Rajpal Choudhary

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दीपोत्सव 2025 : समाज और सच के दीप जलाएंप्रकाश का यह पर्व केवल घरों में दीप जलाने का नहीं, बल्कि हृदयों में आशा जगाने का ...
21/10/2025

दीपोत्सव 2025 : समाज और सच के दीप जलाएं

प्रकाश का यह पर्व केवल घरों में दीप जलाने का नहीं, बल्कि हृदयों में आशा जगाने का अवसर है। दीपावली का पंचदिवसीय उत्सव—धनतेरस से भाईदूज तक—भारत की उस संस्कृति का प्रतीक है, जो अंधकार से प्रकाश, निराशा से आशा और स्वार्थ से सेवा की ओर प्रेरित करता है।

राजस्थान में दीपोत्सव लोक और जीवन का उत्सव है। मिट्टी के दीयों से लेकर रंग-बिरंगे आकाशदीपों तक हर घर में उजाला होता है, पर असली दीप वह है जो समाज के मन को प्रकाशित करे—जो समानता, संवेदना और सहयोग का संदेश दे।

धनतेरस हमें सिखाता है कि सच्चा धन स्वास्थ्य, सेवा और संतुलन में है। रूप चौदस आंतरिक स्वच्छता और सादगी के सौंदर्य को दर्शाती है। दीपावली तब सार्थक होती है जब हर घर में समान उजाला फैले। गोवर्धन पूजा हमें प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करना सिखाती है, जबकि भाईदूज रिश्तों की पवित्रता और विश्वास का प्रतीक है।

जिस प्रकार दीप अंधकार मिटाता है, उसी प्रकार पत्रकार समाज के अंधेरों को उजाले में लाते हैं। झूठ, अन्याय और भ्रम के विरुद्ध पत्रकार की कलम एक दीप की तरह जलती है।

इस दीपोत्सव पर सभी पत्रकार साथी सत्य, संवेदना और सहयोग के दीप जलाएं। पत्रकारिता केवल खबरें लिखने का कार्य नहीं, बल्कि समाज में सच्चाई का प्रकाश फैलाने की जिम्मेदारी है।
आइए, संकल्प लें कि अंधकार किसी घर में न रहे, भेदभाव किसी मन में न बचे और हर विचार से समाज में उजाला फैले।

सभी पत्रकार साथियों को दीपोत्सव के पंचदिवसीय पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।यह दीपावली आपके जीवन में प्रकाश, प्रसन्नता और सकारात्मक परिवर्तन लेकर आए।

— राजपाल
स. जनसंपर्क अधिकारी, हनुमानगढ़

02/10/2025

तुम अगर साथ देने का वा'दा करो
मैं यूंही मस्त नग़्मे लुटाता रहूँ

तुम मुझे देख कर मुस्कुराती रहो
मैं तुम्हें देख कर गीत गाता रहूँ

कितने जल्वे फ़ज़ाओं में बिखरे मगर
मैंने अब तक किसी को पुकारा नहीं

तुम को देखा तो नज़रें ये कहने लगीं
हम को चेहरे से हटना गवारा नहीं

तुम अगर मेरी नज़रों के आगे रहो
मैं हर इक शय से नज़रें चुराता रहूँ

मैंने ख़्वाबों में बरसों तराशा जिसे
तुम वही संग-ए-मरमर की तस्वीर हो

तुम न समझो, तुम्हारा मुक़द्दर हूँ मैं
मैं समझता हूँ, तुम मेरी तक़दीर हो

तुम अगर मुझ को अपना समझने लगो
मैं बहारों की महफ़िल सजाता रहूँ

स्रोत :
पुस्तक : कुल्लियत—ए—साहिर लुधियानवी(पृष्ठ 329)
रचनाकार : साहिर लुधियानवी

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