10/08/2025
पौलस्त्यहिन्ध ( हिंस्र ) ज्ञत विहित समिन्कर्मचकपालशेः । श्लाध्यस्त हयानुजोसो मघव मद मुपोमेघनादस्य संख्ये सौमित्रिस्तीबदण्डः प्रतिहरण विधेर्य प्रतीहार आसीत ।। 2 ।।
भोज की ग्वालियर प्रशस्ति के इस श्लोक के अनुसार प्रतिहार वंश का सम्बंध पौलतस्य के पौत्र रावण का वध करने वाले श्रीराम के छोटे भाई सुमित्रपुत्र सौमित्र लक्ष्मण के वंसज है । प्रतिहार का वास्तविक अर्थ द्वारपाल है, भगवान राम के वनवास के समय अपने भाई भाभी के द्वारपाल बनने के कारण लक्ष्मणजी का एक अन्य नाम प्रतिहार पड़ा, और उनके वंशजों ने उसी प्रतिहार गौरव उपाधि को अपनाया । लक्ष्मण प्रभु के प्रतिहार बने, और लक्ष्मण के वंसज भारत माता के प्रतिहार बनें ।
प्रतिहारो का मूल स्थान एवं उनके साथ गुर्जर शब्द जुड़ने का कारण
प्रतिहारो का मूलस्थान मूलप्रदेश उज्जैयिनी- मालवा नहीं , अपितु अर्बुदगिरि (आबू पर्वत) सहित भीनमाल ( भिल्लमाल) – जालौर का प्रदेश था । ह्वेनसांग के भारत – भ्रमण करने से पहले ही यह क्षेत्र ‘ गुर्जर ‘ नाम से प्रसिद्ध हो गया था । प्रतिहार सत्ता का प्रारम्भ मण्डौर-मेड़ता से हुआ , जो उन दिनों ‘मरु-मांड ‘ कहलाता था ।
जब प्रतिहारो की एक शाखा मंडोर से जालौर आई तब प्रतिहारो को उनके समकालीन लोग गुर्जर कहने लगे और यही लोग जब स्थानान्तरित होकर कन्नौज आये तब गुर्जर – प्रतिहार नाम से विख्यात हुए ।
साम्राज्य की उन्नतिकाल में अन्हिलवाड़ापट्टन के चालुक्यों ने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर गुर्जर देश या गुजरत्रा का स्वामित्व ग्रहण किया । तभी से गुर्जर नाम उनके लिए प्रयुक्त होने लगा ।
तुर्को द्वारा चालुक्यों की सत्ता समाप्त कर दिये जाने पर दिल्ली सुलतानों के प्रतिनिधि भी गुर्जर कहलाने लगे ।
कहने का तात्पर्य यह कि प्रतिहार , चालुक्य और तुर्कों के साथ गुर्जर शब्द जुड़ने का कारण उनका गुर्जर नामक पर शासन करना था । गुर्जर क्षत्रियों के अतिरिक्त गुर्जर ब्राह्मणों और गुर्जर वैश्यों के उदाहरण क्रमशः स्कन्दपुराण तथा अभिलेखों में मिलते हैं ।
🙏🙏🙏🙏प्रतिहारो का वंश परिचय
भारतीय इतिहासकारो के अनुसार 600ईस्वी से 1200 ईस्वी तक का काल राजपूत काल माना जाता है । प्रतिहार भी खुद का परिचय क्षत्रिय राजपूत के रूप में ही देते है, लेकिन कुछ अगड़म बगड़म इतिहासकारो के कारण एक भरम की स्तिथि उतपन्न हो गयी गई है, की राजपूत नवीन शब्द है , जबकि राजपूत नवीन नही, वैदिककालीन शब्द है …
राजपूत शब्द की प्राचीनता
राजपूत शब्द संस्कृत के ‘ राजपुत्र ‘ का अपभ्रश है । प्राचीन भारत में राजपुत्र शब्द का प्रयोग क्षत्रिय राजकुमारों के लिए होता था ।
शासक वर्ग से सम्बन्धित होने के कारण क्षत्रिय लोग राजकुमार , महाराजकुमार , राजपुत्र अथवा महाराजपुत्र की उपाधिों से सम्बोधित किये जाते थे ।
पं ० गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा ने अर्थशास्त्र ( कौटिल्य ),सौन्दरानन्द ( अश्वघोप ) , मालविकाग्निमित्र ( कालिदास ) , हर्षचरित और कादम्बरी ( बाण ) आदि ग्रंथों में प्रयुक्त राजपुत्र ‘ शब्द का उल्लेख किया है ।
उन्होंने अभिलेखों में भी ‘ राजपुत्र ‘ का उल्लेख ढूँढ निकाला है । वि ० सं ० 1287 के तेजपाल मंदिर अभिलेख में ‘ राजपुत्र ‘ ,वम्हनी के वाघदेव प्रतिहार अभिलेख तथा वि०सं ०1344 ( 1287 ई ० ) के हिण्डोरिया ( जिला दमोह ) अभिलेख में चन्देल हम्मीरवर्मा के महासामन्त को ” महाराजपुत्र कहा गया है ।
हर्षवर्धन काल में भारत भ्रमण करने वाले चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग ( 629-17 ई ० ) ने ‘ राजपूत ‘ शब्द के स्थान पर राजाओं को ,’ क्षत्रिय ‘ ही कहा है । इस प्रकार ‘ राजपुत्र ‘ शब्द का प्रयोग अनेक शिलालेखों में मिलता है ।
प्रमाण स्रोत्र
एते रुक्मरथानाम ‘ राजपुत्रा ‘ महारयाः । रयेष्वस्त्रेषु नागेषु च विशापते ।। महाभारत 7. 112. 2 ( महाभारत में भी राजपूत शब्द प्रयोग में आया है )
भालिभाडा प्रभृति ग्रामेषु संतिठमान श्री प्रतिहारवंशीय सर्वराजपुत्रश्च । (1287 विक्रम संवत के तेजपाल मंदिर अभिलेख में प्रतिहारो को राजपुत्रः अर्थात राजपूत ही बताया गया है । )
एपि ० इण्डि ० , खण्ड 16 , पृ ० 10 टिप्पणी 4 ; वही , खण्ड 20. पृ ० 135 ( बाघदेव प्रतिहार अभिलेख में जो 1287ईस्वी का है, उस अभिलेख में प्रतिहारो को राजपुत्रः उर्फ राजपूत ही कहा गया है ।
इक्रिप्सन्स सी ० पी ० एण परार , पृ ० 56 ( हिंडोरिया ( जिला – दमोहा ) अभिलेख में चंदेल शासक हम्मीरवर्मा को महाराजपुत्रः अर्थात महाराजपुत कहा गया है । महाराजपुत्रः से स्पष्ठ है, क्षत्रिय राजाओ की संतानों को राजपुत्रः उर्फ राजपूत ही कहा जाता था। आज भी हम सामान्य लोकक्ति से ही इतिहास का पता कर सकते है । भारतीय संस्कृति में एक कहावत प्रचलित है ” पूत के पग पालने में ही दिख जाते है ” । यहां पुत्र का अपभ्रंस ही पूत है । जब एक सामान्य से वाक्य में पुत्र को पूत कहा गया है, तो फिर राजाओ के पुत्र राजपुत्रो को क्या कहा जायेगा ? सामान्य चिंतक भी इस गुत्थी को सुलझा सकता है, की राजपूत ही वैदिक कालीन क्षत्रिय है ।
कुल मिलाकर इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है की राजपूत शब्द संस्कृत के राजपुत्रः शब्द का ही अपभ्रंस है । भगवान राम का नाम संस्कृत में ” रामः ” इस तरह लिखा जाता है , जिसका संस्कृत में उच्चार करते समय जिव्हा से राम+ह् ऐसी ध्वनि निकलती है, लेकिन आज प्रत्येक भारतीय भगवान राम का नाम रामह की जगह राम , रामा, आदि ही लेते है । जिस तरह अंत का स्वर राम से हटा दिया गया, वही हाल राजपुत्रः शब्द का हुआ, पृथ्वीराज चौहान जी के समय से हिंदी अवधि जैसी प्राकृत भाषाओं का प्रचलन शुरू हुआ था, जिसके कारण राजपुत्रः या क्षत्रिय कहा जाने लगा ।
🙏🙏🙏प्रतिहार राजपुत्रः (राजपूत )जाति है ।
वि०सं ० 872(815 ई ०) से वि०सं० की चौदहवीं शताब्दी तक के प्रतिहारो के जितने भी अभिलेख प्राप्त हुए हैं , उनमें से किसी में भी इन्हें अग्निवंशी नहीं स्वीकार किया गया ।
भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में उन्हें सूर्यवंशी बताया गया है –
मन्विज्ञाककुस्थ ( स्थ ) मूल पृथवः स्मापालकल्पद्रुमा तेपां वंशे सुजन्मा क्रमनिहतपदे धाम्नि वजेपु घोरं , राम पौलस्त्यहिन्ध ( हिंस्र ) ज्ञत विहित समिन्कर्मचकपालशेः । श्लाध्यस्त हयानुजोसो मघव मद मुपोमेघनादस्य संख्ये सौमित्रिस्तीबदण्डः प्रतिहरण विधेर्य प्रतीहार आसीत ।। 2 ।।
भोज की ग्वालियर प्रशस्ति के इस श्लोक के अनुसार प्रतिहार वंश का सम्बंध पौलतस्य के पौत्र रावण का वध करने वाले श्रीराम के छोटे भाई सुमित्रपुत्र सौमित्र लक्ष्मण के वंसज है । प्रतिहार का वास्तविक अर्थ द्वारपाल है, भगवान राम के वनवास के समय अपने भाई भाभी के द्वारपाल बनने के कारण लक्ष्मणजी का एक अन्य नाम प्रतिहार पड़ा, और उनके वंशजों ने उसी प्रतिहार गौरव उपाधि को अपनाया । लक्ष्मण प्रभु के प्रतिहार बने, और लक्ष्मण के वंसज भारत माता के प्रतिहार बनें ।
प्रतिहारो का मूल स्थान एवं उनके साथ गुर्जर शब्द जुड़ने का कारण
प्रतिहारो का मूलस्थान मूलप्रदेश उज्जैयिनी- मालवा नहीं , अपितु अर्बुदगिरि (आबू पर्वत) सहित भीनमाल ( भिल्लमाल) – जालौर का प्रदेश था । ह्वेनसांग के भारत – भ्रमण करने से पहले ही यह क्षेत्र ‘ गुर्जर ‘ नाम से प्रसिद्ध हो गया था । प्रतिहार सत्ता का प्रारम्भ मण्डौर-मेड़ता से हुआ , जो उन दिनों ‘मरु-मांड ‘ कहलाता था ।
जब प्रतिहारो की एक शाखा मंडोर से जालौर आई तब प्रतिहारो को उनके समकालीन लोग गुर्जर कहने लगे और यही लोग जब स्थानान्तरित होकर कन्नौज आये तब गुर्जर – प्रतिहार नाम से विख्यात हुए ।
साम्राज्य की उन्नतिकाल में अन्हिलवाड़ापट्टन के चालुक्यों ने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर गुर्जर देश या गुजरत्रा का स्वामित्व ग्रहण किया । तभी से गुर्जर नाम उनके लिए प्रयुक्त होने लगा ।
तुर्को द्वारा चालुक्यों की सत्ता समाप्त कर दिये जाने पर दिल्ली सुलतानों के प्रतिनिधि भी गुर्जर कहलाने लगे ।
कहने का तात्पर्य यह कि प्रतिहार , चालुक्य और तुर्कों के साथ गुर्जर शब्द जुड़ने का कारण उनका गुर्जर नामक पर शासन करना था । गुर्जर क्षत्रियों के अतिरिक्त गुर्जर ब्राह्मणों और गुर्जर वैश्यों के उदाहरण क्रमशः स्कन्दपुराण तथा अभिलेखों में मिलते हैं ।
राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार पंडित गौरीशंकर हीरानंद ओझा के मतानुसार प्रतिहार क्षत्रिय राजपूत ही है । प्रतिहारो के काल मे गुर्जर जाति नही, बल्कि स्थानसूचक उपाधि थी, जैसे भारत मे रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारतीय है, चाहे वह किसी भी मान्यता या संस्कृति से संबंध रखता हो । आधुनिक इतिहासकारो ने प्रतिहारो को गुजर मान लिया है, जो मात्र उनका भरम है ।
क्या यही उदाहरण पर्याप्त नही है यह साबित करने के लिए की प्रतिहार वास्तव में राजपूत क्षत्रिय है, मिहिरभोज प्रतिहार राजपूत कुलभूषण है । और मिहिरभोज की गद्दी के उत्तराधिकारी प्रतिहार राजपूत ही है ??
मिहिरभोज प्रतिहार कौन था ?
मिहिरभोज प्रतिहार नागभट्ट प्रतिहार द्वितीय का पौत्र थे, इस वंश का आधुनिक काल मे मूलपुरुष नागभट्ट प्रथम है ।नागभट्ट का वास्तविक नाम नाहड़राय है । नागभट्ट प्रतिहारो की जालौर शाखा से थे, जिनका कार्यकाल ईस्वी संवत 730-756 का रहा है । मूहम्मद बिन कासिम के बाद मुल्तान के गर्वनर जुनैद ने भिल्लमाल, जालौर आदि क्षेत्र को जीत लिया, तो यहब पीछे नागभट्ट प्रतिहार ने ही धकेला ।
नागभट्ट की मृत्यु के बाद उनका पुत्र कुकस्थ गद्दी पर बैठा, इन्हें भी प्रतिहारो की कीर्ति बढ़ाने वाला राजा ही कहा गया है ।
कुकुस्थ के बाद देवराज और देवराज के बाद वत्सराज प्रतिहार ( 775ईस्वी-800ईस्वी) राज्यगद्दी पर विराजमान हुए
ग्वालियर प्रशस्ति के अनुसार वत्सराज प्रतिहार इस वंश का महाप्रतापी शासक हुआ, बाउक अभिलेख के अनुसार वत्सराज ने भाटी राजपूतो को परास्त किया,
वत्सराज प्रतिहार की कीर्ति उस समय बुंलन्दी पर पहुंच गई, जब उन्होंने भारत के सबसे शक्तिशाली और प्रतापी राजाओ ने शुमार गौड़ राजा धर्मपाल को युद्ध मे बड़ी बुरी तरह परास्त किया ।। वत्सराज ने धर्मपाल पर आक्रमण कर बड़ी आसानी से विजय प्राप्त करते हुए धर्मपाल के राजचिन्ह एवं राजछत्र तक को छीन लिया ।
वत्सराज की राष्ट्रकूटों से पराजय
राष्ट्रकूट( वर्तमान में राठौड़ एवं रेड्डी ) नरेश ध्रुव वत्सराज का समकालिक था । गोविन्द तृतीय के वनि – दिन्दोरी और गधनपुर अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उसने वत्सराज को पराजित कर मरुदेश(राजस्थान) में शरण लेने को विवश किया । इतना ही नहीं उसने वत्सराज के यश के साथ ही उन दो राजछत्रों को भी छीन लिया ।। जिन्हें उसने गौड़राज से विजयश्री के रूप में प्राप्त किया था । वत्सराज ने ज्वालापुर ( जालोर ) के अपने पुराने सत्ता क्षेत्र में आश्रय लिया । जैन ग्रंथ कुवलयमाल ‘ में वहां उसके राज्य करने का उल्लेख मिलता है । ध्रुव के प्रत्यावर्तन के साथ ही गौड़ नरेश धर्मपाल नै प्राय : सम्पूर्ण उत्तर भारत को रौंद कर इन्द्रायुध के स्थान पर चक्रायुध को कन्नौज का राजा बनाया । उज्जयिनी के प्रतिहारो के लिए ये कठिन परीक्षा के दिन थे ,जिसकी चुनौती वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने सहर्ष स्वीकार की ।
नागभट्ट प्रतिहार 800ई- 833ईस्वी ( प्रतिहारो का उगता सूर्य )
नागभट्ट प्रतिहार वत्सराज का पुत्र था, जिस समय प्रतिहार राठौड़ो के सामने अपना अस्तित्व हारने के कगार पर पहुंच चुके थे, उसी समय नागभट्ट ने प्रतिहारो की कमान संभाली थी । मिहिरभोज की ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट द्वितीय की कीर्ति की सविस्तार वर्णन है । मिहिरभोज की ग्वालियर प्रशस्ति के अनुसार नागभट्ट ने भारत का दक्षिण क्षेत्र , सिंध ( पाकिस्तान ) , विदर्भ , अंग और कलिंग ( बिहार, बंगाल, उड़ीसा ) के राजाओ को अपने अधीन कर किया ।
प्रतिहारो का राष्ट्रकूटों से दुबारा पराजित होना
नागभट्ट के समय तक राष्ट्रकूटों की गद्दी गोविंद तृतीय के पास थी, अपने पिता ध्रव की भांति गोविंद भी बड़ा प्रतापी राजा था, उन्होंने उत्तरभारत मे कई सैनिक अभियान चलाए । अमोघवर्ष के पथरी स्तम्भ अभिलेख के अनुसार ” राष्ट्रकूट राजा गोविंद तृतीय ने गौड़ राजा धर्मपाल के साथ मिलकर नागभट्ट प्रतिहार को युद्ध मे बड़ी बुरी तरह परास्त किया, यह युद्ध बुंदेलखंड में लड़ा गया था । बाद में गोविंद ने धर्मपाल को भी परास्त किया ।
बुचकला अभिलेख के अनुसार गोविंद के शिथिल पड़ते ही नागभट्ट द्वितीय ने बड़ी सेना लेकर कंन्नोज को घेर लिया, ओर गोविंद से साथी शासक चक्रायुद्ध को कन्नौज से मार भगाया । यह नागभट्ट की गोविंद को सीधी चुनोती थी, कन्नौज पर अधिकार करने नागभट्ट ने महाराजधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की थी ।मूल पुरुष तीव्र दंड देने में विख्यात थे, जिन राम ( सूर्यवँशी ) ने पौलतस्य वंश का नाश किया था, में उन्ही के छोटे भाई सुमित्रानंदन , अपने बड़े भाई श्रीराम के द्वारपाल ( द्वारपाल संस्कृत अर्थ प्रतिहार ) लक्ष्मण जी का वंसज हूँ ।।
इतना कहने के बाद कोई भी भारतीय समझ सकता है, की प्रतिहार सूर्यवँशी है ।। भगवान राम के भाई लक्ष्मणजी श्रीराम के वनवास काल मे उनके साथ थे, ओर श्रीराम के विश्राम के समय वें द्वारपाल की भूमिका में रहकर श्रीराम की सुरक्षा करते थे ।। द्वारपाल को संस्कृत में प्रतिहार भी कहा जाता है, इसी कारण लक्षमण जी का ही दूसरा नाम प्रतिहार हो गया ।।
एक उदाहरण समझें — राजपूतो में राव शेखाजी के वंसज शेखावत लगाते है, शेखावत में ” शेखा ” नाम ” महाराज श्रीशेखाजी का है । जेता कुम्पा राठोड़ जी आदि के वंसज अपने पूर्वजो की स्मृति में खुद को कुम्पावत, जेतावत कहते ही है । ठीक इसी तरह लक्ष्मण जी के प्रतिहार नाम पर, उनका एक वंश चला, जिसने अपनी पहचान लक्ष्मणजी के नाम से ही रखी । लक्ष्मणजी श्रीराम के प्रतिहार थे, और लक्ष्मणजी के वंसज क्षत्रिय #भारतमाताके_प्रतिहार बनें ।। प्रतिहारो ने 300 सालों तक भारत की रक्षा पंक्ति को इतना जबरदस्त बनाएं रखा, की किसी विदेशी परिंदे के पर भी भारत मे नही पड़े ।
भारत का इतिहास इतना विशाल है की अगर मात्र वँशवली का इतिहास ही आज तक मैनेज रखा जाता, तो किताबो लाइबेरी के लिए ही एक अलग से राज्य चाहिए होता, जहां मात्र किताबें होती, किसी इंसान के पांव रखने की जगह नही होती ।। लक्ष्मणजी के बाद लाखो सालों मे कितने भौगोलिक, राजनीतिक ओर सांस्कृतिक परिवर्तन हुए होंगे, ऐसे में पूरी वंशवाली मिलना तो नामुमकिन ही है ।। लेकिन इसके बाद भी इतने आक्रमणों के बीच राजपूत जितनी अपनी वंशवाली , इतिहास बचा सकते थे, उन्होंने भरपूर प्रयास किया ।।
प्रतिहार वंश का मूल पुरुष नागभट्ट प्रथम को माना जाता है । 730-756 ईस्वी के बीच इनका कार्यकाल रहा है। अरबो ने आठवीं शताब्दी के आरम्भ में मुल्तान को पूरी तरह जीत लिया था, ओर सिंध का सुल्तान( राज्यपाल) जुनैद बना । जुनैद ने मालवा , भड़ोच , उज्जैन आदि पर आक्रमण किये, ओर बहुत बड़ी सफलता भी प्राप्त की । इस बेहद बड़े और खतरनाक आक्रमण को और ज़्यादा आगे बढ़ने से रौकने के लिए नागभट प्रथम ने प्रस्थान किया, ओर जुनैद को रगेदकर मारा । यह वह समय है, जब चौहान प्रतिहारो के सामन्त हुआ करते थे ।। भड़ोच आदि को जुनैद ने जीत लिया था, लेकिन नागभट्ट ने उन्हें खदेड़कर पुनः हिन्दू पताका फहरा दिया ।।
इन्ही नागभट के वंश में उनके कार्यकाल के लगभग 100 साल बाद उसी गद्दी पर बैठे मिहिरभोज प्रतिहार, मिहिरभोज महान विजेता नागभट्ट द्वितीय के पौत्र और रामभद्र के पुत्र थे । मिहिरभोज की माता का नाम अप्पा देवी था ।
लेख संदर्भ
पुस्तक इलियट एंड डाउसन हिस्ट्री ऑफ इंडिया खण्ड 1 पेज संख्य 4
राजपूताने का इतिहास 61
राजस्थान का इतिहास (हिंदी) पेज -954
परिहाररवंश मुंशी देवी प्रसाद पेज – 908
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