15/11/2025
उत्सुक पर्यवेक्षक एवं प्रकृति-प्रेमी
न केवल मनोज्ञ दृश्य, वृक्ष, फूल और फ़सल, अपितु पशु, पक्षी, मछलियाँ और यहाँ तक कि कीड़े-मकोड़े में भी गुरुजी की रुचि थी। एक दिन, जब वे 16 वर्ष के होने वाले थे, उन्होंने चलते समय एक ततैया को देखा। वह अपने बनाए छेद के मुँह में, एक गतिहीन टिड्डा ले आ रहा था। गुरुजी की अवलोकन की गहरी शक्ति और कीटों के विषय में ज्ञान के कारण, उन्हें पता चला कि टिड्डा मरा नहीं था; उसे ततैये के डंक से लकवा मार गया था। ततैया छेद में घुसा, उभरा और फ़िर उसने टिड्डे को अन्दर खींच लिया। तत्पश्चात्, उसने वह छेद बन्द कर दिया और चला गया। गुरुजी ने सुना था कि ततैया अंडे देती है और अंडे से निकलने वाले लार्वा के पोषण के लिए, भोजन के रूप में टिड्डा देती है।
वे छेद के भीतर के घटनाक्रम को देखना चाहते थे, परन्तु आंशिक रूप से इसे उजागर नहीं करना चाहते थे। हालाँकि, प्रकृति ने उनका साथ दिया। अगली बार जब वे उस स्थान पर आए, तो उन्होंने पाया कि अज्ञात कारणों से, छेद की मिट्टी के आवरण में एक छोटा सा छेद हो गया था। वे अपना मुख उसके पास लाए और उन्होंने अन्दर झाँका। उन्होंने देखा कि लार्वा एक वयस्क ततैया से अलग दिखता है। गुरुजी ने लार्वा और टिड्डे की अधिक विस्तार से जाँच करने का निर्णय लिया। इस उद्देश्य के लिए, उन्हें एक लेंस की आवश्यकता थी, परन्तु वे उसे नहीं लाए थे। वे अपने अध्ययन को एक और दिन के लिए टालना नहीं चाहते थे । साधन-सम्पन्न होने के कारण, उन्होंने एक सूखा पत्ता उठाया, उसमें एक छोटा सा छेद किया व उस छेद पर वर्षा के पानी की एक बूँद डाल दी। पत्ते को उचित रूप से पकड़े हुए, उन्होंने पानी की बूँद को लेंस के रूप में प्रयोग किया और अपने अध्ययन को आगे बढ़ाया।
एक अन्य अवसर पर, उन्होंने एक बन्दर को पड़ोसी वृक्षों की दो बहुत नीची, क्षैतिज शाखाओं के बीच के छोटे से अन्तराल में अपना हाथ पकड़े, प्रतीयमानतः बहुत चिन्ताग्रस्त बैठे देखा। यह देखने के लिए कि बन्दर के हाथ में क्या है, गुरुजी ने अपना सिर धरती के पास रखा। उन्होंने देखा कि इसमें एक सेब था, जो सम्भवतः किसी ने वहाँ गिरा दिया था। चूँकि बन्दर अपनी मुट्ठी से फल को छोड़ना नहीं चाहता था, इसलिए वह अपना हाथ निकालने और स्वयं को छुड़वाने में असमर्थ था। गुरुजी ने सोचा, "अपनी बुद्धिमत्ता के होते हुए भी, यह बन्दर नहीं चाहता है कि फल को छोड़े, अपना हाथ उस अन्तराल में से बाहर निकाल ले व फ़िर उसी फल को नीचे से उठा ले ।”
उन्हें बन्दर पर दया आ गई। तो, उन्होंने उस बन्दर को अपने स्वयं के बनाए बन्धन से मुक्त करने की योजना के साथ, एक केले को छीला और गूदे को उसके मुँह के पास ले गए। बन्दर आगे झुक गया और फल खाने लगा, परन्तु सेब को पकड़े रहा। गुरूजी ने दूसरा केला छीला। इस बार, उन्होंने इसे बन्दर से कुछ दूरी पर रख दिया। बन्दर के पास केला पाने के लिए सेब को छोड़ने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। जब वह केला खा रहा था, गुरुजी ने सेब बाहर निकाल दिया और उसे वापस बन्दर को सौंप दिया।
गुरुजी ने कहा है – “भगवान की रचना कितनी आकर्षक है। प्रकृति हमें ईश्वर की स्मृति दिलाती है और वास्तव में, यह सब के सामने उनकी अभिव्यक्ति है। जब कोई रात में आकाश या समुद्र को देखता है, तो वह शान्ति की भावना से आप्लावित हो जाता है और यह भी अनुभव करता है कि वह ब्रह्माण्ड में कितना नन्हा सा है। नदी की लहरों पर खेल रही सूर्य की किरणें, हरे भरे खेत, बन्दरों के खेल-कूद, गायों का स्नेह आदि आनन्ददायक हैं। यहाँ तक कि कीड़ों से भी, जिन्हें बहुत से लोग तुच्छ समझते हैं, हमें सीखने के लिए बहुत कुछ है। प्रकृति एक निःशुल्क रमणीय प्रदर्शनी है, जो सभी के अनुभव के लिए उपलब्ध है। विचित्र की बात है कि कई लोग इसे अनदेखा कर देते हैं और बहुत सारा पैसा और समय व्यर्थ करके, अश्लील चलचित्र देखकर और फूहड़ गीतों वाले शब्दावली सुनकर, अपने मन को दूषित कर देते हैं।"