RSS Kastla Kasmabad - Hapur

RSS Kastla Kasmabad - Hapur राष्ट्र की जय चेतना का गान वंदे मातरम्
राष्ट्रभक्ति प्रेरणा का गान वंदे मातरम् It is not that other constituents of the nation do not have any responsibility.

A swayamsewak, whether young in age or old, is a responsible constituent of the nation. But we have entered the Sangh after taking responsibility with resolve, so our responsibility is more.

लाशें नोची गिद्धों ने , कुत्तों ने खाई खाल,साबरमती के सन्त - तूने कर दिया कमाल...  ---------“कौन महा आत्मा - कैसी अहिंसा...
30/05/2026

लाशें नोची गिद्धों ने , कुत्तों ने खाई खाल,
साबरमती के सन्त - तूने कर दिया कमाल...
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“कौन महा आत्मा - कैसी अहिंसा”
पढ़ेंगे - तो ही - जान पाएंगे,
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अपनी - "पढ़ी पढाई" बातो से हट कर - “निष्पक्ष नजरिया” रखते हुए,

आज आप गिनती कीजिये कि :---

इस लेख में - कितने महापुरुषों के "कथन" आये है और गिनती कीजिये इन घटनाओं पर तात्कालीन नेताओं ने - क्या क्या लिखा है,
और कितनी - "किताबे"- लिखी गयी है।

महापुरुषों के विचार पढिये – “सत्य” अंधेरे को चीर के बाहर निकलता दिखाई देगा।

सत्य जानने के लिये – मेरे द्वारा –“चिन्हित” – किये गये हर एक शब्द को - आराम से “समझ समझ” कर पढिये।
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प्रथम विश्व युद्ध से पहले :;----
“ओटोमन सम्राज्य” के नाम से - एक “मुस्लिम साम्राज्य” हुआ करता था जो आज के कई देशों में फैला हुआ था – “ओटोमन सम्राज्य” विशाल भूभाग पर फैला हुआ था, – उस “ओटोमन सम्राज्य” का मुख्यालय आज का तुर्की था।

प्रथम विश्व युद्ध जब स्थिति बदली तो “तुर्की” अंग्रेजों के विरुद्ध और जर्मनी के पक्ष में हो गया। विश्व युद्ध में जर्मनी की पराजय के पश्चात अंग्रेजों ने “तुर्की” को मजा चखाने के लिए तुर्की को विघटित कर दिया।
अंग्रेज “तुर्की” के “खलीफा” के विरोध में सामने आ गए।
मुसलमान “खलीफा” को अपना नेता मानते थे।
अंग्रेजों द्वारा - अपने खलीफा के विरोध करने के कारण - मुसलमानों मे अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की लहर दौड़ गई।
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“भारत के मुस्लिम नेताओं ने भी” - इस मामले को लेकर अंग्रेजों के विरुद्ध सन १९२१ मैं “खिलाफत आन्दोलन” शुरू किया।

अब - "खिलाफत और खलीफा" के बारे में जान लीजिये - मुसलमान पूरी दुनिया में “इस्लाम” की सत्ता चाहते है और अपने नेता को “खलीफा” कहते है।

“इस्लाम की सत्ता” कायम करने और अपने नेता को वापिस “खलीफा पद” स्थापित करने के लिये ही भारत में “खिलाफत आन्दोलन” शुरू किया गया था।

इस आंदोलन के दौरान ही –“मो. अली जौहर” ने अफगानिस्तान के
“शाह अमानुल्ला” को तार भेजकर भारत को “दारुल इस्लाम” बनाने के लिए अपनी सेनाएं भेजने का अनुरोध किया।
{ये वो ही "जौहर" था इसी के नाम पर "आजम खान" ने "कोलेज" बनवाया था}

इसी बीच –“खलीफा सुल्तान अब्दुल माजिद” - अंग्रेजों की शरण में आकर माल्टा चले गये।
आधुनिक विचारों के समर्थक –“कमाल अता तुर्क” नये शासक बने। देशभक्त जनता ने भी उनका साथ दिया।
इस प्रकार “खिलाफत आंदोलन” अपने घर में ही मर गया, पर भारत में इस आन्दोलन के नाम पर “अली भाइयों” ने अपनी रोटियां अच्छी तरह सेंक लीं।

अब “अली भाई” एक “शिष्टमंडल” लेकर “सऊदी अरब” के
“शाह अब्दुल अजीज” से खलीफा बनने की प्रार्थना करने गये।
शाह ने तीन दिन तक मिलने का समय ही नहीं दिया और चौथे दिन दरबार में सबके सामने उन्हें दुत्कार कर बाहर निकाल दिया।

भारत आकर मो.अली ने भारत को – “दारुल हरब”(संघर्ष की भूमि) कहकर “मौलाना अब्दुल बारी” से हिजरत का फतवा जारी करवाया।

इस पर हजारों मुसलमान अपनी सम्पत्ति बेचकर अफगानिस्तान चल दिये। इनमें उत्तर भारतीयों की संख्या सर्वाधिक थी; पर वहां उनके मजहबी भाइयों ने उन्हें खूब मारा तथा उनकी सम्पत्ति भी लूट ली। वापस लौटते हुए उन्होंने भी देश भर में दंगे और लूटपाट की।
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खिलाफात आन्दोलन की असफलता से चिढ़े मुसलमानों ने पुरे देश मैं दंगे करने शुरू कर दिए,
केरल में मालावार क्षेत्र में मुस्लिम मोपलाओं ने वहां के हिन्दुओं पे जो अत्याचार ढाए, उनकी जिस बर्बरता से हत्या की उसे पढ़कर हृदय दहल जाता है।
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इसी “खिलाफत आन्दोलन” को “कोंग्रेस और गांधी” का समर्थन मिलने के बाद ही “मुसलमान संगठित हुए थे।
उसी की बदोलत – मोपला,मालाबार और नोवाखाली में हिन्दुओं का कत्लेआम हुआ,
माताओं,बहिनों से बलात्कार हुए और हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया गया था।

मुस्लिम नेताओं तथा भारतीय मुसलमानों को - खुश करने के लिए - गाँधी ने मोतीलाल नेहरु के सुझाव पर - कांग्रेस की ओर से “खिलाफत आन्दोलन” के “समर्थन” की घोषणा की।
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श्री विपिन चन्द्र पाल, डा. एनी बेसेंट, सी. ऍफ़ अन्द्रूज आदि नेताओं ने कांग्रेस की बैठक में “खिलाफत के समर्थन का विरोध किया”,
किन्तु इस प्रश्न पर हुए मतदान में गाँधी जीत गए। गाँधी खिलाफत आन्दोलन के “खलीफा” ही बन गए।

गांधी जी के नेतृत्व में -"हिन्दू समाज" समझ रहा था कि - हम राष्ट्रीय एकता और स्वराज्य की दिशा में बढ़ रहे हैं और मुस्लिम समाज की सोच थी कि :--- खिलाफत की रक्षा का अर्थ है - इस्लाम के वर्चस्व की वापसी।
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“इस्लाम” की सत्ता लाने के लिए,
गान्धी खुद -“अखिल भारतीय ख़िलाफ़त समिति” पहले अधिवेशन का
पहला "अध्यक्ष" भी बन गया था।
गाँधी ने खुद 1919 ई. में “अखिल भारतीय ख़िलाफ़त समिति” का अधिवेशन अपनी "अध्यक्षता" में किया था।
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खिलाफत के प्रश्न को भारत के “राष्ट्रीय आंदोलन” का हिस्सा बनाकर गांधी ने “उलेमा वर्ग” को “प्रतिष्ठा प्रदान” की और विशाल मुस्लिम समाज की “मजहबी कट्टरता” को “संगठित होकर” आंदोलन के रास्ते पर बढ़ने का अवसर प्रदान किया।

अगर “खिलाफत आन्दोलन” नहीं होता तो “मुस्लिम लीग” का वजूद एक “क्षेत्रिय्र दल” जैसा ही रहता और कभी ये राष्ट्रीय स्तर तक नही पहुँचती और देश का बटवारा भी नही हुआ होता,
हम कह सकते हैं कि - “मोपला और खिलाफत आन्दोलन” के कारण ही “मुस्लिम नेताओं” को आधार मिला “देश के बटवारे का और हिन्दुओं के कत्लेआम का”।

"खिलाफत आंदोलन" ने आम "मुस्लिम समाज" में "राजनीतिक जागृति" पैदा की और उन्हें अपनी "शक्ति" का अहसास कराया।
"मुसलमानों व कांग्रेस" ने जगह जगह प्रदर्शन किये।
“अल्लाह हो अकबर” जैसे नारे लगाकर - मुस्लिमो की भावनाएं भड़काई गयी।
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महामना मदनमोहन मालवीय जी और कुछ अन्य नेताओं ने चेतावनी दी कि - खिलाफत आन्दोलन की आड़ मे मुस्लिम भावनाएं भड़काकर भविष्य के लिए खतरा पैदा किया जा रहा है,
किन्तु गांधी ने कहा :----
“मैं मुसलमान भाईओं के इस आन्दोलन को स्वराज से भी ज्यादा महत्व देता हूँ l”
भले ही भारतीय मुसलमान "खिलाफत आन्दोलन" करने के वावजूद अंगेजों का बाल बांका नहीं कर पाए,
किन्तु उन्होंने पुरे भारत में “मृतप्राय मुस्लिम कट्टरपंथ” को “जहरीले सर्प” की तरह “जिन्दा” कर डाला।

यह सोच - "खिलाफत आंदोलन" के प्रारंभ होने के कुछ ही महीनों के भीतर अगस्त 1921 में केरल के "मलाबार" क्षेत्र में वहां के हिन्दुओं पर मोपला मुसलमानों के आक्रमण के रूप में सामने आयी।

हिन्दुओं के सामने "इस्लाम या मौत" का विकल्प प्रस्तुत किया गया।

एक लाख हिन्दुओं को (मारा गया , बलात धर्मान्तरित किया गया , हिन्दू औरतों के बलात्कार हुए) सैकड़ों मंदिर तोड़े गए तथा तीन करोड़ से अधिक हिन्दुओं की संपत्ति लूट ली गई। पूरे घटनाक्रम में महिलाओं को सबसे ज्यादा उत्पीड़ित होना पड़ा।
यहां तक कि - "गर्भवती महिलाओं" को भी नहीं बख्शा गया।
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मोपलाओं की वहशियत चरम पर थी।
इस सम्बन्ध में 7 सितम्बर, 1921 में "टाइम्स आफ इंडिया" में जो खबर छपी वह इस प्रकार है:----

"विद्रोहियों ने सुन्दर हिन्दू महिलाओं को पकड़ कर जबरदस्ती मुसलमान बनाया। उन्हें - "अल्पकालिक पत्नी"- के रूप में इस्तेमाल किया।
हिन्दू महिलाओं को डराकर उनके साथ बलात्कार किया। हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया।"

जबकि “मौलाना हसरत मोहानी” ने कांग्रेस के “अहमदाबाद अधिवेशन” में मोपला अत्याचारों पर लाए गए निन्दा प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा :---
"मोपला प्रदेश “दारुल अमन” नहीं रह गया था, वह “दारुल हरब” में तब्दील हो गया था।
मोपलाओं को संदेह था कि -- हिन्दू अंग्रेजों से मिले हुए हैं, जबकि अंग्रेज मुसलमानों के दुश्मन थे। मोपलाओं ने ठीक किया कि - हिन्दुओं के सामने “कुरान और तलवार” का विकल्प रखा और यदि हिन्दू अपनी जान बचाने के लिए मुसलमान हो गए तो यह "स्वैच्छिक मतान्तरण" है, इसे जबरन नहीं कहा जा सकता।"
(राम गोपाल-इंडियन मुस्लिम-ए पालिटिकल हिस्ट्री, पृष्ठ-157)

यदपि इस आंदोलन की पहली मांग –“खलीफा पद” की पुनर्स्थापना तथा- दूसरी मांग भारत की स्वतंत्रता थी।
इसलिए – “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” के –“संस्थापक डा.हेडगेवार” इसे “अखिल आफत आंदोलन” तथा “हिन्दू महासभा” के “डा.मुंजे” “खिला-खिलाकर आफत बुलाना” कहते थे;
पर इन - देशभक्तों की बात को - गांधी ने नहीं सुना।

कांग्रेस ने “मुस्लिम तुष्टीकरण” का जो देशघाती मार्ग उस समय अपनाया था,
उसी पर - आज भारत के अधिकांश राजनीतिक दल चल रहे हैं।
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“स्वामी श्रधानंद” जी “शिक्षाविद तथा आर्य प्रचारक” के साथ साथ कांग्रेस के नेता भी थे। वह कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य भी थे।

स्वामी श्रधानंद जी, लाला लाजपत राय जी और महात्मा हंसराज जी ने –“धर्म परिवर्तन” करने वाले हिन्दुओं को पुन: “वैदिक धर्म” में शामिल करने का अभियान शुरू किया।
कांग्रेस के - मुस्लिम नेताओं ने इनके द्वारा चलाये जा रहे “शुद्धि आन्दोलन” का “विरोध” शुरू कर दिया। कहा गया कि :-- यह आन्दोलन हिन्दू मुस्लिम एकता को कमजोर कर रहा है।
गाँधी के निर्देश पर - कांग्रेस ने स्वामी जी को आदेश दिया कि -- वे इस अभियान में भाग ना लें।

स्वामी श्रधानंद जी ने उत्तर दिया, “मुस्लिम मौलवी तबलीग” हिन्दुओं के धरमांतरण का अभियान चला रहे हैं !
क्या कांग्रेस उसे भी बंद कराने का प्रयास करेगी -??-
कांग्रेस मुस्लिमों को तुष्ट करने के लिए “शुधि अभियान” का विरोध करती रही, लेकिन गांधीजी और कांग्रेस ने “तबलीग अभियान” के विरुद्ध एक भी शब्द नहीं कहा।
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“शुद्धि आन्दोलन” का कोंग्रेस के विरोध करने के कारण - स्वामी श्रधानंद जी ने - कांग्रेस से सम्बन्ध तोड़ लिया।

स्वामी जी ने और लाला लाजपत राय ने यह महसूस किया कि - अगर मुस्लिमो और इसाईओं को हिन्दुओं के निर्बाध धर्मान्तरण की छूट मिलती रही तो यह हिंदुस्तान की एकता के लिए भlरी खतरा सिद्ध होगा।
स्वामी श्रधानंद जी शुधि अभियान मैं पुरे जोर शोर से सक्रिय हो गए।
६० मलकाने मुसलमानों को वैदिक (हिन्दू) धर्म में दीक्षित किया गया।
“उन्मादी मुसलमान” शुद्धि अभियान को सहन नहीं कर पाए।

पहले तो उन्हें धमकियां दी गयीं, अंत मैं २२ दिसम्बर १९२६ को दिल्ली में “अब्दुल रशीद” नामक एक मजहबी उन्मादी ने उनकी गोली मारकर “हत्या” कर डाली।
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स्वामी श्रधानंद जी की इस निर्मम हत्या ने सारे देश को व्यथित कर डाला परन्तु गाँधी ने यंग इंडिया अखबार में लिखा :----
” मैं भाई अब्दुल रशीद नामक मुसलमान, जिसने श्रधानंद जी की हत्या की है, के पक्ष में यह कहना चाहता हूँ, कि इस हत्या का दोष हमारा है।
“अब्दुल रशीद” जिस “धर्मोन्माद” से पीड़ित था, उसका उत्तरदायित्व हम लोगों पर है। देशाग्नी भड़काने के लिए केवल मुसलमान ही नहीं, हिन्दू भी दोषी हैं।”
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स्वातंत्रवीर सावरकर जी ने उन्हीं दिनों २० जनवरी १९२७ के “श्रधानंद” के अंक में अपने लेख में गाँधी द्वारा “हत्यारे अब्दुल रशीद” की तरफदारी की कड़ी आलोचना करते हुए लिखा :--–

"गाँधी ने अपने को – “शुद्ध हृदय, महात्मा तथा निष्पक्ष” - सिद्ध करने के लिए एक “मजहवी उन्मादी हत्यारे” के प्रति सुहानुभूति व्यक्त की है। मालाबार के मोपला हत्यारों के प्रति वे पहले ही ऐसी सुहानुभूति दिखा चुके हैं।"
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गाँधी ने स्वयं “हरिजन अखबार” तथा अन्य पत्रों में “लेख लिखकर” - स्वामी श्रधानंद जी तथा "आर्य समाज" के “शुधि आन्दोलन” की कड़ी निंदा की।
दूसरी ओर जगह जगह हिन्दुओं के “बलात धरमांतरण” के विरुद्ध - उन्होंने “एक भी शब्द” कहने का साहस नहीं दिखाया।
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मोपला कांड के चश्मदीद गवाह रहे –“केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी” के पहले –“अध्यक्ष और स्वतंत्रता सेनानी माधवन नॉयर” अपनी किताब “मालाबार कलपम" में लिखते हैं कि :-- “मोपलाकांड में हिन्दुओं का सिर कलम कर थूवूर के कुओं में फेंक दिया गया”।
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एक बात याद रखो :---
मुस्लिम करें तो “अल्लाह अल्लाह” हिन्दू करें तो -“बहुत बुरा बहुत बुरा” -
ये गांधी का सिद्धांत था।
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1 - एक लाख हिन्दुओं को (मारा गया, बलात धर्मान्तरित किया गया, हिन्दू औरतों के बलात्कार हुए) और यह सब हुआ गाँधी के “खिलाफत आन्दोलन” के कारण।
2 – 1920... तक "तिलक जी" की जिस कोंग्रेस का लक्ष्य “स्वराज्य” प्राप्ति था गाँधी ने अचानक उसे बदलकर “आन्तरिक विरोध” के बाद भी एक दूर देश –“तुर्की के खलीफा” के “सहयोग और मुस्लिम आन्दोलन” में बदल डालाl
3 - गाँधी अपनी निति के कारण इसके उत्तरदायी थे, मौन रहे। उत्तर में यह कहना शुरू कर दिया कि :---
"मालाबार में हिन्दुओं को मुस्लमान नही बनाया गया - सिर्फ मारा गया",
जबकि उनके ही मुस्लिम मित्रों ने ये स्वीकार किया कि - मुसलमान बनाने की सैकडो घटनाएं हुई है।
4 – इतने बड़े दंगो के बाद भी गांधी की “अहिंसा” की दोगली नीत पर कोई फर्क नहीं पड़ा मुसलमानों को खुश करने के लिए इतने बड़े दंगो के दोषी मोपला मुसलमानों के लिए “फंड” शुरू कर दिया।
5 - गाँधी ने “खिलाफत आन्दोलन” का समर्थन करके “इस्लामी उग्रवाद” को पनपाने का काम किया।
6 - श्री विपिन चन्द्र पाल, डा. एनी बेसेंट, सी. ऍफ़ अन्द्रूज आदि राष्ट्रवादी नेताओं ने कांग्रेस की बैठक में खिलाफत के समर्थन का विरोध किया , किन्तु इस प्रश्न पर हुए मतदान में गाँधी जीत गए।
7 - महामना मदनमोहन मालवीय जी तरह के कुछ नेताओं ने चेतावनी दी कि – “खिलाफत आन्दोलन” की आड़ में मुस्लिम भावनाएं भड़काकर भविष्य के लिए खतरा पैदा किया जा रहा है।
किन्तु गांधी ने कहा :--- “मैं मुसलमान भाईयों के इस आन्दोलन को “स्वराज” से भी ज्यादा महत्व देता हूँ "l
8 - महान स्वाधीनता सेनानी तथा हिन्दू महासभा के नेता - भाई परमानन्द जी ने -- उस समय चेतावनी देते हुए कहा था,

“ गाँधी जी तथा कांग्रेस ने मुसलमानों को तुष्ट करने के लिए जिस बेशर्मी के साथ खिलाफत आन्दोलन का समर्थन किया तथा अब “’खूंखार हत्यारे मोपलों” की प्रसंसा कर रहे हैं, यह घटक नीति आगे चल के इस्लामी उग्रवाद को पनपाने में सहायक सिद्ध होगी l”
9 – खिलाफत आन्दोलन का समर्थ कर गांधी तथा कांग्रेस ने –“मुस्लिम कट्टरवाद तथा अलगाववाद” को बढ़ावा दिया था।
10 - अ. भा. कांग्रेस की अध्यक्ष रही “डा. एनी बेसेंट” ने २९ नवम्बर १९२१ को दिल्ली में जारी अपने वक्तब्य में कहा था :----

“असहयोग आन्दोलन को “खिलाफत आन्दोलन” का भाग बनाकर गांधी तथा कुछ कोंग्रेसी नेताओं ने “मजहवी हिंसा” को पनपने का अवसर दिया।
एक ओर – “खिलाफत आन्दोलनकारी - मोपला मुस्लिम मौलानाओं’ द्वारा - मस्जिदों में भड़काऊ भाषण दिए जा रहे थे दूसरी और “असहयोग आन्दोलनकारी” - हिन्दू जनता से यह अपील कर रहे थे कि - हिन्दू – मुस्लिम एकता को पुष्ट करने के लिए खिलाफत वालों को पूर्ण सहयोग दिया जाए l”
11 - डा. बाबा साहेब अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक "भारत का बिभाजन" के प्रष्ठ १८७ पर गाँधी पर प्रहार करते हुए लिखा था :---
"गाँधी जी हिंसा की प्रत्येक घटना की निंदा करने में चुकते नहीं थे किन्तु गाँधी ने ऐसी हत्याओं का कभी विरोध नहीं किया।
उन्होंने चुप्पी साधे रखी।
ऐसी मानसिकता का केवल इस तर्क पर ही विश्लेषित की जा सकती है कि - गाँधी जी हिन्दू- मुस्लिम एकता के लिए व्यग्र थे और इस उद्देश्य की पूर्ती के लिए कुछ हिन्दुओं की हत्या से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था"
(उसी पुस्तक के प्रष्ठ १५७ पर )
12 - मालाबार और मुल्तान के बाद सितम्बर १९२४ मैं कोहाट में मजहबी उन्मादियों ने हिन्दुओं पर भी अत्याचार ढाए।
कोहाट के इस दंगे में गुंडों द्वारा हिन्दुओं की निर्संस हत्याओं किये जाने का समाचार सुनकर भाई परमानन्द जी , स्वामी श्रधानंद जी तथा लाला लाजपत राय ने एकमत होकर कहा था ‘”खिलाफत आन्दोलन में मुसलमानों का समर्थन करने के ही - यह दुषपरिणाम सामने आ रहे हैं कि - जगह जगह मुस्लमान घोर पाशविकता का प्रदर्शन कर रहे है।
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हिन्दू महासभा के नेता –“स्वातंत्र वीर सावरकर” जी ने आगे चलकर “मालावार” क्षेत्र का भ्रमण कर के वहां के “अत्याचारों व हत्याकांड” की पृष्ठभूमि पर - “मोपला” - नामक उपन्यास लिखा था।

खिलाफा आन्दोलन का समर्थन कर गाँधी जी तथा कांग्रेस ने मुस्लिम कट्टरवाद तथा अलगावबाद को बढ़ावा दिया था। मोपलाओं द्वारा हिन्दुओं की निर्संस हत्या का जब - आर्य समाज तथा हिन्दू महासभा ने - विरोध किया तब भी गाँधी मोपलाओं को “शांति का दूत” बताने - से नहीं चुके।
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महान स्वाधीनता सेनानी तथा “हिन्दू महासभा” के नेता “भाई परमानन्द” जी ने उस समय चेतावनी देते हुए कहा था, "गाँधी तथा कांग्रेस ने मुसलमानों को तुष्ट करने के लिए जिस बेशर्मी के साथ खिलाफत आन्दोलन का समर्थन किया तथा अब “खूंखार हत्यारे मोपलों” की प्रसंसा कर रहे हैं, यह घटक नीति आगे चल के “इस्लामी उग्रवाद” को पनपाने में सहायक सिद्ध होगी l"

महात्मा गाँधी और कांग्रेसी मुसलमानों को तुष्ट करने के लिए “मोपला विद्रोह” को अग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह बताकर आततायिओं को “स्वाधीनता सेनानी” सिद्ध करने का प्रयास कर रहे थे जबकि मोपला में लाखों हिन्दुओं की नश्रंस हत्या की गयी और २०, ००० हिन्दुओं को धर्मान्तरित कर मुस्लिम बनया गया।
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कितने दुःख की बात है :---
“खूंखार हत्यारे मोपलों” को कोंग्रेस ने -“स्वाधीनता सेनानी” - सिद्ध कर ही दिया,
केरल की किताबो में आज भी इन्हें “स्वाधीनता सेनानी” ही पढाया जाता है,

और सुनो – उन सभी – हत्यारों को “स्वाधीनता सेनानी” की पेंशन भी दी गयी।
अभी कुछ दिन पहले ही –मोदी जी ने– कुछ “मोपलों के हत्यारे मुस्लिमों” के नाम -“स्वाधीनता सेनानीयों” की सूचि से हटाए है...
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“मालाबार और मुल्तान” के बाद सितम्बर १९२४ में “कोहाट” में “मजहबी उन्मादियों” ने हिन्दुओं पर भी अत्याचार ढाए।

कोहाट के इस दंगे में गुंडों द्वारा हिन्दुओं की निर्संस हत्याओं किये जाने का समाचार सुनकर - भाई परमानन्द जी, स्वामी श्रधानंद जी तथा लाला लाजपत राय ने - एकमत होकर कहा था :--
"खिलाफत आन्दोलन में मुसलमानों का समर्थन करने के ही यह दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं कि - जगह जगह मुस्लमान घोर पाशविकता का प्रदर्शन कर रहे हैं l"
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दिसम्बर १९२४ में “बेलगाँव” में “प.मदनमोहन मालवीय” जी की अध्यक्षता में हुए -“हिन्दू महासभा के अधिवेशन में” कांग्रेस की मुस्लिम पोषक नीति पर कड़े प्रहार कर - हिन्दुओं को राजनीतिक द्रष्टि से संगठित करने पर बल दिया गया।
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इतिहासकार –“शिवकुमार गोयल” ने अपनी पुस्तक में कांग्रेस की भूमिका का उल्लेख किया है।
यह देश का दुर्भाग्य रहा है कि - कांग्रेस ने “इस्लामी आतंकवाद” के विरुद्ध एक भी शब्द नहीं बोला। जब “आर्य समाज, हिन्दू महासभा और अन्य हिन्दू संगठनो” ने “शुद्धिकरण” अभियान चलाया तो यह अभियान चलाने वाले लोग – “कट्टरपंथियों” की नजरों में काँटा बन गए।
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गांधी के सेक्स पर किताब -
http://www.dailymail.co.uk/news/article-1264952/A-new-book-reveals-Gandhi-tortured-young-women-worshipped-shared-bed.html
गांधी ने स्वंय लिखा है कि - वह अपने "ब्रह्मचर्य के प्रयोग" करने के लिए अपने पोती के साथ नंगे सोते थे।

सत्तर वर्ष की आयु में - जो मनुष्य ऐसा दुराग्रह करे कि - वह तो किसी स्त्री, लड़की के साथ नग्न सोयेगा,
क्योंकि वह अपने ब्रह्मचर्य की परीक्षा लेना चाहता है।

किसी नारी की गरिमा, उसकी निजता को खण्डित करने वाला वह कितना कठोर रहा होगा!

ऐसा हठ तो वही कर सकता है जिसे किसी स्त्री की - मर्यादा, उसकी इच्छा, उसके पवित्रतम मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की स्वतंत्रता की रत्ती भर परवाह न हो।

अपनी जांच के लिए :---
किसी नारी को विकराल लज्जाजनक स्थिति में डाल देना कौन सी अहिंसा है और किस ब्रह्मचर्य का अनुपालन है-??-
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गांधी के इस प्रयोग से - व्यथित होकर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने
25 जनवरी, 1947 को गांधी को एक पत्र लिखा :---
"यह प्रयोग आपकी भयंकर भुल है" इसे तत्काल रोक दो, इससे आपके अनुयायी काफी व्यथित व दु:खी हैं।

“सरदार पटेल का यह पत्र -“राष्ट्रीय सुरक्षा अभिलेखागार” में - आज भी सुरक्षित रखा है”
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ऐसा वो... वो...आदमी - क्या होगा - उसके लिए - शब्द नहीं है।

गांधी की - "अहिंसा" को भी समझिये !!

भारत के विभाजन के समय - हिन्दू सिख औरतेँ जिनका मुसलमानों ने बलात्कार किया और जबरन इस्लाम ग्रहण करने को विवश किया जा रहा था।
उस समय गाँधी ने कहा कि - जब तक मुसलमान -- हिन्दू सिख औरतों से बलात्कार करना चाहें,
उन्हें रोको मत , जी भर कर मुसलमान - हिन्दू सिख औरतों से बलात्कार करें,
जब जी भर जाएगा वो अपने आप छोड़ देंगे, इससे हिंसा भी नही होगी।

विभाजन के समय जब मुसलमान हिन्दुओं को काट रहे थे तो गाँधी ने कहा कि - मुसलमानों को रोको मत और हिन्दू बहादुरी से अपने आप को मुसलमानों के हवाले कर दें ताकि ज्यादा हिंसा न भड़के यदि हिन्दू उनसे मुकाबला करेंगे तो हिंसा ज्यादा भड़केगी।
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ये सब मैं अपनी तरफ से नही कह रहा हूं ,
इसे आप गाँधी की पुस्तक :---
“प्रार्थना प्रवचन पार्ट” 1,Vol. 87 के पृष्ठ 217- 19 पर देखें,
साथ ही उसमें 6 अप्रैल 1947 को दिए गए भाषण को भी देखें।
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आप यहाँ से भी - जानकारी कर सकते है - भाग 1
Sources Of Information :----
1 - https://allthatsinteresting.com/gandh...
2 - https://www.opindia.com/2019/10/my-de...
3 - https://www.newindianexpress.com/maga...
4 - https://www.bbc.com/news/world-africa...
5 - https://www.mkgandhi.org/letters/hitl...
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आप यहाँ से भी - जानकारी कर सकते है - भाग 2
Sources Of Information :----
1 - https://www.indiatoday.in/education-t...
2 - https://www.sanskritimagazine.com/the...
3 - https://allthatsinteresting.com/gandh....
4 - https://navbharattimes.indiatimes.com...
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आप ये वीडियों भी - देख और सुन सकते है..

गांधी का काला सच - जो लोगो से छुपाया गया.. - भाग 1
https://www.youtube.com/watch?v=bkrWJ5SmdL8
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गांधी का काला सच - जो लोगो से छुपाया गया.. - भाग 2
https://www.youtube.com/watch?v=jSyuSAfeZJM
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लंदन में गांधी - "अंजुमन-ए- इस्लामिया" संस्थान के भागीदार थे.।

लेखक “मि. घोष” की पुस्तक "द कुरान एंड द काफिर" में भी गांधी की “उत्पत्ति” का उल्लेख है..
{इस किताब में गांधी के सारे खानदान की जानकारी मिल जायेगी}
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{आप ने - पूरी पोस्ट पढ़ी - इस से - मेरी मेहनत सफल हुई...

To the world he was the spiritual leader of India's independence movement, a pioneer of non-violent resistance and father of the Indian nation.

27/11/2025

श्री राम के एक पूर्वज थे राजा हरिश्चन्द्र, वे ज़ब अयोध्या के सिन्हासन पर बैठे तो उन्होंने एक नियम बनाया की राजा को प्रतिदिन प्रजा के बीच जाना चाहिए लेकिन जैसे जैसे राज्य बढ़ता गया इसमें परेशानी आने लगी।

लेकिन सूर्यवंशी राजा काफ़ी प्रजावत्सल थे इसलिए बड़ी जन समस्या सामने नहीं आयी। चंद्रवंशियों के हाथ मे सत्ता आयी तो उन्होंने हस्तिनापुर मे महासभा सिस्टम भी लागू कर दिया, कुछ लोगो को राज्य का दौरा करके प्रजा की बात रखनी होती थी।

यही आइडिया आगे चलकर जनपद महाजनपद मे बदला लेकिन इतना स्पष्ट है की भारत मे राजशाही के दौर मे भी व्यवस्था थी की राजा तक प्रजा की बात पहुँच सके। शास्त्रार्थ इसी परम्परा का भाग था।

आज के दौर मे एक नयी चिंता का कारण सामने है की भारतीयों मे सेविंग करने की आदत अब लुप्त हो रही है, अब भारतीय सिर्फ 5% बचा रहे है और ये बहुत बड़ी चिंता बनने वाली है। अमेरिका के लोग भी कम बचत करते है लेकिन उनके पास पेंशन फंड है जो अनिवार्य है।

आप अपने इर्द गिर्द कितने ही लोगो को देख पाएंगे जो साधारण परिवार मे पले बढे होंगे मगर आज यूरोप और आशियान देशो के दौरे से नीचे नहीं उतऱ पाते। यदि भारत मे भी घूमते है तो कोई सादगी नहीं है बल्कि खर्चा करने पर प्राथमिकता होती है।

सरकार तो निश्चित रूप से इसे एन्जॉय कर रही है, 12 लाख तक की छूट दी गयी है क्योंकि उसे पता है नयी पीढ़ी इसे उपभोग के समानो मे खर्च कर देगी जो टैक्स रिबेट दी भी है वो GST के माध्यम से सरकार को ही लौटेगी। समस्या तब आएगी ज़ब आप 45-50 के हो जायेंगे, प्राइवेट नौकरियों मे पिछड़ेंगे और सेविंग नहीं होंगी।

आने वाले 15-20 साल इस वर्ग के लिए बड़े कष्टदायी होने वाले है यदि ऐसे मे पेंशन फंड नहीं बना तो आगे बड़ी दिक्क़त आने वाली है। यूरोप या कनाडा के पार्लियामेंट की चर्चा देखते है तो महसूस होता है इनके नेता कितने परिपक्व ढंग से चर्चा करते है। जनता के मुद्दे ध्यान से उठाते है, ऐसे मुद्दों पर पार्लियामेंट मे चर्चा आवश्यक है।

ऐसा नहीं है की इनसे कुछ बदल जाएगा लेकिन मीडिया कवरेज मिलेगी और समाज मे एक नयापन पनपने लगेगा। इस समय पूरी दुनिया ai और रेयर अर्थ मिनरल पर चर्चा कर रही है।

कनाडा मे न्यू कार्बन टैक्स पर चर्चा हो रही है, ब्रिटेन मे भी बढ़ते टैक्स को लेकर विपक्ष घेर रहा है, डेनमार्क जैसे शांत देश मे पेंशन फंड को लेकर चर्चा होती रही है लेकिन हमारे यहाँ मुद्दा है दलित ओबीसी और पिछडो की सेना मे क्या भागीदारी है? राफेल कितने गिरे? ट्रम्प के कहने पर सीजफ़ायर हुआ या नहीं?

हम दुनिया का पहला लोकतंत्र है जो सरकार से ज्यादा विपक्ष से परेशान है क्योंकि यह बहुत बचकाना और नासमझ है। ये पहला विपक्ष है जिसने अपनी क्रेडिबिलिटी ऐसी खोयी है की सरकार के सामने खुला मैदान है ज़ब चाहे दौड़ लगा दें। भारत को सख्त रूप से आवश्यकता है की असल मुद्दों पर चर्चा हो।

सरकार बुरी नहीं है, हर सरकार देश काल और परिस्थिति के अनुसार नीतियां बनाती है। आर्थिक नीतियों मे सरकार का दोष बहुत कम होता है यहाँ असली खिलाडी विपक्ष को बनना होता है, विपक्ष का काम विरोध करना नहीं सवाल पूछना होता है और यहाँ हम धोबी पछाड़ हो रहे है।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट विशेषकर RSS को आगे आना ही होगा, सुप्रीम कोर्ट इसलिए क्योंकि वहाँ राहुल गाँधी की तुलना मे तो थोड़े परिपक्व लोग है और RSS इसलिए क्योंकि उसे सत्ता का मोह नहीं है। RSS 11 साल से सत्ता मे है लेकिन उनका व्यवहार आज भी पहले जैसा है कोई अकड़ या कोई घमंड नहीं है।

RSS के लिए बीजेपी की सत्ता सिर्फ एक सीढ़ी है, अभी तो अखंड भारत बनेगा फिर विश्व बंधुत्व की बात होंगी और इस तरह RSS के पास अभी 100-200 साल बहुत काम है। सत्ता उनकी मंजिल नहीं है इसलिए RSS को बीजेपी के अंदर ही पुराने राजाओं की तरह एक परिषद गठन करनी होंगी।

क्या पता हो भी मगर वह सार्वजनिक ना हो, ये मुद्दा मोहन भागवत की सीधी अटेंशन का हकदार है। यदि बीजेपी घोटाले नहीं करती है और जनता त्रस्त ना हो तो भारत एक संगठन की राजशाही बन चुका है। पुराने राजा महाराजा जो करते थे वो ही बीजेपी को करने की जरूरत है यदि उसे लम्बे समय तक सत्ता मे टिकना है और अपना विकल्प रोके रखना है तो निंदक नहीं बल्कि जनपरिषद नियारे राखिये।

आर्य भूमि

26/11/2025

जो मोबाइल की लत नहीं छूटी तो देख लीजिए आपकी भी यही हालत होगी !

अजीब चल रही है दुनिया। 6-7 नाम से एक trend चल रहा है। न तो ये कोई meme है, न तो इसका कोई विशेष अर्थ है लेकिन Gen Alpha म...
26/11/2025

अजीब चल रही है दुनिया। 6-7 नाम से एक trend चल रहा है। न तो ये कोई meme है, न तो इसका कोई विशेष अर्थ है लेकिन Gen Alpha में '6-7' बोलने का craze इतना बढ़ गया है कि ये एक viral trend हो गया। एक basketball game से प्रेरित इस trend में 6-7 का कोई अर्थ नहीं है, लेकिने Gen Alpha के बच्चे 6-7 का इतना इस्तेमाल कर रहे हैं कि अभिभावक और शिक्षक परेशान हैं। अब चूँकि वो परेशान होते हैं, तो बच्चे और अधिक इस्तेमाल करते हैं। यहाँ तक तो पढ़ने में शायद आपको हँसी-मज़ाक़ जैसा लग रहा होगा लेकिन New York Post की एक ख़बर के अनुसार 6-7 trend इतना अधिक चल गया है कि स्कूलों में ये बोलना ban कर दिया गया है और ऐसा बोलने वाले बच्चों को सज़ाएं दे कर इस पर नियंत्रण किया जा रहा है। कहीं-कहीं तो पुलिस तक को involve किया जा रहा है। Class में कोई एक 6 बोलता है और बाक़ी 7। इस नरेबाज़ी से दुनिया के सबसे ताक़तवर देश भी परेशान है। कमाल है ना!!?? हमें तो Gen Z ही समझ में नहीं आ रहा था, अब Gen Z को Gen Aplha वाले समझ में नहीं आएँगे!!! हम तो अब तीसरी पीढ़ी वाले हैं... हमारा क्या... 😄😄

26/11/2025

स्त्री श्रृंगार रहस्य

प्राचीन समय में स्त्री अपने पति के प्रेम, सम्मान और सुख के लिए श्रृंगार करती थी।
उसका हर आभूषण, हर सुगंध, हर वस्त्र – पति के प्रति उसके प्रेम का संदेश होता था।
वह घर में ही देवी की तरह सुसज्जित रहती थी, क्योंकि उसका श्रृंगार केवल दिखावट नहीं था,
बल्कि ऊर्जा, आकर्षण और संबंधों में मधुरता का स्रोत था।

देवी लक्ष्मी पार्वती आदि देवियों को देखो वो अपने पति के लिए श्रृंगार करती है। ये सभी देवियां अपने आप में दिव्य और सुंदर है लेकिन फिर श्रृंगार करती है क्योंकि श्रृंगार का अर्थ सुंदर दिखना नहीं अपितु आकर्षण उत्पन्न करना है।

लेकिन आज की आधुनिकता ने इस भाव को बदल दिया है, आज श्रृंगार घर के लिए नहीं, बाहर वालों को दिखाने के लिए होने लगा है। बाहर जाना हो तो सुंदर कपड़े, मेकअप, आभूषण, परफ्यूम।

और घर के भीतर साधारण, बिना सजावट, जैसे सब महत्व खो गया हो।

घर में जहां प्रेम और आकर्षण होना चाहिए,
वहां उदासीनता और दूरी फैलने लगी है।
पति-पत्नी का संबंध ऊर्जा पर चलता है,
और श्रृंगार उस ऊर्जा को जागृत करता है।
जब घर में ही आकर्षण नहीं रहेगा,
तो मन बाहरी आकर्षण की ओर खिंचने लगेगा…

इसी कारण रिश्तों में तनाव बढ़ रहा है, भावनात्मक दूरी आने लगी है, घर में संवाद कम हो रहा है, अफेयर, एक्स्ट्रा रिलेशन, और तलाक बढ़ रहे हैं।

श्रृंगार केवल बाहरी नहीं, आंतरिक प्रेम है, श्रृंगार सिर्फ चेहरे पर लगाया रंग नहीं, यह सम्मान, प्रेम और समर्पण की अभिव्यक्ति है।

आज लोग उन्हीं को दिखाने में व्यस्त हैं, जिन्हें हम जानते तक नहीं, जो हमारे नहीं हैं – सोशल मीडिया, ऑफिस, पार्टियाँ, बाहर की दुनिया।

लेकिन घर जहां प्रेम जीवन और संबंध बसते हैं।
वहां सब साधारण, महत्वहीन, उपेक्षित सा हो गया है।

26/11/2025

#भारतविमर्श
*एक षड्यंत्र का पर्दाफाश*...
●हजारों साल से शूद्र दलित मंदिरों में पूजा करते आ रहे थे, ●अचानक 19वी० शताब्दी में ऐसा क्या हुआ कि, दलितों को मंदिरों में प्रवेश नकार दिया गया?

१. क्या इसका सही कारण आपको मालूम है?
२. या सिर्फ ब्राह्मणों को गाली देकर मन को झूठी तसल्ली दे देते हो?

अछूतों को मन्दिर में न घुसने देने की सच्चाई क्या है...? यह काम पुजारी करते थे कि, मक्कार अंग्रेजो के द्वारा किया गया लूटपाट का षड्यंत्र था?

1932 में लोथियन कॉमेटी की रिपोर्ट सौंपते समय डॉ. आंबेडकर नें अछूतों को मन्दिर में न घुसने देने का जो उद्धरण पेश किया है वो वही लिस्ट है जो अंग्रेजो ने भारत में कंगाल यानि गरीब लोगों की लिस्ट बनाई थी जो लोग मन्दिर में घुसने (Entry fee) देने के लिए अंग्रेजों के द्वारा लगाये गए टैक्स को देने में असमर्थ थे!

षड़यंत्र: 1808 ई० में ईस्ट इंडिया कंपनी पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर को अपने कब्जे में लेती है और फिर लोगो से कर वसूला जाता है, तीर्थ यात्रा के नाम पर कर!

हिन्दुओं के चार ग्रुप बनाए जाते हैं! इसमें से चौथा ग्रुप जो कंगाल है, उनकी एक लिस्ट जारी की जाती है!

1932 ई० में जब डॉ आंबेडकर अछूतों के बारे में लिखते हैं तो, वे ईस्ट इंडिया के जगन्नाथ पुरी मंदिर के दस्तावेज की लिस्ट को अछूत बनाकर लिखते हैं!

भगवान जगन्नाथ के मंदिर की यात्रा को यात्रा कर में बदलने से ईस्ट इंडिया कंपनी को बेहद मुनाफ़ा हुआ और यह 1809 से 1840 तक निरंतर चला। जिससे अरबो रूपये सीधे अंग्रेजो के खजाने में बने और इंग्लैंड पहुंचे। श्रद्धालु यात्रियों को चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता था!

प्रथम श्रेणी: लाल जतरी (उत्तर के धनी यात्री)

द्वितीय श्रेणी: निम्न लाल (दक्षिण के धनी यात्री)

तृतीय श्रेणी: भुरंग (यात्री जो दो रुपया दे सके)

चतुर्थ श्रेणी: पुंज तीर्थ (कंगाल की श्रेणी जिनके पास दो रूपये भी नही मिलते थे, उनकी तलाशी लेने के बाद)

चतुर्थ श्रेणी के नाम इस प्रकार हैं!

01. लोली या कुस्बी!

02. कुलाल या सोनारी!

03. मछुवा!

04. नामसुंदर या चंडाल

05. घोस्की

06. गजुर

07. बागड़ी

08. जोगी

09. कहार

10. राजबंशी

11. पीरैली

12. चमार

13. डोम

14. पौन

15. टोर

16. बनमाली

17. हड्डी

प्रथम श्रेणी से 10 रूपये! द्वितीय श्रेणी से 6 रूपये! तृतीय श्रेणी से 2 रूपये और चतुर्थ श्रेणी से कुछ नही!

अब जो कंगाल की लिस्ट है जिन्हें हर जगह रोका जाता था और मंदिर में नही घुसने दिया जाता था। क्योंकि वो एन्ट्री फीस नही दे पाते थे। ठीक वैसे ही जैसे आज आप ताजमहल/लालकिला में बिना एन्ट्री नही जा सकते...

आप यदि उस समय 10 रूपये भर सकते थे तो आप सबसे अच्छे से ट्रीट किये जाते थे...

डॉ आंबेडकर ने अपनी लोथियन कॉमेटी रिपोर्ट में इसी लिस्ट का जिक्र किया है और कहा कि कंगाल पिछले 100 साल में कंगाल ही रहे!

बाद में वही कंगाल अंग्रेजों द्वारा और बाद में काले अंग्रेज कोंग्रेसियों द्वारा षडयंत्र के तहत अछूत बनाये गए! ताकि हिंदु समाज विभाजित कर उन्हें बरगला कर धर्मांतरित किया जा सके...!!

हिन्दुओ के सनातन धर्म में छुआछुत बेसिक रूप से कभी था ही नहीं।

यदि ऐसा होता तो सभी हिन्दुओ के श्मशानघाट और चिता अलग अलग होती। और मंदिर भी जातियों के हिसाब से ही बने होते और हरिद्वार में अस्थि विसर्जन भी जातियों के हिसाब से ही होता।

यह जातिवाद आज भी ईसाई और मुसलमानों में भी है। इनमें जातियों और फिरको के हिसाब से अलग अलग चर्च और अलग अलग मस्जिदें हैं और अलग अलग कब्रिस्तान बने हैं। सनातनी हिन्दुओं में जातिवाद, भाषावाद, प्रान्तवाद, धर्मनिपेक्षवाद, जडतावाद, कुतर्कवाद, गुरुवाद, राजनीतिक पार्टीवाद पिछले 1000 वर्षों से मुस्लिम और अंग्रेजी शासको ने षडयंत्र से डाला है, ताकि विभाजित हिंदुओं पर शासन करनें में आसानी हो...

एकजुट हिंदुओं पर शासन विश्व की कोई भी प्रजाति के बस की बात नहीं है। जिस पर से कांग्रेस नाम के राजनीतिक दल ने पिछले 70 वर्षो तक अपनी राजनीति की रोटियां सेकीं और जूते में दाल खिलाई

26/11/2025

हराम का खाने की आदत हो गई है , प्रोपेड मीटर के ख़िलाफ़ प्रदर्शन , अच्छी चीज का बॉयकॉट हमेशा होता आया है, प्रीपेड मीटर से बिजली की चोरी और बर्बादी दोनों रुक सकती है, २०० यूनिट भले फ्री करो लेकिन प्रीपेड मीटर इलेक्ट्रिक और गैस दोनों जरूरी है, गैस पाइप लाइन से थोड़ी सुरक्षा भी होगी , पूरे देश में एक सिस्टम लागू हो जब पैसा पहले देना होगा तब रूम का पंखा और बल्ब और मीटर फालतू नहीं चलेगा , ये पूरे देश में जल्द से जल्द एक साथ लागू होना चाहिए ..

"सोने के सिक्के" चलाने वाला भारत को "सोने की चिड़िया" बनाने वाले हिन्दू राजा की गाथाएं।आओ हिन्दुओ तुम्हे सुनाता हूँ, सुना...
26/11/2025

"सोने के सिक्के" चलाने वाला भारत को "सोने की चिड़िया" बनाने वाले हिन्दू राजा की गाथाएं।

आओ हिन्दुओ तुम्हे सुनाता हूँ, सुनाता हूँ कि कैसे ईसाइयों व मुस्लिमो के सेकुलर हिन्दुओ के साथ मिलकर रचे गए शिक्षा व्यवस्था के षड्यंत्र के कारण महान हिन्दू राजाओं का असली इतिहास हम हिंदुपुत्रों से छुपाकर रखा गया, सरकारी पाठ्यक्रमों में महान हिन्दू राजा वीर विक्रमादित्य परमार की गाथाओं को नहीँ पढ़ाया गया, नतीजन हम अपना असली इतिहास से अनभिज्ञ अपना हिन्दुत्वि पौरुषिक आंकलन नहीँ कर सके, और सेकुलरिज्म की एक बहुत बड़ी मतांन्ध युवा पीढ़ी पैदा कर बैठे, जो हमारे ग्रन्थों व असली इतिहास के विरुद्ध तर्क वितर्क करने पर आमादा हो गई, आओ अपना पौरुषिक इतिहास जिंदा करें, आओ हिन्दुओ अपने बच्चो को महान हिन्दू राजा का असली इतिहास बताएं।

आपने बचपन से कई बार एक बात जरूर सुनी होगी की भारत पहले सोने की चिड़िया था और भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। पर क्या आप ये जानते है कि भारत को सोने की चिड़िया आखिर किसने बनाया था। नहीं ना तो हम बताते है कि वो राजा थे विक्रनादित्य।

बड़े ही शर्म की बात है कि महाराज विक्रमदित्य के बारे में देश को लगभग शून्य बराबर ज्ञान है, जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया बनाया था, और स्वर्णिम काल लाया था।

उज्जैन के राजा गंधर्वसैन की तीन संताने थी सबसे बड़ी पुत्री मैनावती फिर पुत्र भृतहरि व सबसे छोटा पुत्र विक्रमादित्य। राजा गंधर्वसैन के बाद उज्जैन का राजा भृतहरि बना जिसकी रानी का नाम पिंगला था। राजा भृतहरि अपनी रानी पिंगला को बहुत प्यार करते थे लेकिन रानी पिंगला अस्तबल की एक शहीस से प्यार करती थी और शहीश एक नर्तकी वेश्या से प्यार करता था। एक दिन विक्रमादित्य ने शहीश और भाभी पिंगला को गलत अवस्था में देख लिया तो उसने भाभी को काफी लताड़ लगाई। पिंगला रानी ने सोचा कि विक्रमादित्य राजा भर्तृहरि को सच्चाई ना बता दे उसने विक्रमादित्य पर ही अपने से चिपटने का आरौप लगा दिया और विक्रमादित्य के लिए मृत्यु दंड मांगा। अपनी पत्नी के प्यार में पागल राजा भृतहरि ने विक्रमादित्य को मृत्युदण्ड दिया और जल्लादों को विक्रमादित्य को जंगल में ले जाकर कत्ल करके उसकी आंखें निकालकर लाने का हुक्म दिया। पर जल्लादों ने विक्रमादित्य से ये वचन लेकर छोड़ दिया कि वो उज्जैन में कभी ना आए और एक हिरन को मारकर उसकी आंखें राजा भृतहरि को पेश कर दी। राजा भृतहरि बहुत ही न्यायप्रिय राजा थे। एक साधु ने राजा भृतहरि की न्यायप्रियता से खुश होकर एक अमरफल राजा भृतहरि को दिया था। राजा ने वह फल अपनी रानी पिंगला को दे दिया और पिंगला रानी ने वह अमरफल अपने प्रेमी शहीश को और शहीश ने वह फल अपनी प्रेमिका नर्तकी वेश्या को दे दिया। नर्तकी वेश्या ने सोचा मैं अमर होकर क्या करूंगी और उसने वह फल राजा भृतहरि को पेश किया। तब राजा ने नर्तकी से पूछा कि वह फल उसे कहां से मिला तो उसने शहीश का नाम लिया शहीश को बुलवाकर पूछा तो उसने सच्चाई बता दी कि रानी पिंगला उससे प्यार करती है उसने यह फल उसे दिया था।

तब राजा भृतहरि ने पिंगला से अमरफल के बारे में पूछा तो रानी बोली कि वह फल उसने खा लिया है, तब राजा भृतहरि ने वह फल रानी को दिखाया और कहा बदकार नार तूने शहीश के प्यार के चक्कर में मेरे विक्रमादित्य जैसे बेकसूर भाई को मरवा दिया और रानी की गर्दन तलवार से काट दी। फिर राजा भृतहरि ने जल्लादों को बुलवाकर रोते हुए पूछा कि उन्होंने उसके भाई विक्रमादित्य का कत्ल किस जगह किया था वहां उसे ले चले। तब जल्लादों ने राजा भृतहरि को रोते देखकर बता दिया कि उन्होंने विक्रमादित्य का कत्ल नही किया था बल्कि उसे ये हिदायत देकर छोड़ दिया था कि कभी भी उज्जैन में ना आये और एक हिरन को मारकर उसकी आंखें पेश की थी। राजा भृतहरि ने अपनी सेना को हुक्म दिया कि वो विक्रमादित्य को ढूंढकर लाए उसकी सेना के जवानों ने विक्रमादित्य को एक साधु के यहां ढूंढ निकाला और विक्रमादित्य को पिंगला रानी की सारी दास्तान सुना दी और बताया कि राजा भृतहरि उसकी याद में दिन रात रोता रहता है।

विक्रमादित्य को राजा भृतहरि के सामने पेश किया गया तो दोनों भाई फुट फुट कर गले मिलकर रोए राजा भृतहरि ने सन्यासः ले लिया और राजपाट विक्रमादित्य को सौंप दिया।

और राजा भृतहरि के बाद ही मैनावती के पुत्र गोपीचंद ने सन्यासः लिया था। राजा भृतहरि और उसके भानजे गोपीचंद के गुरु गुरु गोरखनाथ थे।

बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा पदमसैन के साथ कर दी, जिनके एक लड़का हुआ गोपीचन्द, आगे चलकर गोपीचन्द ने श्री ज्वालेन्दर नाथ जी से योग दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए। विक्रमादित्य का इतिहास भारत के स्वर्णिम इतिहास का प्रतीक है आइए जानते हैं विक्रमादित्य के बारे में...

ऐसे देश बना सोने की चिड़िया:विक्रमादित्य के समय में हमारे देश की आर्थिक दशा काफी अच्छी थी। वो ऐसा समय था जिसने भारत को सोने की चिड़िया बनाया और सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया था। महाराज विक्रमदित्य ने केवल धर्म ही नही बचाया उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर सोने की चिड़िया बनाई, उनके राज को ही भारत का स्वर्णिम राज कहा जाता है।

विदेश जाता था कपड़ा:

विक्रमदित्य के काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे भारत में इतना सोना आ गया था की, विक्रमदित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे। इसी कारण वो कपड़े का व्यापार और सोने के सिक्कों के टलन ने भारत को सोने की चिड़िया का नाम दिया गया था।

न्याय के लिए प्रसिद्ध था ये काल:

आपने शुरु से ही किताबों में राजा विक्रमादित्य के न्याय की कहानियां जरूर सुनी होंगी। ऐसा माना जाता है कि उनके न्याय से प्रसन्न होकर कई बार तो देवता भी उनसे न्याय करवाने आते थे, विक्रमदित्य के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से बने होते थे, न्याय, राज सब धर्मशास्त्र के नियमो पर चलता था विक्रमदित्य का काल राम राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जहाँ प्रजा धनि और धर्म पर चलने वाली थी। इसी कारण राजा विक्रमादित्य को न्याय का प्रतीक माना जाता है।

खो गए थे रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ:

क्या आप जानते है कि कुछ काम उनके समय में ऐसे हुए जो कि ना होते तो आज रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथ आपके पास ना होते। रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे, महाराज विक्रम ने ही पुनः उनकी खोज करवा कर स्थापित किया विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये और सनातन धर्म को बचाया।

राजा के नौरत्नों में एक थे कालिदास:

विक्रमदित्य के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् लिखा, जिसमे भारत का इतिहास है अन्यथा भारत का इतिहास क्या मित्रो हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके थे हमारे ग्रन्थ ही भारत में खोने के कगार पर आ गए थे। विक्रमादित्य के इतिहास को सदा के लिए याद किया जाता रहेगा।

जनता भूलती जा रही है:

इस समय तो ऐसा देखने को मिल जाएगा कि जनता विक्रमादित्य को भूलती जा रही है। जिसने भारत को सोने की चिड़िया बनाने के लिए इतना संघर्ष किया आज उसी राजा का नाम हमारी पीढी नहीं जानती है। किताबों से उनका नाम मिटता जा रहा है। जो कि आने वाली पीढ़ी के लिए चिंता का विषय है।

विक्रमादित्य के जन्म को लेकर अलग अलग इतिहासकारों की अलग अलग मान्यताएं हैं। फिर भी ऐसा माना जाता है कि उनका जन्म 102 ई पू के आस पास हुआ था।

महेसरा सूरी नामक एक जैनी साधू के अनुसार उज्जैन के एक बहुत बड़े शासक गर्दाभिल्ला ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके एक सन्यासिनी का अपहरण कर लिया था, जिसका नाम सरस्वती था। संयासिनी के भाई ने मदद की गुहार लगाने एक शक शासक के दरबार में गया।

शक शासक ने उसकी मदद की और युद्ध में गर्दाभिल्ला से उस सन्यासिनी को रिहा कराया। कुछ समय के बाद गर्दाभिल्ला को एक जंगल में छोड़ दिया गया, जहाँ पर वह जंगली जानवरों का शिकार हो गया।

राजा विक्रमादित्य इसी गर्दाभिल्ला के पुत्र थे। अपने पिता के साथ हुए दुर्व्यवहार को देखते हुए राजा विक्रमादित्य ने बदला लेने की ठानी।

इधर शक शासकों को अपनी शक्ति का अंदाजा हो गया। वो उत्तरी पश्चिमी भारत में अपना राज्य फैलाने लगे और हिन्दुओं पर अत्याचार करने लगे। शक शासकों की क्रूरता बढती गयी।

सन 78 के आस पास राजा विक्रमादित्य ने शक शासक को पराजित किया और करुर नाम के एक स्थान पर उस शासक की हत्या कर दी। करूर वर्तमान के मुल्तान और लोनी के आस पास पड़ता है। कई ज्योतिषी और आम लोगों ने इस घटना पर महाराजा को शकारि की ऊपधि दी और विक्रमी संवत की शुरुआत हुई। विक्रम संवत 2073 का इतिहास के बारे में पढ़ें।

भविष्यत् पुराण की मान्यताओं के आधार पर भगवान शिव ने विक्रमादित्य को पृथ्वी पर भेजा था। शिव की पत्नी पार्वती ने बेताल को उनकी रक्षा के लिए और उनके सलाहकार के रूप में भेजा।

बैताल की कहानियों को सुनकर राजा ने अश्वमेघ यज्ञ करवाया, उस यज्ञ के बाद उस घोड़े को विचरने के लिए छोड़ दिया गया, जहाँ जहाँ वह घोड़ा गया राजा का राज्य वहाँ तक फ़ैल गया। पश्चिम में सिन्धु नदी, उत्तर में बद्रीनाथ, पूर्व में कपिल और दक्षिण मे रामेश्वरम तक इस राजा का राज्य फ़ैल गया।

राजा ने उस समय के चार अग्निवंशी राजाओं की राजकुमारियों से विवाह कर अपने राज्य को और मजबूत कर लिया। राजा विक्रमादित्य द्वारा स्थापित राज्य में कुल 18 राज्य थे। विक्रमादित्य की इस सफलता पर सभी सूर्यवंशी खुश थे और चंद्रवंशी राज्यों में कोई ख़ुशी नहीं थी। इसके बाद राजा ने स्वर्ग का रुख किया।

ऐसा माना जाता है कि राजा विक्रमादित्य कलियुग के आरम्भ में कैलाश की ओर से पृथ्वी पर आये थे। उन्होंने महान साधुओं का एक दल बनाया जो पुराण और उप पुराण का पाठ किया करते थे। इन साधुओं में गोरखनाथ, भर्तृहरि, लोमहर्सन, सौनाका आदि प्रमुख थे। इस तरह न्याय प्रिय राजा विक्रमादित्य ने अपने पराक्रम से लोगों की रक्षा भी की और साथ ही सदा धर्म स्थापना के कार्य में लगे रहे।

#साभार

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