29/09/2018
भाजपा तथा संघ नेताओं की सोच तथा कार्यप्रणाली को लेकर देश में काफी संदेह व्यक्त किए जा रहे हैं। आलोचक मोदी सरकार तथा संघ की अनुमानित संस्कृति के बारे में जो भी कहें, मेरा मानना है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत की नई दिल्ली में भाषण शृंखला ने भविष्य में भारत के लिए भगवा इकाई हेतु एक नई अवधारणा तय की है। इसने आज के अधिकतर संघ परिवार के नेताओं की सोच तथा कार्यपद्धति को धुंधला कर दिया है जो सार्वजनिक रूप से भाजपाई जोड़ी नरेन्द्र मोदी तथा अमित शाह का महिमामंडन करते हैं।
मोहन भागवत ने तीन दिवसीय कार्यक्रम में कुछ महत्वपूर्ण विचारों का खुलकर तथा दृढ़तापूर्वक व्याख्यान किया जो भाजपा की वर्तमान अल्पसंख्यक विरोधी छवि को मिटाने तथा कुछ गलत अवधारणाओं को सुधारने का एक प्रयास है। प्रारम्भ में उनके भाषण के कुछ पद्यांशों का उल्लेख करना उचित होगा, जो 2019 के बाद भारत को प्रशासित करने के लिए एक ट्रैंड-सैटर हो सकता है। पहले, उन्होंने कहा कि ‘‘हिंदू राष्ट्र का यह अर्थ नहीं कि यहां मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। जिस दिन ऐसा कहा जाएगा, हिंदुत्व का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। हिंदुत्व वसुधैव कुटुम्बकम (सारा विश्व एक परिवार है) की बात करता है।’’
यहां यह जानना रुचिकर होगा कि संघ प्रमुख ने सर सैयद अहमद खान के एक समारोह में दिए भाषण का हवाला दिया जो उनके ‘पहले मुस्लिम बैरिस्टर’ बनने पर उनके सम्मान में आर्य समाज समुदाय ने आयोजित किया था। सर सैयद ने उस समय एक बड़े एकत्र को सम्बोधित करते हुए कहा था ‘‘मैं बहुत दुखी हूं कि आपने मुझे भारत माता के अपने बेटों में से एक नहीं माना...।’’ सैयद अहमद के शब्द न केवल भारतीय मुसलमानों के लिए आंखें खोलने वाले होने चाहिएं बल्कि समाज के उन वर्गों के लिए भी जो ‘भारत की विभाजित सोच’ पर फल-फूल रहे हैं। भागवत ने वास्तव में हर किसी को बताया कि भारतीय विचार के बारे में कैसे सोचना और कैसे उसे अमल में लाना है, जिस पर 1981 तक अविभाजित भारत में अमल किया जा रहा था। तो कैसे और कहां हमसे 1981 के बाद गलती हो गई? इसकी इतिहासकारों की नई पीढ़ी द्वारा जांच तथा उद्देश्यपूर्ण समीक्षा होनी चाहिए।
दूसरे, संघ के पुराने दर्शन पर मोहन भागवत ने कहा कि गुरु एम.एस. गोलवलकर (संघ के दूसरे सरसंघचालक) द्वारा व्यक्त किए गए विचार एक विशेष संदर्भ में दिए गए भाषणों का संग्रह हैं और ये सदा वैध नहीं हो सकते। संघ कट्टर नहीं है। समय बदलता है और उसी के अनुसार हमारे विचार भी बदलते हैं। डा. हेडगेवार ने कहा था कि हम बदलते समय के अनुकूल बनने के लिए स्वतंत्र हैं। यह समझा जा सकता है। वैश्विक तौर पर हमने माक्र्सवाद तथा लेनिनवाद के दर्शन का यूरोपियन देशों में हश्र देखा है जो अपने विचारों को लेकर तब कट्टर थे। यहां तक कि माओवाद भी आज पूंजीवादी रास्ते पर चल रहा है हालांकि इसमें स्वतंत्र विश्व की निजी आजादी तथा स्वतंत्रताएं नहीं हैं।
हमने अपने देश में माक्र्सवाद का हश्र देखा है, जो एक शक्तिशाली दर्शन था। यह अपनी चमक खो चुका है। जहां तक माओवाद की बात है, यह कुप्रशासन तथा जमीनी स्तर पर सुधारों के अभाव की वही पुरानी कहानी का एक हिस्सा है। मुझे अफसोस इस बात का है कि अधिकारी इस तथ्य को नजरअंदाज कर रहे हैं कि नक्सली (माओवादी) हमारे अपने लोग हैं। तीसरे, संघ परिवार के एक वर्ग की सोच के विपरीत मोहन भागवत ने यह स्पष्ट किया है कि ‘संविधान सभी भारतीयों का सर्वसम्मत है और इसके अनुसार चलना सभी का कत्र्तव्य है। मैंने जो कहा, वह संविधान के अनुसार है। संघ संविधान की सर्वोच्चता को स्वीकार करने के बाद कार्य करता है और हम इसका पूर्ण सम्मान करते हैं।’ यह एक ऐसे संगठन की विचारधारा में एक बड़े बदलाव का संकेत है जो आम तौर पर 1976 में संविधान में शामिल किए गए ‘धर्मनिरपेक्षता’ तथा ‘समाजवाद’ शब्दों को लेकर अपना संदेह व्यक्त करता था।
चौथे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिए गए ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के स्टैंड के बिल्कुल विपरीत संघ प्रमुख ने वास्तविकता तथा खुले दिल से कांग्रेस की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका को स्वीकार किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि ‘हम सर्व-समाहित भारत का विचार रखते हैं न कि ‘मुक्त’ का।’इस संदर्भ में मोहन भागवत ने कहा कि संघ अपनी विचारधारा लोगों अथवा राजनीतिक दलों पर थोपने में रुचि नहीं रखता और न ही यह किसी को रिमोट कंट्रोल कर रहा है। संंघ प्रमुख की टिप्पणी ने इन ङ्क्षचताओं का निराकरण करने का भी प्रयास किया कि मोदी सरकार को नागपुर से नियंत्रित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ‘आमतौर पर लोग आशंका व्यक्त करते हैं कि नागपुर (संघ मुख्यालय) से कोई कॉल अवश्य किसी विशिष्ट निर्णय (सरकार का) के लिए होगी। यह आधारहीन है। वे (भाजपा नेता) न तो हमारी सलाह पर निर्भर करते हैं और न ही हम उन्हें देते हैं। अगर उन्हें किसी सुझाव की जरूरत होती है और यदि हमारे पास कुछ देने के लिए होता है तो हम देते हैं।’
इतिहास को देखते हुए मोहन भागवत के दावे को पचाना कठिन है, यद्यपि भाजपा की मोदी-अमित शाह जोड़ी अपने तौर पर स्वतंत्र कार्य करने के लिए जानी जाती है, इसने हाल के वर्षों में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर संघ की सलाह को नजरअंदाज किया है। मेरा स्टैंड काल्पनिक नहीं है, बल्कि संघ परिवार की भीतरी गतिविधियों पर आधारित है। जो भी हो, कौन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर प्रश्न उठा सकता है, जिन्होंने अपनी एक बहुत बड़ी राजनीतिक छवि बना ली है। मैंने पाठकों के साथ संघ की नई विचारधारा को केवल इस उद्देश्य के साथ सांझा किया है कि उन्हें जनता के सामने रखा जाए।
संघ के ये विचार अब जमीनी स्तर पर जनता की अदालत में परखे जाएंगे। मोहन भागवत के लिए सफलता की कामना। उन्होंने कम से कम संघ कार्यकत्र्ताओं द्वारा गौ रक्षा के नाम पर दूषित किए गए देश के माहौल, जो हिंदुत्व के नाम पर कानून को भी अपने हाथ में ले लेते हैं, विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में, के बीच नए विचारों के साथ आगे आने की बड़ी हिम्मत दिखाई है। यह भाजपा प्रशासन की गुणवत्ता की खामियां प्रतिबिंबित करता है। मुझे दुख इस बात का है कि संघ परिवार के अधिकतर नेता हिंदूवाद को पूरी तरह से नहीं समझते या आप इसे हिंदुत्व भी कह सकते हैं। यह एक असहनशील मत नहीं है। यह सहनशीलता की अपनी उदार जड़ों तथा अन्य मतों की समझ से शक्ति प्राप्त करता है। यह दर्शन के साथ-साथ कार्य में भी लचकदार है। एक तरह से यह व्यक्ति के मतभेद के अधिकार को स्वीकार करता है, बशर्ते असहमति को तार्किक रूप से पेश किया जाए।
दरअसल मैं पूरी विनम्रता के साथ कहूंगा कि ङ्क्षहदू दर्शन उदार, प्रगतिशील तथा धर्मनिरपेक्ष है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ मजहब नहीं होता। इसे धार्मिक सहनशीलता की भावना को पारस्परिक सम्मान तथा समझ के आधार पर प्रतिङ्क्षबबित करना होता है जो हिंदूवाद के वैश्विक चरित्र का आधार हैं। मेरा एकमात्र सुझाव यह है कि कृपया सितम्बर 1893 को पार्लियामेंट आफ रिलीजन्स में दिए गए स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण को पढें तो आपको हिंदूवाद की वास्तविक ताकत बारे पता चलेगा और भाग्यवश प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में विवेकानंद की कसमें खाते हैं। लोगों के सामने अब वास्तविक चुनौती जमीनी स्तर पर वायदों तथा कार्रवाइयों का ईमानदारीपूर्वक परीक्षण है। इस बीच मैं मोहन भागवत द्वारा हिंदुत्व के संघ ब्रांड पर नई रोशनी डालने के लिए उनको सलाम करता हूं जो आज भारत की जरूरत है।-हरि जयसिंह