27/05/2026
ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा भारत की सबसे पवित्र धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है। यह परिक्रमा भगवान श्रीकृष्ण की बाल एवं किशोर लीलाओं से जुड़े पूरे ब्रज मंडल की यात्रा है।
ब्रज चौरासी कोस क्या है?
“84 कोस” लगभग 252 किलोमीटर माना जाता है।
1 कोस लगभग 3 किलोमीटर के बराबर माना जाता है।
यह परिक्रमा मुख्य रूप से Mathura, Vrindavan, Govardhan, Barsana, Nandgaon, गोकुल, बलदेव आदि क्षेत्रों को मिलाकर पूरी होती है।
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परिक्रमा कहाँ से शुरू करनी चाहिए?
परंपरागत रूप से ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा की शुरुआत अधिकतर लोग:
1. Mathura से करते हैं
क्योंकि:
यह भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है।
यहाँ Shri Krishna Janmabhoomi के दर्शन करके यात्रा आरंभ की जाती है।
2. कई संत-महात्मा Govardhan से भी शुरू करते हैं
क्योंकि:
गोवर्धन को स्वयं श्रीकृष्ण का स्वरूप माना गया है।
गोवर्धन परिक्रमा का विशेष महत्व है।
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यात्रा कहाँ समाप्त होती है?
परिक्रमा सामान्यतः वहीं समाप्त होती है जहाँ से शुरू हुई हो।
उदाहरण:
यदि यात्रा मथुरा से शुरू की, तो अंत भी मथुरा में।
यदि गोवर्धन से शुरू की, तो अंत गोवर्धन में।
अंत में:
यमुना स्नान
ठाकुर जी के दर्शन
संतों का आशीर्वाद
भंडारा या प्रसाद वितरण
किया जाता है।
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84 कोस परिक्रमा क्यों दी जाती है?
मान्यता है कि:
मनुष्य 84 लाख योनियों में भटकता है।
ब्रज की 84 कोस परिक्रमा करने से जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति मिलती है।
भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।
जीवन के पाप और कष्ट कम होते हैं।
भक्ति परंपरा में कहा जाता है:
> “ब्रज की रज, ब्रज का जल और ब्रज के संत — तीनों दुर्लभ हैं।”
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ब्रज परिक्रमा में मुख्य स्थान
Mathura
कृष्ण जन्मभूमि
विश्राम घाट
द्वारिकाधीश मंदिर
Vrindavan
बांके बिहारी मंदिर
प्रेम मंदिर
निधिवन
इस्कॉन मंदिर
Govardhan
गोवर्धन पर्वत
दानघाटी
राधाकुंड
श्यामकुंड
Barsana
राधारानी मंदिर
लठमार होली स्थल
Nandgaon
नंद भवन
कृष्ण बाल लीलास्थली
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परिक्रमा कितने दिन की होती है?
अलग-अलग प्रकार:
पैदल परिक्रमा: 30 से 45 दिन
साधु-संतों के साथ: लगभग 40 दिन
वाहन से: 7 से 15 दिन
गोवर्धन छोटी परिक्रमा: 21 किमी
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परिक्रमा का पारंपरिक क्रम
आमतौर पर यह मार्ग माना जाता है:
मथुरा → वृंदावन → गोकुल → महावन → बलदेव → गोवर्धन → राधाकुंड → बरसाना → नंदगांव → कोसी → कामवन → वापस मथुरा
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परिक्रमा के नियम
नंगे पैर चलना शुभ माना जाता है।
सात्विक भोजन।
हरिनाम संकीर्तन।
झूठ, क्रोध, नशा आदि से दूर रहना।
गौ सेवा और संत सेवा का महत्व।
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ब्रज परिक्रमा का आध्यात्मिक महत्व
ब्रज केवल स्थान नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण की लीला भूमि मानी जाती है। भक्त मानते हैं कि:
ब्रज की धूल भी पवित्र है।
यहाँ की परिक्रमा करने से मन में भक्ति बढ़ती है।
राधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।
अंत में भक्त अक्सर यह बोलते हैं:
> “राधे-राधे”
“जय श्रीकृष्ण”
“ब्रज चौरासी कोस की जय”