साहित्य सिनेमा और रेडियो

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साहित्य सिनेमा और रेडियो जीवन के लिए जरूरी तीन मनोरंजक
क्षेत्रों के लिए एक छोटा सा प्रयास

महिलाएं दुनिया के हर काम को कर जाती हैं बस उन्हें गुमराह न किया जाए"तुम महिला हो और कमजोर हो हर काम को नहीं कर सकती!"और ...
02/11/2025

महिलाएं दुनिया के हर काम को कर जाती हैं बस उन्हें गुमराह न किया जाए
"तुम महिला हो और कमजोर हो हर काम को नहीं कर सकती!"
और यही हज़ारों सालो से किया जा रहा है इस लकीर को कुछ महिलाएँ मिटाकर आगे निकल जाती हैं अधिकांश इस लकीर के उस पार जाने की सोच भी नहीं पाती और कुछ सब सोच कर जा नहीं पाती, लकीर के इस पार ही छटपटाती रहती है!

~सायरा बानो

आज विश्व रेडियो का दिन है।   अपना बचपन तो रेडियो पर गीत सुनकर निकला है!नाना जी को खेती किसानी का कार्यक्रम और समाचार सुन...
14/02/2025

आज विश्व रेडियो का दिन है।
अपना बचपन तो रेडियो पर गीत सुनकर निकला है!
नाना जी को खेती किसानी का कार्यक्रम और समाचार सुनने में दिलचस्पी थी।
शाम को रामचरितमानस की चौपाई सुनने से शुरू हुआ रेडियो जवानों का कार्यक्रम सुनकर बंद होता था।

जनकवि स्वर्गीय कैलाश गौतम जी का लिखा एक गीत "अमावस्या का मेला"
मेरे पूरे घरवालों को पसन्द था।
जब थोड़ी बड़ी हुई तब दोपहर में सखी लोगों की चर्चा सुनने, लोकगीत सुनने में भी आनंद आने लगा था।
रेडियो चालू करके गीत सुनते सुनते घर के काम निपटाया करती थी।
बचपन में रेडियो के चैनल वालीं सुई में झाँक कर देखा करती थी कि शायद टीवी की तरह रेडियो में भी चलचित्र दिखाई दे जाये।
बचपन की कोशिश तो कामयाब न हुई लेकिन उस सपने को मोबाइल ने मूर्त रूप दे दिया।

तस्वीर फेसबुक साभार

अरूणिमा सिंह

"सिगरेट की डिब्बी पर लिखा गया एक गाना जो लहू बनकर हमारी नसों में दौड़ने लगा"____________________________________________व...
06/02/2025

"सिगरेट की डिब्बी पर लिखा गया एक गाना जो लहू बनकर हमारी नसों में दौड़ने लगा"
____________________________________________
वे हालिया भारत-चीन युद्ध में भारत को हुई क्षति से बहुत आहत थे। युद्ध ख़त्म होने के बाद, 26 जनवरी 1963 के गणतंत्र दिवस पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक विशेष कार्यक्रम रखा गया। इस कार्यक्रम के आयोजन की जिम्मेदारी भारत सरकार ने सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार महबूब ख़ान को सौंपा। महबूब जी ने इस मौके के लिए उन्हें कोई ऐसा गीत रचने को कहा जो शहीदों को श्रद्धांजलि के रूप में दिल्ली में प्रस्तुत किया जा सके।

एक दिन वे सुबह-सवेरे बॉम्बे के माहिम बीच पर टहल रहे थे। तभी उन्हें एक पंक्ति सूझी -

"जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी"

उन्हें ये पंक्ति बहुत पसंद आई लेकिन उनके पास उस समय कोई पेन और कागज़ नहीं था। लिहाज़ा उन्होंने किसी से एक पेन माँगा और अपनी जेब में रखी सिगरेट की डिब्बी निकालकर उसी पर ये पंक्तियाँ नोट कर लीं।

संगीतकार सी रामचन्द्र के संगीत में बद्ध इस गीत को उनकी ज़िद पर लता मंगेशकर ने 26 जनवरी 1963 के गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए गाया:

"ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर पानी"
"जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी"

समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और राष्ट्रपति राधाकृष्णन भी थे। ये गाना सुनकर समारोह में सभी का रोयां-रोयां कलप उठा। पूरे कार्यक्रम में एक अजब-सा सन्नाटा था। सभी की आँखें भर आई थीं। पंडित नेहरू भी रोने लगे थे।

नेहरू जी ने उस कार्यक्रम के बाद लता मंगेशकर को अपने पास बुलाकर उनकी काफी प्रशंसा की, लेकिन दुःख की बात यह थी इस गीत के रचयिता को उस कार्यक्रम में आमंत्रित तक नहीं किया गया था।

एक रोचक बात यह है कि यह गीत किसी भी फ़िल्म का हिस्सा कभी नहीं रहा। लेकिन आज तक यह सभी देशभक्ति गीतों में सर्वाधिक लोकप्रिय बना हुआ है।

बाद में लता मंगेशकर और उन कवि "प्रदीप" को भारत सरकार ने सर्वोच्च फ़िल्म सम्मान दादा साहब फाल्के से सम्मानित किया।

@ #प्रशान्त
06/02/2021

06/02/1915 - 11/12/1998
नमन एवं श्रद्धांजलि💐💐
6 Feb 2021, 00:01

Prashant Dwivedi
Repost
06/02/2025

(Image courtesy: Image: History Pics/Twitter)

Kavi Pradeep (left) penned 'Ae mere watan ke logon' while C Ramchandra (right) put it to music. The song was then performed by Lata Mangeshkar. This is also a coincidence that today is the birth anniversary of Kavi Pradeep and the death anniversary of Lata Ji)

रहें न रहें हम, महका करेंगे.....____________________________________________फिर भारत भूमि पर ही जन्म लेना आई...और हमारी ...
05/02/2025

रहें न रहें हम, महका करेंगे.....
____________________________________________
फिर भारत भूमि पर ही जन्म लेना आई...और हमारी आने वाली पीढ़ियों को एक और याद दे जाना..!

रहें ना रहें हम, महका करेंगे बन के कली, बन के सबा, बाग़े वफ़ा में ...

रहें ना रहें हम...

मौसम कोई हो इस चमन में रंग बनके रहेंगे हम खिरामां
चाहत की खुशबू, यूँ ही ज़ुल्फ़ों से उड़ेगी, खिज़ा हों या बहारां
यूँ ही झूमते, यूँ ही झूमते और खिलते रहेंगे
बन के कली, बन के सबा, बाग़े वफ़ा में ...
रहें ना रहें हम...

खोये हम ऐसे क्या है मिलना क्या बिछड़ना नहीं है याद हमको
गुंचे में दिल के जब से आये सिर्फ़ दिल की ज़मीं है याद हमको
इसी सरज़मीं, इसी सरज़मीं पे हम तो रहेंगे,
बन के कली, बन के सबा, बाग़े वफ़ा में ...
रहें ना रहें हम...

जब हम न होंगे तब हमारी खाक पे तुम रुकोगे चलते, चलते
अश्कों से भीगी चांदनी में इक सदा सी सुनोगे चलते, चलते
वहीं पे कहीं, वहीं पे कहीं हम तुमसे मिलेंगे
बन के कली, बन के सबा, बाग़े वफ़ा में ...
रहें ना रहें हम...

रहें ना रहें हम, महका करेंगे बन के कली, बन के सबा, बाग़े वफ़ा में ...

रहें ना रहें हम...

Prashant Dwivedi

लीला नायडू पर राज कपूर की पहली निगाह शम्मी कपूर की शादी की दावत में पड़ी थी. लीला ने अपने शुरुआती जीवन का बड़ा वक्फा यूरोप...
05/02/2025

लीला नायडू पर राज कपूर की पहली निगाह शम्मी कपूर की शादी की दावत में पड़ी थी. लीला ने अपने शुरुआती जीवन का बड़ा वक्फा यूरोप में बिताया था सो वह एक व्यापक विश्वदृष्टि से संपन्न हो चुकी थी. 1954 में वह मिस इंडिया भी बनी थी.

लीला नायडू के पिता रामैय्या नायडू दुनिया भर में नाम कमा चुके न्यूक्लियर साइंटिस्ट थे और मैडम क्यूरी के सबसे होनहार छात्रों में गिने जाते थे जबकि स्विस-फ़्रेंच मूल की उनकी माँ मार्था मांगे एक आयरिश इंडोलॉजिस्ट थीं. ब्रिटिश राज के घोर विरोधी रामैय्या नायडू ने पढ़ाई के लिए अपने समय के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में जाने से सिर्फ़ इस वजह से इनकार करते हुए शान्तिनिकेतन और बीएचयू जैसे संस्थानों में जाना बेहतर समझा कि वे विश्वविद्यालय ब्रिटेन में थे. ब्रिटेन में मिल रही स्कॉलरशिप को ठुकराते हुए उन्होंने पेरिस जाकर मैडम क्यूरी के साथ काम किया था.

लीला की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई यूरोप के बड़े नगरों में हुई. अपने उसूलों पर बने रहने की ताक़त उसे पिता से मिली जबकि यूरोप के सौंदर्यशास्त्र की बारीकियाँ माँ ने सिखाईं.

पहली मुलाक़ात के कुछ दिन बाद राज कपूर ने लीला को मिलने का न्यौता भेजा. वह पिता को साथ लेकर गई. राज कपूर ने बताया कि वे मुल्कराज आनंद की किताब ‘द गॉडेस एंड द ट्रैक्टर’ पर फ़िल्म बनाने की मंशा रखते हैं और लीला को लीड रोल में लेना चाहते हैं. इस पर लीला ने मासूमियत के साथ राज कपूर के कहा कि इस रोल के लिए वे कुछ दिन गाँव में रह कर तैयारी करना चाहेंगी. राज कपूर थोड़ा हैरान होकर कहने लगे कि गाँव में गर्मी होगी और मच्छर काटेंगे. लीला ने विनम्रतापूर्वक कहा कि ग्रामीण स्त्री का रोल करने के लिए गाँव में रह कर ही तैयारी की जा सकती है. राज कपूर ने एक असहाय निगाह डॉ. नायडू पर डाली और कहा – “आप तो कतई नहीं चाहेंगे न कि आपकी बेटी एक रोल के चक्कर में महीना भर गाँव जा कर रहे?” डॉ. नायडू ने असमंजस में कहा कि एक बार कोशिश कर लेने में क्या हर्ज है.

मामला वहीं फंसा रह गया.

छः महीने बाद लीला को फिर से आर.के. स्टूडियो से बुलावा आया. सूचना-प्रसारण मंत्रालय में काम करने वाली लीला की पारिवारिक मित्र ने उसे पहले से बता रखा था कि राज कपूर एक अच्छे निर्देशक तो हैं लेकिन उन्हें अपनी फ़िल्मों की हर लीड हीरोइन के साथ इश्क़ हो जाने की लाइलाज बीमारी है.

स्टूडियो पहुँचते ही लीला को सारी बात समझ में आ गई. स्क्रीन-टेस्ट के तौर पर लीला को ड्रेस-ट्रायल देना था और शूटिंग के सारे काम की देखरेख उनकी हालिया हीरोइन नरगिस कर रही थीं. लीला को जिन कपड़ों को पहन कर आने को कहा जा रहा था उनमें से कुछ फ़िल्म की ‘गॉडेस’ के लिहाज़ से ज़्यादा ही तंग और भड़कीले थे लेकिन लीला ने वही किया जैसा उससे कहा जा रहा था. आखिरकार उसे पहनने के लिए साटिन का एक पैंट-सूट दिया गया.

लीला से अब नहीं रहा गया. उसने पूछा – “गाँव में रहने वाली औरत ये सब तो नहीं पहनेगी न!”

राज कपूर समझ गए उनका वास्ता एक समझदार औरत से पड़ा है. झेंपते हुए बोले – “दरअसल मैं आपको एक साथ चार फ़िल्मों के लिए साइन करने की सोच रहा हूँ.”

राज कपूर के मुताबिक़ लीला को एक कॉन्ट्रैक्ट साइन करना था जिसके बाद उन्हें आर के स्टूडियो की नई खोज के रूप में प्रोजेक्ट किया जाना था. लीला ने साटिन का पैंट-सूट नहीं पहना और राज कपूर कहा कि उन्हें सोचने के लिए कुछ समय चाहिए.

करियर की बिलकुल शुरुआत में राज कपूर की मंदाकिनी बन जाना उसके लिए सबसे आसान होता लेकिन उसे अपने आधुनिक, चेतनासंपन्न और आज़ाद होने का पूरा अहसास था और जीवन की विराटता का भी.

बंबई का सिनेमा लीला नायडू जैसी स्वतंत्र और अपार प्रतिभावान अभिनेत्री के साथ न्याय करने लायक तब भी नहीं था अब भी नहीं है.

अपनी बायोग्राफ़ी में लीला नायडू बताती हैं कि उस दिन आर. के स्टूडियो से घर लौटकर उन्होंने राज कपूर को एक नोट लिखकर बताया कि वे उनके साथ काम करने में असमर्थ हैं. उनका दाख़िला ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में हो गया था. उन्हें वहाँ जाने की तैयारी करनी थी.

~अशोक पाण्डे

मुझे पता है मेरे पाँव तुम्हारी कल्पनाओं से सुंदर नहीं हैं पर इन्हें सुंदर बनाने के लिए महावर लगा लेती हूँ तुम्हें पसंद ह...
19/10/2024

मुझे पता है
मेरे पाँव तुम्हारी कल्पनाओं से सुंदर नहीं हैं
पर इन्हें सुंदर बनाने के लिए महावर लगा लेती हूँ
तुम्हें पसंद हैं न, ये महावर लगे पैर
जब इन्हें लगा के चलती हूँ पूरे घर पर निशान बन जातें हैं जैसे तुम्हारे मन पर मेरे प्रेम के चिन्ह ❤️😊

~त्रिशा

कल राखी और आज गुलजार है जन्मदिन मुबारक गुलज़ार साहब ❤️
18/08/2024

कल राखी और
आज गुलजार है

जन्मदिन मुबारक गुलज़ार साहब ❤️

[ प्रेम करने के लिए ] प्रेम करने के तरीक़े चाहे अलग होंया भिन्न हो प्रेम में जीने का सलीका किसी अजनबी की तरह प्रेम आ जात...
12/08/2024

[ प्रेम करने के लिए ]

प्रेम करने के तरीक़े चाहे अलग हों
या भिन्न हो प्रेम में जीने का सलीका

किसी अजनबी की तरह
प्रेम आ जाता है
पथ का रास्ता भले ही मालूम ना हों

मगर,
अनजान रास्ता कोई
मंज़िल मुकम्मल कर लेता है

किसी की ज़िंदगी में
वो पत्थर की ठोकर बनता है तो
किसी की ज़िंदगी में मंज़िल का द्वार

पर,
प्रेम किसी न किसी तरह
दरवाज़े पर दस्तक दे ही जाता है

वो कोई लड़की हो सकती है
या कोई लड़का
या हो सकता है ईश्वर

किसी भी
रंग, रूप, शब्द में आ सकता है
उसे ना तव्वज़ो आती है
और ना कोई अख़्तियार आता है

प्रेम करने के लिए
अब तक कोई दरवाज़ा नहीं बना
जिसके लिए उसे किसी की अनुमति लेनी पड़े।

Dev Lal Gurjar

इससे पहले कि नदियों के पाट खत्महो जायेंओरा जाएं सारे जंगलसिरा जाये तितली, फूल ,तारों के कितने किस्सेहवा अंधड़ में बदल जाय...
25/06/2024

इससे पहले कि नदियों के पाट खत्म
हो जायें
ओरा जाएं सारे जंगल
सिरा जाये तितली, फूल ,तारों के कितने किस्से
हवा अंधड़ में बदल जाये
बारिश होना भी लगभग बंद हो जाये
हमें एकबार मिल लेना चाहिए

कही भी मिल लेना चाहिए
जहाँ से दिखती रहे थोड़ी हरियाली थोड़ा आकाश
और ओझल रहें घृणा की तरेरती नजरें

इतनी तेजी से इतनी सुंदरता नष्ट की जा रही है यहाँ कि
मैं बचे हुए को जी लेने के लिए बेचैन हो उठी हूँ

मैं खयालों में रोज जमा कर रही हूँ मिट्टी ,पानी और हरियाली
तुम्हारे संग-साथ के लिए इतनी चीजें तो चाहिए ही

तुम ही सोचो कैसा होगा हमारा अभिसार
बिना बारिश, बिना जंगल ,बिना पहाड़ और नदी के
एक उजाड़ , प्लास्टिक का संसार दम घोट देगा हमारा

देखना अगर इसी तरह टलता रहा हमारा मिलना
तो एकदिन प्यार किये बिना ही हम दुनिया से चले जायेगें
और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

~रूपम तिवारी

मुझे विक्रम सेठ पसंद हैं. कॉलेज के ज़माने से ही बहुत ज़्यादा पसंद हैं. एम.ए. में पढ़ता था तो सबसे पहले उनके उपन्यास 'गोल्डन...
25/06/2024

मुझे विक्रम सेठ पसंद हैं. कॉलेज के ज़माने से ही बहुत ज़्यादा पसंद हैं. एम.ए. में पढ़ता था तो सबसे पहले उनके उपन्यास 'गोल्डन गेट' ने अपने शिल्प से हतप्रभ किया. छः सौ से ऊपर सोनेट्स की मदद से लिखा गया एक शानदार उपन्यास था वह. एक-एक सोनेट तकनीकी रूप से परफेक्शन के नज़दीक और भाषा का बहता दरिया.

फिर उनका ट्रेवेलॉग पढ़ा ‘फ्रॉम हैवेन लेक’ - उनके चीन प्रवास की डायरी और तिब्बत होते हुए वापस लौटने की दुस्साहसिक किस्सागोई. इसके एक लम्बे हिस्से का मैंने अनुवाद भी किया जो कुछ पत्रिकाओं में छपा. किसी ने उनका कविता संग्रह ला कर दिया ‘द हम्बल एडमिनिस्ट्रेटर्स गार्डन’. फिर कविताओं का एक और संग्रह हाथ लगा ‘ऑल यू हू स्लीप टुनाइट’.

उनकी कविता के मोहपाश में फंस ही रहा था कि ‘अ सूटेबल बॉय’ आ गया. इस उपन्यास के छपते ही विक्रम इंटरनेशनल सेलेब्रिटी बन गए. तीन बरस बाद उनका सर्वश्रेष्ठ गद्य ‘एन इक्वल म्यूजिक’ की सूरत में आया. विएना की सड़कों पर घूमते हुए कितनी ही बार मैंने इस उपन्यास के माइकेल और जूलिया को खोजने की कोशिश की. सर्दियों में ओपेरा हाउस के सामने से गुजरता तो किसी खिड़की से बीथोवेन की उनकी प्रिय सिम्फनी के नोट्स के तैरते आने की बाट जोहता.

विक्रम सेठ ने लगातार लिखा है और उनके लिखे को मैंने खोज-खोज कर पढ़ा है. जब 2005 में ‘टू लाइव्स’ छप कर आया, मुझे उनकी संपन्न पारिवारिक विरासत से ईर्ष्या हुई कि इतना सब एक ही आदमी के हिस्से कैसे आ जाता है.

चीनी कविता के बारे में मेरी जितनी भी जानकारी है, उसके पीछे भी विक्रम सेठ की किताबें हैं. अनुवाद को लेकर भी विक्रम बहुत संजीदा रहे हैं और उन्होंने खूब अनुवाद किये हैं. संक्षेप में मुझे विक्रम सेठ के लिखे से मोहब्बत है.

इस देश के हिन्दीभाषी हिस्से में शायद ही कोई ऐसा हो जिसने ‘हनुमान चालीसा’ को बचपन से न पढ़ा हो और जिसे इसका बड़ा हिस्सा कंठस्थ न हो. बहुत कम लोग जानते होंगे विक्रम सेठ ने ‘हनुमान चालीसा’ का भी अंग्रेज़ी अनुवाद किया है.

विक्रम ने यह अनुवाद दस साल पहले किया था. यह एक स्वान्तःसुखाय काम था जिसे उन्होंने अपने ही घर में रहने वाली नब्बे साल की अपनी मामी को भेंट किया. उन्हीं के कहने पर ही उन्होंने इसे प्रकाशित करने का मन बनाया.

दिल्ली में कल जब इस किताब को रिलीज किया गया, विक्रम सेठ ने अपनी किताब से ज्यादा हालिया चुनाव के नतीजों के बाद देश की राजनीति में आई उस स्पेस के बारे में ज्यादा बात की जिसमें सांस लेना थोड़ा आसान हुआ है. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने इस अनुवाद को करने के पीछे के उद्देश्यों के बारे में बात की है.

जिस-जिस ने ‘अ सूटेबल बॉय’ पढ़ी है उन्हें भास्कर की याद होगी जो पांच साल की आयु में तुलसीदास की लिखी चालीस चौपाइयों वाली इस कविता को रट लेता है. विक्रम ने यह किताब उसी भास्कर को समर्पित की है.

किताब पांच जुलाई को बाज़ार में उपलब्ध होगी.

~अशोक पाण्डे

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