08/04/2026
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ…
आज अब्बू को हमसे जुदा हुए पूरा एक साल गुजर गया…
मगर दिल आज भी इस हक़ीक़त को मानने को तैयार नहीं…
कभी-कभी यूं लगता है जैसे अभी दरवाज़ा खुलेगा…
आप उसी प्यारी मुस्कुराहट के साथ अंदर आएंगे…
और हमेशा की तरह कहेंगे — “क्या हाल है बेटा?”
आपकी आवाज़ आज भी कानों में गूंजती है अब्बू…
आपकी हर बात, हर नसीहत, हर अंदाज़…
आज भी हमारी ज़िंदगी का हिस्सा है…
कुरआन-ए-पाक फरमाता है:
“كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ”
हर जान को मौत का स्वाद चखना है…
बस यही हक़ीक़त हमें सब्र देती है कि ये दुनिया फानी है…
और हर किसी को एक दिन अपने रब के पास लौट जाना है…
अब्बू…
आप सिर्फ़ हमारे बाप नहीं थे…
आप एक मुकम्मल शख्सियत थे…
आप आलीम-ए-दीन थे… मिल्लत-परस्त थे…
आपकी ज़ुबान में मिठास थी, दिल में मोहब्बत थी…
आप हर किसी को अपना बना लेते थे…
ना आपने कभी किसी में छोटा-बड़ा देखा, ना मज़हब-जात का फ़र्क…
आप हिंदू-मुस्लिम एकता की एक जीती-जागती मिसाल थे…
आज भी जब कहीं इंसाफ़ की बात होती है…
आप याद आते हैं…
जब भी किसी गरीब, मज़लूम की आह सुनाई देती है…
दिल आपको ढूंढने लगता है…
क्योंकि आपने ही तो सिखाया था—
“बेटा, इंसान वही है जो दूसरों के काम आए…”
अब्बू…
आप हमारी ताक़त थे… हमारी हिम्मत थे…
आप वो साया थे, जिसके नीचे ना जाने कितने लोग सुकून और अमन पाते थे…
आज भी जब तन्हाई मिलती है…
तो यादों का कारवां चल पड़ता है—
वो उंगली पकड़कर चलना सिखाना…
वो हल्की सी डांट के बाद सीने से लगा लेना…
वो रातों को हमारी फिक्र में जागते रहना…
वो हर छोटी खुशी में बच्चों की तरह खुश हो जाना…
अब्बू… आप सिर्फ़ एक बाप नहीं थे…
आप मेरे हीरो थे… मेरी पहचान थे…
मेरे Inspiration… मेरे cicerone (राह दिखाने वाले)…
आपकी सादगी… आपकी शफकत… आपकी मीठी ज़ुबान…
हर मज़हब, हर जात, हर तबके के लोगों को साथ लेकर चलने का आपका अंदाज़…
गरीबों और मज़लूमों के लिए आपका दर्द…
ये सब कुछ आज भी हमें रुला देता है… और गर्व भी दिलाता है…
अब्बू… आपकी कमी सिर्फ़ एक कमी नहीं…
ये एक ऐसा खालीपन है जो हर सांस में महसूस होता है…
चलते-फिरते… हंसते-खेलते…
यहां तक कि सजदे में भी दिल से बस एक ही सदा निकलती है—
“काश… आज अब्बू होते…”
मगर इस दर्द के साथ एक फ़ख्र भी है…
फ़ख्र इस बात का कि हम एक ऐसे बाप के बेटे हैं…
जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी तालीम, बराबरी और इंसाफ़ के लिए वक़्फ़ कर दी…
जिन्होंने नाइंसाफ़ी, जात-पात और ज़ुल्म के खिलाफ डटकर आवाज़ उठाई…
और हमें सिखाया कि इस्लाम अद्ल और बराबरी का पैग़ाम देता है…