27/05/2026
त्यागमूर्ति, करुणा की प्रतिमूर्ति और बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी के संघर्षों की सबसे मजबूत रीढ़, माता रमाबाई अंबेडकर जी के 91वें परिनिर्वाण दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।
माता रमाबाई अंबेडकर (जिन्हें समाज आदर से 'रमाई' कहता है) का जन्म 7 फरवरी 1898 को एक गरीब परिवार में हुआ था। वर्ष 1906 में उनका विवाह डॉ. भीमराव अंबेडकर जी से हुआ। उस समय बाबासाहेब का संघर्ष शुरुआती दौर में था। रमाई ने न केवल एक पत्नी का कर्तव्य निभाया, बल्कि बाबासाहेब के सामाजिक क्रांति के संकल्प को पूरा करने के लिए अपने सुखों की आहुति दे दी।
मूक नायक की अदृश्य शक्ति
बाबासाहेब जब उच्च शिक्षा के लिए विदेश (अमेरिका और इंग्लैंड) में थे, तब भारत में माता रमाबाई ने अत्यधिक गरीबी और तंगहाली का सामना किया। उन्होंने मजदूरी की, गोबर के उपले कंडे बनाए और बेचकर घर चलाया, लेकिन कभी बाबासाहेब की पढ़ाई में अड़चन नहीं आने दी। उनका मानना था कि उनके पति केवल उनके परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे शोषित समाज के उद्धार के लिए पढ़ रहे हैं।
चार-चार बच्चों का सर्वोच्च बलिदान
समाज सुधार और राष्ट्र निर्माण की इस महायात्रा में माता रमाबाई को गहरा व्यक्तिगत दर्द सहना पड़ा। उचित इलाज और अभावों के कारण उन्होंने अपने चार बच्चों—रमेश, गंगाधर, राजरत्न और इंदु (पुत्री)—को अपनी आँखों के सामने खो दिया। एक माँ के लिए इससे बड़ा दुख और कोई नहीं हो सकता, लेकिन उन्होंने समाज के करोड़ों "वंचित बच्चों" के भविष्य के लिए अपने आंसुओं को पी लिया। इसी सर्वोच्च बलिदान के कारण उन्हें 'त्यागमूर्ति' कहा जाता है।
"रमा के बिना मैं वह नहीं बन पाता जो आज हूँ। उसने मेरे संकल्पों को जीवित रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।"
— डॉ. बी. आर. अंबेडकर (अपनी पुस्तक 'थॉट्स ऑन पाकिस्तान' माता रमाबाई को समर्पित करते हुए
लगातार संघर्ष, मानसिक आघात और गिरते स्वास्थ्य के कारण 27 मई 1935 को माता रमाबाई का परिनिर्वाण हो गया।
माता रमा बाई का जीवन इस बात का प्रतीक है कि किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन के पीछे केवल नेतृत्व करने वाला ही नहीं, बल्कि पृष्ठभूमि में रहकर चुपचाप सर्वस्व न्योछावर करने वाली आत्माएं भी होती हैं। आज उनके परिनिर्वाण दिवस पर पूरा देश उनके इस महान ऋण को याद कर उन्हें नमन करता है।
माता रमाबाई अंबेडकर अमर रहें!🙏🙏🙏