08/09/2025
आर्यवृत के इतिहास के अनुसार प्राचीन काल मे राजाओ की जाति लिखना आवश्यक नही था।
क्षत्रियो के तीन वंश :- सूर्यवंशी ,चन्द्रवंशी, यदुवंशी
महाभारत के युद्ध के पश्चात प्राचीन उपाधि "गुर्जर"(शत्रु विनाशक)के साथ एकताबद्ध होकर एक जाति "गुर्जर "में सूत्रबद्व हुये और उनके नाम पर विजित क्षेत्र का नामकरण "गुर्जरात्रा" हुआ ।
गुर्जरो की पहली राजधानी "द्वारिका" थी।(बॉम्बे गजेटियर पेज 201)
इंडिया हिस्ट्री खण्ड 1 पेज 64 -65 पर CV वैध लिखते है।
जाट,गुर्जर,मराठा आदि नाम छठी शताब्दी या 7वी शताब्दी से पूर्व ही उपयोग में आये।
गुर्जर प्रतिहार वंश के राजा नागभट्ट की संतान आज तक अपने को गुर्जर कहती है।
गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना नागभट्ट प्रथम ने की 725 ई में कई थी।उसने राम के वंशज लक्ष्मण को अपना पूर्वज बताते हुए अपने वंश को सूर्यवंश की साखा सिद्ध किया।
महाकवि राजशेखर ने गुर्जरो को रघुकुल तिलक तथा रघुकुलमणि कहा है।
7वी से 10 वी सताब्दी के शिलालेखों पर सूर्य की कलाकृति इनके सूर्यवंशी होने की पुष्टि करती है।
विद्ववानों का मानना है कि गुर्जरो ने भारत वर्ष को 300 साल तक अरब आक्रांताओ से सुरक्षित रखकर प्रतिहार (रक्षक)की भूमिका निभाई थी।
प्रतिहारो ने अपने शिलालेखो पर स्पस्ट रूप से" गुर्जर" वंश से होने की पुष्टि की है।
नागभट प्रथम बड़ा वीर था।उसने सिंध की और से आने वाले अरबो का सफलता पूर्वक सामना किया।
नागभट्ट के भतीजे का पुत्र वत्सराज इस वंश का प्रथम शासक था।जिसने सम्राट की उपाधि धारण की ।
वत्सराज द्वतीय के पुत्र नागभट्ट द्वतीय 2 ने 816 ई के लगभग गंगा की घाटी पर हमला कर कनौज पर अधिकार कर लिया।
और भीनमाल से राजधानी कनौज बनाई।
5वी सताब्दी में भीनमाल गुर्जरो की राजधानी थी।इसकी स्थापना गुर्जरो ने की थी।
गुर्जर प्रतिहारो के आरम्भिक नाते रिस्तेदार, आत्मीयजन सेनापति चौहान थे।
गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का सेनापति भी चौहान ही था जिसे कनौज से भेजा गया था।
चीनी यात्री हेनसांग 630 ई से 645 ई तक आर्यवृत मे रहा वह भड़ौच की राजसभा में गया और अपने जीवन के व्यकितत्व की अन्वेषणा में उसने इस भड़ौच के इस "गुर्जर वंश" को "क्षत्रिय" लिखा है ।
वंश शुद्ध ता में कोई जाति संसार मे गुर्जरो की समानता नही कर सकती है।
राजपूत कोई जाति ही नही है ये तो इतिहासकारो का दिग्भ्रम है।न ही किसी राजपूत जाति ने इस देश पर शासन किया न ही इस जाति का पता चलता है।राजपूत शब्द सबसे पहले मुस्लिम आक्रमण कारियो ने प्रयोग किया था ।
शब्द हिन्दू,हिंदुस्तान,राजपूत,और अफगान,उस समय के एसमिरिती चिह्न है 12बी सताब्दी के पहले ये जाति धरती के पटल पर कही नही थी।
राजपूत "गुर्जर"की संतान है फिर संतान की रास्ट्रीयता पूर्वजो से उत्तम कैसे हो गई।
यूरोपीयन इतिहासकारो के अनुसार कई राजपूत वंश हून, शक, गुर्जरो आदि की संतान है।जिन्होंने भारत मे प्रवेश कर यही निवास ग्रहण कर लिया और बाद में हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया।
राजस्थान में जो शेखावत राजपूत है।जो अरब तुर्क (शेख)हारा कर( हिन्दू राजाओ ने गुलाम बनाकर जीवन दान दिया ) यही हिन्दू धर्म अपना लिया वो ही आज शेखावत राजपूत कहलाते है।