01/09/2026
विवाह "विश्वास, साथ और भरोसे" पर आधारित एक पवित्र रिश्ता है
दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि विवाह "विश्वास, साथ और भरोसे" पर आधारित एक पवित्र रिश्ता है, लेकिन जब इसके बीच आपसी विश्वास टूट जाता है और मतभेद समय पर नहीं सुलझाए जाते, तो वैवाहिक जीवन एक संघर्ष क्षेत्र (Conflict Zone) में बदल जाता है।
न्यायालय की इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के मुख्य बिंदु और निहितार्थ निम्नलिखित हैं: कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां'बेटर-हाफ' का 'बिटर-हाफ' बनना: कोर्ट ने कहा कि यदि पति-पत्नी के बीच के विवादों को समय रहते और सावधानीपूर्वक हल न किया जाए, तो सबसे सुंदर और करीबी माने जाने वाले रिश्ते भी बेहद कड़वे हो जाते हैं। इसके चलते आपका 'बेटर-हाफ' (जीवनसाथी) आपके लिए 'बिटर-हाफ' (कड़वाहट की वजह) बन जाता है।शारीरिक हिंसा का खतरा: अदालत ने सचेत किया कि जब आपसी विश्वास और भरोसे की नींव हिल जाती है, तो रिश्ते पूरी तरह से अवांछनीय और अप्रत्याशित मोड़ ले लेते हैं। ऐसे माहौल में अक्सर शारीरिक और मानसिक हिंसा भी जगह बना लेती है।
दशकों पुराना मामला: यह टिप्पणी दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश विमल कुमार यादव की पीठ ने एक पुराने वैवाहिक विवाद (साल 2001 के एक मामले) में पति को बरी करते हुए की, जहाँ आपसी कलह चरम पर पहुँच चुकी थी। कानूनी व सामाजिक प्रभावसमय पर समाधान जरूरी: कोर्ट का यह फैसला साफ संदेश देता है कि वैवाहिक जीवन के छोटे-मोटे झगड़ों को खींचने के बजाय उन्हें बातचीत या मध्यस्थता से तुरंत सुलझा लेना चाहिए।कानून में बदलाव की आवश्यकता: वर्तमान में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत 'अपरिवर्तनीय विवाह विच्छेद' (Irretrievable Breakdown of Marriage) को सीधे तौर पर तलाक का आधार नहीं माना गया है। इस वजह से कई जोड़े सालों तक आपसी खींचतान और अदालती मुकदमों के मानसिक तनाव से गुजरने को मजबूर रहते हैं। पारिवारिक और सामाजिक नुकसान: ऐसे विवाद न केवल दो व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं, बल्कि पूरे परिवार और अंततः समाज के ताने-बाने को भी नुकसान पहुँचाते हैं।
#विश्वासऔरसंवाद #स्वस्थरिश्ते National Commission for Women