18/11/2022
BIRTH PLACE OF AMRAPALI
आज वैशाली की प्रसिद्ध राजनर्तकी और अपूर्व सुन्दरी ‘अम्बपाली’ के गाँव ‘अम्बारा’ हैं। अम्बपाली बुद्धकाल की एक ऐतिहासिक पात्र है और उसकी जन्मस्थली ‘अम्बारा’ गाँव भी। ‘अम्बपाली’ का वह ‘आम्रवन’ अब भी बचा हुआ है, जिसे अम्बपाली ने बुद्ध को दान दिया था। इस आम्रवन में बुद्ध ने अपने शिष्यों के साथ कई वर्षावास गुजारे थे। मुजफ्फरपुर-छपरा मुख्य मार्ग से सटा हुआ यह आम्रवन एक पुष्करणी (तालाब) से शुरू होता है। इस तालाब की स्थिति अच्छी नहीं है। फिर भी देश-विदेश के बौद्ध भिक्षु जब यहाँ आते हैं, तो इसके जल से अभिषेक करते हैं। सम्भव है उस समय यह मार्ग दूसरी जगह से जाता हो और तालाब बगीचे के बीच में रहा हो। बीसियों एकड़ का यह आम्रवन अतिक्रमण का शिकार होकर अब मात्र दो-तीन एकड़ का ही रह गया है। इसी आम्रवन के सामने अम्बारा चौक पर सडक के उस पार एक सरकारी प्राथमिक स्कूल है। लोग उसी को अम्बपाली का घर बताते हैं। वहाँ मुख्यद्वार पर बुद्ध की एक छोटी-सी मूर्ति लगी हुई है और उसके नीचे एक पुराने शिलापट्ट पर अँग्रेजी में लिखा हुआ है-Birth Place of Amarpali
लोग बताते है कि बहुत पहले वहाँ आम्रपाली की एक प्रतिमा भी स्थापित थी, जो अब नहीं है। अभी हाल-हाल तक स्कूल के सामने के मुख्य मार्ग पर बिहार सरकार का एक बड़ा-सा साईन बोर्ड लगा था, जिसके ऊपरी हिस्से के एक किनारे पर बुद्ध और दूसरे किनारे पर आम्रपाली की तस्वीरें बनी थी। उसके नीचे आम्रपाली और बुद्ध के ऐतिहासिक विवरण थे, जो अब भी है। किन्तु रख-रखाव के अभाव में वह बोर्ड जड़ से उखड़ गया और उसे स्कूल के अन्दर चहारदीवारी से सटाकर खड़ा कर दिया गया। वहाँ उग आये खर-पतवार और धूल-कीचड़ के बीच आज भी उसकी लिखावट पढ़ी जा सकती है, जिसमें आम्रपाली के जन्मस्थान का वर्णन है।
पुराने लोग बताते हैं कि यह स्थान स्तूपनुमा एक ऊँचा टीला और ईंट का खंडहर था, जो दूर-दूर तक फैला था। धीरे-धीरे लोग उसे काटते गये और उस लावारिश जमीन को हड़पते चले गये। 1960-65 के आस-पास जब यह सरकारी स्कूल बना, उस समय भी यह जमीन लगभग 30 डिसमिल थी। किन्तु आज यह दो-तीन डिसमिल ही रह गयी है। यहाँ से होकर एक लम्बी-चौड़ी सुरंग वैशाली गढ़ तक जाती थी, जिसके अवशेष अब भी जहाँ-तहाँ देखे जा सकते हैं। वैशाली गढ़ की दूरी यहाँ से लगभग 5-6 किमी है। अम्बपाली भीड़ से बचने के लिए इसी सुरंग से होकर वैशाली दरबार में जाती थी।
इससे दक्षिण-पूरब सुरंग के रास्ते पर अम्बारा नाम का एक और गाँव है, जिसे ‘अम्बारा चौबे’ कहते हैं। इस गाँव के लोगों का दावा है कि ‘आम्रपाली’ का जन्म इसी गाँव में हुआ था। प्रमाण में वे सुरंग के रास्ते का एक ऊँचा स्थान दिखाते हैं, जो कभी ऊँचा टीला था। ‘‘अम्बारा चौबे’ एक भूमिहार बहुल गाँव है, जबकि ‘अम्बारा तेजसिंह’ राजपूत बहुल। यहाँ ब्राह्मण और दलित-पिछ्ड़ी जातियों की संख्या भी कम नहीं है। पहले इस पंचायत का नाम आम्रपाली के नाम पर ‘आम्रपाली’ था, किन्तु वर्ष 2000-01 के परिसीमन में यह पंचायत दो भागों में बँट गया- ‘अम्बारा तेजसिंह’ और ‘मड़वा पाकड़’। पर पुराने दस्तावेज में इसका नाम ‘आम्रपाली’ ही है। इनमें आसपास के कई गाँव मिले हुए हैं, जिसमें एक प्रमुख गाँव है पास का ‘रेवा वसंतपुर’।
‘रेवा वसंतपुर’ के एक टोले में ‘डोम’ लोगों का घर है। इनके कुछ घर ‘मड़वा पाकड़’ में भी हैं। ‘अम्बारा तेजसिंह’ के सवर्ण खासकर राजपूत लोग ‘अम्बपाली’ के अस्तित्व के प्रति उतने उत्साहित और संवेदनशील नहीं हैं। उनका कहना है- ‘रही होगी कोई नीच जाति की नर्तकी।‘ किन्तु दलित-पिछड़े लोग उसे अपनी विरासत मानते हैं। अधिकांश लोग ‘अम्बपाली’ को ‘डोम’ जाति की कन्या बताते हैं। कुछ लोग जोर देकर बताते है कि ‘अम्बपाली’ डोम जाति की ही थी। हमलोग बाबा-दादा के ज़माने से सुनते आये हैं। ऐसे लोगों में पास के स्कूल के शिक्षक राणा कुणाल, चन्द्रिका प्रसाद, कपिलदेव राम, सहदेव राम, दिलीप साह आदि लोग हैं। इसके प्रमाण में वे लोग बताते हैं कि यहाँ के डोम लोग अब भी सुन्दर होते हैं। पुराने ज़माने में नाचना-गाना उनका पेशा रहा होगा, जो अब नहीं है। वे पास के गाँव ‘रेवा वसंतपुर’ के डोम 'सिक्की मल्ली' के परिवार के बारे में बताते हैं, जिसके खानदान-दर-खानदान गोरे और सुन्दर रहे हैं। आज भी उनके परिवार के सभी सदस्य वैसे ही गोरे और सुन्दर हैं।
‘अम्बपाली’ उसी के खानदान की थी। उस पंचायत की मुखिया बेबी कुमारी के पति सुरेश शर्मा, वयोवृद्ध अवकाश प्राप्त शिक्षक योगेन्द्र प्रसाद सिंह, अवधेश ठाकुर, कपिलदेव ठाकुर आदि लोग भी इस संभावना से इनकार नहीं करते। मैंने सिक्की मल्ली के घर पर जाकर देखा और सचमुच वैसा ही पाया। सिक्की मल्ली के बेटे-बेटी-पोती-पतोहू की तस्वीर नीचे दी जा रही है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है, पर बुद्ध द्वारा चांडाल कन्या प्रकृति को बौद्ध धर्म में दीक्षित कर शिष्या बनाने का इतिहास है। प्रकृति पहले बुद्ध के प्रमुख शिष्य आनन्द पर अनुरक्त थी। किन्तु बुद्ध द्वारा मोह की निस्सारता समझाने पर वह बुद्ध की शिष्या बन गयी।
भारत में ऐसा पहली बार हुआ कि सैकड़ों स्त्रियों ने बौद्धधर्म अपनाकर संन्यास ग्रहण कर लिया। और यह सब बुद्ध के सामने हुआ। यह परम्परा बुद्ध के बाद भी जारी रही। इसके प्रमाण तुर्कों के आगमन के पूर्व बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी तक मिल जाते हैं, “क्योंकि भारत से बौद्धधर्म का लोप तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में हुआ.” (‘बुद्धचर्य्या’, राहुल सांकृत्यायन, भूमिका) बौद्धग्रन्थ ‘थेरीगाथा’ में केवल 73 प्रमुख स्त्रियों के ही नाम, वक्तव्य और उनकी कवितायें मिलती हैं। बौद्ध धर्म में दीक्षित स्त्रियों को ‘थेरी’ कहते थे। इन प्रमुख थेरियों में वैशाली की राजनर्तकी या गणिका ‘अम्बपाली’ का भी नाम है।
Amrapali was the most beautiful woman of her time. The description of her beauty is found in Pali texts. Amrapali was so beautiful that every man in the city wanted to marry her.