08/07/2026
हमें कुछ बातों पर बहुत गहराई से विचार करने की आवश्यकता है—
• क्या एक समाज के रूप में हम वास्तव में जीवित हैं?
• क्या हमारे पास कोई ऐसी सामाजिक संरचना है जो संकट के समय समाज के साथ खड़ी दिखाई दे?
• क्या पिछले 40-50 वर्षों में सवर्ण समाज कोई ऐसी सशक्त सामाजिक व्यवस्था खड़ी कर पाया है जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ गर्व कर सकें? यदि नहीं, तो आखिर वे कौन सी कमियाँ, दुर्बलताएँ और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ हैं जो हमें बार-बार बिखेर देती हैं?
पिछले एक वर्ष में समाज के बीच रहकर जो देखा, समझा और अनुभव किया, उसने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया। मुझे लगा कि हम अभी उस स्थिति में नहीं हैं जहाँ समाज के बड़े मुद्दों पर एकमत होकर, दीर्घकालिक सोच के साथ आगे बढ़ सकें। कई बार व्यक्तिगत सोच, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ और अपने-अपने तरीके से कार्य करने की प्रवृत्ति सामूहिक लक्ष्य से बड़ी हो जाती है।
इसी दौरान मुझे यह भी महसूस हुआ कि केवल संगठन खड़े कर देने से समाज नहीं बदलता। समाज तब बदलता है जब उसकी जड़ों में चेतना हो, जब धरातल पर जनजागरण हो, जब लोग अपने समाज, संस्कृति और भविष्य के प्रति संवेदनशील बनें। इसलिए मुझे लगा कि इस समय मेरी आवश्यकता किसी मंच या पद से अधिक समाज के बीच है।
इन्हीं विचारों के साथ मैंने अपने आपको विकल्प मोर्चे से अलग करने का निर्णय लिया था, जिसकी सार्वजनिक घोषणा मैं पहले भी कई बार कर चुका हूँ।
यह निर्णय किसी व्यक्ति या संगठन के विरोध में नहीं है, बल्कि इस विश्वास के साथ है कि समाज की मजबूत नींव तैयार किए बिना कोई भी बड़ा भवन लंबे समय तक खड़ा नहीं रह सकता।
विकल्प मोर्चे के सभी साथियों, पदाधिकारियों और शुभचिंतकों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।
लेकिन फिलहाल मुझे लगता है कि मेरी भूमिका समाज के बीच रहकर वैचारिक जागरण, सामाजिक चेतना और आधारभूत संरचनाओं के निर्माण में अधिक उपयोगी हो सकती है।
मैं आज भी सनातन, संस्कृति, राष्ट्र और समाज के प्रति उतना ही समर्पित हूँ जितना पहले था।
मेरे विचार, मेरी प्रतिबद्धता और मेरा संघर्ष वहीं है, केवल कार्य का माध्यम और दिशा अलग है।
आशा है कि हम सब अपने-अपने अहंकार, महत्वाकांक्षाओं और सीमाओं से ऊपर उठकर उस समाज के निर्माण में योगदान देंगे जिसकी आवश्यकता आने वाली पीढ़ियों को है।
स्नेह और शुभकामनाओं सहित,
अनिल कुमार मिश्रा