01/06/2026
*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 1.6.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, अधिक ज्येष्ठ मास, कृष्ण पक्ष, प्रतिपदा, सोमवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 26.11.1995, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— कोलकाता।
*⚜️ प्रश्न— सत्संगमें बातें सुनते हैं, सब बातें ठीक जँचती भी है, बातें यथार्थ मालूम देती है, फिर भी सुनी हुई बातें ठीक आचरणमें नहीं आ रही है, इसमें कारण क्या है?*
*समाधान— बात यह है कि अभी वास्तविक बातको समझा नहीं है। एक कहावत आती है कि— 'स्वबीती कहें या परबीती।' तो परबीतीसे स्वबीती ज्यादा काम आती है। यह अड़चन मेरे खुदके भी आयी हुई है। सब करते हुए कमी दिख रही है, अनुभव नहीं हो रहा है, आखिर अड़चन कहाँ हैं। पीछे सन्तोंकी कृपासे यह बात समझमें आयी।*
*⚜️ 'ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥' (गीता-5/22)। संयोगजन्य सुखकी आसक्तिके ऊपर ही सब पाप टिके हुए हैं, सुखकी, धनकी, आरामकी, मान-बड़ाईकी कामना ही दुःखोंका कारण है; इनके वशीभूत नहीं होवें, तो सब ठीक हो जाय। सब पापोंका, सम्पूर्ण दुःखोंका, फजीहतका, अपमान-निन्दाका मूल कारण सुखासक्ति ही है। इनके अनुसार क्रिया कर बैठना ही इनके वशीभूत होना है। पारमार्थिक उन्नतिमें संयोगजन्य सुखकी आसक्ति मूल बाधा है। इस वास्ते साधन करते हुए, ठीक समझते हुए असफल हो जाते हैं।*
*⚜️ सुखकी आशासे सुख नहीं मिलता है, सुख तो जितना मिलना है, उतना ही मिलेगा। मिलने वाला सुख पाप, अन्याय नहीं करने पर भी मिलेगा और नहीं मिलने वाला सुख पाप, अन्याय, अत्याचार करने पर भी नहीं मिलता है। जैसे मदिरा पीनेसे आदमी मदांध हो जाता है, वैसे ही सुखकी आशासे मनुष्य पागल हो जाता है, होश नहीं रहता, उस बेहोशीमें मनुष्य पाप, अन्याय कर बैठता है, इसलिए राग-द्वेषके वशीभूत नहीं होना है। राग-द्वेष, काम-क्रोध, ठीक-बेठीक, अनुकूलता-प्रतिकूलता— ये साधककी पारमार्थिक सम्पत्तिको लूटनेवाले लूटेरे हैं।*
*⚜️ मनुष्य परिस्थितियोंको बदलनेकी ही कोशिश करता है, लेकिन परिस्थितियोंको बदलना मनुष्यके हाथमें नहीं है, परिस्थितियोंका सदुपयोग ही मनुष्यके हाथमें है। मनुष्य शरीर परमात्मप्राप्तिके लिए मिला है, तो प्रत्येक परिस्थिति साधन सामग्री है, जिससे उद्देश्यकी पूर्तिमें बाधा लगती हो, ऐसी परिस्थिति भगवान् दे सकते ही नहीं। बस, मनुष्य शरीरके उद्देश्यको पहचाननेकी आवश्यकता है।*
*⚜️ जैसे गाय आँखें मींचकर मालिनकी (सब्जी की) छाबड़ीमें मुँह डालती है, वैसे ही मनुष्य विवेकका निरादर करके लोभवश पापोंमें प्रवृत्त होते हैं। 'भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥' (गीता-2/44)। जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्यों द्वारा परमात्मप्राप्ति तो दूर, परमात्मप्राप्तिकी एक निश्चयात्मिका बुद्धि भी होना मुश्किल होता है। 'अक्लका अधूरा और गाँठका पूरा'— ऐसे मनुष्यका मिलना कठिन होता है।*
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