04/03/2023
# # # # होली तब और अब # # #
एक जमाना वो भी था जब गांवों में होली पर बच्चों में बहुत उत्साह हुआ करता था। घर वाले नये वस्त्र सिलवाते थे। होली से दस पंद्रह दिन पहले से गींदड शुरू हो जाती थी। गींदड खेलने के लिए खेतों से "चिटिया" (गींदड खेलने का डंडा) काटकर लाते उसे आग में गर्म करके उस पर डिजाइन बनाते और रात में बारह एक बजे तक गींदड खेलते । घरों से औरतें, बच्चे, बुड्ढे ,जवान सभी देखते । गाँव के बीच में जहां चौक होता उसके बीच में नगाड़ा रखा जाता और एक व्यक्ति उसे बजाता , कयी पुरुष महरी ( जनाना कपड़े पहनकर) बनते और राजस्थानी गीत-- तेजा गाते ,राजस्थानी दोहे बोलते, लोक गीत गाये जाते जिन्हें सुन कर आनंदित होते । सीमित साधन होते हुए भी खुश थे। सभी का सम्मान किया जाता था। कभी लड़ाई झगड़ा नहीं होता था। होली के दिन तो सारी रात गींदड खेलते थे। होली के दूसरे दिन नये कपड़े पहन कर सभी के घरों में जाते- बड़ों को प्रणाम करते और राम राम करते । मंदिरों में जाते वहां पुजारी जी सभी के गुलाल लगाते और प्रसाद देते। उसके बाद युवतियां और किशोरियां सोलह दिन गणगौर पूजन करती। बनौरा निकाला जाता जिसमें घूघरी बनती जो सभी को बांटी जाती ।उस समय जो खुशी होती उसको शब्दों में पिरोना आसान नहीं । गणगौर के दिन शोभायात्रा निकाली जाती जो गाँव के तालाब पर जाती वहां पूजा की जाती। युवतियां फोगडे ( राजस्थानी वनस्पति) की गणगौर बनाती उसका गहने पहना कर सिणगार करती हर जगह गीत ही सुनाई देता था। यह फागोत्सव बसंत पंचमी से शुरू होकर गणगौर तक चलता ।गणगौर पर ऊंटों व घोड़ों की दौड़ होती । यह था गाँव वसंतोत्सव।
शहरों में यह त्योंहार कुछ अलग हट कर मनाया जाता है। रीति- रिवाज तो एक जैसे ही हैं, मगर शहरी तड़क भड़क और संसाधन की भरमार से इसे और भी रंगीन बना दिया । अब पारंपरिक लोकगीत की जगह फिल्मों का असर दिखाई पड़ता है। होली पर शहरों में महा मूर्ख सम्मेलन, हास्य कवि गोष्ठियां , शहर की जानी मानी हस्तियों को विभिन्न प्रकार की उपाधियां दी जाती, जिसे पढकर हंसी भी आती और आनंद भी आता । राजस्थान के शहरों में कयी जगह अब भी गींदड खेलते हैं ,विभिन्न चंग मंडली द्वारा पारंपरिक गायन व नृत्य का प्रदर्शन देखकर आनंद आता है। मगर कुछ जगह इस लोक त्योंहार में फूहड़पन भी आ गया है। यह बदलते परिवेश का परिचायक है जिसे हमने गाहे ब गाहे अंगीकार कर लिया। होली के दूसरे दिन रंग खेलने में अबीर गुलाल की जगह पक्के रासायनिक रंग और कीचड़ तक प्रयोग करने लग गये जो हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ऐसी कुप्रथाओं से हमें बचना चाहिए। हमारे त्योंहार मानव स्वास्थ्य को पुष्ट करने के लिए बनाये गये हैं। बच्चों के उत्साह का तो कहना ही क्या ? हाथों में पिचकारी लेकर सभी को रंगने को लालायित रहते हैं। रेनडांस का अलग ही मजा है। युवा लोगों को देखकर इस मदनोत्सव का आनंद दुगुना हो जाता है। जगह जगह गोठ एवं चंग की थाप पर नृत्य करते लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी को सौंप रहे हैं यह कम गौरव की बात नहीं है। हमारे गोलाघाट का होली मित्र मंडल हमारी इस अनमोल धरोहर को नयी पीढ़ी में पल्लवित पुष्पित कर रही है जो हमारे लिए गर्व की बात है। धन्यवाद एवं साधुवाद "मित्र मंडल" ।
श्री जगदीश शर्मा
समाजसेवी
गोलाघाट