25/05/2025
अन्तरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2025 से सम्मानित बानू मुश्ताक़ की कहानी "चिराग़-ए-दिल" का हिन्दी अनुवाद :
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• 🪔 चिराग़-ए-दिल 🪔
कथाकार : बानू मुश्ताक़ | अंग्रेजी अनुवाद : दीपा भस्थी | हिन्दी अनुवाद : राजेश करमहे | सम्पादन : पंकज मित्र
मेहरून ने मुश्किल से आधा खुला दरवाज़ा सरकाया , अभी बस एक पैर ही अंदर रखा ही था कि उसके अब्बा, जो बैठक में दीवान पर लेटे हुए थे, और उनके बड़े भाई, जो उनसे धीमी आवाज़ में कुछ बात कर रहे थे, दोनों ने एकदम से चुप हो गए और उसे देखने लगे. उसकी भतीजी राबिया अंदर से दौड़ती हुई आई और चिल्लाई, 'मेहरून फुफू आ गई हैं – मेहरून फुफू आ गई हैं,' अमान, उसका मँझला भाई और राबिया के अब्बा, ठोड़ी पर शेविंग सोप का झाग लगाए , ब्रश अभी भी उसके हाथ में था, अपने कमरे से बाहर आया, और बैठक में उसे इस तरह देखने लगा मानो उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा हो. उसकी सबसे बड़ी बहन, अतीगे, जो बच्चों को अपनी मीठी आवाज़ में कुरान पढ़ा रही थीं, अपना सेरागु (ओढ़नी) सिर से फिसलने की परवाह किए बिना उन्हें घूरने के लिए बैठक में आ गई. उसकी अम्मी, अपनी पतली उंगलियों में तस्बीह (प्रार्थना की माला) पकड़े हुए, हैरतज़दा खड़ी थी, मानो पूछ रही हों: ' यह सच है? क्या यह सच है?' उसकी छोटी बहनें, रेहाना और सबीहा, बैठक के दरवाज़े के पीछे से झाँक रही थीं, उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि रसोई में वे जो चपातियाँ बना रही थीं, वे तवे पर जल रही थीं. शुक्र है कि उसका छोटा भाई आतिफ घर पर नहीं था.
पूरा घर एक पल के लिए थम सा गया. यह उसे अजीब लग रहा था. जिस अम्मा ने उसे नौ महीने पेट में रखा और पाला, उन्होंने यह नहीं कहा, 'अच्छा, तुम आ गईं. अंदर आओ, मेरी लाडो,' और उसके अब्बा, जो अपनी चौड़ी छाती पर कूदने वाली छोटी लड़की से खुश होते थे, उनके चेहरे पर खैरमकदम की एक छोटी सी मुस्कान भी नहीं थी; न तो उनके बड़े भाईजान, जो घमंड से उसे 'मेरी परी, मेरी एंजेल' कहते थे, न ही अमान, जिसने उसे कॉलेज भेजने पर जोर दिया था, किसी ने उसका इस्तकबाल नहीं किया. उनकी बीवियां उसे ऐसे घूर रही थीं जैसे वह किसी दूसरे ग्रह से आई हों.
मेहरून का दिल बैठ गया. जब उसकी गोद में बैठी नौ महीने की बच्ची ज़ोर से रोई, तभी सब लोग अपनी सुस्ती से बाहर आए. उसके बड़े भाई ने उनसे पूछा, 'इनायत कहाँ है?'
उसने अपना सिर झुका लिया जैसे उसने कोई जुर्म किया हो और जवाब दिया, 'वह शहर में नहीं हैं.'
'तो तुम किसके साथ आई हो?'
'मैं अकेली आई.'
'अकेली?' उनके चारों ओर एक कोरस उठ खड़ा हुआ, जबकि वह दहलीज पर खड़ी रही.
'फारूक, उसे अंदर ले जाओ.' जैसे ही उसके बड़े भाई का हुक्म जारी हुआ, मेहरून अंदर चली गईं, उनके कदम भारी और लड़खड़ाते हुए थे. यह एक अदालत की तरह लग रहा था. उसकी बच्ची रोने लगी, और, अपना बुर्का हटाए बिना, उसने नकाब ऊपर उठाया, अपने वालिद के बिस्तर पर एक कोने पर बैठ गईं, और बच्ची के मुँह में अपना स्तन दिया. उसने अपना चेहरा नहीं धोया था. जैसे ही बच्ची ने दूध पिया, उसके पेट में जलन सी होने लगी. उसने पिछली रात से कुछ नहीं खाया था. उनकी माँ को छोड़कर, कोई भी दूसरी औरत इस बैठक में मौजूद नहीं हो सकती थी.
'मेहर, क्या तुमने आने से पहले घर में किसी को बताया था?'
'नहीं.'
'क्यों? तुमने निकलने से पहले उन्हें क्यों नहीं बताया? ऐसा लगता है कि तुमने हमें बेइज़्जत करने का मन बना लिया है.'
'मैं किसे बताती? कौन है वहाँ? उन्हें आखिरी बार घर आए हुए एक हफ्ता हो गया है – उन्होंने मुझे यह भी नहीं बताया कि वह कहाँ जा रहे हैं. मैंने आप सभी को लिखा था, लेकिन आपने जवाब नहीं दिया, परवाह नहीं की कि मैं मर जाती या जिंदा रहती.'
'तुमने लिखा कि तुम्हारा शौहर किसी नर्स के साथ चला गया है. और तुम चाहती हो कि हम इस पर यकीन करें?'
'अगर आपको मुझ पर यकीन नहीं था, तो आपको आकर पूछताछ करनी चाहिए थी. ऐसे लोग हैं जिन्होंने उन्हें एक साथ देखा है.'
'और जब हम आकर उसे देख लेंगे तो हमें क्या करना चाहिए? मान लो हम उसे पकड़ लेते हैं और उससे इस बारे में पूछते हैं, और वह कहता है, हाँ, यह सच है – तब हम क्या कर सकते हैं? क्या हमें मस्जिद में अर्ज़ी लगानी चाहिए? वह कहेगा, मैंने गलती की है, मैं उसे मुसलमान बनाऊँगा और उससे निकाह करूँगा. तब वह तुम्हारी सौतन होगी. और मान लो हम उसे और डांटते हैं. अगर वह कहता है, मुझे यह मेहरून नाम की औरत नहीं चाहिए, मैं उसे तलाक दूँगा, तो हम क्या कर सकते हैं?'
अब तक मेहरून ज़ार ज़ार रो रही थी. अपनी बच्ची को दूसरे स्तन पर ले जाते हुए और उसे दूध पिलाते हुए, उन्होंने अपने बुर्के के नीचे से अपना सेरागु निकाला और अपनी आँखें और नाक पोंछी. सब चुप थे
'इसका मतलब है कि आप सब कुछ भी करने की हालत में नहीं हैं, है ना?' कोई नहीं बोला. उन्होंने जारी रखा. 'मैं आपके पैरों पर गिरकर कह रही थी कि मैं शादी नहीं करना चाहती. क्या आपने सुना? मैंने कहा था, मैं बुर्का पहनकर कॉलेज जाऊँगी. मैंने आपसे भीख माँगी थी कि मुझे पढ़ाई बंद न करने दें. आप में से किसी ने मेरी बात नहीं सुनी. मेरी कई सहेलियों की तो शादी भी नहीं हुई है, और फिर भी मैं बूढ़ी हो गई हूँ. मुझ पर पाँच बच्चों का बोझ है. उनके पिता घूम रहे हैं, और मेरी कोई ज़िंदगी नहीं है. जब कोई आदमी ऐसा हराम काम कर रहा है, तो आप में से कोई भी उससे यह पूछने के काबिल नहीं है कि वह ऐसा क्यों कर रहा है?'
'बस, मेहर, बस करो.' उनकी माँ ने आँखें बंद कर लीं और अपना सिर हिलाया.
'हाँ, अम्मा. मेरा भी बस हो गया है. पहले लोग फुसफुसाते थे, और फिर जिन्होंने उन्हें थिएटर में और होटलों में एक साथ जाते देखा, वे सीधे आकर मुझे बताने लगे. और फिर वह इतना बेखौफ हो गया कि उसके घर जाने लगा. और जब सबने उसे डांटा, तो वह बेंगलुरु गया, हजारों रुपये खर्च किए, और उसका तबादला करवा दिया. अब वह पिछले आठ दिनों से उसके साथ रह रहा है. मैं इसे और कितने दिन बर्दाश्त करूँ? मैं कैसे ज़िन्दा रहूँगी?'
'धीरज रखो, मेरी बेटी. तुम्हें उसे प्यार से सही रास्ते पर लाने की कोशिश करनी चाहिए.'
'अम्मा, क्या मेरा दिल नाम की कोई चीज नहीं है? क्या मेरे पास एहसास नहीं हैं? मैं उसे अपने शौहर की तरह इज़्ज़त नहीं दे सकती जब वह इस तरह चला गया है. उसे देखकर मेरा मन नफरत से भर जाता है. उससे प्यार करना तो बहुत दूर की बात है. बात उसके मुझे तलाक देने की नहीं है – मैं उससे तलाक लूँगी. मैं उस घर में वापस नहीं जाऊँगी.'
'मेहर, तुम क्या कह रही हो? यह बहुत ज्यादा है. वह एक आदमी है, और उसने कुछ गंदगी पर पैर रखा है, लेकिन वह उसे वहाँ धो देगा जहाँ पानी है और फिर अंदर आ जाएगा. उस पर कोई दाग नहीं लगेगा.'
इससे पहले कि वह जवाब दे पातीं, अमान ने बीच में टोक दिया. 'देखो यह हमारे सामने कैसे बात कर रही है. इसने उसके सामने भी ऐसे ही बात की होगी. और इसीलिए वह गुस्सा होकर चला गया होगा.' वह रुका और अपनी आवाज़ नरम की. 'अगर इस घर की बहुएँ इस तरह की बातें सीखेंगी, तो यह बहुत अच्छा होगा क्या?' मेहरून का दुःख जल्दी ही गुस्से में और फिर मायूसी में बदल गया .
'आप बहुत अच्छी बहस करते हैं, अन्ना. अल्लाह आपका भला करे. यह सच है: मैं ही बुरी इंसान हूँ. मैंने जान लिया है कि मेरा बुरा आदतें क्या है. मैं बुर्का के बिना बाहर नहीं निकली. उसने मुझे इसे हटाने और अपनी साड़ी अपनी कमर के नीचे पहनने और उसके साथ हाथ पकड़कर अकड़कर चलने के लिए कहा. लेकिन आपने मुझे बुर्के में ढका और मुझे ऐसे पाला कि मैं अपनी साड़ी का पल्लू भी अपने सिर से फिसलने नहीं देती, है ना? मुझे इसे हटाने पर अब नग्न महसूस होता है. आपने मुझे अल्लाह के डर से भर दिया. मैं वह करने के लिए तैयार नहीं हुई जो उसने मुझसे कहा था, और इसलिए उसने किसी ऐसे आदमी को अपना लिया जो उसकी धुन पर नाचता है. और अब आप सब डरे हुए हैं कि अगर वह मुझे छोड़ देगा तो मैं आप पर बोझ बन जाऊँगी – इसीलिए आप मुझे इसे बर्दाश्त करने के लिए कह रहे हैं. लेकिन अब यह मुमकिन नहीं है. उस जहन्नुम में जलने के बजाय, मैं अपने बच्चों को ले जाऊँगी और कहीं कुली का काम करूँगी. मैं आप सब पर बोझ नहीं बनूँगी – बिल्कुल भी बोझ नहीं.'
'क्या फल कभी डाल पर बोझ होता है, मेहर? बकवास मत करो,' उनकी माँ ने बरजा
'अम्मी, उसे अंदर ले जाओ और उसे कुछ खाने को दो,' उनके बड़े भाई ने शाइस्तगी से कहा. 'हम दस मिनट में चिकमगलूर के लिए निकलेंगे. अगर बस मिली, तो हम बस लेंगे. अगर नहीं, तो हम टैक्सी लेंगे. हम उसकी धुन पर नाच नहीं सकते.'
'मैं आपके घर में एक बूँद पानी भी नहीं पीऊँगी. न ही मैं चिकमगलूर जाऊँगी. अगर आप मुझे जबरदस्ती वहाँ ले गए, तो मैं आपसे वादा करती हूँ कि मैं खुद को आग लगा लूँगी.'
'यह बहुत ज्यादा है, मेहर. जो मरना चाहते हैं, वे इसके बारे में बात करते हुए नहीं घूमते. लेकिन अगर तुम्हें इस परिवार की इज्जत की कोई परवाह होती तो तुम यहाँ आने के बजाय ऐसा करती. जिस घर में तुम्हारी डोली जाती है, उसी घर से तुम्हारी डोला (अर्थी) निकलना चाहिए. यही एक गैरतमंद औरत की ज़िन्दगी है. तुम्हारी एक बेटी हाई स्कूल में पढ़ रही है; तुम्हारी दो छोटी बहनें हैं जो शादी की उम्र की हैं. एक गलत कदम और तुम उनके मुस्तकबिल के रास्ते में आ जाओगी. तुम कहती हो कि हमें तुम्हारी बचकानी बातें माननी चाहिए, और जाकर तुम्हारे पति से लड़ना चाहिए, लेकिन हमारी भी बीवियां और बच्चे हैं. तो अंदर जाओ और कुछ खाओ.' वह थोड़ी देर के लिए अपने भाई की ओर मुड़ा, और फिर वापस उसकी ओर मुड़ा. 'अमान, दौड़कर एक टैक्सी ले आओ. और तुम, मेहर, अगर तुम्हारे बच्चे या पड़ोसी पूछते हैं, तो उनसे कहना कि तुम बच्चे को अस्पताल ले गई थी, या कुछ और. तुम यहाँ आने के लिए किस समय निकली थी?'
वह नहीं बोली.
'अभी साढ़े नौ बजे हैं,' अमान ने कहा. 'वह नौ बजे आई थी. सफर तीन घंटे का है. वह सुबह छह बजे निकली होगी. अगर हम इसी पल निकलते हैं, तो हम साढ़े बारह बजे तक वहाँ पहुँच सकते हैं.'
मेहरून जहाँ बैठी थी, वहाँ से हिली तक नहीं. उनकी माँ और उनकी छोटी बहनों ने बारी-बारी से उसे खाने के लिए कहा, लेकिन उसने एक निवाला भी या एक बूँद पानी भी अपने मुँह में नहीं डाला. जब टैक्सी आई, तो उसने किसी से बात नहीं की. बाहर निकलते हुए, बच्ची को अपनी छाती से कसकर पकड़े हुए और उसके बड़े भाई उसके बगल में, उसने उनमें से किसी को भी खुदा हाफिज नहीं कहा. जैसे ही वह आखिरी कुछ सीढ़ियाँ उतरी, उसने मुड़कर उस घर को देखा जिसमें वह पैदा हुई और पली-बढ़ी थी. उसकी आँखें आँसुओं से भर गईं. उसके पिता अपनी छाती पकड़े हुए खाँस रहे थे. उसकी अम्मी सिसक रही थीं, अपनी बेटी की ओर मुड़ रही थीं, फिर अपने शौहर की ओर, उन्हें लिटा रही थीं, उन्हें पंखे से हवा कर रही थीं, उन पर पानी छिड़क रही थीं, और खुद से कह रही थीं, 'या अल्लाह, अगर मैंने अपने पूरी ज़िन्दगी में कोई भी नेकी, कोई भी सबाब, कोई भी अच्छा काम किया है तो मेरी बेटी की ज़िन्दगी संवर जाए.'
अमान ने कार का दरवाज़ा खोला, मेहर को अपनी आँखों से इशारा किया कि वह अंदर बैठे जबकि वह धीमी आवाज़ में बड़बड़ा रहा था. वह कभी-कभी अपने बड़े भाइयों पर अपने फख़्र के बारे में डींग मारती थी. जब वह अपने पति इनायत से गुस्सा होती थी, तो वह कहती थी, 'मेरे भाई शेर-ए-बब्बर की तरह खड़े हैं, और अगर तुम ऐसे ही करते रहे, तो एक दिन वे तुम्हें काट कर टुकड़े फेंक देंगे, हुशियार!' लेकिन यह यकीन पूरी तरह से मिट गया था. उसके भाइयों के अल्फ़ाज़ उसके कानों में गूँज रहे थे: 'अगर तुममें हमारे परिवार की इज्जत बनाए रखने की समझ होती, तो तुम खुद को आग लगा लेती और मर जाती. तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था.'
गाड़ी में बैठते समय उसने अपने घर की ओर मुड़कर नहीं देखा – न अपनी माँ की ओर, जिन्हें वह शायद खिड़की से झाँकते हुए देखती, न अपनी बहनों की ओर जो परदे के पीछे से झाँक रही होतीं, और न ही अपनी भाभियों की ओर, जो शायद वैसे भी अपने कामों में मुब्तिला होतीं. लेकिन उसके नकाब के नीचे से आँसू उसके चेहरे पर बह रहे थे. वह अपने होठों को काटते हुए और छोटी-छोटी सिसकियाँ निगलते हुए बैठी रही.
गाड़ी तेज़ी से चल रही थी. कोई नहीं बोला. अमान मोहल्ले के ड्राइवर के बगल में सामने वाली सीट पर बैठा था. क्या कोई उसके सामने परिवार के राज़ खोल सकता था? उनका सफर खामोशी से जारी रहा. सोलह साल तक वह इनायत के प्यार और वासना के खेल में मोहरा बनी रही थी. और सोलह साल बाद, उसने उसके औरत होने की बेहुरमती की थी . 'तुम लाश की तरह पड़ी रहती हो. मुझे तुमसे क्या खुशी मिली?' उसने उसे ताना मारा था. 'मैंने तुम्हें क्या नहीं दिया – पहनने को, खाने को? मुझे कौन रोकने वाला है? मैं उस औरत के साथ हूँ जो मुझे खुशी देती है.'
उसने पेड़ों या नज़ारों या सड़क पर ध्यान नहीं दिया. तभी अचानक गाड़ी रुक गई और उसने उदास नज़रों से बाहर देखा तो उसे वह घर दिखाई दिया जिसे वे उसका घर कहते थे. सामने वाले दरवाज़े से एक मुरझाए चेहरे वाली नौजवान लड़की गाड़ी की ओर दौड़ती हुई आई, यह कहते हुए, 'अम्मी! आखिरकार तुम वापस आ गईं. मैं बहुत फिक्रमंद थी.' उसने माँ की बाहों से बच्ची को उठाया, उसे अपनी छाती से लगाया और दौड़कर अंदर चली गई.
मेहरून धीरे-धीरे घर में दाखिल हुई. यह खाली लग रहा था. बाकी बच्चे स्कूल गए हुए थे, और उसकी सोलह साल की बेटी सलमा, जो अपनी अम्मी के दर्द को उनके साथ सहती थी, उस दिन घर में सबसे बड़ी थी. सलमा ने अपने भाई-बहनों को पढ़ाई के लिए भेज दिया था, अपनी अम्मी के लौटने का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी. अपनी अम्मी के साथ अपने मामूओं को देखकर उसने राहत की साँस ली. वह अपने मामूओं को देखकर खुश थी. वह सोच रही थी कि वे उस दूसरी औरत को बालों से घसीटकर भगा देंगे. वह एक हिरणी की तरह दौड़ती रही, अपने मामूओं के लिए नाश्ता लाती रही, चाय उबालती रही.
मेहरून अपने कमरे में लेटी हुई थी. सलमा अंदर आई, अपनी अम्मी के चेहरे से आँसू पोंछे, उसे कुछ कौर खिलाया, और बचे हुए खाने की प्लेट लेकर वापस बाहर आ रही थी कि उसे एक परिचित आवाज़ सुनाई दी.
वह दौड़कर बेडरूम में वापस गई. 'अम्मी, अम्मी, अब्बा आ गए हैं.' मेहरून ने न सुनने का नाटक किया और जिस कंबल से खुद को ढका था, उसमें और दब गई. उसके सिर की नसें तड़क रही थीं जैसे ही सलमा बैठक में बाहर निकली. उसके मामू बाहर जा चुके थे, और सलमा मर्दों को बात करते हुए सुन सकती थी, जिसमें बातचीत थी, हँसी थी, सलाम थे.
'अरे, भैय्या! आप किस समय आए?' इनायत पूछ रहा था.
'हम अभी आए. आप कैसे हैं?'
'ओह, मैं ठीक हूँ, अल्लाह का शुक्र है. और आपकी सभी दुआओं का भी.'
अमान की आवाज़: 'आप कहाँ थे, इनायत भाई?'
'बस यहीं. कुछ काम, यह और वह करना – आप जानते ही हैं. आखिरकार, हम जागने के बाद सिर्फ घर पर नहीं बैठ सकते. सलमा,' उसने आवाज़ दी. 'सलमा, अम्मी कहाँ हैं? देखो कौन आया है. अम्मी से बाहर आने के लिए कहो.'
घर के अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई. 'पता नहीं वह कहाँ है,' इनायत ने कहा. 'वह बच्ची के साथ अंदर होगी. मुझे उसे बुलाने दो, रुको.' वह अंदर आया और सलमा को देखा, और उससे धीमी आवाज़ में पूछा: 'ये लोग कब आए? तुम्हारी अम्मी कहाँ हैं?' उसके दिल में शक की एक गाँठ पैदा हुई.
'मामू अभी आए हैं. अम्मी अभी भी सो रही हैं,' सलमा ने चालाकी से जवाब दिया.
इनायत ने राहत की साँस ली.
'वह अभी तक नहीं उठी? उसे क्या हो गया है?' वह बेडरूम के दरवाज़े पर आया. मेहरून को सिकुड़ी हुई और सोई हुई देखकर उसे नफरत हुई. उसकी नज़र में उसकी अहमियत सिर्फ इतनी थी कि वह उसके बच्चों की माँ थी. हालाँकि वह चाहता था अंदर जाए पर उसके पैर उसे अंदर नहीं ले गए.
उसने तसव्वुर किया कि वह दरवाज़े पर कैसे खड़ा होगा. उसके कपड़े, सिगरेट की बदबू, उसके पसीने की गंध, उसका बूढ़ा होता शरीर, उसकी बड़ी आँखें. वह आदमी जिसने उसकी हर नस पर अपनी छाप छोड़ी थी, वह उसके लिए एक अजनबी था. वह कंबल में कसकर लिपटी रही, उसकी आवाज़ सुनती रही.
'सलमा, यहाँ आओ. उसे यह सब नाटक बंद करने के लिए कहो. कि अगर उसने अपने भाइयों को मुझे सलाह देने के लिए बुलाया है, तो वह अपने ही गले में फंदा डाल रही है. एक ही साँस में – एक, दो, तीन बार – मैं कहूँगा और इसे खत्म कर दूँगा, उसे बताओ. और उसे बताओ कि उसके तलाक के बाद, देखो क्या वह अपनी छोटी बहनों और अपनी बेटियों की शादी करवा पाती है. उसे यह बताओ – कि वह मेहमानों के सामने परिवार की इज्जत खराब कर रही है. अपनी अम्मी को बताओ, अपने भाइयों का इस्तकबाल करे – उससे पूछो कि उसे चिकन चाहिए या मटन, क्योंकि अब लगभग दोपहर हो गई है, तो उसे बताओ कि जल्द ही दोपहर का खाना बनाना शुरू करे.'
सलमा वहाँ थी भी नहीं, लेकिन उसने जो कुछ भी कहना था, उसने सब उगल दिया, यह तसव्वुर करते हुए कि वह वहाँ थी.
इनायत और उसके साले ऐसे बात कर रहे थे जैसे कहीं कुछ भी गलत नहीं था. उन्होंने कॉफी की कीमतों के बारे में, कश्मीर में चुनावों के बारे में, पड़ोस में एक बुजुर्ग जोड़े के कत्ल की जाँच के बारे में, मोहल्ले की उस मुस्लिम लड़की के बारे में जिसने एक हिंदू लड़के से सिविल मैरिज की थी, इधर उधर की बातें होती रही।बातचीत जारी रही जैसे ही प्रेशर कुकर की सीटी बजी, और ब्लेंडर घूमा, और मसाले की तेज़ गंध फैल गई, और चिकन लाया गया, और खाना तैयार था क्योंकि मेहरून ने उसे बनाया था, और सलमा उन सभी को दोपहर का खाना परोसने दौड़ती रही. मेहरून किचन से केवल एक बार, केवल थोड़े समय के लिए बाहर निकली.
बढ़िया खाने पीने के बाद, पान चबाते हुए मेहरून के भाई जाने के लिए तैयार हो गए. जाने से पहले, अमान आया और किचन के दरवाज़े के पास खड़ा हो गया. 'थोड़ी समझदारी से काम लो और यह सब संभालो,' उसने कहा. 'मैं अगले हफ्ते मिलने आऊँगा. वह कुछ दिनों तक ऐसी हरकतें करेगा और फिर खुद ही वापस आ जाएगा. तुम्हें ज़िम्मेदार होना चाहिए. कुछ महिलाओं को किन तकलीफों का सामना करना पड़ता है – शराबी शौहर , पीटने वाली सास. खुदा का शुक्र है कि तुम अच्छी हालत में हो. वह थोड़ा गैर-जिम्मेदार है, बस यही है. तुम ही हो जिसे यह सब ठीक करना है.' उसके भाई चले गए, और जैसे ही कार की आवाज़ दूर हुई, इनायत भी घर से बाहर निकल गया.
सलमा अपनी माँ की ओर मुड़कर देखने लगी. उसके मामूओं ने न तो उसे तसल्ली दी थी और न ही उसकी मदद की थी. वह अपनी अम्मी के दुःख से धड़कने लगी. उसके अब्बू के बाहर निकलते ही उसकी आँखों में आँसू भर आए थे. घर उदासी की चादर में लिपटा हुआ था, और जब उसके भाई-बहन स्कूल से लौटे तो वे इस चादर को उठा नहीं पाए. हर किसी का अपना काम था, हर किसी का अपना बोझ.
जैसे ही शाम की रोशनी कम होने लगी, घर के चारों ओर चिराग़ जलाए गए. लेकिन मेहरून का चिराग़-ए-दिल बहुत पहले ही बुझ चुका था. वह किसके लिए जीती? क्या फायदा था? दीवारें, छत, प्लेटें, कटोरे, चूल्हा, बिस्तर, बर्तन, सामने के आँगन में गुलाब का पौधा – इनमें से कोई भी उसके सवालों का जवाब नहीं दे पा रहा था. उसे अपने चारों ओर मंडराती, रखवाली करती नीरस आँखों की जोड़ी का एहसास भी नहीं हुआ. सलमा अपनी किताबों में खो जाना चाहती थी; उसे अपनी आने वाली एस एस एल सी के इम्तहान की तैयारी करनी थी. लेकिन एक बड़ी फ़िक्र, जिसका नाम नहीं लिया जा सकता था, उसकी अम्मी को लगातार उसकी नज़र में रखती थी.
रात की खामोशी में, मेहरून अंधेरे में घूरती रही. यह उसकी ज़िन्दगी जितना ही काला था. बच्चे सो रहे थे. केवल सलमा अभी भी जगी हुई थी, बैठक में पढ़ाई कर रही थी, उसकी आँखें अपनी माँ के कमरे पर टिकी हुई थीं. मेहरून की नींद गायब हो गई थी. उसने सोचा : क्या उसके मायके में उसकी लड़ाई आसान थी? इनायत से उसकी शादी उसके दूसरे साल के बी कॉम परीक्षा से एक महीने पहले हुई थी. वह रोई, उसने इम्तहान में बैठने की इजाज़त देने की भीख माँगी, लेकिन उसकी दलीलों पर सब बहरे हो गए थे. शादी के एक हफ्ते बाद, उसने हिचकिचाते हुए अपने शौहर से इसके बारे में बात की. वह हँसा, उसे 'प्यार', 'डार्लिंग', 'मेरा दिल' कहा. 'अगर तुम यहाँ नहीं हो,' उसने कहा था, 'क्या मैं साँस लेना बंद नहीं कर दूँगा?' मेहरून का मानना था कि अगर वह उसके साथ नहीं होती, तो शायद वह ऐसा ही करता. वह खुश थी. उसने उसकी हर ख्वाहिश पूरी की थी , और वह ऐसा चिराग़ था जिसने उसके दिल को रोशन किया था.
सिर्फ एक साल पहले जब उसके सास-ससुर का इंतकाल हुआ, तब मेहरून को आखिरकार उसका शौहर पूरी तरह से मिल गया. उसकी ननदें अपने शौहरों के घर चली गई थीं; उसके देवर अपने-अपने रास्ते चले गए थे. अपने खुद के घर का यह पुराना सपना पूरा हो गया था. लेकिन अब जब यह पूरा हो गया था, तो उसके चेहरे पर झुर्रियां पड़ गई थीं, और उसके हाथों पर नसें उभर आई थीं, और उसकी आँखों के नीचे कालिख थी, उसकी एड़ियाँ फट गई थीं, और उसके कटे-फटे, बेतरतीब नाखूनों के नीचे गंदगी जम गई थी, उसके बाल पतले हो गए थे – और उसने इनमें से किसी पर भी ध्यान नहीं दिया था. और शायद इनायत ने भी ध्यान नहीं दिया होता, अगर उसके अपेंडिक्स के ऑपरेशन, और उस नर्स के लिए नहीं, जो एक प्राइवेट अस्पताल में बहुत कम तनख्वाह पर बहुत ज्यादा काम कर रही थी, जिसकी आँखों में हजारों सपने थे, जो अपनी चमकती ज़िल्द और शहद जैसी आँखों से हवा में चलती या शायद तैरती थी – कोई बता नहीं सकता था – जो एक भँवर की तरह खींचती थी, जो अपने तीसवें साल में फिसल रही थी, और अपने मुस्तकबिल को मजबूत करने और अपने सपनों को पूरा करने के लिए कुछ भी, बिल्कुल कुछ भी करने के लिए तैयार थी.
इनायत ने नर्स को 'सिस्टर' कहकर पुकारा नहीं था. अस्पताल में बिताए उन सभी दिनों के पहले दिन से ही, उसने उसे उसके नाम से बुलाया था.
और फिर उसने उस कोख को बेइज़्जत किया था, जिसने उसे उसके कई बच्चे दिए थे. उसने मेहरून के ढीले पेट और उसके लटके हुए स्तनों के लिए उसे ताने दिए थे,जिसने उनके बच्चों की भूख मिटाई थी. उसने उसकी रूह को भी उरियाँ महसूस कराया था. एक दिन उसने कहा था, 'तुम मेरी अम्मी जैसी हो,' और उन लफ़्ज़ों के साथ उसे जिंदा जहन्नुम में धकेल दिया था. इन लफ़्ज़ों को सुनने के बाद के कुछ महीनों में, उस घर में खाया गया हर निवाला उसे हराम जैसा लगता था. अपने ही घर में अजनबी होने का एहसास उसे सता रहा था, और ज़िल्लत की आग उसे जला रही थी, और इसलिए उसने अपने परिवार से मदद मांगी थी.
रात गहरी होती जा रही थी, और मेहरून के दिल की बेचैनी सख्त होती जा रही थी. उसने कभी इतना अकेला महसूस नहीं किया था. उसकी कोई इच्छा नहीं थी. वह बिस्तर पर बैठ गई. कोई नहीं था जो उसकी परवाह करता. कोई नहीं था जो उसे छेड़ता, गले लगाता, चूमता. वह व्यक्ति जिसने यह सब किया था, वह अब किसी और का था. ज़िन्दगी का कोई मतलब नहीं लग रहा था. और पीछे से आने वाला तेज शोर भी उसे हिला नहीं पाया. उसे पता था कि एक फ्रेम वाली तस्वीर गिर गई थी और शीशा टूट गया था, और फ्रेम टुकड़ों में टूट गया था, और तस्वीर बाहर गिर गई थी, लेकिन एक तरह की चिंता उसके अंदर घर कर गई थी और उसे साफ करने की कोई इच्छा नहीं थी. वह धीरे-धीरे बिस्तर से उतरी. उसने अपनी बच्ची को देर तक घूरा, और फिर कमरे से बाहर चली गई. उसके छोटे बच्चे सुकून से सो रहे थे.
जब वह चुपचाप बैठक में गई, तो उसने देखा कि सलमा, जो वहाँ पढ़ाई कर रही थी, सो गई थी, उसका सिर मेज पर टिका था. वह वहाँ खड़ी रही, अपनी सोई हुई बेटी के बगल में, और काँपने लगी. उसने सोचा था कि उसके सारे एहसासात मर चुके थे, लेकिन सलमा को देखकर उसके अंदर जो लहर दौड़ रही थी, उसने उसे गिरने पर मजबूर कर दिया. उसने अपनी बेटी को छूने की एक जबरदस्त आरज़ू को रोका और अपने दिल में उससे कहा, 'तुम्हें इन बच्चों की माँ बनना है, मेरी प्यारी.'
उसके कदम धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे. उसने दरवाज़ा खोला और सामने के आँगन में कदम रखा. उसने जो कुछ पौधे पाले थे, वे रोते हुए लग रहे थे. वे उसके द्वारा लिए गए फैसले से मुतफ्फिक होकर सिर हिलाते हुए लग रहे थे. वह वापस अंदर आई, अपने पीछे दरवाज़ा बंद किया, रसोई में गई, मिट्टी के तेल का डिब्बा उठाया और घर के चारों ओर घूमती रही, यह तय नहीं कर पा रही थी कि उसे अपने ऊपर डालते समय कहाँ होना चाहिए. वह बैठक में वापस आने से पहले अपने सोते हुए बच्चों को एक बार फिर देखने के लिए रुकी.
उसने सलमा की ओर नहीं देखा.
वह तेजी से रसोई में गई, माचिस उठाई और उसे अपने दाहिने हाथ में कसकर पकड़े हुए, चुपचाप सामने के दरवाज़े का कुंडी खोली और फिर से आँगन में कदम रखा. उसने अंधेरे में घूरा और सुनिश्चित किया और सोचा कि उसके पास कोई नहीं था, कोई उसे नहीं चाहता था, जैसे ही उसने अपने ऊपर मिट्टी का तेल डाला. वह अपने काबू से बाहर एक ताकत की गिरफ्त में थी. उसने चारों ओर देखा, और कोई आवाज़ उस तक नहीं पहुँची, और उसे कोई छुअन महसूस नहीं हुई, कोई यादें नहीं बची थीं, कोई रिश्ते उसे भेद नहीं सकते थे. वह अपने एहसास से परे थी.
लेकिन सब कुछ घर के अंदर हो रहा था, जहाँ बच्ची की भूख की चीखों ने सलमा को अचानक जगा दिया था, और उसे बच्ची को अपनी छाती से लगाने के लिए दौड़ा दिया था, और 'अम्मी, अम्मी' कहकर चिल्लाई, कमरे को पार करके जहाँ उसके भाई-बहन सो रहे थे और फिर घर के चारों ओर अपनी अम्मी को ढूंढ रही थी, उसने खुला दरवाज़ा देखा और आँगन में दौड़ पड़ी, और, उस धुंधले अंधेरे में भी, अपनी अम्मी का चेहरा देखा और मिट्टी के तेल की बदबू को महसूस किया. बिना सोचे समझे वह आगे दौड़ी, बच्ची को अपने हाथों में लिए हुए, और उसने अपनी अम्मी को कसकर गले लगा लिया. उसकी अम्मी हाथ में माचिस लिए हुए, उसे गले लगाने वाली लड़की को बेज़ारी से देखती रही, मानो वह किसी और का इंतज़ार कर रही हो. सलमा ने बच्ची को ज़मीन पर लिटाया और ज़ोर से रोई, 'अम्मी! अम्मी! हमें छोड़कर मत जाओ!' उसने अपनी माँ के पैर पकड़ लिए.
सलमा सिसक रही थी, और नन्हा बच्चा ज़मीन पर रो रहा था. मेहरून ने उनकी ओर देखा, और उस अजीब ताकत से आज़ाद होने के लिए जूझने लगी जिसने उसे जकड़ रखा था, और माचिस उसके हाथ से गिर गई. सलमा अभी भी अपनी अम्मी के पैरों से लिपटी हुई थी. 'अम्मी,' वह कह रही थी. 'सिर्फ इसलिए कि आपने एक आदमी को खो दिया है, आप हम सभी को उस औरत की दया पर छोड़ देंगी? आप अब्बा के लिए मरने को तैयार हैं, लेकिन क्या आप हमारी खातिर जी नहीं सकती है? आप हम सबको यतीम कैसे बना सकती हैं, अम्मी? हमें आपकी ज़रूरत है.' लेकिन उसके लफ़्ज़ों से ज़्यादा, सलमा की छुअन ने उसे मुतास्सिर किया.
उसने सिसकते हुए बच्चे को उठाया और सलमा को अपनी छाती से लगा लिया, और, यह महसूस करते हुए कि उसे एक दोस्त द्वारा तसल्ली मिल रही है, छुआ जा रहा है और समझा जा रहा है, मेहरून की आँखें भारी हो गईं, और वह बस इतना ही कह पाई, 'मुझे माफ़ करना, मेरी प्यारी,' अब रात का अंधेरा पिघल रहा था.
चित्र : AI द्वारा निर्मित