पागल पथिक

पागल पथिक कुछ बनने की जिज्ञासा गर हैं तो
कुछ त्याग करने का जज़्बा भी रखो

21/07/2026

**लाठियों से नहीं दबते सपने**

किताबों के हाथों में जब लाठी का उत्तर आया,
लोकतंत्र का चेहरा भी कुछ पल को शर्माया।
जो कल तक भविष्य थे, आज सवाल बन गए,
सच पूछो तो सत्ता के लिए बवाल बन गए।

मां ने भेजा था पढ़ने को, ज्ञान का दीप जलाने,
किसने सोचा था लौटेंगे, जख्म नए घर लाने।
कलम से जो लड़ सकते थे, उनसे डंडे भिड़ाए गए,
उत्तर देने के बदले बस आदेश सुनाए गए।

कुर्सी अगर इतनी ऊंची हो कि दर्द दिखाई न दे,
तो समझो शासन बचा है, पर जनता साथ नहीं है।
आवाजों को कुचलने से इतिहास नहीं बदलता,
हर घायल कदम कभी न कभी सवाल बन निकलता।

लाठी की चोटें तन पर हैं, मन पर नहीं टिकेंगी,
सच की छोटी-सी चिंगारियां एक दिन लौ बनेंगी।
डर के साए में बैठा शासन कब तक राज करेगा,
युवाओं का हर टूटा सपना फिर से आवाज करेगा।

सत्ता का धर्म है सुनना, जनता का मान रखना,
मतभेदों के इस वन में संवाद का ध्यान रखना।
जो छात्र हैं, वे कल का भारत गढ़ने वाले हैं,
उन्हें दुश्मन समझोगे तो अपने ही उजाले हैं।

इतिहास यही कहता आया—अहंकार नहीं चलता,
जनमन की पीड़ा पर कोई शासन नहीं पलता।
लाठियां थक जाएंगी, पर हौसले नहीं झुकेंगे,
सवाल अगर सच्चे होंगे, उत्तर भी फिर मिलेंगे।
अंकुर अंजान

21/07/2026

# सम्मान का मूल्य

जिसे सिर आँखों पर रखा,
अक्सर उसी ने नज़रें फेर लीं।
जिसकी हर बात को इज़्ज़त दी,
उसी ने हमारी ख़ामोशी को कमज़ोरी समझ ली।

अजीब दस्तूर है कुछ रिश्तों का,
जहाँ सम्मान को प्रेम नहीं, आदत समझ लिया जाता है।
जो हर बार झुककर बात करे,
उसे लोग अक्सर झुकाने लायक समझ लिया जाता है।

मर्द जब किसी औरत का सम्मान करता है,
तो उसकी सीमाओं का भी सम्मान करता है,
उसकी इच्छा, उसके निर्णय, उसके स्वाभिमान का भी।
पर कई बार यही शालीनता
उसकी बेबसी समझ ली जाती है।

हर कहानी ऐसी नहीं होती,
बहुत-सी स्त्रियाँ सम्मान का उत्तर सम्मान से देती हैं।
लेकिन कुछ रिश्तों में ऐसा भी होता है कि
जो सबसे अधिक कद्र करता है,
उसी की कद्र सबसे कम की जाती है।

फिर एक दिन वह मर्द बदल जाता है,
घमंडी नहीं बनता,
बस अपनी क़ीमत समझ जाता है।
वह शिकायतें करना छोड़ देता है,
अपेक्षाएँ रखना छोड़ देता है।

क्योंकि उसने सीख लिया होता है—
सम्मान माँगा नहीं जाता, कमाया भी नहीं जाता,
वह तो सामने वाले के संस्कारों में होता है।
जिसके भीतर सम्मान देने की आदत ही न हो,
वह किसी के समर्पण का मूल्य भी नहीं समझ सकता।

इसलिए अब वह मुस्कुराकर आगे बढ़ जाता है,
बिना किसी कटुता के, बिना किसी शोर के।
क्योंकि उसे समझ आ जाता है कि
जहाँ सम्मान न मिले,
वहाँ ठहरना भी अपने सम्मान के विरुद्ध है।
अंकुर तिवारी अंजान

20/07/2026

ग़ज़ल

दुनिया की उलझनों में उलझना नहीं है हमको,
इश्क़ की बातों में अब पड़ना नहीं है हमको।

बहुत देख लीं हसरतें, बहुत टूटे हैं ख़्वाब भी,
अब हर किसी पे यूँ ही अब मरना नहीं है हमको।

जो वक़्त की हवा के साथ बदल लेते हैं रास्ते,
उनके लिए अब उम्र भर अब ठहरना नहीं है हमको।

नज़रें झुकाकर जी लिए,कर लिए बहुत समझौते,
अब अपना दीद सामने किसी के खोना नहीं है हमको।

जो दर्द दे के पूछें कि "कैसे हो आजकल तुम?",
ऐसे रिश्तों को फिर से नातेदारी अब रखना नहीं है हमको।

अब माँ-बाप की दुआ ही हमारी सबसे बड़ी दौलत है
गैरों के झूठे वादों पर अब पिघलना नहीं है हमको।

तजुर्बों ने सिखा दिया हमे हर चेहरे का फ़लसफ़ा ही
हर एक मुस्कान पर दिल अब रखना नहीं है हमको।

अब ख़ुद की मंज़िलों से ही रिश्ता बना लिया है
किसी के लौट आने का अब सपना नहीं है हमको।

दुनिया की उलझनों में उलझना नहीं है हमको,
इश्क़ की बातों में अब पड़ना नहीं है हमको।
अंकुर तिवारी अंजान

20/07/2026

ना इश्क की ज़रूरत है, ना प्यार की ज़रूरत है,
अब तो बस सुकून भरे किरदार की ज़रूरत है
झूठे वादों और बदलते चेहरों के बोझ से थक चुका हूँ मै
अब सिर्फ़ अपने ही आत्मसम्मान की ज़रूरत है
जो साथ निभाए हर हाल में उसे ही कहेंगे अब अपना
हर किसी के इज़हार की नहीं, वफ़ादार की ज़रूरत है
ज़िंदगी अब किसी के सहारे नहीं गुज़ारनी है हमको
बस माँ-बाप की दुआ और परिवार की जरूरत है
जिन्हें हमारा ख्याल नहीं क्यों ही रखें हम ख्याल उनका
मुझे तो अब ईश्वर ईश्वर के आशीर्वाद की ज़रूरत है
अंकुर तिवारी अंजान

20/10/2025
सुनो पंडिताइन गर जो तुम नीर होती तो मैं आब लिखता तेरे चांद से चेहरे को आफताब लिखता कुछ नहीं लिखता जो,तो वो है दर्द मेरा ...
26/09/2025

सुनो पंडिताइन
गर जो तुम नीर होती तो मैं आब लिखता
तेरे चांद से चेहरे को आफताब लिखता
कुछ नहीं लिखता जो,तो वो है दर्द मेरा
तुम्हें मैं अपना हसीं एक ख़्वाब लिखता
तुम्हारे पाव के पायल पर बनाता धुन नई
तेरे कंगन के खनक पर नया राग लिखता
जो तेरे होठ खुलते खिलखिलाकर खुशी से
उस पल को मैं अपना सुनहरा आज लिखता
लिखता तो मैं हूँ आज भी तुम पर गज़ले कई
पर अपनी हर ग़ज़ल में खुद को तेरे साथ लिखता
तुम्हारे होने भर से ही मेरा संवर जाता ये जीवन
तुझे प्रियसी नहीं मैं अपना आधा भाग लिखता
अंकुर तिवारी अंजान

मै गणित का छात्र जिसे साहित्य से बहुत प्रेम था पर हिचकिचाहट इतनी कि कभी व्यक्त नहीं कर पाया मैंने इतना चाहा दिलों जान से...
03/07/2025

मै गणित का छात्र जिसे साहित्य से बहुत प्रेम था
पर हिचकिचाहट इतनी कि कभी व्यक्त नहीं कर पाया
मैंने इतना चाहा दिलों जान से उसको पर क्या करूं
इस एकतरफा इश्क को चाह कर भी कभी कह नहीं पाया
मैं मान लेता कि वह मेरा है बीजगणित के एक्स की तरह और खुशी बढ़ जाती
पर यह मान लेना कितना कठिन है समझ नहीं पाया
साहित्य कोई एक्स की वैल्यू थोड़े हैं जिसका एक मान होगा
साहित्य तो दो चर वाले रैखिक समीकरण की तरह हैं
जिसके एक्स का मान सदैव वाई पर निर्भर रहता है
खैर गणित के छात्र का साहित्य के लिए इतना प्रेम
इस समाज में किसी अंतर्जातीय विवाह से कम नहीं है
और ऐसा होता भी है इसलिए मुझे कोसों दूर रखा गया साहित्य से
पर वो सुना है न कि एकतरफा इश्क की बात ही कुछ और है
बस वही कुछ और बात मेरे इस साहित्य प्रेम में भी था
पर प्रेम इतना कि उसके बिना चाहें उसे हद से। ज्यादा चाहना
उसके बिना पूछे उसका कली से भी ज्यादा ध्यान रखना
पर वो पढ़ा हैं न कि अधातु और जल में कोई अभिक्रिया नहीं हो सकती
ठीक वैसा ही इस गणित और साहित्य के प्रेम में भी हुआ
गणित चाहे कितना भी सपोज कर ले पर एक्स की वैल्यू
हर समीकरण के साथ बदलती ही रहती हैं
इसलिए ब्रह्मांड में चाहे कुछ भी हो सकता है पर कभी
गणित के छात्र का साहित्य से प्रेम स्वीकार नहीं होगा
©® अंकुर तिवारी अंजान

01/07/2025

देर सवेर तो हो ही जाता है मिलन तन का तन से
पर मन का मन से भी मिलना बड़ा जरूरी होता है

कहने को तो चांद सितारे तोड़ने को कहते हैं सब
पर निज संबंधों का मान रखना बड़ा जरूरी होता है

रिश्ता तो बंध ही जाता है,दो लोगों का एक संग में
पर निश्छल प्रेम की डोर में बंधना बड़ा जरूरी होता है

रिश्ते नाते है धन जीवन के,इनको ऊपर रखना पड़ता हैं
ख़ुद को खोकर रिश्तों को रखना बड़ा जरूरी होता हैं

समय चक्र हैं बड़ा बलि, सबको इसके चक्र में जाना है
इसलिए निज लहज़े पर अल्पविराम बड़ा जरूरी होता है

अंकुर अंजान

बारिश की बूंदे आयी जो, मन के कुछ घाव हरे हुए कुछ गिरी हमारे तन पर तो, फिर से कुछ हम छले गयेकुछ बूंदें धरा पर भी आयी, कुछ...
28/06/2025

बारिश की बूंदे आयी जो, मन के कुछ घाव हरे हुए
कुछ गिरी हमारे तन पर तो, फिर से कुछ हम छले गये

कुछ बूंदें धरा पर भी आयी, कुछ बूंदें उपवन पर बरसी भी
कुछ बूंदों की चाह में चातक, कई महीने तरसी भी

मेघों का गर्जन उठा कभी, कभी चंचल चपला चमक गई
जो उठी आंधियां रह रह कर, छत जाने कितनो के उड़ा गई

विरहिन को विरह लगाया भी, हृदय में प्यास जगाया भी
पर बुझा सकी ना प्यास जिया की, बूंदों ने अगन लगाया भी

कुछ बूंदों ने तन को सिहराया, मन को यादों में क़ैद किया
कुछ बूंदों ने तो गिर गिर कर, दिल को भीतर तक भेद दिया

कुछ प्रश्न मुझे जो करने थे, सब बूंदों की लय बह गए
न प्रिए मिले ना प्रेम मिला,हम विरह झेलते रह गए

काश! कुछ बूंदें दिल पर गिरती तो,दिल शायद हल्का हो जाता
जो रह गया मलाल था मुझको, वो भी इनमें कहीं खो जाता
©अंकुर तिवारी अंजान

**"पसंदीदा स्त्री यानी कि— तुम"**जब तुम्हें पहली बार देखा तो लगा मानो जैसे कोई अपना हो,ना मिले, न आवाज़ दी फिर भी दिल ने...
27/06/2025

**"पसंदीदा स्त्री यानी कि— तुम"**

जब तुम्हें पहली बार देखा तो लगा मानो जैसे कोई अपना हो,
ना मिले, न आवाज़ दी फिर भी दिल ने कहा तुम मेरा सपना हो

तुम अप्सरा तो नहीं हो,क्योंकि वो तो होती है केवल सुंदर
तुम तो एक एहसास हो,सुकून हो,जो समा गई हो मेरे अंदर

तुम्हारा चेहरा जैसे भोर का सूरज तुम्हारी सुबह की पहली किरण जैसी
तुममें सादगी है जो मिलती नहीं शहरों में तुम लगती हो मुझे मेरी मां के जैसी

तुम्हारी चूड़ियों की खनक, तुम्हारे कानो की बालियां अच्छी लगती हैं
भौहों के बीच जो लगाती हो बिंदिया बड़ी अच्छी लगती है

कुर्ती और जींस भी फबता है तुझ पर बहुत ज्यादा
मगर साड़ी में तेरा क्या ही कहना तुम खूब फबती हो

तुम्हारी बातों की मिठास दिल में मिश्री सी घुल जाती हैं
मेरा ख़्याल है तुमको मुझसे ज्यादा ये बात दिल की छू जाती है

जैसे चकोर को होती है ख्वाहिश चांद के उतर आने की
वैसे ही होता हैं मुझे ख्वाहिश तुझे अपना बनाने की

मैं कह नहीं पाता हूँ दिल में क्या हैं मेरे पर तुम समझती हो शायद,
तुम मेरी पसंद नहीं तुम मेरी आदत बन चुकी हो शायद

मेरे मन के एहसासों में तेरी रवानी बसने लगी हैं
तू अब मेरे ख्वाबों की हसीं कहानी बनने लगी है

मन ही नहीं भरता है मेरा तेरे दीदार से अब तो मेरा
तू ऑनलाइन जरूर हैं मगर ऑफलाइन सी लगने लगी हैं

अंकुर अंजान

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