ਹੁਸ਼ਿਆਰਪੁਰ ਲੋਕ ਸਭਾ

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*'राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020' के त्री-भाषा फार्मूले से आने वाले समय में देश की अन्य समतावादी भाषाओं और संस्कृतियों के ...
06/03/2025

*'राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020' के त्री-भाषा फार्मूले से आने वाले समय में देश की अन्य समतावादी भाषाओं और संस्कृतियों के साथ-साथ पंजाब की गुरुमुखी (पंजाबी भाषा) भी प्रभावित होगी। परिणामस्वरूप, पंजाब की आगामी पीढ़ी गुरुग्रन्थ साहिब में दर्ज भगत, गुरुओं के मानवता, समता और प्रेम के संदेशों से विमुख होकर असमानता पर आधारित अमानवीय वैदिक संस्कृति का अनुसरण करना शुरू कर देगी। अगर "राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020" आगामी बीस वर्षों तक लागू रही तो देश की समतावादी संस्कृतियों का सर्वनाश होना निश्चित है। इसलिए हमें हर हाल में 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020' को रोकना होगा।*

_- प्रो. डॉ. जवाहर नेसन_ (शिक्षाविद, पूर्व कुलपति मैसूर विश्वविद्यालय एवं पूर्व संयोजक शिक्षा नीति उच्च स्तरीय समिति, तमिलनाडु सरकार)

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_प्रिय बहुजन द्रविड़ भाइयों और बहनों,_

बहुजन द्रविड पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार जीवन सिंह जी ने प्रो. डॉ. जवाहर नेसन (शिक्षाविद, पूर्व कुलपति मैसूर विश्वविद्यालय एवं पूर्व संयोजक शिक्षा नीति उच्च स्तरीय समिति, तमिलनाडु सरकार) के साथ दिनांक 1 मार्च से 3 मार्च, 2025 तक पंजाब का दिन दिवसीय दौरा किया। इस बीच उन्होंने लुधियाना, जालंधर और चंडीगढ़ में आयोजित विभिन्न संगोष्ठीयों को सम्बोधित किया।

दिनांक 3 मार्च, 2025 को 'केंद्रीय श्री गुरु सिंह सभा' एवं 'द्रविड़ एम्प्लाइज नेटवर्क' के द्वारा बहुजन द्रविड़ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष *सरदार जीवन सिंह* की अध्यक्षता में केन्द्रीय श्री गुरु सिंह सभा, प्लॉट नं. 1, सेन्ट्रल मार्ग, सेक्टर 28A, चंडीगढ़ में *"लोकतान्त्रिक भारत के निर्माण हेतु गठबंधन"* विषय पर पंजाब के विद्वानों एवं राजनीतिक नेताओं के साथ एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

इस संगोष्ठी में मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित प्रो. डॉ. जवाहर नेसन जी ने "राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020" पर अपने समीक्षात्मक विचार व्यक्त किए।

प्रो. डॉ. जवाहर नेसन ने संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा कि, तीन दिनों तक पंजाब का दौरा करने और यहां के शिक्षाविदों से मिलने के बाद, मुझे यह आभास हुआ है कि पंजाब में 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020' (एनईपी) की दिशा और उसके दीर्घकालिक परिणामों के बारे में गहन जागरूकता, चर्चा और समझ की कमी है। इसलिए एनईपी पर पंजाब में भी एक समुचित बहस की जरूरत है।

उन्होंने राज्य में राजनीतिक स्तर पर भी एनईपी के प्रति स्पष्टता की कमी की ओर इशारा करते हुए कहा कि, पंजाब में राजनीतिक स्तर पर भी 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020' के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में स्पष्टता की कमी है।

उन्होंने आगे कहा कि, "पंजाब से एकमात्र मुद्दा जिस पर प्रतिक्रिया आई है, वह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा पंजाबी भाषा पढ़ाने का मुद्दा था, जबकि पूरी एनईपी पर गहन चर्चा होनी चाहिए थी।

उन्होंने अपने व्याख्यान में केंद्र सरकार की "राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020" की समीक्षा करते हुए आगे बताया कि, केंद्र सरकार की *"राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020"* की संरचना वैदिक परंपरा के आधार पर तैयार की गई है। भाजपा इस 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020' के माध्यम से भारत में मनुवाद पर आधारित एक 'नए समाज' की रचना करना चाहती है। इस शिक्षा नीति के तहत जाति आधारित कौशल को बढ़ाने का प्रयास भी किया गया है।

उन्होंने आगे बताया कि, केंद्र सरकार ने शिक्षा में 10+2 ढाँचे की जगह 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020' को 5+3+3+4 ढाँचे के आधार पर विकसित किया है। केंद्र सरकार ने मौलिक शिक्षा में तीन भाषा फार्मूला (क्षेत्रीय भाषा, हिंदी और अंग्रेजी) को अनिवार्य रूप से लागू करके गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी भाषा को जबरन थोपने का षड्यंत्र किया है। भाजपा की केंद्र सरकार इस फार्मूला के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाओं को नष्ट करने की फिराक में है।

उन्होंने आगे कहा कि, भाषा सिर्फ संवाद का ही माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों के विकास में भी अहम भूमिका निभाती है। भारत विभिन्न भाषा और संस्कृतियों वाला एक संघ राज्य है, और यही हमारे देश की विशेषता रही है। केंद्र सरकार इस तीन भाषा फार्मूले के द्वारा भारत की अन्य समतावादी भाषाओं और संस्कृतियों को नष्ट कर देशवासियों के ऊपर मनुवाद पर आधारित हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान थोपने का काम कर रही है। यह भारत की समतावादी भाषाओं, संस्कृतियों और हमारे सामाजिक लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा आघात है।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि, 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020' के त्री-भाषा फार्मूले से आने वाले समय में देश की अन्य समतावादी भाषाओं और संस्कृतियों के साथ-साथ पंजाब की गुरुमुखी (पंजाबी भाषा) भी प्रभावित होगी। परिणामस्वरूप, पंजाब की आगामी पीढ़ी गुरुग्रन्थ साहिब में दर्ज भगत, गुरुओं के मानवता, समता और प्रेम के संदेशों से विमुख होकर असमानता पर आधारित अमानवीय वैदिक संस्कृति का अनुसरण करना शुरू कर देगी। इस प्रकार, अगर "राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020" आगामी बीस वर्षों तक लागू रही तो देश की समतावादी संस्कृतियों का सर्वनाश होना निश्चित है। इसलिए हमें हर हाल में इस 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 2020' को रोकना होगा।

_तत्पश्चात बीडीपी अध्यक्ष सरदार जीवन सिंह जी ने भी विद्वानों की इस संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा,_

साथियों, प्रो. डॉ. जवाहर नेसन जी ने देश के लिए बेहद जरूरी और गंभीर विषय "राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020" पर विस्तार से अपने विचार साझा किए हैं। चुंकि आप सब विद्वान लोग हैं इसलिए आपको इस विषय पर गहनता से विचार करना चाहिए और समाज का भी मार्गदर्शन करना चाहिए।

तथाकथित राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बहाने अगर हमारी भाषा और समतावादी संस्कृति नष्ट कर दी जाएगी तो हमारा बहुजन द्रविड़ समाज इस मनुवादी असमानता और घृणा के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा कहा से ग्रहण करेगा?

ब्राह्मण इस देश में अतिसूक्ष्म (3%) आबादी वाले लोग हैं, लेकिन देश की विधायिका और कार्यपालिका में इन्हीं मुट्ठीभर लोगों का कब्जा है। मैं सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हूँ, इसलिए मैं देखता हूँ की देश के सर्वोच्च न्यायलय को भी यही अतिसूक्ष्म आबादी वाले लोग चला रहे हैं। देश का तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया भी इन्हीं मुट्ठीभर लोगों के कब्जे में है।

3% ब्राह्मण विधानपालिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को नियंत्रित कैसे कर रहे हैं? वह बहुजन द्रविड़ों में हिंदूवादी मूर्खता का प्रसार करके ही देश के सभी तंत्रों को नियंत्रित करने में सफल हो रहे हैं। समतावादी शिक्षा और संस्कृति के माध्यम से ही लोगों की मूर्खता को दूर किया जा सकता है। इसलिए हर हाल में हमें अपनी समतावादी संस्कृति और भाषा को बचाना होगा।

उन्होंने आगे कहा कि, ब्राह्मण देश और विदेश, जहां भी जाते हैं, वह अपनी जाति की संरचना को लागू करने का प्रयास करते हैं। जाति के नाम पर होने वाली मनोवैज्ञानिक अनुभूति को समझाया नहीं जा सकता। इसका दर्द वही समझ सकता है जिसने इसका दंश झेला है। जाति का संबंध सुंदरता, शिक्षा और पद से नहीं है, बल्कि जाति का संबंध जन्म से है। कुछ लोग कहते हैं की जाति का संबंध पेशा से है। अगर मैं जाति से चमार हूँ और पेशे से अधिवक्ता हूँ, तो मेरी जाति क्या होगी? जाति का संबंध सिर्फ और सिर्फ जन्म से है। इसलिए अगर आप जाति को समाप्त करना चाहते हैं तो आपको इस देश का शासक वर्ग बनना पड़ेगा। शासक वर्ग बनकर ही आप इस देश से जाति रूपी कोढ को समाप्त कर सकते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि, 1699 में, आनंदपुर साहिब में करीब 70 हजार लोगों की एक राष्ट्रस्तरीय सभा आयोजित कर गुरु गोबिंद सिंह जी ने जाति का उन्मूलन किया था। इसके बावजूद भी अगर हमारे लोग आज तक अपने नाम के पीछे जाति की पूँछ लगाकर घूम रहे हैं, तो इसका एकमात्र दोषी देश में व्याप्त मनुवादी (हिंदूवादी) संस्कृति ही है।

भारत में जाति ही मुख्य समस्या है, इसके अलवा जो भी समस्याएं हैं वह सब जाति से उत्पन्न हुई हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि जब तक भारत में हिंदू संस्कृति जिंदा है, तब तक जाति भी बनी रहेगी। जब तक जाति रहेगी, छुआछूत, जातीय उत्पीड़न और गरीबी बनी रहेगी। इसलिए 1699 की तर्ज पर एक बार फिर से जाति का उन्मूलन जरूरी है।

उन्होंने आगे कहा कि, देश की इन विकट परिस्थितियों में हम अपनी गरिमा और स्वाभिमान को कैसे सुरक्षित कर सकते हैं? बिना हथियार के आप अपनी माँ, बहनों की सुरक्षा नहीं कर सकते। आज पूरी दुनिया अमेरिका से क्यों डरती है, क्योंकि आज उसके पास आधुनिकतम हथियार हैं इसलिए दुनिया के सभी देश अमेरिका से डरते हैं। मैं कहता हूँ कि हथियार इंसान की गरिमा और स्वाभिमान के रक्षक हैं। इसलिए आज हमें अपनी गरिमा, स्वाभिमान और माँ-बहनों की सुरक्षा के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी के द्वारा दी गई कृपाण (तलवार) की आवश्यक है।

उन्होंने आगे कहा कि, मान्यवर कांशीराम जी का युग हमारे लोगों के लिए उज्जवल युग था, लेकिन आज हम अंधकार युग में पहुंच गए हैं। आज हमें परिवर्तन के लिए साझेदारी की जरूरत है। लोकतंत्र में किसी एक जाति के वोटों की संख्या से विजय प्राप्त नहीं की जा सकती इसलिए हमें बहुजन द्रविड़ समुदाय के साथ सामाजिक लोकतंत्र स्थापित कर राजनीतिक भाईचारा बनाना होगा, क्योंकि ब्राह्मणवादी व्यवस्था में सबका शोषण होता है। इस प्रकार, शोषित-पीड़ित लोगों के बीच सामाजिक लोकतंत्र स्थापित करके ही हम इस देश का शासक वर्ग बन सकते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि, 'बेग़मपुरा' की दृष्टि गुरु रविदास की देन है और 'खालसा' शब्द गुरु कबीर की देन है। इसलिए हम अपने संतों, गुरुओं के बेग़मपुरा मिशन को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं। 'बेग़मपुरा खालसा राज' की स्थापना करके ही हम इस देश में जातिविहीन समतावादी समाज का निर्माण कर सकते हैं।

आइये हम सूचना के आदान-प्रदान के लिए अपनी *मातृभाषा* सीखें।

आइए हम वैश्विक सद्भावना और वैज्ञानिक ज्ञान विकसित करने के लिए *अंग्रेजी* सीखें।

आइए हम आत्म-सम्मान सुनिश्चित करने, सत्य को जानने, स्वतंत्र रूप से प्रेम का आदान-प्रदान करने, जातियों को खत्म करने, सामाजिक संवाद को सुविधाजनक बनाने और भारत के सच्चे आध्यात्मिक दर्शन को समझने के लिए *पंजाबी* सीखें, जो सभी मानव अस्तित्व का मूलभूत संकलन है।

आइये हम सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति के लिए *"बेगमपुरा खालसा राज"* की स्थापना के लिए काम करें।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ। वाहेगुरु जी का खालसा। वाहेगुरु जी की फ़तेह।।

केन्द्रीय श्री गुरु सिंह सभा के अध्यक्ष प्रोफेसर शाम सिंह जी ने अपने स्वागत भाषण के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की तथा कार्यक्रम का सफल संचालन केन्द्रीय श्री गुरु सिंह सभा के महासचिव डॉ. खुशहाल सिंह जी ने किया।

न्यायमूर्ति रंजीत सिंह, चंडीगढ़; प्रोफेसर देविंदर सिंह, पंजाब विश्वविद्यालय सिख छात्र संघ के पूर्व संरक्षक; कैप्टन गुरदीप सिंह घुमन, सामाजिक कार्यकर्ता, चंडीगढ़; सरदार तीरथ सिंह, पंजाब बीडीपी प्रधान; सरदार गुरप्रीत सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता; प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद खालिद, सामाजिक कार्यकर्ता; प्रोफेसर हरपाल सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता आदि विशेष आमंत्रित विद्वानों सहित सैकड़ों बीडीपी कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

अंत में, बहुजन द्रविड़ पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एडवोकेट अशोक सिंह जी ने संगोष्ठी में आमंत्रित सभी वक्ताओं, विद्वानों का हार्दिक आभार व्यक्त किया।

गुरुओं के समानता मिशन में...

चंडीगढ़ से.....

बीबीसीआई न्यूज़, नई दिल्ली
+91 9717366805

_प्रिय बहुजन द्रविड भाइयो और बहनो,_बहुजन द्रविड पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार जीवन सिंह जी के निर्देश पर सरदार सेल्व...
02/11/2024

_प्रिय बहुजन द्रविड भाइयो और बहनो,_

बहुजन द्रविड पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार जीवन सिंह जी के निर्देश पर सरदार सेल्वा सिंह सहित बीडीपी के कई युवा कार्यकर्ता चंडीगढ़ में एक महीने की मीडिया ट्रेनिंग में हैं।

सदियों से जड़मूल ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ हम जो लड़ाई छेड़े हुए हैं उसे फ़तेह करना आसान काम नहीं है। यह लड़ाई फ़तेह करने के लिए हमें हर मोर्चे में तैयार होना होगा। हमें स्वयं के संस्थान, स्वयं के प्रशिक्षण केंद्र और स्वयं के मीडिया सेंटर तैयार कर संचालित करने होंगे। बीडीपी युवाओं का मीडिया प्रशिक्षण इसी दिशा में यह एक शुरुआत है।

हमें उम्मीद है कि यह युवा कार्यकर्ता बहुत जल्द मीडिया कार्य में सिद्धस्त होकर अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए नज़र आएंगे। शुभकामनायें।

_गुरुओं के समानता मिशन में..._

*एडवोकेट अशोक सिंह*
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, बीडीपी
+91 9717366805

_प्रिय बहुजन द्रविड भाइयो और बहनो,_आज दिनांक 02 नवम्बर, 2024 को बहुजन द्रविड पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार जीवन सिंह...
02/11/2024

_प्रिय बहुजन द्रविड भाइयो और बहनो,_

आज दिनांक 02 नवम्बर, 2024 को बहुजन द्रविड पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार जीवन सिंह जी ने पार्टी उपाध्यक्ष एडवोकेट अशोक सिंह और पंजाब प्रधान सरदार तीरथ सिंह जी के साथ बुलंदपुरी पहुंचकर बाबा बलदेव सिंह जी से मुलाक़ात की।

करीब 30 मिनट की मुलाक़ात के दौरान देश-दुनिया के कई सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर हमारी बात हुई।

बाबा बलदेव सिंह जी ने हमें अगले सप्ताह (12 नवम्बर से 13 नवम्बर, 2024 तक) बुलंदपुरी में होने जा रहे *"विनम्रता में एक दूसरे के प्रति दया और प्रेम की लहर"* प्रोग्राम में आमंत्रित करते हुए बताया कि इस कार्यक्रम में भारत, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, वर्मा, मलेशिया, कनाडा आदि देशों से सभी धर्मों के धर्म गुरुओं और नामचीन लोगों को आमंत्रित किया है।

उन्होंने कहा कि हम आपको भी सपरिवार आमंत्रित कर रहे हैं। आप सबको इस कार्यक्रम में अनिवार्य रूप से दो दिन पहले ही पहुंचना है।

अंत में, बाबा जी से विदा लेकर हम अमृतसर के लिए रवाना हो गए।

गुरुओं के समानता मिशन में....

*बीबीसीआई न्यूज़, नई दिल्ली*
+91 9717366805

_Dear Bahujan Dravidian brothers and sisters,_

Today on 02 November, 2024, National President of Bahujan Dravida Party Sardar Jeevan Singh ji reached Bulandpuri along with Party Vice President Advocate Ashok Singh and Punjab Chief Sardar Tirath Singh ji and met Baba Baldev Singh ji.

During the meeting of about 30 minutes, we talked on many socio-cultural issues of the country and the world.

Baba Baldev Singh ji invited us to the *"A WAVE OF KINDNESS AND LOVE FOR EACH OTHER IN HUMILITY"* to be held in Bulandpuri next week (from 12 November to 13 November, 2024) and told that religious leaders and eminent people of all the religions from different countries like India, America, England, Germany, Burma, Malaysia, Canada etc. have been invited to this program.

He said that we are also inviting you with your family. All of you have to reach this program two days in advance.

Finally, after bidding adieu to Baba ji, we left for Amritsar.

In the Guru's Mission of equality....

*BBCI News, New Delhi*
+91 9717366805

https://youtu.be/F0Zi7zEuQtE?si=HhrEMtIKeOC_U3Lo*हम मनुवाद (ब्राह्मणवाद) मुक्त दिल्ली विधानसभा -2025 का निर्माण करेंगे।*...
24/10/2024

https://youtu.be/F0Zi7zEuQtE?si=HhrEMtIKeOC_U3Lo

*हम मनुवाद (ब्राह्मणवाद) मुक्त दिल्ली विधानसभा -2025 का निर्माण करेंगे।*

*जिन्हें ब्राह्मणों के शंख पर भरोसा है वह बीएसपी के साथ जाएं और जिन्हें मान्यवर कांशीराम जी की बहुजन रणनीति पर भरोसा है वह बहुजन द्रविड पार्टी के साथ आएं।*

*बहुजन द्रविड पार्टी मान्यवर कांशीराम जी की बहुजन विचारधारा और थांथाई पेरियार की द्रविड़ विचारधारा को साथ लाकर सद्गुरु रविदास के "बेग़मपुरा" सपने को साकार करने का प्रयास कर रही है।*

_- बीडीपी उपाध्यक्ष, एडवोकेट अशोक सिंह_

delhi assembly election 2025 | बहुजन द्रविड़ पार्टी देगी दिल्ली में टक्कर | ...

_प्रिय बहुजन द्रविड भाइयो और बहनो,_आज दिनांक 3 अक्टूबर, 2024 को बहुजन द्रविड पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार जीवन सिंह...
03/10/2024

_प्रिय बहुजन द्रविड भाइयो और बहनो,_

आज दिनांक 3 अक्टूबर, 2024 को बहुजन द्रविड पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार जीवन सिंह जी के नेतृत्व में दिल्ली में वरिष्ठ कांशीरामवादी बुद्धिजीवियों की एक उच्च स्तरीय 'गोलमेज सभा' का आयोजन किया गया।

इस सभा में मान्यवर कांशीराम साहब द्वारा स्थापित "बहुजन मूवमेंट" को एक बार फिर से राष्ट्रीय स्तर पर पुनर्जीवित करने हेतु विचार-मंथन किया गया।

इस उच्च स्तरीय 'गोलमेज सभा' में मौजूद वरिष्ठ कांशीरामवादी बुद्धिजीवियों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया की आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव - 2025 से पहले बहुजन द्रविड पार्टी द्वारा दिल्ली की सभी 70 विधानसभा सीटों में बड़े पैमाने पर सामाजिक-राजनीतिक कॉर्नर मीटिंगों का आयोजन कर बहुजन द्रविड समाज को संगठित करने का काम किया जायेगा।

तत्पश्चात आगामी कॉर्नर मीटिंगों के आयोजन और संचालन हेतु जल्द ही कमेटियों का गठन कर जिम्मेदारी सौंपने की योजना तैयार की गई।

अंत में, सभी बुद्धिजीवियों को भजन सिंह द्वारा लिखित *"फूल जो लहू में खिले"* ऐतिहासिक पुस्तक की एक-एक प्रति भी भेंट की गई। धन्यवाद!

संतों, गुरुओं, महापुरुषों के समानता मिशन में.....

*बीबीसीआई न्यूज़, नई दिल्ली*
+91 9717366805

बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम पर 'बेग़मपुरा' के कारिंदों का प्रभाव...!*************************************************भारत...
08/09/2024

बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम पर 'बेग़मपुरा' के कारिंदों का प्रभाव...!

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भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास क्रम में पंजाब का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। शिवालिक पहाड़ियों से सटे पंजाब के रोपड़ (रूपनगर) जिले में मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों की विकसित 'सिंधु घाटी सभ्यता' के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं की अविभाजित पंजाब की धरती ही सिंधु घाटी सभ्यता की जननी रही है। अविभाजित पंजाब की धरती ही दस सिख गुरु साहिबान से लेकर बाबा बंदा सिंह बहादुर, बाबा जीवन सिंह, महाराजा रणजीत सिंह, ज्ञानी दित्त सिंह आदि महान क्रांतिकारियों तथा समाज सुधारकों की कर्मस्थली बनी।

दशवें पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी ने 13 अप्रैल, 1699 को बैसाखी के दिन एक राष्ट्र स्तरीय सभा का आयोजन कर अपने लाखों अनुयायियों के बीच में से 'पंज प्यारों' का चुनाव कर *'मानवता की आजादी'* तथा *'सच्चाई का राज'* स्थापित करने के लिए *'ख़ालसा पंथ'* की स्थापना भी पंजाब स्थित रोपड़ जिले के नजदीक आनंदपुर साहिब में ही की थी। यदपि, गुरु गोबिंद सिंह जी के आह्वान पर स्वेच्छा से अपना सर बलिदान करने के लिए आगे आने वाले 'पंज प्यारे' अलग-अलग जातियों और अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्र से थे। इनमें से भाई दया सिंह लाहौर (पंजाब) से, भाई धरम सिंह मेरठ (उत्तर प्रदेश) से, भाई मोहकम सिंह द्वारका (गुजरात) से, भाई साहिब सिंह बीदर (कर्नाटक) से और भाई हिम्मत सिंह पुरी (उड़ीसा) से थे। इन 'पंज प्यारों' में से चार प्यारे अत्याचार पीड़ित निम्न जातियों से संबंधित थे। गुरु गोबिंद सिंह जी ने इन सभी को इनकी जातीय पहचान से मुक्त करते हुए कहा था, *"इन गरीब सिखन को देऊं पातशाही। याद करें हमरी गुरुआई।। "* उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा रोंपी गई जाति नामक पूंछ काटकर पुरुषों को 'सिंह' और महिलाओं को 'कौर' उपनाम से नवाजते हुए आह्वान किया था, *"मानस की जात सबै एकै पहिचानबो।"*

पंजाब के इसी रोपड़ जिले में आनंदपुर साहिब से मात्र 12 किलोमीटर दूर स्थित पिरथीपुर बुंगा (बुंगासाहिब) में 15 मार्च, 1934 को माता बिशन कौर की कोख से एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया 'कांशीराम'। कांशीराम के पिता सरदार हरि सिंह जी रविदासिया सिख थे। उनका पैतृक घर ख़्वासपुर गांव में था, जो रोपड़ से महज 3 किलोमीटर की दूरी में अवस्थित है। उन दिनों की स्थानीय परंपरा के अनुसार पहले बच्चे का जन्म ननिहाल में होता था, इसलिए पहले बच्चे के जन्म के समय माता बिशन कौर को उनके मायके पिरथीपुर बुंगा (बुंगासाहिब) भेज दिया गया। इस प्रकार, ननिहाल (बुंगासाहिब) में ही कांशीराम का जन्म हुआ।

रविदासिया सिख परिवार में जन्मे कांशीराम जी का बचपन रोपड़ में मौजूद सिंधु घाटी सभ्यता के खंडहरों के बीच हंसते-खेलते हुए बीता और समतावादी सिख सिद्धांतों तथा मानवता की रक्षा हेतु सिख गुरुओं की शहादत के इतिहास का अध्ययन-मनन करते हुए वह जवान हुए। शायद यही कारण था कि 'उनकी चेतना में अतीत की बगावतें बचपन से ही मौजूद थीं।'

'बहुजन नायक कांशीराम' पुस्तक के लेखक सतनाम सिंह लिखते हैं, "पंजाब में 'ख़ालसा पंथ' के प्रभाव की वजह से तथाकथित सनातनी ब्राह्मणवाद का विषैला पौधा पनप नहीं पाया। वहां ब्राह्मण समुदाय की स्थिति कोई ख़ास अच्छी नहीं थी। यही वज़ह थी कि बचपन में कांशीराम जी को ब्राह्मणवादी जातिवाद का दंश नहीं झेलना पड़ा।" स्वयं कांशीराम जी भी अपने एक भाषण में कह चुके हैं कि, "जब मैं छोटी उम्र में था तब अपने पंजाब में ब्राह्मण के लड़कों का डील-डौल तथा रहन-सहन देखकर मैं सोचता था कि ब्राह्मण बड़ी ही गरीब तथा पिछड़ी कौम होती है। लेकिन जब मैं शिक्षित हुआ और भारतीय समाज का खुली आँखों से अध्ययन किया तब मैंने इतिहास के पन्नों में पाया कि ब्राह्मण कौम गरीब नहीं है, बल्कि ये तो 85% शोषित-पीड़ित समाज के सिर पर सवार है।"

वर्ष 1956 में रोपड़ के पब्लिक कॉलेज से बी.एस.सी. पास करने के बाद प्रतिभाशाली युवक कांशीराम ने 1957 में 'सर्वे ऑफ इंडिया' की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। प्रशिक्षण (Training) के लिए उन्हें देहरादून बुलाया गया। प्रशिक्षण के दौरान सभी प्रशिक्षणार्थियों को एक बॉण्ड भरने के लिए कहा गया। इस बॉण्ड में एक निश्चित समय सीमा तक 'सर्वे ऑफ इंडिया' की नौकरी करना अनिवार्य था। सभी प्रशिक्षणार्थियों ने उस पर हस्ताक्षर किए, लेकिन जन्मजात 'आजाद' कांशीराम ने हस्ताक्षर करने से इनकार करते हुए कहा, "मैं सरकार का बंधुआ मजदूर बनने से बेहतर समझता हूं कि इस नौकरी को छोड़ दूं।" इस प्रकार, 'सर्वे ऑफ इंडिया' का कार्यभार संभालने से पहले प्रशिक्षण काल में ही उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी।....कुछ ही दिनों बाद पूना, महाराष्ट्र में उनकी नौकरी लग गई। पूना में कांशीराम जी 'किर्की एक्सप्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेट्री' (ई.आर.डी.एल.) में अनुसंधान सहायक पद पर नियुक्त हुए।

मूलनिवासी संतों, गुरुओं ने पहले दमनकारी मुगल-ब्राह्मण गठजोड़ के खिलाफ संघर्ष किया। उसके बाद आधुनिक युग में जन्मे महापुरुषों ने षड्यंत्रकारी ब्रिटिश-ब्राह्मण गठजोड़ से मूलनिवासियों की आजादी का कारवाँ आगे बढ़ाया। इन अनवरत संघर्षों के बाद 15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश हुक्मरान भारत छोड़ने को राजी हुए, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत द्वारा तथाकथित स्वतंत्रता के नाम पर जो सत्ता हस्तान्तरित की गई वह मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों के हाथों में न आकर ब्रिटिशों के अनन्य सहयोगी रहे आर्य ब्राह्मणों के हाथों में ही केंद्रित हो गई। परिणामस्वरूप, इस 'ब्राह्मण राज' (स्वराज) में एक बार फिर से देश के सभी संस्थानों का तेजी से ब्राह्मणीकरण किया जाना शुरू हो गया और मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों के ऊपर ब्राह्मणवाद द्वारा थोपी गई सदियों पुरानी श्रेणीबद्ध निम्नता और ज़लालत यथावत बनी रही। ऐसे समय में जरूरत थी एक ऐसे अगुआ (नेता) की जो दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी की तरह विशाल हृदय के साथ अत्याचार पीड़ित लोगों को राष्ट्रीय स्तर पर लामबंद करने के लिए आगे आए और उनका हौसला बुलंद कर दमनकारी 'ब्राह्मण राज' के विरुद्ध आजादी का बिगुल फूंक सके।

*घटना जो चिंगारी बनी* : महाराष्ट्र में दलित जागरण को देखते हुए ई.आर.डी.एल. में बुद्ध और अम्बेडकर जयंती पर छुट्टी होती थी, लेकिन कुछ ब्राह्मणवादी अधिकारियों ने सन 1963 में इन दोनों छुट्टियों को समाप्त कर इन्हें क्रमशः दीपावली और तिलक जयंती में परिवर्तित कर दिया। ई.आर.डी.एल. में पदस्थ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी दिनाभाना ने जब इस घटना का लिखित रूप में विरोध किया, तो ब्राह्मणवादी अधिकारियों ने उनसे उनकी नौकरी छीन ली।...जब यह बात कांशीराम जी को पता चली तो उन्होंने दिनाभाना को पास बुलाकर उनसे सारे घटनाक्रम की जानकारी ली।...दिनाभाना के अंदर अपने अधिकारों तथा मूलनिवासी महापुरुषों के प्रति दृढ़ इच्छाशक्ति और बहादुरी देखकर मान्यवर कांशीराम जी उनसे प्रभावित हुए। फिर उन्होंने कहा, जो अपने अधिकारों के लिए बहादुरी से लड़ते हैं, वे सभी हमारे अपने हैं। अब यह लड़ाई तुम अकेले की नहीं, मेरी भी है, बल्कि हम सबकी है।

सतनाम सिंह आगे लिखते हैं, "उस रात कांशीराम जी सो नहीं पाए। बार-बार एक ही सवाल मन में गूंजता रहा, इस ब्राह्मण राज में क्या हम आज भी आजाद हैं? इसी उधेड़बुन में सारी रात बीत गई। वे इस विवाद को रक्षा मंत्रालय तक लेकर गए। रक्षा मंत्रालय ने इंसाफ किया। दोषी अधिकारियों की खिंचाई की गई। बुद्ध और अम्बेडकर की जयंतियां फिर से घोषित की गईं। दिनाभाना की नौकरी भी बहाल की गई।"...इस घटना के बाद से कांशीराम जी उखड़े-उखड़े रहने लगे। दिन-रात उनके भीतर यही सवाल गूंजते कि, हमारा इस देश में क्या वजूद है? हमारे अधिकारों और गरिमा की रक्षा करने की किसे चिंता है? हमारी मांगों की सुनवाई कहाँ हो सकती है? न जज हमारे, न अधिकारी हमारे और न मंत्री हमारे! अपने दुखी मन की शांति और अपने अंदर उठ रहे सवालों के जवाब के लिए वे डॉ. अम्बेडकर का साहित्य पढ़ने लगे। निरंतर अध्ययन के बाद अम्बेडकर साहित्य में उन्हें अपने सवालों का जवाब मिला....."तुम्हें वही रुख अपनाना चाहिए जो बुद्ध ने अपनाया था। तुम्हें वही रुख अपनाना चाहिए जो गुरु नानक ने अपनाया था। तुम्हें न सिर्फ शास्त्रों को त्यागना चाहिए, बल्कि उनके प्राधिकार को भी नकार देना चाहिए, जैसा कि बुद्ध और गुरु नानक ने किया था। तुम्हारे अंदर हिन्दुओं को यह कहने का साहस होना चाहिए कि उनमें कुछ गलत है तो वह है उनका धर्म – वह धर्म जिसने उनमें जातीय पवित्रता की धारणा पैदा की है।"....इस घटना के बाद कांशीराम जी के अंदर जो चिंगारी पैदा हुई थी, दिन प्रति दिन वह आग का विकराल रूप धारण करती चली गई।"

मान्यवर कांशीराम जी पंजाब में 'निम्नों में भी निम्नतम लोगों की आजादी' और 'मानव गरिमा' की रक्षा हेतु की गई 'सिख क्रांति' से तो पहले ही अवगत थे। इसलिए पूना में रहते हुए उन्होंने महाराष्ट्र में फुले, शाहू, अम्बेडकर द्वारा किए गए 108 वर्ष लंबे संघर्षों का गहन अध्ययन करना शुरू कर दिया। इसके बाद उन्होंने देश के दूसरे राज्यों में बहुजन महापुरुषों द्वारा अत्याचार पीड़ित लोगों की मुक्ति हेतु किए गए संघर्षों का अध्ययन किया। अंततः उन्हें यह बात समझ में आई कि, "इस देश में ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना (जाति व्यवस्था) के आधार पर मूलनिवासी लोगों को 6000 से ज्यादा जातियों में तोड़ा गया है। जातियों में तोड़कर इन्हें लंबे समय तक देश की शासन-सत्ता से दूर रखा गया है। इसलिए यह लोग अभी तक घोर सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक असमानता का शिकार हो ब्राह्मणवादी अन्याय, अत्याचार सहने को मजबूर हैं।"

तत्पश्चात उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने की योजना बनानी शुरू कर दी। अपनी सरकारी नौकरी के बारे में बताते हुए कांशीराम जी ने एक बार कहा था, "1964 में जैसे ही मैंने समाज के लिए काम करने का निश्चय किया उस दिन के बाद मैं कभी अपनी नौकरी पर, कार्यालय में नहीं गया। मैंने इस्तीफा तो नहीं दिया था, मगर नौकरी पर भी नहीं गया। मुझे मेरे कार्यालय से कुछ रकम भी हासिल करनी थी, मगर मैं वह रकम लेने के लिए भी उस कार्यालय में नहीं गया।" एक बार कांशीराम जी ने बताया था कि, "जब मैंने नौकरी छोड़ी उस समय महाराष्ट्र में अम्बेडकरवादी आंदोलन का केंद्र 'रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया' थी। इसलिए शुरुआती दिनों में मैं अपने अम्बेडकरवादी मित्रों के साथ 'आरपीआई' से जुड़ गया। लेकिन बाबा-बाबा करने वाले अम्बेडकरवादी नेता 1971 में जब बापू-बापू करते गांधीवादी कांग्रेस के चरणों में लेट गए तो एक बार फिर मुझे नए सिरे से सोचना पड़ा।" अम्बेडकरवादियों से निराशा हाथ लगने के बाद उन्होंने 'The Chamcha Age : An Era of the Stooge' नामक किताब लिखकर 24 सितंबर, 1982 को पूना पैक्ट की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रकाशित की थी। इस ऐतिहासिक पुस्तक में उन्होंने बहुजन द्रविड़ समाज में चार प्रकार के चमचों की बड़ी यथार्थ व्याख्या की थी।

मान्यवर कांशीराम जी से पहले अत्याचार पीड़ित लोगों का संघर्ष ब्राह्मणवादी सत्ताधीशों से *'सामाजिक न्याय'* की मांग तक सीमित होकर रह गया था। इसलिए मान्यवर कांशीराम जी को एक ऐसे सूत्र की तलाश थी जो इन अत्याचार पीड़ित लोगों को एक निश्चित सामाधान की ओर लेकर जाए। अंततः उन्हें वह सूत्र *'गुरुग्रन्थ साहिब'* में *'बेग़मपुरा'* की शक्ल में मिला। मान्यवर कांशीराम जी के शब्दों में *"मेरा घोषणा पत्र गुरुग्रन्थ साहिब में दर्ज है।"* गुरु रविदास की दृष्टि में एक ऐसा देश *"जहां कोई दुख न हो। कोई कष्ट और चिंता न हो। कोई संकट और टैक्स न हो। कोई धार्मिक आतंक, कोई कलंक और पतन न हो। जहां सबको गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पौष्टिक आहार मिले। जहां हमेशा शांति और सुरक्षा बनी रहे। जहां इंसानों का कोई दूसरा या तीसरा दर्जा न हो। जहां सब धनवान और संतुष्ट हों। जहां सब अपनी मर्जी और मुक्त-भाव से विचरण कर सकें। "* गुरु रविदास की यही 'बेग़मपुरा दृष्टि' बाद में सिख गुरुओं का मिशन बनी।

जैसा कि, गुरु नानक ने सिख पंथ के संस्थानीकरण के दौरान "निम्नों में भी निम्नतम" घोषित किए गए अत्याचार पीड़ित लोगों की मुक्ति को ध्यान में रखते हुए कहा था, *"नीचा अंदरि नीच जाति नीची हू अति नीचु ॥ नानकु तिन कै संगि साथि वडिआ सिउ किआ रीस ॥ जिथै नीच समालीअनि तिथै नदरि तेरी बखसीस।।"* दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी ने भी अपने पूर्वगामी गुरुओं का अनुकरण करते हुए तहिया किया था कि, *"जिनकी जाति और कुल माहीं, सरदारी नहीं भई कदाहीं। इनहीं को सरदार बनाऊँ, तबै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ।।"* इस प्रकार, उन्होंने सन 1699 में 'निम्नों में भी निम्नतम' घोषित किए गए अत्याचार पीड़ित लोगों को जाति मुक्त कर उन्हें पातशाही सौंपने का ऐतिहासिक काम किया था। ठीक उसी प्रकार, मान्यवर कांशीराम जी ने भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था में 'निम्न से निम्नतम' घोषित किए गए अत्याचार पीड़ित लोगों की मुक्ति हेतु उन्हें *'हुक्मरान कौम'* बनाना अपना लक्ष्य निर्धारित किया।

सदियों से अत्याचार पीड़ित लोगों को शासक कौम बनाना बिल्कुल भी आसान काम नहीं होता। तभी तो गुरु गोबिंद सिंह जी कहते थे, *"कोई किसी को राज न देहै। जो लेहै निज बल से लेहै।।"* इन अत्याचार पीड़ित लोगों का हौसला बुलंद कर इन्हें शक्तिशाली फ़ौज में परिवर्तित करने के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी कहते थे कि, *"चिड़ियां नाल मैं बाज तुड़ावां, गीदडां नू मैं शेर बनावां। सवा लाख से एक लड़ावां, ता गोबिंद सिंह नाम धरावां।।"* संतों, गुरुओं की इन्हीं बातों को अपना वैचारिक आधार बनाकर मान्यवर कांशीराम जी 'ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना' के आधार पर तोड़े गए मूलनिवासी लोगों में भाईचारा बनाकर उन्हें बहुजन समाज बनाने और उनमें एकता बल (Strength) पैदा कर अंततः उन्हें *'हुक्मरान कौम'* बनाने के अपने मिशन में जुट गए।

इस प्रक्रिया में, जिस प्रकार पांचवें पातशाह गुरु अर्जुन ने फरीद, नामदेव, कबीर, रविदास आदि 36 संतों, गुरुओं के शबदों को एकत्र कर समानता का हिमायती *"गुरुग्रन्थ साहिब"* का संकलन किया था। ठीक उसी प्रकार, मान्यवर कांशीराम जी ने भारत के अलग-अलग हिस्सों में ब्राह्मणवाद के विरुद्ध सामाजिक क्रांति का उद्घोष करने वाले बुद्ध, कबीर, रविदास, फुले, शाहू, अम्बेडकर, बिरसा, पेरियार, अयंकाली, नारायण गुरु, हरिचंद ठाकुर, गुरुचंद ठाकुर, स्वामी अच्छूतानंद, सर छोटू राम आदि संतों, गुरुओं, महापुरुषों के संघर्षों को भी अपने मिशन में शामिल किया।

इस तरह, सन 1977 तक मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ समाज के अधिकारी-कर्मचारियों को जागरूक कर उन्होंने डॉ. अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस 6 दिसंबर, 1978 को सर्वप्रथम 'The All India Backward (Sc/St, Obc) & Minority Communities Employee Federation' (बामसेफ़) नामक एक संस्था की स्थापना की। यह गैर-राजनीतिक, गैर-संघर्षनात्मक और गैर-धार्मिक संस्था थी। इसका मुख्य काम मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ समाज को बौद्धिक रूप से जाग्रत करना था। सामुदायिक उन्नति हेतु सिखों के *'दसवंध'* (कमाई का दसवां भाग) दान करने की अनिवार्य परंपरा की तर्ज पर मान्यवर कांशीराम जी ने *'बामसेफ'* के सदस्यों के लिए *'Pay Back To Society'* का सिद्धांत प्रतिपादित कर समाजोन्नति के लिए उन्हें 3T = Time (समय), Talent (हुनर), Treasury (कोष) का दान करने को प्रेरित किया।

तत्पश्चात बामसेफ की स्थापना के तीसरे वर्ष 6 दिसंबर, 1981 को उन्होंने *'दलित शोषित समाज संघर्ष समिति'* (Ds-4) की स्थापना की। यह कोई राजनीतिक पार्टी नहीं, अपितु संघर्ष और विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा बहुजन द्रविड़ समाज में जागृति पैदा करने के लिए बनाया गया एक सामाजिक संगठन था। इसमें छात्र, महिलाएं, नौजवान और भूमिहीन मजदूरों को जोड़कर बड़े पैमाने पर उन्हें मूलनिवासी संतों, गुरुओं, महापुरुषों के समतावादी दर्शन और संघर्षों से अवगत कराया गया।

Ds-4 का प्रथम मुख्य कार्यक्रम 'साईकिल मार्च' था। इसके जरिये बहुजन द्रविड़ समाज में *"छोटे-छोटे साधनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल"* करने की अवधारणा विकसित की गई। सर्वप्रथम 40 दिन (15-3-1983 से 24-4-1983) तक चलने वाले इस कार्यक्रम में लगभग तीन लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया। यह कार्यक्रम मान्यवर कांशीराम जी के जन्म दिन 15 मार्च, 1983 को नई दिल्ली से प्रभावशाली साईकिल रैली के रूप में "छोटे-छोटे साधनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल" करने के नारे के साथ शुरू हुआ था। इस साईकिल मार्च के दौरान मान्यवर कांशीराम जी ने नारा दिया था, *"दो पहिया दो पैरों का, साथ नहीं है गैरों का।"* मान्यवर कांशीराम जी के कठिन परिश्रम तथा बामसेफ और डीएस-4 द्वारा संचालित किए गए जागृति कार्यक्रमों के कारण देश भर के बहुजन द्रविड़ समाज में अपने अधिकारों और स्वाभिमान को प्राप्त करने के प्रति बड़े पैमाने पर जागृति पैदा हुई। परिणामस्वरूप, अब बहुजन द्रविड़ समाज की प्रभावी राजनीति के लिए समाज की ओर से एक राजनीतिक दल के गठन की मांग उठनी तेज हो गई थी।

गुरु गोबिंद सिंह द्वारा आनंदपुर साहिब में 13 अप्रैल, 1699 को देशभर के अनुयायियों को आमंत्रित कर 'खालसा राज' (सच्चाई का राज) हेतु *'ख़ालसा पंथ'* की स्थापना के बाद, आधुनिक भारत में यह पहला अवसर था जब किसी व्यक्ति ने राष्ट्रीय स्तर पर अत्याचार पीड़ित लोगों की मुक्ति के लिए उन्हें इतने बड़े पैमाने पर आंदोलित और लामबंद कर केंद्र में 'बहुजन राज' की स्थापना हेतु हुंकार भरी थी।

छठे पातशाह गुरु हरगोबिंद जी कहते थे, *"राज बिना नहीं धरम चले है। धरम बिना सब दले मले हैं।।"* उन्होंने ज़ालिम के खिलाफ सिख साम्राज्य की नींव रखते हुए *'मीरी-पीरी'* सिद्धांत की शुरुआत की थी। मीरी यानी राजकीय प्राधिकार और पीरी यानी आध्यत्मिक प्राधिकार। ठीक इसी प्रकार, मान्यवर कांशीराम जी का भी मानना था कि, *"जिनका राजपाठ नहीं होता उनके साथ हमेशा अन्याय, अत्याचार होता है। अगर इन अन्याय, अत्याचारों से मुक्ति चाहिए तो हमें इस देश का शासक बनना होगा।"*

इस प्रक्रिया में, बहुजन द्रविड़ समाज की चाहत को देखते हुए मान्यवर कांशीराम जी ने डॉ. अम्बेडकर के जन्मदिन 14 अप्रैल, 1984 को दिल्ली में *'बहुजन समाज पार्टी'* के गठन की घोषणा कर दी। 22 से 24 जून, 1984 तक दिल्ली के लाल किले के सामने वाले मैदान में पार्टी का प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ। जिसमें देशभर के कार्यकर्ता, अनुयायी उपस्थित हुए। इसके बाद भारतीय चुनाव आयोग से पार्टी का विधिवत पंजीकरण भी करवा लिया गया। मान्यवर कांशीराम जी द्वारा स्थापित वही बहुजन समाज पार्टी बाद में देश की तीसरी राष्ट्रीय पार्टी बनी।"

"बीएसपी के गठन के बाद एक आदर्श सामाजिक परिवर्तन हेतु जनजागृति करने के लिए मान्यवर कांशीराम जी ने धरना प्रदर्शन, महापुरुषों की जयंतियों पर मेले और साईकिल मार्च जैसे कार्यक्रम तैयार किये। 15 अगस्त, 1988 से 15 अगस्त, 1989 तक उन्होंने निम्नलिखित 5 सूत्री कार्यक्रम शुरू किए :- 1) आत्मसम्मान के लिए संघर्ष, 2) स्वधीनता के लिए संघर्ष, 3) समानता के लिए संघर्ष, 4) विखरे समाज में भाईचारा स्थापित कर जातिवाद के उच्छेद के लिए संघर्ष, 5) अस्पृश्यता, अन्याय, अत्याचार और धार्मिक आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष।

इस 5 सूत्रीय कार्यक्रम के तहत पेरियार के जन्मदिन 17 सितंबर, 1988 से भारत की पांच दिशाओं से 5 साईकिल मार्च की शुरुआत की गई। यथा, 1) कन्याकुमारी (तमिलनाडु) से नई दिल्ली के लिए, 2) कोहिमा (नागालैंड) से नई दिल्ली के लिए, 3) कारगिल (कश्मीर) से नई दिल्ली के लिए, 4) पुरी (उड़ीसा) से नई दिल्ली के लिए, और 5) पोरबंदर (गुजरात) से नई दिल्ली के लिए। उक्त सभी साईकिल यात्राएं 27 मार्च, 1889 को एक विशाल रैली के रूप में दिल्ली में एकत्रित हुईं। दिल्ली में लाखों लोगों ने इस रैली का हार्दिक स्वागत किया था।"

'बहुजन नायक' अख़बार के पत्रकार तथा बहुजन आंदोलन के सहयोगी रहे आनंद रहाटे जी मान्यवर कांशीराम जी के बारे में बताते हुए लिखते हैं, "डॉ. अम्बेडकर के परिनिर्वाण के बाद आंदोलन को एक सक्षम नेता मिला था। वह एक पल के लिए भी आराम नहीं करते और बिना थके लगातार काम करते रहते थे। कोलकाता की रैली में मैं उनके साथ था और मैंने देखा कि रैली होने से पहले शाम को ही वह रैली स्थल पर चले गए और काफी देर रात तक वहां सारी व्यवस्था देखते रहे। रैली स्थल से कमरे पर लौटने पर उन्होंने एक कंबल लिया और जूता उतारे बिना ही सो गए। सोने से पहले उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे पांच बजे जगा देना। कांशीराम जी ऐसे नेता थे, जो एक आम कार्यकर्ता की तरह काम करते थे।" मान्यवर कांशीराम जी का मानना था कि, "हमें सामूहिक रूप से समाजसेवा कार्य में जुट जाना चाहिए। पैसे की आज कोई कमी नहीं है। कमी है तो सच्ची तमन्ना की। अगर दिल में तमन्ना सच्ची है तो हर समस्या अपने आप सुलझती चली जाती है। बिना तमन्ना के सफलता मिलना बहुत मुश्किल है।....आगे चलकर उनकी यही बातें कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत बनीं।

मान्यवर कांशीराम जी ने मूलनिवासी संतों, गुरुओं, महापुरुषों से प्रेरणा लेते हुए अपनी कुशल रणनीतियों के बल पर ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना को तोड़ने और गुलाम बनाये गए अत्याचार पीड़ित लोगों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक मुक्ति हेतु आजीवन संघर्ष किया। उन्होंने अपनी कुशल रणनीतियों से समाज की *'होऊ सकत नाही' मानसिकता में परिवर्तन लाकर 'होऊ सकत है'* की भावना विकसित की। उनके इन संघर्षों की बदौलत करोड़ों लोगों के जीवन में अमूलचूल बदलाव आया। फलस्वरूप, अत्याचार पीड़ित बहुजन द्रविड़ समाज लामबंद हुआ और ब्राह्मणवाद का गढ़ कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश (आर्यावर्त) में बहुजन समाज पार्टी की चार बार सरकारे बनीं। वह चाहते तो स्वयं मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था में "निम्नों में भी निम्नतम" घोषित की गई महिला वर्ग में से एक दलित महिला मायावती को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनाकर समानता की मिसाल पेश की। उत्तर प्रदेश के अलावा 13 राज्यों की विधान सभाओं और कई लोकसभा क्षेत्रों में भी बहुजन समाज पार्टी का खाता खुला।

इस प्रकार, देश की केंद्रीय सत्ता में अत्याचार पीड़ित मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों का 'राज' स्थापित करने हेतु संघर्ष पथ पर आगे बढ़ते हुए 8 अक्टूबर, 2006 की मध्य रात्रि में मान्यवर कांशीराम जी का विवादित देहांत हो गया।

भारतीय राजनीति में मान्यवर कांशीराम जी का पदार्पण एक युगान्तकारी घटना थी। मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों की मुक्ति के लिए उन्होंने जो प्रयास किए वह अद्वितीय हैं, लेकिन हमें इस बात का भी एहसास है कि मूलनिवासी संतों, गुरुओं, महापुरुषों की विचारधारा को दरकिनार करने वाली मायावती की अगुआई में मान्यवर कांशीराम जी की 'बहुजन समाज पार्टी' आज विप्रो की रीति में फंसकर ब्राह्मणवाद के खारे समुद्र में गर्क हो चुकी है।

मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों की आजादी का कारवां अभी अधूरा है, क्योंकि तथाकथित स्वतंत्रता के 77 वर्षों बाद भी बहुजन द्रविड समाज घोर सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक असमानता का शिकार बना जानवरों से भी बदतर जीवन जीने को मजबूर है। लेकिन फिर भी, इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि हमारे संतों, गुरुओं, महापुरुषों ने मूलनिवासियों की आजादी की जो मशाल जलाई थी वह अभी बुझी नहीं है, बल्कि सुदूर उत्तर से लेकर नीचे दक्षिण तक, और पूर्व से लेकर पश्चिम तक अभी भी उसकी ज्योत प्रज्वलित है। संग्राम अभी जारी है। कई लोगों ने भट्टी जला रखी है; फिर भी, यह आग अभी तक वह भट्टी नहीं बना पाई जो ब्राह्मणवाद रूपी कूड़े-करकट को जलाकर भारत को सोने जैसा शुद्ध कर सके। इसलिए बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम जी की अनुपस्थिति में संतों, गुरुओं, महापुरुषों के 'बेग़मपुरा मिशन' को मंजिले मकसूद तक ले जाने की जिम्मेदारी अब ऊर्जावान, मिशनरी बहुजन द्रविड़ युवाओं के कंधों पर है। आज हम बहुजन द्रविड पार्टी के माध्यम से मूलनिवासी संतों, गुरुओं, महापुरुषों के *'बेग़मपुरा मिशन'* को आगे बढ़ा रहे हैं। हम ऊर्जावान, मिशनरी बहुजन द्रविड़ युवाओं से उम्मीद करते हैं कि वे भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों की आजादी के इस महासंग्राम में स्वेच्छा से भागीदारी निभाने के लिए आगे आएंगे। धन्यवाद!

संतों, गुरुओं के बेग़मपुरा मिशन में...

एडवोकेट अशोक सिंह
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
बहुजन द्रविड पार्टी, नई दिल्ली
+91 9717366805

Address

Hoshiarpur
Hoshiarpur
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