बहुजन मुक्ति पार्टी धर्मशाला

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बहुजन मुक्ति पार्टी धर्मशाला इस बार हिमाचल में बहुजन मुक्ति पार्टी

09/10/2018

क्या चुनाव आयोग भाजपा का चुनाव प्रभारी बन गया है?

29/09/2018

पाक के हाईकोर्ट में मनाई गई भगत सिंह की जयंती, कहा-ब्रिटिश क्वीन मांगें माफी
Bhagat singh's 111th birth anniversary observed in Pakistan

लाहौरः पाकिस्तान में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारियों में एक भगत सिंह की 111वीं जयंती मनाई गई। शुक्रवार को लाहौर में भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन ने हाईकोर्ट के डेमोक्रेटिक हॉल में कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें कई निर्वाचित प्रतिनिधि पहुंचे और भगत सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की। बता दें कि आम तौर पर पाकिस्तानी किसी भारतीय क्रांतिकारी नेता का सम्मान नहीं करते।

श्रद्धांजलि सभा में दो प्रस्ताव भी पारित किए गए। पहले में भगत सिंह को फांसी देने के लिए ब्रिटिश महारानी से भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों से माफी मांगने की मांग की गई और दूसरे में उनकी याद में सिक्के और डाक टिकट जारी करने की मांग की गई।

भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष इम्तियाज राशिद कुरैशी ने कहा कि पाकिस्तान सरकार को स्कूल पाठ्यक्रम में भगत सिंह की कहानी शामिल करनी चाहिए और उन्हें उनके पराक्रम के लिए देश का शीर्ष नागरिक सम्मान दिया जाना चाहिए।

29/09/2018

👉800 साल मुगलों का राज रहा, 200 साल अंग्रेजों का राज रहा, 68 साल कांग्रेस का राज रहा, इतने सालों तक हिन्दू महफूज रहे ओर अचानक बीजेपी के 3 सालों मे ही हिन्दू खतरे में आ गये.. जबकि भारत का राष्ट्रपति ओर प्रधानमंत्री हिन्दू हैं, कश्मीर छोड बाकी सभी राज्यों के मुख्य मंत्री हिन्दू हैं, भूमि-वायु-नौसेना तीनो दल के प्रमुख हिन्दू हैं, सभी राज्यों के कलक्टर ओर पुलिस कमिश्नर हिन्दू हैं, RAW, NIA, CBI के अध्यक्ष हिन्दू हैं...
फिर भी अंधे भगत मेसेज करते हे हिन्दू खतरे मे हे, हिन्दू खतरे मे हे !!!
अरे भाई जरा सोचो हिन्दू खतरे मे नही खतरे मे तो भाजपा हे जो अपनी कुर्सी बचाने के लिये धर्म को बदनाम कर रहे हे , अगर इन्होने कुछ काम किया होता विकास किया होता तो उसी के आधार पर वोट मांगते, पर ये वोट मांग रहे हे हिन्दू मुसलीम पे.🤔🤔🤔

29/09/2018

भाजपा तथा संघ नेताओं की सोच तथा कार्यप्रणाली को लेकर देश में काफी संदेह व्यक्त किए जा रहे हैं। आलोचक मोदी सरकार तथा संघ की अनुमानित संस्कृति के बारे में जो भी कहें, मेरा मानना है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत की नई दिल्ली में भाषण शृंखला ने भविष्य में भारत के लिए भगवा इकाई हेतु एक नई अवधारणा तय की है। इसने आज के अधिकतर संघ परिवार के नेताओं की सोच तथा कार्यपद्धति को धुंधला कर दिया है जो सार्वजनिक रूप से भाजपाई जोड़ी नरेन्द्र मोदी तथा अमित शाह का महिमामंडन करते हैं।

मोहन भागवत ने तीन दिवसीय कार्यक्रम में कुछ महत्वपूर्ण विचारों का खुलकर तथा दृढ़तापूर्वक व्याख्यान किया जो भाजपा की वर्तमान अल्पसंख्यक विरोधी छवि को मिटाने तथा कुछ गलत अवधारणाओं को सुधारने का एक प्रयास है। प्रारम्भ में उनके भाषण के कुछ पद्यांशों का उल्लेख करना उचित होगा, जो 2019 के बाद भारत को प्रशासित करने के लिए एक ट्रैंड-सैटर हो सकता है। पहले, उन्होंने कहा कि ‘‘हिंदू राष्ट्र का यह अर्थ नहीं कि यहां मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। जिस दिन ऐसा कहा जाएगा, हिंदुत्व का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। हिंदुत्व वसुधैव कुटुम्बकम (सारा विश्व एक परिवार है) की बात करता है।’’

यहां यह जानना रुचिकर होगा कि संघ प्रमुख ने सर सैयद अहमद खान के एक समारोह में दिए भाषण का हवाला दिया जो उनके ‘पहले मुस्लिम बैरिस्टर’ बनने पर उनके सम्मान में आर्य समाज समुदाय ने आयोजित किया था। सर सैयद ने उस समय एक बड़े एकत्र को सम्बोधित करते हुए कहा था ‘‘मैं बहुत दुखी हूं कि आपने मुझे भारत माता के अपने बेटों में से एक नहीं माना...।’’ सैयद अहमद के शब्द न केवल भारतीय मुसलमानों के लिए आंखें खोलने वाले होने चाहिएं बल्कि समाज के उन वर्गों के लिए भी जो ‘भारत की विभाजित सोच’ पर फल-फूल रहे हैं। भागवत ने वास्तव में हर किसी को बताया कि भारतीय विचार के बारे में कैसे सोचना और कैसे उसे अमल में लाना है, जिस पर 1981 तक अविभाजित भारत में अमल किया जा रहा था। तो कैसे और कहां हमसे 1981 के बाद गलती हो गई? इसकी इतिहासकारों की नई पीढ़ी द्वारा जांच तथा उद्देश्यपूर्ण समीक्षा होनी चाहिए।

दूसरे, संघ के पुराने दर्शन पर मोहन भागवत ने कहा कि गुरु एम.एस. गोलवलकर (संघ के दूसरे सरसंघचालक) द्वारा व्यक्त किए गए विचार एक विशेष संदर्भ में दिए गए भाषणों का संग्रह हैं और ये सदा वैध नहीं हो सकते। संघ कट्टर नहीं है। समय बदलता है और उसी के अनुसार हमारे विचार भी बदलते हैं। डा. हेडगेवार ने कहा था कि हम बदलते समय के अनुकूल बनने के लिए स्वतंत्र हैं। यह समझा जा सकता है। वैश्विक तौर पर हमने माक्र्सवाद तथा लेनिनवाद के दर्शन का यूरोपियन देशों में हश्र देखा है जो अपने विचारों को लेकर तब कट्टर थे। यहां तक कि माओवाद भी आज पूंजीवादी रास्ते पर चल रहा है हालांकि इसमें स्वतंत्र विश्व की निजी आजादी तथा स्वतंत्रताएं नहीं हैं।

हमने अपने देश में माक्र्सवाद का हश्र देखा है, जो एक शक्तिशाली दर्शन था। यह अपनी चमक खो चुका है। जहां तक माओवाद की बात है, यह कुप्रशासन तथा जमीनी स्तर पर सुधारों के अभाव की वही पुरानी कहानी का एक हिस्सा है। मुझे अफसोस इस बात का है कि अधिकारी इस तथ्य को नजरअंदाज कर रहे हैं कि नक्सली (माओवादी) हमारे अपने लोग हैं। तीसरे, संघ परिवार के एक वर्ग की सोच के विपरीत मोहन भागवत ने यह स्पष्ट किया है कि ‘संविधान सभी भारतीयों का सर्वसम्मत है और इसके अनुसार चलना सभी का कत्र्तव्य है। मैंने जो कहा, वह संविधान के अनुसार है। संघ संविधान की सर्वोच्चता को स्वीकार करने के बाद कार्य करता है और हम इसका पूर्ण सम्मान करते हैं।’ यह एक ऐसे संगठन की विचारधारा में एक बड़े बदलाव का संकेत है जो आम तौर पर 1976 में संविधान में शामिल किए गए ‘धर्मनिरपेक्षता’ तथा ‘समाजवाद’ शब्दों को लेकर अपना संदेह व्यक्त करता था।

चौथे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिए गए ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के स्टैंड के बिल्कुल विपरीत संघ प्रमुख ने वास्तविकता तथा खुले दिल से कांग्रेस की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका को स्वीकार किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि ‘हम सर्व-समाहित भारत का विचार रखते हैं न कि ‘मुक्त’ का।’इस संदर्भ में मोहन भागवत ने कहा कि संघ अपनी विचारधारा लोगों अथवा राजनीतिक दलों पर थोपने में रुचि नहीं रखता और न ही यह किसी को रिमोट कंट्रोल कर रहा है। संंघ प्रमुख की टिप्पणी ने इन ङ्क्षचताओं का निराकरण करने का भी प्रयास किया कि मोदी सरकार को नागपुर से नियंत्रित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ‘आमतौर पर लोग आशंका व्यक्त करते हैं कि नागपुर (संघ मुख्यालय) से कोई कॉल अवश्य किसी विशिष्ट निर्णय (सरकार का) के लिए होगी। यह आधारहीन है। वे (भाजपा नेता) न तो हमारी सलाह पर निर्भर करते हैं और न ही हम उन्हें देते हैं। अगर उन्हें किसी सुझाव की जरूरत होती है और यदि हमारे पास कुछ देने के लिए होता है तो हम देते हैं।’

इतिहास को देखते हुए मोहन भागवत के दावे को पचाना कठिन है, यद्यपि भाजपा की मोदी-अमित शाह जोड़ी अपने तौर पर स्वतंत्र कार्य करने के लिए जानी जाती है, इसने हाल के वर्षों में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर संघ की सलाह को नजरअंदाज किया है। मेरा स्टैंड काल्पनिक नहीं है, बल्कि संघ परिवार की भीतरी गतिविधियों पर आधारित है। जो भी हो, कौन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर प्रश्न उठा सकता है, जिन्होंने अपनी एक बहुत बड़ी राजनीतिक छवि बना ली है। मैंने पाठकों के साथ संघ की नई विचारधारा को केवल इस उद्देश्य के साथ सांझा किया है कि उन्हें जनता के सामने रखा जाए।

संघ के ये विचार अब जमीनी स्तर पर जनता की अदालत में परखे जाएंगे। मोहन भागवत के लिए सफलता की कामना। उन्होंने कम से कम संघ कार्यकत्र्ताओं द्वारा गौ रक्षा के नाम पर दूषित किए गए देश के माहौल, जो हिंदुत्व के नाम पर कानून को भी अपने हाथ में ले लेते हैं, विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में, के बीच नए विचारों के साथ आगे आने की बड़ी हिम्मत दिखाई है। यह भाजपा प्रशासन की गुणवत्ता की खामियां प्रतिबिंबित करता है। मुझे दुख इस बात का है कि संघ परिवार के अधिकतर नेता हिंदूवाद को पूरी तरह से नहीं समझते या आप इसे हिंदुत्व भी कह सकते हैं। यह एक असहनशील मत नहीं है। यह सहनशीलता की अपनी उदार जड़ों तथा अन्य मतों की समझ से शक्ति प्राप्त करता है। यह दर्शन के साथ-साथ कार्य में भी लचकदार है। एक तरह से यह व्यक्ति के मतभेद के अधिकार को स्वीकार करता है, बशर्ते असहमति को तार्किक रूप से पेश किया जाए।

दरअसल मैं पूरी विनम्रता के साथ कहूंगा कि ङ्क्षहदू दर्शन उदार, प्रगतिशील तथा धर्मनिरपेक्ष है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ मजहब नहीं होता। इसे धार्मिक सहनशीलता की भावना को पारस्परिक सम्मान तथा समझ के आधार पर प्रतिङ्क्षबबित करना होता है जो हिंदूवाद के वैश्विक चरित्र का आधार हैं। मेरा एकमात्र सुझाव यह है कि कृपया सितम्बर 1893 को पार्लियामेंट आफ रिलीजन्स में दिए गए स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण को पढें तो आपको हिंदूवाद की वास्तविक ताकत बारे पता चलेगा और भाग्यवश प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में विवेकानंद की कसमें खाते हैं। लोगों के सामने अब वास्तविक चुनौती जमीनी स्तर पर वायदों तथा कार्रवाइयों का ईमानदारीपूर्वक परीक्षण है। इस बीच मैं मोहन भागवत द्वारा हिंदुत्व के संघ ब्रांड पर नई रोशनी डालने के लिए उनको सलाम करता हूं जो आज भारत की जरूरत है।-हरि जयसिंह

13/04/2018

नेशनल डेस्कः केंद्र सरकार ने बोलचाल और लिखित में दलित शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने सभी राज्यों के प्रमुक सचिवों को लिखित आदेश जारी किए हैं। इससे पहले सरकारी स्तर या कहीं भी दलित शब्द का प्रयोग वर्जित था।

केंद्र ने लगाई दलित शब्द के प्रयोग पर रोक
केंद्र ने अब सरकारी दस्तावेज से लेकर किसी भी पत्रावली में दलित शब्द का प्रयोग करने पर करने पर रोकर लगा दी है। मोदी सरकार ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा 21 जनवरी को दिए निर्णय के अनुसार सरकारी दस्तावेज और कई अन्य जगहों पर दलित शब्द के प्रयोग पर रोक लगाई थी।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का हवाला देते हुए केंद्र ने सभी प्रदेशों में दलित शब्द का प्रयोग बंद करवाया है। अब किसी भी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के आगे उनकी जाति का नाम लिखा जाना सरकार ने अनिवार्य कर दिया है। इससे पहले तत्कालीन सरकार ने 10 फरवरी 1982 को नोटिफिकेशन जारी कर हरिजन शब्द पर भी रोक लगाई थी। अब हरिजन बोलने पर कड़ी सजा का प्रावधान है, लेकिन बता दें कि अभी यह पता नहीं कि दलित शब्द का प्रयोग करने पर कितनी सजा का प्रावधान किया गया है।

मंत्रालय ने पत्र में बताया कहीं नहीं है संविधान में दलित शब्द का प्रयोग
मत्रालय द्वारा प्रमुख सचिव को लिखे पत्र में कहा गया है कि दलित शब्द का प्रयोग संविदान में कहीं नहीं है। बता दें कि इससे पहले वर्ष 1990 में इसी प्रकार का एक आदेश जारी हुआ था। जब सरकारी दस्तावेजों में अनुसूचित जाति के लोगों के लिए सिर्फ जाति लिखने के निर्देश दिए गए थे।

01/04/2018

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने आज कहा कि कांग्रेस मुक्त भारत जैसे नारे राजनीतिक मुहावरे है न कि संघ की भाषा का हिस्सा। उन्होंने कहा कि ये राजनीतिक नारे हैं। यह आरएसएस की भाषा नहीं है। एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि मुक्त शब्द राजनीति में इस्तेमाल किया जाता है। हम किसी को छांटने की भाषा का कभी इस्तेमाल नहीं करते।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि हमें राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सभी लोगों को शामिल करना है, उन लोगों को भी जो हमारा विरोध करते हैं। फरवरी में संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वह महात्मा गांधी के कांग्रेस मुक्त भारत के सपने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और उन्होंने देश की इस सबसे पुरानी पार्टी पर सत्ता में रहने के दौरान देश की विकास की कीमत पर गांधी परिवार का महिमामंडन करने का आरोप लगाया था। भागवत 1983 बैच के भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी ध्यानेश्वर मुलेकी छह पुस्तकें लांच करने के लिए यहां आए थे।

आरएसएस प्रमुख ने बदलाव लाने के लिए सकारात्मक पहल की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि नकारात्मक दृष्टि वाले बस संघर्षों और विभाजन की ही सोचते हैं। ऐसा व्यक्ति राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में बिल्कुल ही उपयोगी नहीं है। भागवत ने कहा कि हिंदुत्व को देखने का एक तरीका अपने आप, अपने परिवार एवं अपने देश पर विश्वास करना है। उन्होंने कहा कि यदि कोई अपने आप पर, परिवार पर और देश पर विश्वास करता है तो वह समावेशी राष्ट्रनिर्माण की दिशा में काम कर सकता है।

01/04/2018

कल भारत बन्द होगा

एस.सी./एस.टी. एक्ट संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित समाज ने दो अप्रैल को भारत बंद का ऐलान किया है। संगठनों ने भारत बंद को सफल बनाने के लिए जगह-जगह लोगों से इसमें शामिल होने का आह्वान किया है। वहीं प्रशासन ने किसी भी स्थिति से निपटने के लिए चौकसी कड़ी कर दी गई है। इसी बीच पंजाब सरकार ने सोमवार को स्कूल-कॉलेज बंद करने का ऐलान कर दिया है। राज्य भर में 4000 के करीब जवानों को तैनात किया गया है। इंटरनेट सेवाएं रहेंगी बंद
सरकार ने कल दिनभर इंटरनेट सेवा बंद करने के भी आदेश दे दिए हैं। राज्यभर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम कर दिए गए हैं। पंजाब के प्रमुख सचिव करन ए सिंह ने केंद्र सरकार रक्षा सचिव को पत्र लिखकर सैन्य बलों की मांग की है ताकि कानून व्यवस्था को कायम रखा जा सके। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी प्रदर्शन के दौरान दलित संगठनों से शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की है। बंद का आह्वान करने वाले संगठनों के साथ लगातार बातचीत की जा रही है। उन्हें आश्वासन दिया जा रहा है कि पंजाब सरकार दलितों के किसी भी अधिकार को नहीं छीनने दिया जाएगा।
दलित समुदाय ने किया एससी के फैसले का विरोध
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से एस.सी./एस.टी. एक्ट के संबंध में सुनाए गए एक फैसले से दलित समुदाय में रोष है। इस समुदाय के लोगों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने भी कोई रीव्यू पटीशन दाखिल नहीं की जिससे केंद्र सरकार का दलित विरोधी रवैया स्पष्ट होता है। इससे दलितों पर होने वाले अत्याचारों में वृद्धि होगी व उन्हें मिलने वाले इंसाफ की उम्मीद और मद्धम हो जाएगी। इसी रोष में देश भर में दलित संगठनों ने उक्त फैसले के खिलाफ 2 अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया है।
क्या है एससी-एसटी एक्ट
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989 को 11 सितम्बर, 1989 को संसद में पारित किया गया था। 30 जनवरी, 1990 को इस कानून को जम्मू-कश्मीर छोड़ पूरे देश में लागू किया गया। एक्ट के मुताबिक कोई भी ऐसा व्यक्ति जो कि एससी-एसटी से संबंध नहीं रखता हो, अगर अनुसूचित जाति या जनजाति को किसी भी तरह से प्रताड़ित करता है तो उस पर कार्रवाई होगी। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 के तहत आरोप लगने वाले व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार किया जाएगा। जुर्म साबित होने पर आरोपी को एससी-एसटी एक्ट के अलावा आईपीसी की धारा के तहत भी सजा मिलती है। आईपीसी की सजा के अलावा एससी-एसटी एक्ट में अलग से छह महीने से लेकर उम्रकैद तक की सजा के साथ जुर्माने की व्यवस्था भी है। अगर अपराध किसी सरकारी अधिकारी ने किया है, तो आईपीसी के अलावा उसे इस कानून के तहत 6 महीने से लेकर एक साल की सजा होती है।

01/04/2018

कानपुरः कानपुर में एक दलित दम्पति ने ‘भगवत कथा’ में भाग लेने से रोकने वाले अगड़ी जाति के लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने पर इस्लाम धर्म अपनाने की चेतावनी दी है। पुलिस उप महानिरीक्षक रतनकांत पाण्डेय ने बताया कि रसूलाबाद थाना क्षेत्र के नारखुर्द गांव में रहने वाली जया देवी ने आरोप लगाया है कि गत 22 मार्च को वह गांव में भगवत कथा के आयोजन के दौरान आरती करने जा रही थी, तो नरेन्द्र, अजय, रोहित, अम्बिका और चंद्रशेखर नामक लोगों ने उसे बाद में आने को कहा। जब वह फिर आरती की थाल लेकर आई तो आरोपियों ने उसकी थाल फेंक दी।
पाण्डेय के मुताबिक जया का आरोप है कि थाल फेंके जाने का विरोध करने पर आरोपियों ने उसके साथ धक्का-मुक्की की और जातिसूचक अपशब्द भी कहे। इस मामले में गत 26 मार्च को मुकदमा दर्ज किया गया था। उन्होंने बताया कि कल शाम को जया और उसके पति बबलू ने गांव में घोषणा की कि अगर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो वे इस्लाम कुबूल कर लेंगे।
इस दलित दम्पति ने बताया कि मुकदमें के आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं। अगर पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगी तो वे इस्लाम कुबूल कर लेंगे। जब आरोपी उन्हें हिन्दू समाज का मानते ही नहीं हैं तो इस्लाम को अपना लेना बेहतर है। बहरहाल, पुलिस उप महानिरीक्षक ने कहा कि दलित महिला को आरती में जाने से रोकने के आरोप की जांच की जा रही है। अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

31/03/2018

जातिवादका अंतिम संस्कार
14 मार्च 2015 ·
कुरुक्षेत्र का मैदान महासंग्राम के लिए पूरी तरह से सज चुका था । दोनों तरफ की सेनाएं भिड़ने के लिए

पूरी तरह से तैयार थीं । हजारो हाथी घोड़ो की चिंघाड़ से पूरा मैदान गूँज रहा था । युद्ध से विरत अर्जुन

का मोहभंग करने के लिए कृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश देने लगते हैं । उस क्षण की विशेषता ये थी सिर्फ
अर्जुन ही कृष्ण को देख और सुन सकता था ऐसे में
1. जब कोई गीता को पढता है तो सम्पूर्ण गीता को पढने में एक दिन से अधिक का समय लगता है फिर कृष्ण
ने अर्जुन को पूरी गीता मात्र कुछ मिनटों में कैसे सुना दी ?
2. जब दोनों सेनाएं युद्ध के लिए तैयार थी और कृष्ण को अर्जुन के सिवाय कोई और देखने सुनने में सक्षम
नहीं था तो दोनों तरफ से युद्ध आरम्भ क्यों नहीं किया गया ? प्रद्युम्न और भीष्म किस चीज की प्रतीक्षा
कर रहे थे ?
3. जब कृष्ण को उस समय सिर्फ अर्जुन ही देख सकता था तो युद्धक्षेत्र से काफी दूर राजमहल में संजय
धृतराष्ट्र को गीता के उपदेश किस प्रकार सुना सकता था ?
4. इतने कोलाहल भरे माहौल में जहाँ हजारो हाथी घोड़े चिंघाड़ रहे थे कोई शांति से प्रवचन कैसे दे सकता है और
कोई उनको शांति के साथ सही तरह से कैसे सुन सकता है ?
5. कृष्ण ने उपदेश दिए अर्जुन ने सुने ? दोनों में से लिखा किसी ने नहीं, किसी तीसरे ने
उसको सुना नहीं फिर गीता लिखी किसने ?
6. अगर किसी तीसरे व्यक्ति ने गीता सुनी भी तो उसको युद्धक्षेत्र में लिखा कैसे गया ?
7. अगर गीता युद्ध के बाद लिखी गयी तो इतने सारे उपदेशो को कंठस्थ किसने किया ? इतने सारे
उपदेशो को सुनकर याद रखकर बिलकुल वैसा ही कैसे लिखा जा सकता था ?
8. अगर गीता के उपदेश इतने ही गोपनीय थे कि उनको सिर्फ अर्जुन ही सुन सके तो इन दोनों के बीच
का वार्तालाप सार्वजानिक कैसे हुआ ?
9. अगर गीता के उपदेश सभी लोगो के लिए उपयोगी थे तो कृष्ण को चाहिए था वो अपने उपदेश सभी युद्ध में
हिस्सा लेने वाले सभी लोगो को सुनाता ताकि सभी लोगो का ह्रदय परिवर्तन हो सकता और इतने बड़े
नरसंहार को टाला जा सकता ।
10. अगर गीता के उपदेश उस समय सभी के लिए उपयोगी नहीं थे तो आज सभी के लिए उपयोगी कैसे
हो सकते हैं ?

31/03/2018

हमारे आरक्षण का ही विरोध क्यों?

एक मित्र की पोस्ट से....धन्यवाद जिसने भी लिखा...
समझे तो आँखे खुल जाएँगी।
एक लगभग 16 वर्ष का गरीब बालक उदास मन से अपनी माँ
से बोला "माँ स्कूल में मेरा मन नहीं लगता, मास्टर जी
बिना बात अपमानित करते रहते हैँ। कहते है सभी पढ़े लिखे
हो जाएंगे तो छोटे काम कौन करेगा। माँ क्या मैं कोई
बिजनेस कर लूं।"
माँ उदास हो गयी कहने लगी "बेटा बिजनेस के लिए तो
पूँजी की जरुरत होती है, हम दलित लोगों के पास पूँजी
कहाँ।"
बच्चा कहने लगा "माँ हमारे पास पूँजी क्यों नहीं होती।"
माँ ने कहा "बेटा, इस मनुवादी समाज में सदियों से व्यापार
या अन्य लाभदायक कार्यों हेतु स्वर्ण हिंदुओं का आरक्षण
रहा है।"
बेटा थोडा और उदास हो गया बोला "माँ, मेरा मन ईश्वर
की पूजा इत्यादि में बहुत लगता है, श्लोक इत्यादि भी
सस्वर बोल लेता हूँ, मैं अगर पुरोहिती करना चाहूँ तो।"
माँ फिर उदास हो गयी, बोली "बेटा इस उद्योग हेतु भी
एक विशेस उच्च जाती का सदियों से आरक्षण चला आ
रहा है।"
अचानक बालक के चैहरे पर चमक आ गयी वह कहने लगा "माँ,
खेती का काम तो हम लोग सदियों से करते चले आ रहे हैं, उस
पर तो हमारा आरक्षण होगा ही, धरती जमीन तो सारी
ईश्वर की बनाई है उसी की है, अगर मै खेती करना चाहूँ
तो?"
माँ को हंसी आ गयी बोली "बेटा खेती तो तू कर सकता है,
मगर एक खेत मजदूर के रूप में, और खेद की बात है की इस काम
में भरपेट रोटी भी नहीं कमा पायेगा, सभी जमीनों पर तो
इन्ही का आरक्षण है!"
बेटा फिर उदास हो गया।
माँ भी उदास हो गयी, बोली "बेटा तू सिर्फ मजदूरी ही
कर सकता है, लेकिन मनुवादियों के इस देश में श्रम की
कीमत इतनी कम है की श्रमजीवी ढंग के साथ जी भी नहीं
सकता है, बेटा अगर अपने स्तर को ऊँचा उठाना है तो मात्र
नौकरी ही एक साधन है, लेकिन उसके लिए भी जो आरक्षण
की सुविधा हमें हमारे मसीहा 'डा. अम्बेडकर जी' ने दिलाई
है वो भी इनकी आँखों में खटकती है।"
बालक की आँखे वितृष्णा से भर गयी बोला "माँ जब सभी
कार्यो पर सभी का आरक्षण है, हमारे आरक्षण का ही
विरोध क्यों?

31/03/2018

नेशनल डेस्क: गुजरात के भावनगर जिले में 21 साल के दलित युवक की केवल इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि वो दलित था और उसे घुड़सवारी का शौक था। हत्या का आरोप कथित तौर पर सवर्णों पर है। मृतक प्रदीप राठौड़ के घुड़सवारी का शौक था जो स्थानीय सवर्णों को पसंद नहीं था। तथाकथित उच्च जाति के लोगों ने प्रदीप राठौड़ के परिवार को कई बार धमकी भी दी थी। जिस वक्त घटना हुई उस वक्त युवक घोड़े पर बैठकर अपने खेत से घर लौट रहा था। मृतक के परिवार ने आरोपियों की गिरफ्तारी से पहले शव का अंतिम संस्कार करने से इनकार कर दिया था। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पुलिस पर दबाव बनाया जिसके बाद उमराला पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
घोड़ा खरीदने पर ​मिली थी धमकी
मृतक के परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है. शिकायत में लिखा है कि जब उन्होंने प्रदीप के लिए 30 हजार रुपए में घोड़ा खरीदा तब नाटुभा दरबार और उसके दोस्तों ने उन्हें धमकी दी थी। प्रदीप लंबे समय से अपने पिता घोड़ा लेने की जिद कर रहा था। उमराला पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक नाटुभा दरबार और दो अन्य के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया है। उन्होंने बताया कि हत्या से एक सप्ताह पहले उनके परिवार को धमकी मिली थी। उन्होंने कहा, 'उन लोगों ने कहा कि दलितों को घुड़सवारी नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि टिम्बी और आसपास के इलाकों में किसी दलित के पास घोड़ा नहीं है।' टिम्बी की जनसंख्या 5000 है जिनमें से अधिकतर दरबार और क्षत्रिय हैं। गांव में करीब 40 दलित परिवार रहते हैं।
मां की तरह से घोडे़ की करता था देखभाल
प्रदीप के शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भावनगर सिविल अस्पताल ले जाया गया है, लेकिन उसके परिजनों ने कहा है कि वे लोग वास्तविक दोषियों की गिरफ्तारी तक शव स्वीकार नहीं करेंगे। कालूभाई ने कहा, 'मैं अपने बेटे को बाइक दिलाना चाहता था लेकिन उसने घोड़ा खरीद लिया।' उन्‍होंने कहा, 'बचपन से ही वह शादियों में घोड़ों को देखता था और उन्‍हें प्‍यार करता था। सात महीने पहले ही उन्‍होंने घोड़ा खरीदा था। वह अक्‍सर अपने घोड़े को ट्रेनिंग देता था और एक मां की तरह से उसकी देखभाल करता था। वह अक्‍सर घोड़े की सवारी करता था। हत्‍यारों ने केवल इसलिए इस हत्‍याकांड को अंजाम दिया क्‍योंकि वे सोचते थे कि उन्‍हें ही घोड़े की सवारी करने का अधिकार है, दलितों को नहीं।'
गुजरात में पहले भी हुए हैं दलितों पर अत्‍याचार
कालूभाई ने कहा, 'एक दिन मेरे बेटे ने खतरे के बारे में बताया था। इसके बाद मैंने धमकी देने वाले एक शख्‍स के रिश्‍तेदार से बात की थी और अनुरोध किया था कि इस मामले को खत्‍म किया जाए। हमने 30 हजार रुपये देकर घोड़ा खरीदा था। उन्‍हें क्‍यों परेशानी हो रही थी ?' भावनगर के एसी-एसटी सेल के उप पुलिस अधीक्षक एएम सैयद ने कहा, ' प्रदीप की निर्दयता से हत्‍या की गई है। हमने इस संबंध में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है।' आपको बता दें, इससे पहले भी गुजरात में दलितों के खिलाफ अत्‍याचार की कई घटनाएं हो चुकी हैं। कुछ महीने पहले ही ऊना में कथित गोरक्षकों ने दलित परिवार के 7 सदस्‍यों को कोड़े से मारा था। इस घटना का विडियो वायरल होने के बाद पूरे राज्‍य में व्‍यापक प्रदर्शन हुए थे। इसी तरह से आनंद जिले में दलित युवक जयेश सोलंकी को गरबा देखने पर पीट-पीटकर मारा डाला गया था।

26/03/2018

नई दिल्लीः नीरव मोदी कांड के बाद पंजाब नेशनल बैंक की मुसीबतें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। खबरों के अनुसार पंजाब नेशनल बैंक को 31 मार्च तक यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (यू.बी.आई.) को 1000 करोड़ रुपए की राशि का भुगतान नहीं करने पर डिफॉल्टर घोषित कर दिया जाएगा। यह पूरा मामला पंजाब नेशनल बैंक की ओर से जारी 1000 करोड़ के एलओयू पर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के भुगतान का है।
सरकार को देना पड़ेगा दखल
जानकारों के मुताबिक पंजाब बैंक के डिफाल्टर होने से बचाने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को इस मामलें में हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। अगर सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा इस मामलें में जल्द हस्तक्षेप कर कोई कार्रवाई नहीं की गई तो बैकिंग इतिहास में यह पहला मामला होगा जब कोई एक बैंक देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक को डिफॉल्टर की सूची में डालेगा

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