21/08/2026
20 अगस्त 2026 को हिमाचल प्रदेश वन विभाग और भारतीय स्कूल ऑफ बिजनेस के भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी के बीच पांच वर्ष का समझौता ज्ञापन हुआ है, जिसके माध्यम से राज्य की अनुमानित 22,600 करोड़ की वन एवं पशुधन अर्थव्यवस्था की संभावनाओं को विकसित करने की बात कही गई है। इसके तहत वन संसाधनों की मैपिंग, डेटा और एआई आधारित वन प्रबंधन, सामुदायिक उद्यमों, बाजार संपर्क तथा वन एवं चरागाह संसाधनों के आर्थिक उपयोग पर काम किया जाना है।
लेकिन हिमाचल में इस समय सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि जंगलों से 22,600 करोड़ कैसे कमाए जाएं; सवाल यह होना चाहिए कि इन जंगलों और उनसे पैदा होने वाली आर्थिक संपदा पर अधिकार किसका है?
भारत का वन अधिकार कानून, 2006 केवल वनवासियों को कुछ सुविधाएं देने वाला कानून नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने वाला अधिकार-आधारित कानून है। कानून वन-निर्भर समुदायों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है तथा सामुदायिक वन संसाधनों की रक्षा, पुनर्जीवन, संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार भी समुदायों को देता है।
यही वह बिंदु है जहां हिमाचल सरकार और वन विभाग की वर्तमान प्राथमिकताओं पर गंभीर राजनीतिक सवाल खड़ा होता है।
जब सरकार स्वयं कह रही है कि हिमाचल के जंगलों में हजारों करोड़ रुपये की आर्थिक संभावनाएं मौजूद हैं, तब यह पूछा जाना स्वाभाविक है कि उन संसाधनों पर सदियों से निर्भर रहे लोगों के अधिकारों की स्थिति क्या है? जिन ग्राम सभाओं ने वन अधिकार कानून के तहत सामुदायिक वन संसाधनों पर अपने दावे प्रस्तुत किए हैं, उनके दावों का क्या हुआ? कितने दावों का निपटारा हुआ? कितने ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार मिले? और यदि इन दावों को मान्यता देने की प्रक्रिया अभी भी अधूरी है, तो सरकार किस अधिकार के आधार पर उन्हीं संसाधनों की आर्थिक कीमत तय कर रही है?
वन अधिकार कानून की मूल भावना यही है कि जंगल को केवल सरकारी नियंत्रण में आने वाली भूमि या राजस्व पैदा करने वाले संसाधन के रूप में नहीं देखा जा सकता। जिन समुदायों ने पीढ़ियों तक जंगलों से ईंधन, चारा, फल, फूल, जड़ी-बूटियां, गैर-काष्ठ वन उपज और अन्य जीवन-निर्वाह की सामग्री प्राप्त की है, उनके अधिकारों को केवल इसलिए समाप्त नहीं किया जा सकता कि अब उन्हीं संसाधनों की बाजार में बड़ी आर्थिक कीमत दिखाई देने लगी है।
आज यदि आंवला, चीड़ की पत्तियां, जंगली आम, साल बीज और रोडोडेंड्रोन जैसे संसाधनों की संभावित आर्थिक कीमत हजारों करोड़ रुपये बताई जा रही है, तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि इन संसाधनों के वास्तविक उपयोगकर्ता कौन रहे हैं। हालिया आकलन में अकेले आंवला की संभावित कीमत 8,700 करोड़, चीड़ की पत्तियों की 5,500 करोड़ और जंगली आम की 4,800 करोड़ बताई गई है। यदि इन संसाधनों को अब 'untapped economic potential' कहा जा रहा है, तो क्या इसका अर्थ यह है कि सरकार ने उन समुदायों के पारंपरिक उपयोग को कभी आर्थिक मूल्य ही नहीं माना?
वन अधिकार कानून इस सोच को चुनौती देता है।
यहां वन विभाग की भूमिका भी गंभीर विमर्श का विषय बनती है। जिस विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में लंबे समय से वन रहे हैं, वही विभाग अब उन जंगलों की आर्थिक क्षमता की पहचान, मैपिंग, प्रबंधन और बाजार से जोड़ने की प्रक्रिया में प्रमुख संस्था बना हुआ है। दूसरी ओर, जिन ग्राम सभाओं को कानून ने सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार देने की कल्पना की है, वे अभी अपने अधिकारों की मान्यता के लिए सरकारी तंत्र के सामने संघर्ष कर रही हैं। यह स्थिति अपने आप में लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रश्न खड़ा करती है।
क्या पहले संसाधनों का आर्थिक मूल्यांकन होगा और बाद में अधिकारों की पहचान? या पहले यह निर्धारित होगा कि इन संसाधनों पर कानूनी रूप से किस समुदाय के अधिकार हैं और फिर उन्हीं अधिकार-धारकों की भागीदारी से वन अर्थव्यवस्था विकसित की जाएगी?
यही इस पूरे MoU का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न है।
सरकार यदि वास्तव में समुदायों को वन अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाना चाहती है तो यह स्वागत योग्य कदम हो सकता है। लेकिन इसके लिए 'community enterprise' शब्द पर्याप्त नहीं है। किसी समुदाय को उत्पादक कंपनी बना देना और उसके पारंपरिक सामुदायिक अधिकार को मान्यता देना दो अलग-अलग बातें हैं। हालिया MoU में महिलाओं के नेतृत्व वाली producer companies और market linkages की बात की गई है। लेकिन सवाल यह है कि इन कंपनियों को संसाधनों तक पहुंच किस अधिकार के आधार पर मिलेगी? क्या ग्राम सभा के सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को पहले मान्यता मिलेगी? क्या ग्राम सभा तय करेगी कि कितना दोहन होगा, कौन करेगा, किस उद्देश्य से करेगा और उससे होने वाले लाभ का वितरण कैसे होगा?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है तो 'community-led forest economy' भी अंततः ऊपर से नीचे की ओर चलने वाली एक और सरकारी आर्थिक परियोजना बन सकती है।
और सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होगा जब वन अर्थव्यवस्था की भाषा के पीछे निजी निवेश और बाजार के लिए जंगलों तक नई पहुंच का रास्ता तैयार किया जाने लगे। आज सरकार संसाधनों की पहचान कर रही है, कल value chain बनाई जाएगी, उसके बाद processing और marketing के लिए निजी पूंजी आएगी और फिर उन संसाधनों को बड़े बाजार से जोड़ने की आवश्यकता बताई जाएगी। यदि इस पूरी प्रक्रिया में ग्राम सभाओं के सामुदायिक अधिकारों को मान्यता नहीं दी गई तो आर्थिक विकास के नाम पर वही पुराना मॉडल वापस आ सकता है जिसमें जंगल समुदायों के आसपास तो रहते हैं, लेकिन उनके निर्णय और आर्थिक नियंत्रण से बाहर रहते हैं।
यह केवल आजीविका का प्रश्न नहीं है। यह सत्ता और स्वामित्व का प्रश्न है।
वन से मिलने वाली वस्तु को बाजार में बेचने का अधिकार और उस वन संसाधन पर सामुदायिक अधिकार — दोनों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। जिस समुदाय ने पीढ़ियों तक किसी जंगल का उपयोग किया है, उसके लिए जंगल केवल लकड़ी, आंवला, आम, चारा या चीड़ की पत्तियों का भंडार नहीं है। वह उसकी आजीविका, संस्कृति, पशुपालन, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक जीवन का आधार है। वन अधिकार कानून इसी ऐतिहासिक संबंध को कानूनी मान्यता देने का प्रयास करता है।
इसलिए यदि किसी ग्राम सभा ने सामुदायिक वन संसाधन का दावा प्रस्तुत किया है और सरकार उसे वर्षों तक मान्यता नहीं देती, लेकिन उसी क्षेत्र के संसाधनों की आर्थिक क्षमता का सर्वेक्षण करके उसे बाजार और value chain से जोड़ने की योजना बनाती है, तो सरकार से सवाल पूछा जाना चाहिए कि अधिकारों की मान्यता में इतनी देरी क्यों और संसाधनों के आर्थिक दोहन में इतनी तेजी क्यों?
वन अधिकार कानून में सामुदायिक वन संसाधन का अधिकार केवल जंगल से कुछ वस्तुएं इकट्ठी करने का अधिकार नहीं है। समुदाय को अपने सामुदायिक वन संसाधन की रक्षा, पुनर्जीवन, संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार भी है। इसलिए यदि किसी बाहरी संस्था द्वारा तैयार की गई वैज्ञानिक मैपिंग यह तय करने लगे कि जंगल में क्या उपलब्ध है, कितना निकाला जा सकता है और उसकी बाजार कीमत क्या है, तो यह प्रक्रिया ग्राम सभा के ज्ञान और निर्णय लेने की भूमिका का विकल्प नहीं बन सकती।
वैज्ञानिक तकनीक का विरोध नहीं होना चाहिए; लेकिन AI और satellite mapping ग्राम सभा के अधिकारों का विकल्प भी नहीं हो सकते।
वन विभाग के पास आंकड़े हो सकते हैं, ISB के पास तकनीकी विशेषज्ञता हो सकती है, सरकार के पास नीति बनाने की शक्ति हो सकती है और निजी कंपनियों के पास पूंजी हो सकती है; लेकिन जिस समुदाय का जीवन उस जंगल से जुड़ा है, उसके पास उस जंगल के साथ पीढ़ियों का अनुभव और कानून द्वारा मान्यता प्राप्त होने वाला अधिकार है। लोकतांत्रिक वन शासन में इन चारों शक्तियों के ऊपर ग्राम सभा की वैधानिक भूमिका को कमजोर नहीं किया जा सकता।
इसलिए सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि 22,600 करोड़ की जिस वन अर्थव्यवस्था की बात की जा रही है, उसमें वन अधिकार कानून के तहत लंबित दावों का क्या स्थान है? क्या सभी संभावित CFR क्षेत्रों को आर्थिक मानचित्र में शामिल करने से पहले उनके अधिकारों की स्थिति स्पष्ट की जाएगी? क्या जिन ग्राम सभाओं ने दावे प्रस्तुत किए हैं, उन्हें इस प्रक्रिया में निर्णायक भागीदारी दी जाएगी? क्या किसी भी commercial value chain, private investment, extraction agreement या market linkage को सामुदायिक अधिकारों की मान्यता और ग्राम सभा की वैधानिक भूमिका से जोड़ा जाएगा?
और यदि इन सवालों का स्पष्ट उत्तर नहीं है तो आशंका पैदा होना स्वाभाविक है कि कहीं यह पूरा अभियान पहले जंगल के संसाधनों को खोजने, उनकी आर्थिक कीमत तय करने और बाजार तक पहुंच बनाने का अभियान तो नहीं है, जबकि उन संसाधनों पर ऐतिहासिक और कानूनी अधिकार रखने वाले लोगों के दावों को अभी भी सरकारी फाइलों में रोका जा रहा है।
हिमाचल को ₹22,600 करोड़ की वन अर्थव्यवस्था चाहिए, लेकिन लोगों के अधिकारों की कीमत पर नहीं।
वन अर्थव्यवस्था का असली लोकतांत्रिक मॉडल वह होगा जिसमें पहले वन अधिकार कानून के तहत लोगों के अधिकारों की पहचान और मान्यता हो, फिर ग्राम सभाएं अपने सामुदायिक वन संसाधनों की योजना बनाएं, संरक्षण और सतत उपयोग की व्यवस्था तय करें, स्थानीय लोगों को value addition और बाजार से जोड़ा जाए और आर्थिक लाभ का सबसे बड़ा हिस्सा उन्हीं समुदायों तक पहुंचे जिनके जीवन और श्रम ने इन संसाधनों को पीढ़ियों तक जीवित रखा है।
अन्यथा 22,600 करोड़ की 'green wealth' का सवाल केवल आर्थिक विकास का सवाल नहीं रहेगा; यह सवाल बन जाएगा कि हिमाचल के जंगलों की दौलत पर फैसला आखिर किसका होगा—वन विभाग का, बाजार का, निजी निवेश का या उन ग्राम सभाओं का जिनके पूर्वजों ने इन जंगलों को पीढ़ियों तक बचाया और जिनके अधिकारों को संसद ने वन अधिकार कानून के माध्यम से मान्यता देने का वादा किया है।