03/10/2025
बात पुरानी है।
मुगल अभी भारत मे पैर न जमा पाये थे। बाबर ने 1526 में पानीपत की लड़ाई जीती। लेकिन 4 साल बाद ही चल बसा।
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गद्दी पर हुमायूं आया। तब राज्य दिल्ली और पंजाब के थोड़े बहुत इलाकों पर था, और उसको टक्कर दे रहा था फरीद खान..
उर्फ शेरशाह सूरी.. वही, जिसने देश मे रुपया चलाया। चांदी का रुपहला सिक्का। और बाद के दौर मे रुपयों पर तस्वीर चाहे जिसकी भी आई। पर पहला चेहरा उसपे शेरशाह सूरी का था।
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बहरहाल, हुमायूं और शेरशाह के बीच बक्सर से 10 किमी दूर गंगा के किनारे चौसा नाम की जगह पर 26 जून 1539 को एक लड़ाई हुई।
यहां हुमायूं की शिकस्त और शेरशाह की मुकम्मल जीत हुई। हुमायूं की हालत पतली थी। हार के बाद वे काबुल की दिशा में मुंह करके भागे। पीछा किया गया। बचने के लिए गंगा की उफनती धारा में कूद गये।
गंगा की लहरें उन्हें निगलने को तैयार थीं। डूबते, अचेत बादशाह को दो हाथों ने निकाला। किनारे लेटाया।
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वो एक भिश्ती था। मुगल सेना में पानी ढ़ोने का काम करता था। चमड़े की मश्क में पानी भरते हुए उसने बादशाह को डूबते देखा। गंंगा में कूदा- लहरों से जूझते हुए हुमायूं को किनारे खींचा।
हुमायूं ने आंखें खोलीं।
माजरा समझकर कृतज्ञता से बोले- तूने मेरी जान बचाई भिश्ती। जो चाहे मांग ले। भिश्ती ने सिर खुजाया और बोला-
- बस हुजूर, एक नई मशक दिलवा दें। हुमायूं हंस पड़े।
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साल 1555 में, हुमायूं ने शेरशाह के वारिसों को हराकर दिल्ली की गद्दी फिर से हासिल की। और भिश्ती को ढुंढवाया।
वह अब भी पुरानी दिल्ली की गलियों में मशक लटकाए "पानी-पानी" चिल्ला रहा था।
बादशाह ने उसे दरबार में बुलाया और ऐलान किया- भिश्ती, तूने चौसा में मेरी जान बचाई थी। आज मैं तुझे एक दिन के लिए भारत का बादशाह बनाता हूं।
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भिश्ती की आंखें फटी की फटी रह गईं।
वह बादशाह बन गया?
जिसने जिंदगी भर औरों के लिए मशक भरने से ज्यादा कुछ जाना नहीं। उसके सर पर शाही पगड़ी धरी गई। दीवान-ए-खास में गद्दी पर बिठाया गया।
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सोचा- बादशाह तो बन गया, कुछ यादगार करना चाहिए। किनारे उसकी मशक धरी देखकर आइडिया आया। फरमान सुनाया,
"आज से सोने-चांदी के सिक्के बंद!
अब चमड़े के सिक्के चलेंगे!"
मशक को कैंची से काट-काटकर गोल टुकड़े बनाए गए। उन पर भिश्ती की मुस्कुराती तस्वीर चिपकवाई गई- प्रथम भिश्ती कॉइन तैयार थे।
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अगले कुछ घंटों में दिल्ली के बाजारों में हंगामा मच गया। व्यापारी चमड़े के सिक्कों को देखकर सिर पीटने लगे।
हलवाई बोला- ये सिक्के तो मेरे लड्डू से भी सस्ते लगते हैं! कपड़ेवाला चिल्लाया- ये चमड़ा मेरे कुत्ते ने चबा लिया। एक अनाजवाला गुस्से में बोला- इसके बदले तो मैं भूसा भी न लूं।
लोग चमड़े के सिक्कों को फेंकने लगे। दुकानें बंद होने लगीं, व्यापार ठप हो गया। दिल्ली की गलियों में भिश्ती बादशाह का मजाक गूंजने लगा।
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हुमायूं ने भी सर पीट लिया। मूर्ख को गद्दी पर बिठाने का नतीजा देख रहे थे। जैसे तैसे दिन गुजरा। भिश्ती से गुस्से में बोले- अरे, ये क्या तमाशा कर दिया? मेरे साम्राज्य की इकॉनमी को तूने चमड़े की मशक में डुबा दी।
भिश्ती ने सिर खुजाया और बोला- हुजूर, मैंने सोचा, चमड़ा सस्ता है। सबके पास होगा, तो सब अमीर हो जाएंगे!
और मेरी तस्वीर वाले सिक्के कितने प्यारे लगते हैं, ना?
हॉउ क्यूट!!
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इतिहास अपने को दोहराता है।
आज फिर अंग्रेजों की मशक ढोने वालों को एक दिन का राज मिला है। बाजार मंदा है, लोग उदास। रुपये की कीमत गिरी जा रही है।
असली राजा, याने प्रजातंत्र में प्रजा सिर धुन रही है। आज फिर भिश्ती ने अपनी छाप के सिक्के चलाये हैं। लिखा है-
राष्ट्राय स्वाहा!!!