बाद वे मैली कुचैली साड़ी पहनी क़भी उस महिला की तरफ़ देखते तो क़भी उस चिट्ठी की तरफ़।
कुछ देर तक गहरी चिंता में प्रफुल्ल बाबू निमग्न हो कुछ सोचते रहे।
‌ दरअसल उस चिट्ठी के साथ-साथ वो महिला अपने गंभीर रूप से बीमार बच्चे को लेकर उनके पास इलाज़ हेतु मदद के लिए अपने गांव से शहर पहुँची थी।
प्रफुल्ल जी ने उसी क्षण अपने सुरक्षाकर्मी को बोलकर उस महिला औऱ उसके बीमार बच्चे के लिए अपने आउट गेस्ट रूम में रहने का प्रबंध करवाया औऱ फ़िर वहीं कुछ देर बाद दोनों के लिए भोजन की व्यवस्था की।
महिला ने पुनः उनसे विनती करते हुए कहा- "साहब ! भगवान के लिए मेरी सहायता कीजिए! मेरे इकलौते बीमार बच्चे को किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा दीजिए, नहीं तो इसका बचना मुश्किल है ।"

महिला बोलते बोलते उनके पैरों पर गिर पड़ी।

"अरे माताजी ऐसा मत कीजिए,आप मेरी मां समान हैं, आप चिंता मत कीजिए, सब ठीक हो जाएगा।" प्रफुल्ल बाबू ने उसका धैर्य बढ़ाया।
इतने में रात के सन्नाटे को चीरती हॉर्न बजाती हुई एक दूसरी गाड़ी तेज़ी से घर के अंदर घुसी औऱ कुछ पल बाद ही एक डॉक्टर वहाँ उपस्थित हुए ।
"आईए डॉक्टर साहब । ये बच्चा बीमार है, इसको ज़रा पूरी गंभीरता से देखकर कर इसकी चिकित्सा शुरू कीजिए।” प्रफुल्ल जी ने कहा।
डॉक्टर बाबू ने बिना कोई समय गंवाए लगभग बीस मिनट तक उस बच्चे का गहन निरीक्षण किया औऱ फ़िर कुछ जाँच करवाने के साथ-साथ कुछ दवाईयों की पर्ची भी वहाँ खड़े प्रफुल्ल बाबू के हाथों में पकड़ा दी।
"ये कुछ दवाइयां औऱ इंजेक्शन मेडिकल स्टोर से तत्काल मंगा लीजिए । मरीज को अभी देने हैं और मैं अपने साथ जांच के लिए इस बच्चे का रक्त नमूना लेकर जा रहा हूँ , जांच की रिपोर्ट लेकर कल फ़िर आऊंगा।" डॉक्टर ने प्रफुल्ल बाबू से कहा औऱ फिर वहां से निकल गए।
प्रफुल्ल बाबू ने डॉक्टर की पर्ची औऱ कुछ पैसे अपने ड्राइवर को पकड़ाते हुए उसे तुरंत सारी दवाइयां लाने का निर्देश दिया औऱ फ़िर अपने घर के अंदर जाने के लिए वहाँ से गलियारे की ओर मुड़े।
"साहब बस आप मेरे बच्चे को किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती करा देते , मैं ग़रीब कहाँ से दे पाऊँगी इलाज़ के इतने पैसे ? मेरे पास तो रहने-खाने तक के भी पैसे नहीं हैं।" महिला गिड़गिड़ाई ।

"माता जी ! अब आप निश्चिंत रहें औऱ जाकर आराम करें , रात बहुत हो चुकी है "। इतना कहकर प्रफुल्ल बाबू वहां से निकल अपने घर के अंदर प्रवेश कर गए।
‌ सुबह डॉक्टर बाबू बच्चे की तमाम रिपोर्ट के साथ फ़िर आ गये और उसे एक दो इंजेक्शन तथा कुछ दवाइयां दीं ।
अपने ऑफिस जाने से ठीक पहले प्रफुल्ल बाबू ने भी बीमार बच्चे के साथ-साथ, उस महिला के लिए अच्छी तरह से खाने पीने की व्यवस्था करा दी और सबको उन दोनों का ध्यान रखने के लिए निर्देशित कर वहाँ से चले गए।
डॉक्टर बाबू अब नियमित रूप से आकर उस बीमार बच्चे की जाँच करते औऱ साथ ही सही ढंग से उसकी चिकित्सा भी।
लगभग एक महीने के बाद जब बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ हो गया तो महिला प्रफुल्ल बाबू के सामने जाकर बोली- "साहब, मेरा बच्चा बिलकुल ठीक हो चुका है, हम अब वापस अपने गांव जाना चाहते हैं। आपने जो मेरे लिए किया उसके लिए मैं जीवन भर आपका औऱ आपके पिता कृष्णकांत जी का उपकार कभी नहीं भूलूंगी।"

जब महिला अपने बच्चे के साथ वहाँ से विदा होने लगी तो प्रफुल्ल बाबू ने कुछ रुपयों के साथ दोनों को नए कपड़े औऱ दो जोड़ी नए चप्पल उपहार स्वरूप दी औऱ साथ ही उसे एक चिट्ठी भी देते हुए कहा कि "इसे उन पिता जी को दे दीजिएगा, जिन्होंने आपको यहाँ भेजा था ।"
‌ महिला हाथ जोड़कर कृतज्ञता का भाव प्रकट करते हुए उन्हें लगातार अनगिनत आशीर्वाद देती वहाँ से चल पड़ी ।

ठीक दूसरे ही दिन अपने गाँव पहुँच कृष्णकांत जी को वह चिट्ठी देते हुए महिला उनसे प्रफुल्ल जी की बहुत तारीफ़ करने लगी ! “बाबा ! आपका बेटा तो देवता है देवता ! कितना ख़याल रखा हमारा । ऐसा बेटा किस्मत वाले को ही नसीब होता है, ऊपरवाला उन्हें औऱ उनके समूचे परिवार को हमेशा सुखी रखे ।”
कृष्णकांत जी उस चिट्ठी को पढ़कर ठगे से रह गए, उसमें लिखा था-
“परम आदरणीय बाबू जी ! मैं आपको नहीं जानता, औऱ न ही क़भी आपसे मिला हूँ। लेकिन अब आपका बेटा इस पते पर नहीं रहता । कुछ महीने पहले ही उसने ये मकान बेच दिया है। अब मैं यहाँ रहने लगा हूँ, पर मुझे भी आप अपना बेटा ही समझिए।
बचपन से ही मुझे, अपने पिता का सुख नहीं मिला, मॉ ने ही पाल-पोस कर बड़ा किया है।
मैंने जब आपका पत्र पढ़ा, तो मुझें ऐसा लगा कि जैसे मेरे सगे पिता ने मुझें कुछ करने के लिए आदेश दिया है।
आप कृपया इन माताजी से कुछ मत कहिएगा। आपकी वजह से मुझे इन माताजी के द्वारा जितना आशीर्वाद और जितनी शुभकामनाएं मिली हैं, उस उपकार के लिए मैं आपका आभारी और ऋणी रहूँगा । सादर प्रणाम।

आपका धर्म पुत्र
प्रफुल्ल शर्मा

कुछ बेहद ख़ामोश लम्हों के बाद कृष्णकांत जी का सिर कुछ सोचकर ख़ुद ब ख़ुद उस अनजान सज्जन व्यक्ति के सम्मान में झुक गया औऱ उनकी आंखें तो नम थीं ही। उनके पुत्र ने चुपके से मकान बेचकर जिन परेशानियों से बचना चाहा था, उन्हीं परेशानियों को एक अनजान पवित्र आत्मा ने अपने लिए वरदान समझ अपनाया और उनका सम्मान सुरक्षित रखा। धन्य है उसका संस्कार।

🙏🏾🙏🏾🙏🏾

एक लकड़हारा जंगल में लकड़ियां काटने जाया करता था। उसी जंगल में एक फकीर की झोपड़ी थी। उस फकीर ने एक दिन उस लकड़हारे को अप...
23/07/2024

एक लकड़हारा जंगल में लकड़ियां काटने जाया करता था। उसी जंगल में एक फकीर की झोपड़ी थी।

उस फकीर ने एक दिन उस लकड़हारे को अपने पास बुलाया और पूछा, "मैं तुझे रोज देखता हूं कि तू इस जंगल में लकड़ी काटता है। क्या कभी तूने आगे जाने की नहीं सोची?"

लकड़हारे ने कहा, "मेरी सात पीढ़ी यही लकड़ी काटती रही है और आगे भी सात पीढ़ियां यही काटती रहेंगी। मुझे कहीं आगे जाने की क्या जरूरत है?"

इस पर उस फकीर ने कहा, "थोड़ा और आगे जाओ। वहां चंदन की लकड़ियां हैं।"

वह थोड़ा और आगे गया और उसे वाकई चंदन की लकड़ियां मिलीं और वह बहुत खुश हो गया। पहले वह रोज लकड़ियों के लिए जाता था, अब वह हफ्ते में एक बार ही जाता था। वह बहुत पैसे वाला हो गया।

कुछ समय बाद फकीर ने फिर उसे रोका और उससे कहा, "मैं कई दिनों से देख रहा हूं तू चंदन की लकड़ियां ला रहा है। क्या कभी उससे और आगे गया?"

इस पर लकड़हारे ने कहा, "उससे आगे क्या करना है? चंदन की लकड़ियां तो सबसे श्रेष्ठ लकड़ियां हैं।"

फकीर ने कहा, "अरे पागल, उससे थोड़ा आगे बढ़ जा। वहां चांदी की खदान हैं।"

फिर वह चांदी की खदानों में पहुंचा। अब वह और पैसे वाला बन गया। अब वह अपने साथ खच्चर लेकर जाता और बहुत सारी चांदी भर कर लाता।

धीरे-धीरे समय बीतता गया। एक दिन फकीर उसे फिर मिला। अब उसने उससे और आगे जाने को कहा और कहा कि वहां सोने की खदान हैं। फिर वह आदमी धीरे-धीरे अपनी जगह का सबसे अमीर आदमी बन गया। उसके पास बहुत सुंदर घर हो गया जो महल की तरह था।

कई साल बीत गए। एक दिन वह अपने रथ से कहीं जा रहा था। सामने वह फकीर आ गया। फकीर को देखते ही वह आदमी रथ से उतरा और उसे प्रणाम करके कहा, "आप बहुत दिनों के बाद दिखे।"

उस फकीर ने कहा, "लेकिन आज भी मैं तुझसे वही प्रश्न पूछता हूं।"

उस आदमी ने उस फकीर की बात बीच में ही काटते हुए कहा, "अब आप मुझसे नहीं कह सकते कि और आगे जाओ, क्योंकि मैं बहुत आगे चला गया हूं। पृथ्वी का पूरा चक्कर काट लिया है मैंने। मैंने सोने से भी आगे हीरे-जवाहरात की खदानी ढूंढ ली हैं। मुझे सब कुछ मिल गया है। मैंने जान लिया है कि आगे कुछ भी नहीं है। मैं पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाती चुका हूं, इसलिए अब आप मुझसे आगे जाने की बात ना कहे।"

इस पर फकीर जोर-जोर से हंसने लगा और उसने कहा, "आगे अभी बहुत कुछ है।"

वह आदमी बोला, "उससे आगे क्या है?"

फकीर ने कहा, "उससे आगे मैं हूं। क्या कभी तुमने सोचा कि जिस आदमी को चांदी, सोने, हीरे-जवाहरात सब की खबर हो, वो इस झोपड़ी में क्या कर रहा है?"

यह बात सुनकर लकड़हारा वही चुपचाप खड़ा हो गया और सोचने लगा, "हां वाकई जिस इंसान को इन सब चीजों के बारे में पता है, वह इस झोपड़ी में क्या कर रहा है?"

तब उसने याद किया कि मैंने जब भी इस फकीर को देखा, ध्यान मुद्रा में ही देखा। क्या ध्यान इन सबसे आगे की चीज है? क्या ध्यान से बढ़कर और कुछ भी नहीं? क्या यह सारी चीजें ध्यान के आगे फीकी हैं?

वह आदमी उस रथ से उतर गया और फिर उसके बाद कभी उस रथ पर नहीं चढ़ा। ध्यान आत्मा की खुराक है, आत्मा को मजबूत करता है। ध्यान एक ऐसी आदत है जो जीवन बदल सकती है और वह आदत है ध्यान करने की आदत।

इस संसार में देखने के लिए अनेक सुंदर स्थान हैं, परंतु सबसे सुंदर स्थान है बंद आंखों से अपने भीतर देखना!

दोस्तो, कहानी पसन्द आई हो तो एक लाइक और अपने दोस्तों से शेयर करना मत भूलना! रोजाना ऐसी ही कहानियों के लिए Follow 👉

# # # Hashtags for Facebook:

"मायका...."अरे वाह..... रीना आज तो बड़ी प्यारी लग रही हो... रक्षाबंधन वाले दिन सुधा अपने मायके से वापिस आयी ही थी कि उसे ...
14/07/2024

"मायका....

"अरे वाह..... रीना आज तो बड़ी प्यारी लग रही हो...
रक्षाबंधन वाले दिन सुधा अपने मायके से वापिस आयी ही थी कि उसे रीना बाहर ही मिल गयी...
चटक हरे रंग के लहंगा चोली और मांग टीका लगाए सजीधजी आज तो वो बिल्कुल अलग और बहुत सुंदर दिख रही थी....
'हां ...जी आंटी मैं भी अभी आयी हूँ अपने मायके से राखी करके...वह बोली

मायके से....
रीना ...सुधा के घर के साथ वाले घर में किराए का कमरा लेकर रह रही थी वो किसी बड़ी कोठी में पूरे दिन के लिए खाना बनाने का काम करती थी और उसका घर वाला कहीं ड्राइवर का काम करता था...
लेकिन उनके रहन सहन से कहीं भी नही लगता था कि रीना इस तरह कोठी में काम करती होगी...

सुबह जब घर से निकलती तो खूब बढ़िया से तैयार टिप टॉप होकर जाती... आते जाते जब भी सुधा को दिखती या मिलती खूब अच्छे से मुस्कुराते हुए बात करती...

मायके से आई हूं.....उसका जवाब सुनकर उस समय तो सुधा अंदर चली गयी लेकिन उसकी ये बात उसके दिमाग से निकल ही नही रही थी कि वो मायके गयी हुई थी राखी का त्योहार मनाने....
क्योंकि कुछ दिन पहले ही तो उसने बताया था कि उसके माँ बाप तो बचपन मे ही किसी दुर्घटना में चल बसे थे...

परिवार में और कोई था नही तो बस वो एक बार किसी दूर के रिश्तेदार के साथ गांव से शहर आ गयी तो दोबारा कभी गांव गयी ही नही...
तो फिर आज अचानक से इसने ये क्यों बोला कि वो मायके गयी थी भाईयों को राखी बांधने....

अब सवाल तो सुधा को बहुत उलझा रहे थे लेकिन उनके जवाब तो तभी मिलते जब रीना बताती....
लेकिन सुधा को ज्यादा समय उलझन में नही रहना पड़ा क्योंकि इत्तफाक से अगले दिन रीना फिर से उसे फिर से मिल गयी...
और सुधा के बिना पूछे ही उसने बताना शुरू कर दिया क्योंकि शायद वो अंदर से जान गई होंगी के उसकी उसदिन वाली बात ने सुधा आंटी के मन मे कई सवाल उठा दिए होंगे...

वह कहने लगी....आंटी आपको तो पता ही है मेरा तो मायका ही नही है बचपन से बस कोठियों में काम करते करते ही बड़ी हुई हूँ...
लेकिन मेरे पति रंजीत की मैं दूसरी पत्नी हूँ...
उसकी पहली पत्नी का जब बच्चा हुआ तो वो चल बसी।फिर रंजीत की शादी मेरे साथ हुई...

रंजीत ने क्योंकि बच्चे की देखभाल के लिए जल्दी शादी की थी तो तब तक उसका बेटा उसकी पहली पत्नी के मायके वालों के पास था... रंजीत ने उन्हें शादी में बच्चे के साथ बुलाया था....

उन्होंने वहां आकर बच्चा तो मुझे सौंपा ही साथ ही जब उन्होंने देखा कि मेरा मायके का कोई भी नही है तो उन्होंने मुझे अपनी बेटी मानकर मेरा कन्यादान भी किया... इस तरह बच्चे को माँ मिल गयी....
मुझे मायका मिल गया और उनको बेटी मिल गयी और अब वो मुझे अपनी बेटी की तरह ही मान देते हैं और हर तीज त्योहार पर मुझे मायके का हर नेग वहीं से आता है....

सुधा उसकी बातें सुनकर सोच में पड़ी थी कि आज ऐसे वक्त में जब अपने ही अपनो को नही पूछते तब भी इस दुनिया मे ऐसे बड़े दिल वाले लोग मौजूद हैं जो सही मायनों में जानते हैं कि रिश्ते बनाना और उन्हें दिल से निभाना क्या होता है.........🙏🙏🙏🙏
आभार -मौसम अभिषेक अग्रवाल



Address

PU 4
Indore
452010

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Manish Kumar posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Manish Kumar:

Share

Category