01/05/2026
साथियों,
अपने अतीत को जाने बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।जब तक हम अपने क्रान्तिकारी इतिहास को नहीं जान जाते तब तक हम अपनी ताकत और कमजोरियों को भी नहीं जान सकते। इसलिए मजदूर आंदोलनों का इतिहास जाने बिना हम उनकी मुक्ति का सपना नहीं देख सकते।
तो आइए जानते हैं कि आखिर क्यों मनाया जाता है मजदूर दिवस या मई दिवस।।
असल में, पहले मज़दूरों के काम के घण्टे तय नहीं थे। ‘सूर्योदय से सूर्यास्त’ के नियम के अनुसार उजाला होने से पहले मज़दूरों को कारख़ानों में पहुँच जाना पड़ता था और अँधेरा होने तक उनसे काम करवाया जाता था। मज़दूरों के काम के घण्टे 18 से 20 तक पहुँच जाते थे। इस स्थिति के ख़िलाफ़ अमेरिका के मज़दूरों ने उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में ही विरोध करना शुरू कर दिया था।
इस दौर में अमेरिका के अलावा अन्य देशों के मज़दूर भी काम के घण्टे कम करवाने आदि माँगों के लिए आवाज़ उठाना शुरू कर दिये थे। 1871 में पेरिस कम्यून के रूप में मज़दूरों ने इतिहास में पहली बार अपना राज स्थापित किया। पेरिस कम्यून केवल 72 दिन ही चल सका। लेकिन पेरिस कम्यून ने न केवल भविष्य की क्रान्तियों के लिए ज़रूरी सबक दिये बल्कि यह साबित कर दिया कि मजदूर भी अपना राज स्थापित कर सकते हैं।
इधर काम के घण्टे आठ करने का आन्दोलन अमेरिका में बढ़ता जा रहा था। “आठ घण्टे काम, आठ घण्टे मनोरंजन, आठ घण्टे आराम” के नारे के इर्द-गिर्द शिकागो के मज़दूरों ने 1 मई 1886 के दिन को आम हड़ताल का दिन तय किया। इस दिवस के तीन दिनों बाद ही 4 मई को ‘हे मार्केट चौक’ पर मज़दूरों ने इस माँग को लेकर एक विशाल प्रदर्शन का आयोजन किया, जहाँ साज़िशाना तरीक़े से पुलिस और मालिकों ने मिलकर बम फिंकवा दिया। इस सभा में बम के धमाके की अफरातफ़री में पुलिस ने मज़दूरों की सभा पर गोली चला दी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गयी। इस घटनाक्रम में सात पुलिसकर्मी भी मारे गये। पुलिस ने मज़दूर नेताओं को जेल में ठूँस दिया, जिनमें से चार नेताओं को झूठे मुकदमे में फांसी दे दी गई।
1889 में द्वितीय इण्टरनेशनल में पूरी दुनिया में 1 मई को मई दिवस मनाने का फ़ैसला किया क्योंकि यह मज़दूर वर्ग के राजनीतिक संघर्ष का एक प्रतीक बन चुका था। मज़दूर आन्दोलन के दबाव में दुनिया के तमाम देशों समेत भारत में भी काम के घण्टे 8 को क़ानूनी मान्यता दी गयी।अमेरिका के मज़दूरों ने जब आठ घण्टे के काम की माँग की थी उस समय तकनीक और मशीनें आज की मशीनों और तकनीक के मुक़ाबले बहुत पिछड़ी हुई थीं। लेकीन अब जबकि मशीनें और तकनीक इतनी उन्नत हो चुकी हैं तब मज़दूर की मज़दूरी का हिस्सा घटता जा रहा है और काम के घण्टे बढ़ते जा रहे हैं।
हमारे देश के हालात कैसे हैं
आज़ादी के बाद से केन्द्र व राज्य में चाहे जिस पार्टी की सरकार रही हो, सभी ने पूँजीपति वर्ग के पक्ष में मज़दूरों के मेहनत की लूट का रास्ता सुगम ही बनाया है। लेकिन 1990-91 में आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद और खासकर मोदी के सत्तासीन होने के बाद से मज़दूरों पर चौतरफ़ा हमला बोल दिया गया है।
आज ये सरकारें मई दिवस के संघर्षो को मिटाना चाहती है और मजदूरों को पूंजीपतियों का गुलाम बनाना चाहती है। सरकार द्वारा मजदूरों के 44 केंद्रीय श्रम कानूनों को खत्म करके 4 लेबर कोड बनाए गए हैं जिन्हें लागू कर "काम के घण्टे 8 से 12" कर दिए गए हैं। मजदूरों के यूनियन बनाने और हड़ताल करने के अधिकार पर हमला किया गया है। कम्पनी मालिक को मजदूर का खून तक निचोड़ने के लिए लेबर कोर्ट को खत्म किया जा रहा है। महिलाओं को रात के समय और खतरनाक उद्योगो में काम करवाने , मजदूरी तय करने और मजदूरी में भेदभाव करने की छूट पूंजीपतियों को दे दी गयी है। कम्पनी मालिक मजदूर को कभी भी हटा सकता है और काम के समय ले सकता है।यह 4 लेबर कोड मजदूरों की स्थिति को बिगाड़ने वाले और उनकी जिंदगी को दयनीय बनाने वाले हैं।
ग्रामीण मज़दूरों की स्थिति और भी बुरी है। खेतों, भट्ठों, भवन निर्माण आदि में काम करने वाले बहुत से मज़दूर 250 से 400 रुपये तक के रेट से काम करने पर मजबूर हैं। ‘मनरेगा’ को सरकार ने पूरी तरह से खत्म कर दिया है।
साथियों आज भी मानेसर-गुड़गाँव से लेकर नोएडा तक मज़दूर अपने हक़ों की माँगों को उठाते हुए आन्दोलनरत हैं। असंगठित मज़दूरों ने न्यूनतम मज़दूरी लागू करने, न्यूनतम मज़दूरी में बढ़ोत्तरी करने, डबल रेट से ओवरटाइम देने, साप्ताहिक अवकाश देने आदि जैसी बिल्कुल जायज़ व कानूनसम्मत माँगों को लेकर आन्दोलन किये। यह देश में मज़दूर संघर्षों की एक नयी लहर की शुरुआत हो सकता है।
नोएडा में इस समय मज़दूरों का जुझारू आन्दोलन जारी है। लेकिन आंदोलनरत मजदूरों का सरकार लगातार दमन कर रही है। उन्हें नक्सली और आतंकवादी बताकर जेलों में भरा जा रहा है।
इसलिए दोस्तों सरकार की मजदूर आंदोलनों को कुचलने की कोशिशों का पर्दाफाश करना होगा और देशभर ने संघर्षरत मजदूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना होगा।।
दोस्तो हम छात्र-छात्राए क्या करें:-
क्या हम भी वोट बटोरू पार्टियों और उनके पिछलग्गु सगठनों द्वारा बनाए जा रहे विश्वकर्मा जयंती की चमक -धमक में इस दिवस के सच्चे उद्देश्यों को भूल जाये ? नही दोस्तो , हम छात्र - छात्राओं ने हमेशा से मजदूर -किसानों , शोषितों और वंचितों के इतिहास को सही मायने में जिंदा रखा है इसलिए आज हम छात्र -छात्राओं का यह फर्ज है कि हम मई दिवस की ऐतिहासिक औऱ क्रांतिकारी विरासत को याद करें।
इसलिए प्रोग्रेसिव स्टूडेंट्स फ्रंट -पीएसएफ छात्र -छात्राओं से अपील करता है कि आप सभी हमारे साथ जुड़े और सरकार द्वारा लाए गए मजदूर विरोधी 4 लेबर कोड का विरोध करे और अपने कॉलेज-यूनिवर्सिटी कैम्पसों में जनवादी माहौल कायम करने के लिए गैर-समझौतावादी संघर्ष तेज करें।
#दुनियां के मजदूरों एक हों ✊✊
#मजदूरदिवस #1मई
Satish Moth Ravi Verma