विचाराभिव्यक्ति

विचाराभिव्यक्ति यह विचारों का कर्मक्षेत्र है।

12/09/2026

💐🙏 #विचाराभिव्यक्ति 🙏💐
#दिनांक: १२-०९-२०२६
#दिवसः शनिवार
#विधा: भजन गीत
#विषय :राम–केवट सम प्रीत

नाव खड़ी थी तीर पर,केवट विनत प्रणाम करूँ।
चरण पखारूँ हे प्रभु, मन में यही अभिराम करूँ।
पत्थर तारा आपने, मेरी नैया भी तारो,
दीन-दयालु राम मेरे, भवसागर से उबारो।

चरणामृत की आशा में, केवट का मन डोला।
प्रेम भरे अनुराग से, प्रभु के आगे नत बोला।
धन-दौलत कुछ भी नहीं,बस चरणों का दान प्रभो,
राम-कृपा मिल जाए तो,सफल हो मेरा प्राण विभो।

राम हँसे, फिर प्रेम से, केवट को गले लगाया।
निष्कपट उसकी भक्ति ने, प्रभु को भी रिझाया।
जाति-पाँत सब मिट गई,बस प्रेम पहचान रहा,
भक्त और भगवान में, मीत प्रीत सम्मान हुआ।

नाव केवल लकड़ी की,राम को गंगा पार किया,
केवट नैया साथ में, पार भक्त निष्काम हुआ।
जिसके चितवन प्रेम हो, उसका क्या संसार हो,
राम-नाम का नाविक केवट,भवसागर से पार हो।

कवि✍️ डॉ० राम कुमार झा 'निकुंंज'
रचना: मौलिक (स्वरचित)
कोलकाता

23/07/2026

संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे
इस लोक को भी अपना न सके उस लोक में भी पछताओगे
ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या रीतों पर धर्म की मोहरें हैं
हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे
ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचियता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे
हम कहते हैं ये जग अपना है तुम कहते हो झूटा सपना है
हम जन्म बिता कर जाएँगे तुम जन्म गँवा कर जाओगे

साहिर लुधियानवी

17/03/2026

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
किसी काम में जो न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ

न दवा-ए-दर्द-ए-जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नज़र हूँ मैं
न इधर हूँ मैं न उधर हूँ मैं न शकेब हूँ न क़रार हूँ

मिरा वक़्त मुझ से बिछड़ गया मिरा रंग-रूप बिगड़ गया
जो ख़िज़ाँ से बाग़ उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ

पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँ
कोई आ के शम' जलाए क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ

न मैं लाग हूँ न लगाव हूँ न सुहाग हूँ न सुभाव हूँ
जो बिगड़ गया वो बनाव हूँ जो नहीं रहा वो सिंगार हूँ

मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँ-फ़ज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुखी की पुकार हूँ

न मैं 'मुज़्तर' उन का हबीब हूँ न मैं 'मुज़्तर' उन का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ

19/01/2026

मौन का अर्थ चुप रह जाना नहीं, बल्कि अंदर की स्थिरता है।
जब कोई परिस्थिति हमें चुनौती देती है—अपमान, हानि, असफलता, गलतफ़हमी, या विरोध—तो हमारा मन तुरंत प्रतिक्रिया देना चाहता है। क्रोध, डर, सफ़ाई, तर्क, आरोप… ये सब मन के शोर हैं।
और शोर में कभी सही निर्णय नहीं होता।
मौन वह स्थिति है जहाँ
आप परिस्थिति के भीतर नहीं, उसके ऊपर खड़े हो जाते हैं।
उस क्षण आप प्रतिक्रिया नहीं करते, आप उत्तर देते हैं।
प्रतिक्रिया बाहर से आती है, उत्तर भीतर से।
जब व्यक्ति मौन में रहता है, तब:
वह दूसरे के शब्दों से नहीं हिलता
वह परिस्थिति की ऊर्जा में नहीं बहता
वह अपनी शक्ति को बचाए रखता है
यही कारण है कि मौन कमजोर नहीं, अत्यंत शक्तिशाली है।
जब आत्मा स्वयं को शांत, स्थिर और साक्षी रूप में अनुभव करती है, तब कोई भी बाहरी तूफ़ान उसे हिला नहीं सकता।
जिसके भीतर शांति है, उसके सामने परिस्थिति हार जाती है।
और जिसके भीतर अशांति है, वह छोटी-सी बात से भी टूट जाता है।
मौन हमें तीन अद्भुत क्षमताएँ देता है:
पहली – स्पष्टता
मौन में बुद्धि साफ़ देख पाती है कि क्या सही है, क्या नहीं।
शोर में हम केवल भावनाओं से सोचते हैं।
दूसरी – ऊर्जा संरक्षण
बहस, शिकायत और प्रतिक्रिया हमारी शक्ति चुरा लेते हैं।
मौन उस शक्ति को बचाकर रखता है।
तीसरी – आत्मसम्मान
जब आप हर बात पर प्रतिक्रिया नहीं देते,
तो आप दूसरों को सिखाते हैं कि आपकी शांति सस्ती नहीं है।
जब आप आत्मा-चेतना में, परमात्मा की याद में स्थिर रहते हैं,
तब बाहर चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, अंदर विजय बनी रहती है।
इसलिए मौन का अर्थ हार मानना नहीं,
बल्कि यह कहना है—
“मैं परिस्थिति नहीं हूँ, मैं उसे देखने वाला आत्मा हूँ।”
यही वास्तविक विजय है।
ओम शांति।

05/01/2026

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