Sanatan Jeevan Yatra

Sanatan Jeevan Yatra सनातन जीवन यात्रा

15/02/2026

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🚩 सावधान सनातनी: बंटोगे तो कटोगे, एक रहोगे तो सुरक्षित रहोगे! 🚩
आज स्वार्थ की राजनीति अपने चरम पर है। कुछ 'आधुनिक जयचंद' सक्रिय हो चुके हैं जिनका न तो धर्म से कोई लेना-देना है और न ही समाज के कल्याण से। उनका एकमात्र एजेंडा है— हिन्दू एकता को खंडित करना।

⚠️ बांटने की गहरी साजिश को पहचानें
जब-जब हिन्दू एक हुआ है, तब-तब धर्म की विजय हुई है। इसी एकता से घबराकर अब समाज को भीतर से खोखला करने का खेल खेला जा रहा है:

कभी अगड़ा बनाम पिछड़ा

कभी सवर्ण बनाम दलित

कभी क्षेत्रवाद (मराठी, बिहारी, पंजाबी)

और अब जातिगत विद्वेष (ब्राह्मण बनाम यादव आदि)

ये जयचंद नए-नए विमर्श (Narratives) गढ़कर हमारे बीच नफरत का जहर फैला रहे हैं। इनका लक्ष्य स्पष्ट है—आपको जातियों में उलझाकर सनातन को कमजोर करना।

🤝 हमारी प्रतिज्ञा
हमें समझना होगा कि शत्रु केवल बाहर नहीं, हमारे बीच भी है। स्वार्थी राजनीति के इन मोहरों को पहचानिए:

ऐसी किसी भी पोस्ट या समाचार को बढ़ावा न दें जो एक जाति को दूसरी जाति के विरुद्ध खड़ा करती हो।

याद रखें, हम किसी भी जाति से पहले एक 'हिन्दू' हैं, एक 'सनातनी' हैं।

इतिहास गवाह है कि जब-जब हम जातियों में बंटे हैं, तब-तब बाहरी आक्रांताओं ने हमें कुचला है।

"जाति पाति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।"
हम सब एक हैं, हमारा रक्त एक है, हमारा धर्म एक है!

जयचंदों की चालबाज़ियों को विफल करें। संगठित रहें, सुरक्षित रहें।

🚩 जय श्री राम! जय सनातन! 🚩

सौजन्य: सनातन सेवा संघ

15/02/2026

🔱 ओम् नमः शिवाय 🔱
"न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं, न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता, चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥"

समस्त सनातन प्रेमियों को महाशिवरात्रि के महापर्व की अनंत शुभकामनाएँ!

🕉️ शिव ही सत्य है, शिव ही अनंत है
महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के मिलन का उत्सव है। यह अंधकार पर प्रकाश और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है। देवाधिदेव महादेव की कृपा आप सभी पर सदैव बनी रहे।

🙏 हमारा संकल्प: सेवा और सनातन
महादेव के आशीर्वाद से सनातन सेवा संघ सदैव धर्म की रक्षा और समाज की सेवा हेतु तत्पर है। आइए, इस पुण्य अवसर पर हम अपने भीतर के 'शिव' को जाग्रत करें और लोक-कल्याण का मार्ग चुनें।

प्रार्थना:
हे नीलकंठ! इस सृष्टि का कल्याण करें, हर घर में सुख-शांति का वास हो और सनातन का ध्वज विश्व भर में गौरव के साथ लहराता रहे।

हर-हर महादेव!

सादर प्रेषक:
विपिन अग्रवाल
सनातन सेवा संघ

13/12/2025

सनातन प्रकाश – कहानी भाग 1
(जहाँ से जागता है भाग्य चक्र)

प्रातःकाल का समय था। आश्रम में वेद-मंत्रों की मधुर ध्वनि वातावरण को पवित्र कर रही थी। विशाल पीपल वृक्ष की छाया में श्वेत वस्त्रों में विराजमान एक तेजस्वी संत अपने सामने बैठे भक्तों को जीवन को सुखमय बनाने के सरल किंतु गूढ़ उपाय बता रहे थे।

उनके मुख पर दिव्य शांति और नेत्रों में करुणा की अपार ज्योति थी। आश्रम में उपस्थित सभी उन्हें आदर से “गुरुजी” कहकर संबोधित करते थे।

गुरुजी ने शांत स्वर में कहा —
“मेरे प्रिय जनों, हम सब सनातनी हैं। सनातन धर्म केवल एक पंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिव्य पद्धति है। जब तक हम इसके मार्ग पर चलते हैं, प्रभु की कृपा सदा हमारे साथ रहती है।”

तभी एक युवा शिष्य ने हाथ जोड़कर विनम्रता से प्रश्न किया —
“गुरुजी, यदि हम पर प्रभु की कृपा सदा रहती है, तो फिर हमारे जीवन में दुःख और परेशानियाँ क्यों आती हैं?”

गुरुजी मंद मुस्कान के साथ बोले —
“वत्स, सुख और दुःख जीवन के शाश्वत नियम हैं। यह नियम इतना व्यापक है कि इससे स्वयं ईश्वर भी अछूते नहीं रहे। श्रीराम को वनवास मिला, श्रीकृष्ण को अपनों का त्याग सहना पड़ा। परंतु अंतर यह है कि उन्होंने दुःख को भी धर्म के मार्ग में साधना बना लिया।”

शिष्य ने पुनः जिज्ञासा से पूछा —
“तो क्या जो दुःख हमारे जीवन में आते हैं, वे कभी समाप्त नहीं होते?”

गुरुजी ने गंभीर स्वर में कहा —
“नहीं वत्स, दुःख स्थायी नहीं होते। परंतु जब मनुष्य का भाग्य चक्र सुप्त अवस्था में चला जाता है, तब संकट दीर्घकालिक प्रतीत होने लगते हैं। हमारा मस्तिष्क, हमारे संस्कार और हमारा भाग्य—तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।”

शिष्य ने चिंतित होकर पूछा —
“गुरुजी, यह भाग्य चक्र सुप्त क्यों पड़ जाता है? और क्या कोई उपाय है जिससे यह जागृत रहे?”

गुरुजी ने शिष्यों की ओर दृष्टि डालते हुए कहा —
“जब हम सनातन वैदिक पद्धति से दूर हो जाते हैं, जब हम अपने दैनिक जीवन में धर्म, संयम, सेवा और साधना को त्याग देते हैं—तब हमारा भाग्य चक्र शिथिल पड़ जाता है।”

फिर उन्होंने आश्वस्त स्वर में कहा —
“उपाय बहुत सरल हैं, छोटे हैं, किंतु अत्यंत प्रभावशाली हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम उन्हें प्रतिदिन अपने आचरण में उतारें।”

शिष्य के नेत्रों में आशा की चमक थी। उसने श्रद्धा से कहा —
“गुरुजी, कृपा कर हमें सनातन वैदिक पद्धति का ज्ञान दीजिए, ताकि हम इन उपायों को अपनाकर अपने जीवन के संकटों से मुक्त हो सकें।”

गुरुजी ने नेत्र मूँदकर कहा —
“वत्स, यही जिज्ञासा तुम्हें प्रकाश की ओर ले जाएगी…।”

आगे क्या होगा?
सनातन वैदिक पद्धति के कौन से सरल नियम हैं जो भाग्य चक्र को जागृत करते हैं?
दैनिक जीवन में कौन से छोटे अभ्यास संकटों को दूर करते हैं?

इन दिव्य रहस्यों को जानने के लिए देखें — कहानी भाग 2

06/12/2025

पवित्र समर्पण: धर्म की निधि, धर्म की सेवा! 🚩

सनातन सेवा का स्पष्ट भाव: ईश्वर को समर्पित दान/धन केवल ईश्वर का होता है।

यह केवल आर्थिक सहायता नहीं है, यह एक पवित्र धरोहर है, जिसका उपयोग धर्म और समाज के उत्थान के लिए होना चाहिए।

✨ हमारे तीन स्तंभ (Triple Mandate):

कार्य (The Purpose): इस निधि का सदुपयोग ईश्वरीय कार्यों (मंदिर, गौशाला, धर्मार्थ शिक्षा, सेवा प्रकल्पों) में हो।

कर्ता (The Management): इसका प्रबंधन ईश्वर में अटूट विश्वास रखने वाले, ईमानदार और सेवाभावी कार्यकर्ताओं द्वारा किया जाए।

फल (The Benefit): इसका अंतिम लाभ ईश्वर में विश्वास रखने वाले समस्त सनातनियों और समाज के हितार्थ हो।

आपका समर्पण, धर्म की शक्ति है। आइए, हम सब मिलकर इस पवित्र निधि का सदुपयोग सुनिश्चित करें!

जय सनातन 🚩 जय गौ माता 🚩

#सनातनसेवासंघ #जयसनातन #सनातनधर्म #सनातन_निधि #धर्मार्थ #ईश्वरीय_कार्य #जयगौमाता #सेवाभाव #धर्मोरक्षतिरक्षितः

“जिस सच को वर्षों से दबाया गया, आज वो परत-दर-परत खुल रहा है…और जो नाम सबसे ज़्यादा पवित्र दिखता था, वही सबसे बड़ा सवालों...
01/12/2025

“जिस सच को वर्षों से दबाया गया, आज वो परत-दर-परत खुल रहा है…और जो नाम सबसे ज़्यादा पवित्र दिखता था, वही सबसे बड़ा सवालों के घेरे में है।”

🔱 अविमुक्तेश्वरानंद के बयान की असल कहानी — तथ्य, परंपरा और राजनीति का संगम अविमुक्तेश्वरानंद जी ने एक बार फिर वही पुराना राग छेड़ दिया—“अयोध्या में ध्वजारोहण की कोई प्रामाणिकता ही नहीं, ये तो मनमर्जी की रस्म है। शास्त्रों में इसका कहीं जिक्र नहीं।”
बयान छोटा था, लेकिन उसमें छिपा अहंकार कई परतें खोल गया। सबसे पहले—उन्होंने ‘हम’ शब्द का इस्तेमाल किया।
‘हम’ मतलब शंकराचार्य। परंपरा के चार स्तंभ:

उत्तर—ज्योतिर्मठ (अथर्ववेद)

पश्चिम—द्वारका शारदा पीठ (सामवेद)

पूर्व—पुरी गोवर्धन पीठ (ऋग्वेद)

दक्षिण—श्रृंगेरी शारदा पीठ (यजुर्वेद)

चारों पीठों की व्यवस्था शास्त्र, विधि और गुरु–परंपरा से चलती है....लेकिन यहाँ कहानी पलट जाती है।

🔸 2022 में ज्योतिर्मठ के वास्तविक शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का महाप्रयाण हुआ। उन्होंने कोई उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था। अचानक सामने आते हैं—स्वघोषित उत्तराधिकारी अविमुक्तेश्वरानंद, हाथ में एक वसीयत लिए। पर हिन्दू समाज के प्रतिष्ठित संगठनों ने उस तथाकथित वसीयत को अमान्य बताया। पुरी पीठ के शंकराचार्य ने भी इनको स्वीकारने से साफ मना किया। सन्यासी अखाड़ों, काशी विद्वत परिषद तथा कई मान्य संस्थाओं ने इन्हें मान्यता नहीं दी।
यानी, जिस गद्दी की बात ये करते हैं— उस पर विधिवत अभिषेक ही नहीं हुआ। इतना ही नहीं, अदालत ने भी इनके “राज्यारोहण” पर रोक लगा दी है।

🔸 उदाहरण से समझिए—

राजा तब राजा बनता है जब वेद–मंत्रों से अभिषेक होता है।
प्रधानमंत्री तब प्रधानमंत्री बनता है जब राष्ट्रपति उसे शपथ दिलाता है।नपर यहाँ मामला उल्टा है— पद मिला नहीं, पर व्यवहार उसी पद का!

अब आते हैं मूल मुद्दे पर—ध्वजारोहण।

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🚩 क्या शास्त्रों में ध्वजारोहण का उल्लेख नहीं है?

जो दावा किया गया, वह आधा–अधूरा और भ्रमपूर्ण है।

वैखानस आगम, कश्यप संहिता, मार्कण्डेय संहिता —
स्पष्ट लिखते हैं कि ध्वज स्थापना अनिवार्य है।

पांचरात्र आगम — ध्वजारोहण को विजय और मंगल का सूचक बताता है।

भविष्य पुराण —
“जिस देवालय पर ध्वज न फहरे, वह स्थान श्मशान तुल्य होता है।”

विष्णु पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण, भागवत पुराण
सबमें ध्वज, ध्वजदंड, यशचिह्न का वर्णन मिलता है।

वैष्णव मंदिर में गरुड़ ध्वज, शैव मंदिर में वृषभ ध्वज।

आज भी बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ, सोमनाथ, श्रीरंगम, रामेश्वरम—
हर प्रमुख मंदिर में ध्वजारोहण सबसे पहले होने वाली विधि है।

ध्वजारोहण उत्सव की घोषणा है,
जबकि शिखर पूजन निर्माण की अंतिम संस्कार विधि है
जो राममंदिर में 2024 में प्राण-प्रतिष्ठा के साथ सम्पन्न हो चुकी है।

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🕉️ जो स्वयं परंपरा से प्रमाणित न हो, वह परंपरा पर प्रश्न उठाए तो कैसा?

यही विडंबना है—
जो व्यक्ति विधि-विधान से अपने पद पर आसीन नहीं हुआ,
वही शास्त्रीयता का सबसे बड़ा ठेकेदार बनकर घूम रहा है। लोग आम धोती–कुर्ते में साधु को सम्मान दे देते हैं, तो भगवा वस्त्र, त्रिपुंड और रुद्राक्ष धारण किए व्यक्ति पर कोई कठोर शब्द भी नहीं बोल पाते। पर इसका अर्थ यह नहीं कि हर कथन शास्त्रसम्मत ही होता है।

अयोध्या में ध्वज फहरा—ये परंपरा थी, है और आगे भी रहेगी।
और यह भी उतना ही सत्य है कि रामभक्ति की धारा को कोई मनगढ़ंत बहस रोक नहीं सकती।
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🔱 समापन — महादेव कृपा करें, विवेक जागृत रहे

धर्म की रक्षा तर्क, परंपरा और अनुभव—तीनों से होती है।
मतभेद हों, परंतु मनभेद न हों। और जो भ्रम फैलाए, उसे शांत भाव से तर्क देकर जवाब दिया जाए।

जय वैदिक सनातन धर्मस्य 🔱🚩🏹🪈

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❓ अब एक बात आप बताइए…

क्या आपको लगता है कि ऐसे विवादित बयानों का उद्देश्य सिर्फ सुर्खियाँ बटोरना होता है? क्या इसके पीछे कोई और वजह है?
अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें! 👇

उत्सुक पर्यवेक्षक एवं प्रकृति-प्रेमीन केवल मनोज्ञ दृश्य, वृक्ष, फूल और फ़सल, अपितु पशु, पक्षी, मछलियाँ और यहाँ तक कि कीड...
15/11/2025

उत्सुक पर्यवेक्षक एवं प्रकृति-प्रेमी

न केवल मनोज्ञ दृश्य, वृक्ष, फूल और फ़सल, अपितु पशु, पक्षी, मछलियाँ और यहाँ तक कि कीड़े-मकोड़े में भी गुरुजी की रुचि थी। एक दिन, जब वे 16 वर्ष के होने वाले थे, उन्होंने चलते समय एक ततैया को देखा। वह अपने बनाए छेद के मुँह में, एक गतिहीन टिड्डा ले आ रहा था। गुरुजी की अवलोकन की गहरी शक्ति और कीटों के विषय में ज्ञान के कारण, उन्हें पता चला कि टिड्डा मरा नहीं था; उसे ततैये के डंक से लकवा मार गया था। ततैया छेद में घुसा, उभरा और फ़िर उसने टिड्डे को अन्दर खींच लिया। तत्पश्चात्, उसने वह छेद बन्द कर दिया और चला गया। गुरुजी ने सुना था कि ततैया अंडे देती है और अंडे से निकलने वाले लार्वा के पोषण के लिए, भोजन के रूप में टिड्डा देती है।

वे छेद के भीतर के घटनाक्रम को देखना चाहते थे, परन्तु आंशिक रूप से इसे उजागर नहीं करना चाहते थे। हालाँकि, प्रकृति ने उनका साथ दिया। अगली बार जब वे उस स्थान पर आए, तो उन्होंने पाया कि अज्ञात कारणों से, छेद की मिट्टी के आवरण में एक छोटा सा छेद हो गया था। वे अपना मुख उसके पास लाए और उन्होंने अन्दर झाँका। उन्होंने देखा कि लार्वा एक वयस्क ततैया से अलग दिखता है। गुरुजी ने लार्वा और टिड्डे की अधिक विस्तार से जाँच करने का निर्णय लिया। इस उद्देश्य के लिए, उन्हें एक लेंस की आवश्यकता थी, परन्तु वे उसे नहीं लाए थे। वे अपने अध्ययन को एक और दिन के लिए टालना नहीं चाहते थे । साधन-सम्पन्न होने के कारण, उन्होंने एक सूखा पत्ता उठाया, उसमें एक छोटा सा छेद किया व उस छेद पर वर्षा के पानी की एक बूँद डाल दी। पत्ते को उचित रूप से पकड़े हुए, उन्होंने पानी की बूँद को लेंस के रूप में प्रयोग किया और अपने अध्ययन को आगे बढ़ाया।

एक अन्य अवसर पर, उन्होंने एक बन्दर को पड़ोसी वृक्षों की दो बहुत नीची, क्षैतिज शाखाओं के बीच के छोटे से अन्तराल में अपना हाथ पकड़े, प्रतीयमानतः बहुत चिन्ताग्रस्त बैठे देखा। यह देखने के लिए कि बन्दर के हाथ में क्या है, गुरुजी ने अपना सिर धरती के पास रखा। उन्होंने देखा कि इसमें एक सेब था, जो सम्भवतः किसी ने वहाँ गिरा दिया था। चूँकि बन्दर अपनी मुट्ठी से फल को छोड़ना नहीं चाहता था, इसलिए वह अपना हाथ निकालने और स्वयं को छुड़वाने में असमर्थ था। गुरुजी ने सोचा, "अपनी बुद्धिमत्ता के होते हुए भी, यह बन्दर नहीं चाहता है कि फल को छोड़े, अपना हाथ उस अन्तराल में से बाहर निकाल ले व फ़िर उसी फल को नीचे से उठा ले ।”

उन्हें बन्दर पर दया आ गई। तो, उन्होंने उस बन्दर को अपने स्वयं के बनाए बन्धन से मुक्त करने की योजना के साथ, एक केले को छीला और गूदे को उसके मुँह के पास ले गए। बन्दर आगे झुक गया और फल खाने लगा, परन्तु सेब को पकड़े रहा। गुरूजी ने दूसरा केला छीला। इस बार, उन्होंने इसे बन्दर से कुछ दूरी पर रख दिया। बन्दर के पास केला पाने के लिए सेब को छोड़ने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। जब वह केला खा रहा था, गुरुजी ने सेब बाहर निकाल दिया और उसे वापस बन्दर को सौंप दिया।

गुरुजी ने कहा है – “भगवान की रचना कितनी आकर्षक है। प्रकृति हमें ईश्वर की स्मृति दिलाती है और वास्तव में, यह सब के सामने उनकी अभिव्यक्ति है। जब कोई रात में आकाश या समुद्र को देखता है, तो वह शान्ति की भावना से आप्लावित हो जाता है और यह भी अनुभव करता है कि वह ब्रह्माण्ड में कितना नन्हा सा है। नदी की लहरों पर खेल रही सूर्य की किरणें, हरे भरे खेत, बन्दरों के खेल-कूद, गायों का स्नेह आदि आनन्ददायक हैं। यहाँ तक कि कीड़ों से भी, जिन्हें बहुत से लोग तुच्छ समझते हैं, हमें सीखने के लिए बहुत कुछ है। प्रकृति एक निःशुल्क रमणीय प्रदर्शनी है, जो सभी के अनुभव के लिए उपलब्ध है। विचित्र की बात है कि कई लोग इसे अनदेखा कर देते हैं और बहुत सारा पैसा और समय व्यर्थ करके, अश्लील चलचित्र देखकर और फूहड़ गीतों वाले शब्दावली सुनकर, अपने मन को दूषित कर देते हैं।"

🚩 सनातन राष्ट्र के विशेष अभियान में आपका सहयोग अपेक्षित है! 🚩प्रिय सनातनी बंधु/भगिनी,सनातन धर्म के प्रति श्रद्धा भावना स...
14/11/2025

🚩 सनातन राष्ट्र के विशेष अभियान में आपका सहयोग अपेक्षित है! 🚩

प्रिय सनातनी बंधु/भगिनी,

सनातन धर्म के प्रति श्रद्धा भावना से परिपूर्ण हृदय हर सनातनी को पवित्र, पावन और गौरवान्वित होने का एहसास देता है।

इसी भाव के साथ, हर सनातनी का साथ पाना सनातन सेवा संघ का गौरवमयी लक्ष्य है, जिसके चलते राष्ट्रीय स्तर पर आज सैकड़ों सनातनी बंधु/भगिनी इस कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं।

हम आपसे भी आशा करते हैं कि आप सनातन राष्ट्र के इस विशेष अभियान में सनातन सेवा संघ की सदस्यता ग्रहण कर हमें सहयोग करें।

जैसा कि आप जानते हैं:

पूज्य संतों का संगठन - सनातन सेवा संघ - आज सनातन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत है।

हम समाज के सभी सनातनी बंधुओं/भगिनियों को एक मंच पर एकत्र कर, विशाल सनातन सुरक्षा चक्र "सुदर्शन" का निर्माण कर रहे हैं।

हम आपसे विनम्र निवेदन करते हैं कि आप सनातन सेवा संघ की सम्मानित सदस्यता ग्रहण कर इस पुनीत कार्य में सहभागी बनें।

📞 किसी भी जानकारी हेतु:

आप हमें "8588861100" पर व्हाट्सएप करें।

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निवेदक

सनातन सेवा संघ

जय गौ माता 🙏

13/11/2025

विस्मयकारी अभिलक्षण
परहितकारी

आँधी से उखड़ा हुआ एक वृक्ष सड़क पर गिर गया। उसके कारण, उस मार्ग पर चलने वाली सभी गाड़ियों को अड़चन से पार पाने हेतु, गति को कम करते हुए रेंगकर सड़क के किनारे तक धीरे-धीरे चलने के लिए बाध्य होना पड़ा। जिस कार में गुरुजी (परमपूज्य जगद्गुरु श्री अभिनव विद्यातीर्थ महास्वामी जी) यात्रा कर रहे थे, वह उस समय वृक्ष को पार कर चुकी थी जब उन्होंने उस कार के चालक को कार रोकने के लिए कहा। गुरुजी ने आदेश दिया, "यदि हम आगे बढ़ते हैं, जैसे हमसे पहले कई अन्य लोगों ने किया है, तो वाहन चालकों को इस स्थान पर असुविधा उठानी पड़ती रहेगी। इसलिए, हमें वृक्ष को सड़क के किनारे पर हटा देना चाहिए।" उनके निर्देश के अनुसार, मठ के कर्मचारियों ने स्वयं को वृक्ष के स्थानान्तरित करने के काम में लगाया। यद्यपि गुरुजी उस समय वृद्ध व अस्वस्थ थे, तथापि वे मूकदर्शक नहीं बने रहे। उन्होंने सुझाव दिया और अपने शारीरिक परिश्रम से भी योगदान दिया। कुछ ही समय में सड़क अड़चन से मुक्त हो गई। अच्छे काम को पूरा करने के बाद, गुरुजी ने अपनी यात्रा पुनः प्रारम्भ की।

1960 में आंध्र-प्रदेश की अपनी पहली यात्रा के समय, एक बार गुरुजी ने लगभग एक घंटे की यात्रा की थी जब उन्होंने दूर से देखा कि सड़क पर एक गाड़ी आंशिक रूप से पलटी हुई पड़ी है। कुछ वाहन चालक बिना रुके आगे बढ़ गए। गुरुजी ने अपनी कार को दुर्घटनास्थल के पास रुकवा लिया और तुरन्त बुरी तरह से क्षतिग्रस्त उस वाहन के पास गए। उन्होंने देखा कि एक गतिहीन एवं रक्त से लथपथ व्यक्ति उसके भीतर फँसा हुआ है। एक क्षण में उन्हें पता चला कि यह दुर्घटना केवल कुछ मिनट पहले ही हुई है और वह व्यक्ति केवल अचेत है, मरा नहीं। उन्होंने मठ के एक विश्वसनीय कर्मचारी को एक एम्बुलेंस की व्यवस्था करने के लिए मठ की एक गाड़ी में तेज़ी से चलने का निर्देश दिया।

यह निर्धारित करके कि उस कार को सीधा खड़ा करने के बाद ही उस दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को बाहर निकाला जा सकता है, गुरुजी ने अपने परिजनों के साथ आवश्यक सहायतार्थ कठिन परिश्रम किया। वे तब अपने 40वें वर्ष में थे और अच्छी तरह से व्यायाम से पुष्ट माँसपेशियाँ कड़ी और शक्तिशाली थीं। फिर भी, चूँकि वाहन भारी था, उसे अन्ततः अपने पहियों पर खडे करने से पहले बहुत प्रयास करना पड़ा। गुरुजी ने तब चोटिल व्यक्ति की सावधानी से जाँच की और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि एम्बुलेंस के आने की प्रतीक्षा किए बिना, उस घायल व्यक्ति को निकालना सुरक्षित होगा। एक कामचलाऊ स्ट्रेचर का उपयोग करते हुए, गुरुजी ने नरमी से उसे मठ के एक बड़े वाहन में स्थानान्तरित कर दिया और चालक को उस दिशा में अबाध गति से आगे बढ़ने का आदेश दिया, जिस दिशा से एम्बुलेंस के आने की आशा थी। उनके कार्यों ने यह सुनिश्चित किया कि दुर्घटना से घायल व्यक्ति को शीघ्रातिशीघ्र चिकित्सा की सहायता मिले। गुरुजी के समय पर किए गए उपकार के कारण, गम्भीर रूप से चोटिल व्यक्ति बच गया और उबर गया।

1970 के दशक की प्रारम्भ में कोयम्बत्तूर की यात्रा के समय, गुरुजी से अनुरोध किया गया था कि वे एक स्थल पर अनुग्रह-भाषण दें। उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी। उस स्थान पर उन्होंने देख पाया कि अस्थायी रूप से उनके भाषण के लिए लगाए हुए ध्वनिवर्धक ने उनके शब्दों को बहुत सुन्दर ढंग से पुनःप्रस्तुत किया। सदैव आसानी से प्रसन्न हो जाने वाले गुरुजी ने, आयोजकों के प्रयासों की सार्वजनिक रूप से सराहना की। अपने आसन पर बैठे-बैठे उन्होंने देखा कि लाउड स्पीकर न केवल हॉल के भीतर, पर सड़क के किनारे पर भी, लगाए गए थे। उनकी तीक्ष्ण पर्यवेक्षण शक्ति से उन्हें ऐसा लगा कि बिना किसी कठिनाई के, कार्यक्रम स्थल के बाहर लगे ध्वनिवर्धकों को डिस्कनेक्ट करना सम्भव है।

उन्होंने कहा, “कृपया सड़क पर लगे ध्वनिवर्धकों को डिस्कनेक्ट करें। यह पर्याप्त है, और वास्तव में उचित भी, कि मेरा भाषण केवल यहाँ सुना जाए और बाहर नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि रुचि रखने वाले लोग, पहले से ही अन्दर बैठे हैं। यह ठीक नहीं है कि सड़क पर चल रहे लोग, जिनकी इस व्याख्यान को सुनने में रुचि नहीं है, उन्हें इस भाषण को सुनने के लिए बाध्य किया जाए। प्रायः विवाह के समय, लाउड स्पीकर इस तरह से चलते हैं कि सड़क पर स्थित लोगों के कानों में सङ्गीत शोर मचाता है। उन्हें लगता है, 'यह समारोह कितना पीड़ाकर है!' सबकी शुभकामनाएँ प्राप्त करने के बदले, वर और वधू अनावश्यक रूप से कुछ ऐसे लोगों के वैमनस्य के पात्र बनते हैं जिन्हें वे जानते भी नहीं। समारोह, चाहे वे विवाहों के हों या इस तरह के आयोजनों के, ध्वनि प्रदूषण के कारण नहीं होने चाहिए।"

गुरुजी द्वारा दिए प्रस्ताव को आयोजकों ने सहज ही कार्यान्वित कर लिया; वैसे तो गुरुजी ने पहले ही समझ लिया था कि बाहरी ध्वनिवर्धकों को सरलता से अलग किया जा सकता है। जनता के प्रति गुरुजी के विचार और ध्वनि प्रदूषण – जो एक ऐसी समस्या, जिसे अब के विपरीत, 1970 के दशक के आरम्भ में भारत में अधिकतर अनदेखा किया गया था – उससे बचने की उनकी तत्परता उल्लेखनीय हैं।

11/11/2025

*फरीदाबाद में अचानक आतंकियों द्वारा संगृहीत विस्फोटक से दिल्ली एनसीआर में सीरियल धमाके से दहलाने की साजिश हुई नाकाम तो पुलिस एवं जांच अधिकारियों के द्वारा ढूंढे जा रहें आतंकी डॉ. उमर ने दिल्ली में कर दिया लालकिले के मेट्रोस्टेशन के पास कर दिया ब्लास्ट।*

*सवाल :* अब सवाल ये है की क्या ये आत्मघाती ब्लास्ट था या एक तीर से दो शिकार की साजिश, पहला शिकार दिल्ली को दहलाना और दूसरा उमर को मिटाना क्यूंकि उमर यदि जिंदा पकड़ में आ जाता तो पता नहीं किस किस का चेहरा सामने आता ?

*ऐसा हम क्यों कह रहें है ?*
*तो इस कहानी को शुरुआत से समझिये*

ये साजिश शुरू होती है 19 अक्टूबर 2025 को जम्मूकश्मीर अनंतनाग से अनंतनाग मेडिकल कॉलेज का रेजिडेंट डॉ. आदिल अहमद जीएस के लिए सेना और सरकार के खिलाफ पोस्टर लगाता सीसीटीवी में कैद हो जाता हैं और जम्मू कश्मीर पुलिस जब मेडिकल कॉलेज पहुँचती है तो डॉ. आदिल भाग चुका होता है और वहां उसके लॉकर की तलाश में मिलती है एक AK-47 और पुलिस समझ जाती है की मामला उतना छोटा नहीं जितना दिखाई दे रहा है और जब जांच शुरू होती है तो डॉ. आदिल उत्तर प्रदेश के साहरनपुर में दबोच लिया जाता हैं और यहाँ से खुलना शुरू होता है एक बड़ा आतंकवादी नेटवर्क जिसका केंद्र बिंदु है फरीदाबाद की अल फलाह मेडिकल यूनिवर्सिटी जहाँ कई डॉ. है जो जम्मू कश्मीर के निवासी हैं और पकडे गए डॉ. आदिल अहमद से खुलासा शुरू होता है डॉ. मुजम्मिल गनई का की वह भी आतंकवाद जैश संगठन के लिए काम करता हैं

इस जानकारी के बाद जे&के पुलिस हरियाणा पुलिस की मदद से डॉ. मुजम्मिल गनई के दो ठिकानों पर छापा मारती है और वहां जो मिलता है ना सिर्फ पुलिस के पूरी हरियाणा सरकार के हाथ पाँव फूल जाते है, छापे में मिलता है बहुत ही खतरनाक बहुत ही भारी मात्रा में 2900 किलो विस्फोटक पदार्थ, AK47 रायफल और गोलियां जिससे पूरे दिल्ली एनसीआर को धमाकों से दहलाया जा सकता था।

इसके बाद डॉ. मुजम्मिल गनइ को पकड़ लिया जाता है और पूछताछ में दो और जिहादी डॉक्टरों के नामों का खुलासा होता है पुलवामा निवासी डॉ. उमर मोहम्मद और महिला डा. शाहीन अहमद निवासी लखनऊ और जब तक डॉ. उमर मोहम्मद पकड़ा जाता वह अपनी आई 20 कार लेकर दिल्ली भाग चुका होता हैं। और छापे के दौरान जिस कार में AK47 रायफल और गोलियां मिली थी वह कार थी लखनऊ निवासी डा. शाहीन अहमद की जो की बहुत ही करीबी थी डॉ. मुजम्मिल गनइ और डॉ. उमर मोहम्मद की और वह भी लखनऊ के लिए फरार हो जाती हैं। और डॉ. शाहीन एक महिला डॉ. ही नहीं शायद एक बहुत बड़े आतंकी नेटवर्क की कमांडर भी थी। अभी डॉ. शाहीन और अन्य आतंक से जुड़ें किरदारों की बात बाद में करते है और चलते है दिल्ली के उस ब्लास्ट की और जिसके धमाके ने 14 साल बाद भारत सरकार और सभी एजेंसियों के कान खड़े कर दिए !

*अब यहां से उठता है वो सवाल की दिल्ली ब्लास्ट आत्मघाती हमला या एक तीर से दो शिकार की साजिश ?*

*हम ऐसा क्यों कह रहे हैं इसे समझने की कोशिश करतें है*
*भारी मात्रा में विस्फोटक की बरामदगी और डॉ. मुजम्मिल की गिरफ्तारी से डॉ. उमर मोहम्मद दिल्ली की और भागता नजर आता है*
*10 नवम्बर सुबह 8 बजे* बदरपुर टोलप्लाजा पर अपनी आई 20 कार में बिलकुल अकेला और सीसीटीवी में दिखाई देता है की वह अकेला है और उसकी गाड़ी नार्मल कंडीशन में है।

*उसके बाद दोपहर में* एक पेट्रोल पम्प पर पॉल्यूशन सेंटर पर पॉल्यूशन चैक करवाते हुए क्यूंकि उसे मालूम है इस समय दिल्ली में पॉल्यूशन की चैकिंग जगह जगह पर है और यहाँ उसके साथ दो लोग और मौजूद हैं जो पॉल्यूशन चैकिंग के समय बहार भी आते है लेकिन मोहम्मद उमर कार से बाहर नहीं आता।

*इसके बाद लगभग 3:30 बजे* ये कार सुनहरी मस्जिद पार्किंग में जाती हुई दिखाई देती है जहाँ वह फिर अकेला है और उसकी कार का बोनट खुला हुआ नजर आ रहा हैं।

*इसके बाद ये कार 3:30 बजे से 6:30 बजे तक* उसी पार्किंग में रही होगी क्यूंकि 6:30 बजे ये कार सुनहरी मस्जिद से बहार आ रही है और इस बार वह खुला बोनट एक कपड़ें से बंधा हुआ हैं

*और 6:30 बजे* ये रेंगती मौत की गाडी 6:55 पर पहुँच जाती है लालकिला मेट्रो स्टेशन गेट नंबर 1 के पास जहाँ होता है एक खतरनाक विस्फोट और जहाँ 10 लोगो से अधिक मौत के गाल में समा जाते है और 24 लोग घायल होकर हॉस्पिटल पहुँच जाते हैं।

*अब यहां से उठता है वो सवाल की दिल्ली ब्लास्ट आत्मघाती हमला या एक तीर से दो शिकार की साजिश ?*

*सवाल एक :* इस कार में विस्फोटक कब, कहाँ और कैसे आया ?

*दो :* बीच में डॉ. उमर के साथ दिखाई देने वाले लोग कहां मिले और कहाँ गए

*तीसरा :* फरीदाबाद से चली कार का नार्मल बोनट मस्जिद में जाने से पहले खुला हुआ क्यों है क्या उस बोनट में विस्फोटक रखवाया गया है ?

*चौथा :* तीन घंटे सुनहरी मस्जिद पार्किंग में कार को क्यों ले जाया गया, उमर मोहम्मद कहँ था, किससे मिला ?

*पांचवा :* क्या विस्फोटक को पार्किंग के अंदर ही फिट करके बोनट को कपड़ें से बांधा गया ?

*छठा :* क्या ये वास्तव में आत्मघाती हमला था क्या मोहम्मद उमर ने चलती गाड़ी में खुद ब्लास्ट किया या कोई टाइमर था या किसी कंट्रोल द्वारा उड़ाया गया ?

*सातवा :* क्या पकड़ें जाने से पहले मोहम्मद उमर की ये सोच थी की पकड़ा जाना सुनिश्चित है तो एक भयानक ब्लास्ट के साथ उसने मरना और मारना स्वीकार किया ?

*आंठवा :* या फिर मोहम्मद उमर किसी के कंट्रोल या किसी के निर्देश पर काम कर रहा था जिसने अपना पर्दाफांस होने से पहले एक तीर से दो शिकार किए मोहम्मद उमर को भी उड़ा दिया और एक आत्मघाती हमले से दिल्ली को दहलाने की एक कोशिश में भी कामयाब हो गएँ ?

*नवां सवाल :* की यदि कार में विस्फोटक दिल्ली में लगाया गया तो उस विस्फोटक का संग्रह केंद्र कहाँ हैं ?

*और दसवा सवाल : की जहाँ से दिल्ली में ब्लास्ट के लिए कार में इतना खतरनाक विस्फोटक फिट किया गया क्या उस जगह पर और विस्फोटक पदार्थ नहीं होगा की दूसरी साजिश को अंजाम ना दे सकें। ?*

सभी घटनाओं को अखबार, टीवी समाचार और सोशल मीडिया से प्राप्त जानकारी के आधार पर जो घटनाक्रम दिखाई दिया है वह लिखकर मन में आये सवालों को आप सब तक पहुंचाने का प्रयास है की किसी और अनहोनी को टाला जा सकें।

*हो सकें तो कृपया आप इन्हें शेयर करें और अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं.*

09/11/2025

🚩 सनातन जागृति का आह्वान: संकट, भक्ति और वह ज्ञान जो आपसे छिपाया गया
हर घर में, हर परिवार में, एक प्रश्न गूँजता है: "हे ईश्वर! इतनी भक्ति, इतना जप-तप, इतनी धार्मिक यात्राएँ... फिर भी मेरे और मेरे परिवार के संकट दूर क्यों नहीं हो रहे?"

जब यह प्रश्न उठता है, तो विश्वास डगमगाता है। लेकिन इसका उत्तर भक्ति की कमी में नहीं, बल्कि सत्य ज्ञान के अभाव में छिपा है।

I. 😔 संकटों की जड़: अज्ञानता का आवरण
आपका प्रश्न सनातन धर्म के सबसे मूलभूत और उपेक्षित सत्य की ओर संकेत करता है। इसका सीधा जवाब है: अज्ञानता और स्वार्थवश ज्ञान को छिपाना।

आज अधिकांश प्राणी उन स्वयंभू धर्माचार्यों के मार्गदर्शन में हैं, जो या तो स्वयं वैदिक शास्त्रों के गहन ज्ञान से रहित हैं, या यदि उन्हें सत्य ज्ञात भी है, तो वे स्वार्थवश आपको वह सत्य कारण बताना नहीं चाहते।

📜 सत्य: जब तक आप अपने धर्मशास्त्रों के धर्म ज्ञान और वैदिक सिद्धांतों को नहीं जानेंगे, तब तक आपकी तमाम पूजा-पाठ, नाम-जप, धार्मिक यात्राएँ और तीर्थ यात्राएँ मात्र कर्मकांड बनकर निष्फल ही सिद्ध होंगी।

भक्ति एक शक्ति है, लेकिन जब उसे ज्ञान की दिशा नहीं मिलती, तो वह भटक जाती है। संकटों को दूर करने के लिए केवल समर्पण ही नहीं, बल्कि ईश्वरीय नियम को समझना भी अनिवार्य है।

II. 🔬 वह सनातन ज्ञान, जिसे विज्ञान अब मानता है
यह विडंबना है कि जिस बात को आज आधुनिक विज्ञान अपने उपकरणों और अनुसंधानों के माध्यम से सिद्ध करता है, हम उसे तुरंत स्वीकार कर लेते हैं। जबकि वही अकाट्य प्रमाण, सैकड़ों वर्षों से हमारे अपने वेद-शास्त्रों में पूर्ण प्रामाणिकता के साथ व्याप्त हैं, पर हमने उन पर विश्वास नहीं किया या उन्हें पढ़ने का प्रयास नहीं किया।

विचार करें:

खगोल विज्ञान (Astronomy): नव ग्रह और नक्षत्रों की गति, सूर्य और चंद्र ग्रहण की सही तारीखें और समय—ये सभी विवरण आज से हज़ारों वर्ष पूर्व हमारे वैदिक ग्रंथों में सटीकता से दर्ज किए गए थे।

ऊर्जा और गति का विज्ञान: एक ग्रह से दूसरे ग्रह की दूरी, ग्रहों की गति और ऊर्जा का मनुष्य के जीवन (ज्योतिष) तथा उसके कर्मों पर होने वाला सूक्ष्म प्रभाव, हमारे शास्त्रों में सदियों से बताया जा रहा है।

ध्वनि और चिकित्सा विज्ञान: ब्रह्मांड में उत्पन्न होने वाली 'ॐ' की ध्वनि की शक्ति, सूर्य ऊर्जा द्वारा चिकित्सा (सूर्य नमस्कार/अर्घ्य) के लाभ, और मस्तिष्क पर तिलक लगाने के वैज्ञानिक लाभ को विज्ञान अब प्रमाणित कर रहा है।

वास्तु और ऊर्जा क्षेत्र: स्थानीय स्तरों पर बने मठों, मंदिरों और आश्रमों के ऊर्जा ज्ञान के सिद्धांत (Energy Grid Principles)—जो स्थान विशेष की सकारात्मकता को बढ़ाते हैं—को विज्ञान ने अब जाकर प्रमाणित करना शुरू किया है।

सनातन धर्म अंधविश्वास नहीं, बल्कि विज्ञान का जनक है। हमारी पूजा-पाठ केवल रीति-रिवाज नहीं, बल्कि इन वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित ऊर्जा का संतुलन करने की प्रक्रियाएँ हैं।

III. 🧘‍♀️ संकल्प: सनातन जीवन यात्रा की ओर वापसी
आपके कष्टों की निष्फलता का एक मात्र समाधान यही है कि आप भक्ति और ज्ञान के बीच की दूरी को मिटाएँ।

सनातन सेवा संघ ने यह परम सिद्ध संकल्प लिया है:

हर सनातनी को परम सिद्ध पूज्य संतों के सानिध्य में, वेद शास्त्रों के सिद्धांतों पर आधारित 'सनातन जीवन यात्रा' का ज्ञान प्रदान करवाया जाए।

यह 'सनातन जीवन यात्रा' आपको सिखाएगी कि:

आपकी भक्ति की दिशा क्या हो: कामनापूर्ति नहीं, बल्कि आत्म-कल्याण।

आपकी पूजा का विज्ञान क्या हो: केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि ऊर्जा का शुद्धिकरण।

आपके कर्मों का नियम क्या हो: प्रारब्ध और कर्मफल को कैसे समझें और स्वीकारें।

जब ज्ञान होगा, तब भक्ति फलीभूत होगी। तभी आप अपनी पूजा-पाठ, धार्मिक यात्राओं और तीर्थ यात्राओं से मिलने वाले पुण्यफल को पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकेंगे और आपके संकट स्वयं ही ज्ञान के प्रकाश में विलीन होने लगेंगे।

आपका अगला कदम क्या होना चाहिए? क्या आप जानना चाहेंगे कि सनातन जीवन यात्रा के ज्ञान को अपने दैनिक जीवन में कैसे लागू किया जाए, ताकि आपकी भक्ति और अनुष्ठान फलदायक हो सकें?

09/11/2025

🔱 सनातन दृष्टि: संकट, भक्ति और अज्ञानता

यह प्रश्न प्रत्येक उस श्रद्धालु के मन में उठता है, जो जीवन में घोर संकटों से घिरा है, जबकि उसने भक्ति, पूजा-पाठ, जप-तप, तीर्थ यात्रा में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसा सोचने पर व्यक्ति का ईश्वर और धर्म से विश्वास डगमगाने लगता है।

आपके प्रश्न का मूल उत्तर, जैसा कि आपने संकेत किया है, वैदिक शास्त्रों के सही ज्ञान और उसके व्यावहारिक पक्ष को न समझने में निहित है।

🤔 संकट क्यों नहीं कट रहे? – सनातन धर्म का वास्तविक सिद्धांत
सनातन धर्म में संकटों का प्रमुख कारण कर्मफल सिद्धांत (प्रारब्ध) है।

1. प्रारब्ध और संचित कर्म का फल:

मनुष्य का वर्तमान जीवन उसके संचित कर्मों (पिछले जन्मों के) के एक भाग, जिसे प्रारब्ध कहते हैं, का फल है।

आपके घोर तप, भक्ति, और पूजा-पाठ के बावजूद जो संकट सामने हैं, वे आपके प्रारब्ध के कठोर फल हैं, जिन्हें भोगना अनिवार्य है।

भक्ति का कार्य: भक्ति इन संकटों को पूरी तरह से समाप्त नहीं करती, बल्कि उन्हें हल्का कर देती है, उनकी तीव्रता कम कर देती है, या बड़े संकट को छोटे रूप में टाल देती है। भक्त को यह शक्ति मिलती है कि वह स्थिर चित्त से उन संकटों को सहन कर सके।

उदाहरण: माता सीता और पांडवों को भी अपने प्रारब्ध भोगने पड़े थे, जबकि वे स्वयं धर्म के उच्चतम स्वरूप थे।

2. अज्ञानता और स्वार्थ का आवरण:

जो स्वयंभू धर्माचार्य और तथाकथित गुरु केवल 'उपाय' और 'अनुष्ठान' बेचते हैं, वे प्रायः इस कर्मफल के सत्य को नहीं बताते। वे लोगों को यह आश्वासन देते हैं कि बस 'इतना' कर लो, और सारे संकट खत्म हो जाएँगे।

यह अज्ञानता है कि हम भक्ति को केवल एक सौदेबाजी मान लेते हैं— "मैंने इतनी पूजा की, अब भगवान मेरा काम करें।" सनातन भक्ति ऐसी सौदेबाजी नहीं, बल्कि निष्काम प्रेम है।

3. भक्ति का लक्ष्य विस्मृत:

भक्ति का परम लक्ष्य मोक्ष या भगवत्-प्राप्ति है, न कि केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति। जब हमारा ध्यान केवल संकटों को काटने पर केंद्रित हो जाता है, तो हम भक्ति के वास्तविक उद्देश्य से भटक जाते हैं।

सच्ची भक्ति से व्यक्ति को धैर्य, शांति, और ईश्वर पर अटूट विश्वास मिलता है, जिससे वह संकटों के बीच भी विचलित नहीं होता।

💡 संकटों के बीच सच्ची सनातन साधना
निष्काम कर्म और भक्ति: कर्मफल की चिंता किए बिना अपना कर्म (धर्म) करें और फल को ईश्वर पर छोड़ दें। संकटों से मुक्ति की कामना से नहीं, बल्कि प्रेम और कर्तव्य मानकर भक्ति करें।

सत्य ज्ञान की खोज: वैदिक शास्त्रों, उपनिषदों और गीता के मूल ज्ञान को पढ़ें और समझें। किसी पर आँख बंद करके विश्वास करने के बजाय, सत्य को अपनी बुद्धि से जानने का प्रयास करें।

समता का भाव (दुःख-सुख में समान रहना): भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि सुख-दुःख तो आने-जाने वाले हैं। एक सच्चा साधक दोनों में समभाव रखता है।

सत्य यह है कि आपकी भक्ति व्यर्थ नहीं जा रही। वह आपके बड़े प्रारब्ध को संभाल रही है, और आपके अंतर्मन को इतनी शक्ति दे रही है कि आप उस संकट को पार कर सकें। भक्ति आपको भोगने की शक्ति देती है, काटने की नहीं।

सनातन जीवन यात्रा
09/11/2025

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