महाराज गंगेश चौबे जौनपुर

  • Home
  • India
  • Delhi
  • महाराज गंगेश चौबे जौनपुर

महाराज गंगेश चौबे जौनपुर इस पेज का उद्येश्य है की भारत को हिन्दू राष्ट्र निर्माण बनने में सहयोग देना |
सनातन धर्म का प्रसार प्रचार

कार्य के विषय में विस्तृत रूप से चर्चा किया जा रहा है |
संगठन के कार्य - समाज में सामाजिक कार्य के लिए प्रोत्साहन देना तथा महिला शाश्क्तिकरण से सम्बंधित कार्य , लिंगानुपात सम्बन्धी समस्या , कन्या भ्रूण हत्या , अनाथ व् गरीबो के लिए भोजन , कपडा, और मकान की व्यवस्था , अनिवार्य व् एच्छिक सिच्छा का व्यवस्था , स्वस्थ्य व् अध्यात्म का प्रचार प्रसार तथा धार्मिक स्थल का निर्माण , योग व् आयुर्वेद शिक्छा का

प्रसार प्रचार , जीव जंतु सुरक्छा व्यवस्था , आधुनिकता वाद में ग्रामीण इलाके में कंप्यूटर की शिक्छा का प्रबंध बाल विकाश व् महिला विकाश , महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार को रोकना तथा उन्हें न्याय दिलाना , समाज के उन लोगो को प्रसाशनिक गतिविधियों से अवगत कराना जो जीवन में कानून को अंधा कहते है , वृद्ध व् विग्लांगो के सम्बन्ध में कार्य , पर्यावरण व् प्रकृति से सम्बंधित कार्य का आयोजन ,गरीबी उन्मूलन सम्बंधित कार्य , शिक्छा के लिए प्रोत्साहन कार्य (scholarship ) और कृषि सम्बंधित जागरूकता समाज में लाना |
संस्था का कार्य agar एक शब्द में कहे तो समाज की जरुरतो को आसानी से समझ कर उसे मुहैया करना अर्थात सामाजिक समस्याओ का समाधान ढूँढना |Organization of work is being discussed widely in the subject |Work organization - to promote social work in society and women Shasktikarn related work, gender equity related issues, female feticide, orphans, poor for whom food, cloth, and house system, the system must Sichchha V. Voluntary, healthy V.scholarship) and agricultural related to awareness in society |The agar in a matter of organization of society needs a word to make it easy to understand that to provide solutions to social problems Finding |

जय महाकाल
18/08/2025

जय महाकाल

।।🕉️ हनुमान प्रसंग ।।पार्वतीजी ने शंकरजी से कहा- भगवन अपने इस भक्त को कैलाश आने से रोक दीजिए, वरना किसी दिन मैं इसे अग्न...
08/04/2025

।।🕉️ हनुमान प्रसंग ।।

पार्वतीजी ने शंकरजी से कहा- भगवन अपने इस भक्त को कैलाश आने से रोक दीजिए, वरना किसी दिन मैं इसे अग्नि में भस्म कर दूंगी। यह जब भी आता है, मैं बहुत असहज हो जाती हूँ। यह बात मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है। आप इसे समझा दीजिए, यह कैलाश में प्रवेश न करें।

शिव जी जानते थे कि पार्वती सिर्फ उनके वरदान की मर्यादा रखने के लिए रावण को कुछ नहीं कहती हैं। वह चुपचाप उठकर बाहर आकर देखते हैं। रावण नंदी को परेशान कर रहा है। शिव जी को देखते ही वह हाथ जोड़कर प्रणाम करता है। प्रणाम महादेव !

आओ दशानन कैसे आना हुआ ? मैं तो बस आप के दर्शन करने के लिए आ गया था महादेव। अखिर महादेव ने उसे समझाना शुरू किया। देखो रावण तुम्हारा यहां आना पार्वती को बिल्कुल भी पसंद नहीं है। इसलिए तुम यहां मत आया करो।

महादेव यह आप कह रहे हैं। आप ही ने तो मुझे किसी भी समय आप के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर आने का वरदान दिया है। लेकिन तुम्हारे क्रिया कलापों से पार्वती परेशान रहती है और किसी दिन उसने तुम्हें श्राप दे दिया तो मैं भी कुछ नहीं कर पाऊंगा, इसलिए बेहतर यही है कि तुम यहां पर न आओ। मैं तो बस आप के दर्शन करने के लिए आ गया था महादेव ! और अब आप ही अपने वरदान को वापस ले रहे हैं।

ऐसी बात नहीं है रावण। इसलिए बेहतर यही है कि तुम यहां पर न आओ। फिर आप का वरदान तो मिथ्या हो गया महादेव। मैं तुम्हें आज एक और वरदान देता हूं। तुम जब भी मुझे याद करोगे, मैं स्वयं ही तुम्हारे पास आ जाऊंगा, लेकिन तुम अब किसी भी परिस्थिति में कैलाश पर्वत पर मत आना। अब तुम यहां से जाओ, पार्वती तुमसे बहुत रुष्ट है। रावण चला जाता है।

समय बदलता है, हनुमानजी रावण की स्वर्ण नगरी लंका को जलाकर राख करके चले जाते हैं। और रावण उनका कुछ नहीं कर सकता है। वह सोचते-सोचते परेशान हो जाता है कि आखिर उस हनुमान में इतनी शक्ति आई कहां से। परेशान होकर वह महल में ही स्थित शिव मंदिर में जाकर शिवजी की प्रार्थना आरम्भ करता है।

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले।
*गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।।

उसकी प्रार्थना से शिव प्रसन्न होकर प्रकट होते हैं। रावण अभिभूत हो कर उनके चरणों में गिर पड़ता है। कहो दशानन कैसे हो ? शिवजी पूछते हैं।

आप अंतर्यामी हैं महादेव। सब कुछ जानते हैं प्रभु। एक अकेले बंदर ने मेरी लंका को और मेरे दर्प को भी जला कर राख कर दिया। मैं जानना चाहता हूं कि यह बंदर, जिसका नाम हनुमान है, आखिर कौन है ? और प्रभु उसकी पूंछ तो और भी ज्यादा शक्तिशाली थी। किस तरह सहजता से मेरी लंका को जला दिया। मुझे बताइए कि यह हनुमान कौन है ?

शिवजी मुस्कुराते हुए रावण की बात सुनते रहते हैं। और फिर बताते हैं कि रावण यह हनुमान और कोई नहीं मेरा ही रूद्र अवतार है। विष्णु ने जब यह निश्चय किया कि वे पृथ्वी पर अवतार लेंगे और माता लक्ष्मी भी साथ ही अवतरित होंगी, तो मेरी इच्छा हुई कि मैं भी उनकी लीलाओं का साक्षी बनूं। और जब मैंने अपना यह निश्चय पार्वती को बताया तो वह हठ कर बैठी कि मैं भी साथ ही रहूंगी, लेकिन यह समझ नहीं आया कि उसे इस लीला में किस तरह भागीदार बनाया जाए।

तब सभी देवताओं ने मिलकर मुझे यह मार्ग बताया। आप तो बंदर बन जाइये और शक्ति स्वरूपा पार्वती देवी आपकी पूंछ के रूप में आपके साथ रहे, तभी आप दोनों साथ रह सकते हैं, और उसी अनुरूप मैंने हनुमान के रूप में जन्म लेकर राम जी की सेवा का व्रत रख लिया और शक्ति रूपा पार्वती ने पूंछ के रूप में और उसी सेवा के फल स्वरूप तुम्हारी लंका का दहन किया।

अब सुनो रावण! तुम्हारे उद्धार का समय आ गया है। अतः श्री राम के हाथों तुम्हारा उद्धार होगा। मेरा परामर्श है कि तुम युद्ध के लिए सबसे अंत में प्रस्तुत होना। जिससे कि तुम्हारा समस्त राक्षस परिवार भगवान श्री राम के हाथों से मोक्ष को प्राप्त करें और तुम सभी का उद्धार हो जाए।

रावण को सारी परिस्थिति का ज्ञान होता है और उस अनुरूप वह युद्ध की तैयारी करता है और अपने पूरे परिवार को राम जी के समक्ष युद्ध के लिए पहले भेजता है और सबसे अंत में स्वयं मोक्ष को प्राप्त होता है.!

।। डॉ0 विजय शंकर मिश्र: ।।

*कामदा एकादशी व्रत कथा चैत्र शुक्ल एकादशी**कामदा एकादशी*धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन्! मैं आपको कोटि-कोटि नमस्क...
07/04/2025

*कामदा एकादशी व्रत कथा चैत्र शुक्ल एकादशी*

*कामदा एकादशी*

धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन्! मैं आपको कोटि-कोटि नमस्कार करता हूँ। अब आप कृपा करके चैत्र शुक्ल एकादशी का महात्म्य कहिए। श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे धर्मराज! यही प्रश्न एक समय राजा दिलीप ने गुरु वशिष्ठजी से किया था और जो समाधान उन्होंने किया वो सब मैं तुमसे कहता हूँ।

प्राचीनकाल में भोगीपुर नामक एक नगर था। वहाँ पर अनेक ऐश्वर्यों से युक्त पुण्डरीक नाम का एक राजा राज्य करता था। भोगीपुर नगर में अनेक अप्सरा, किन्नर तथा गन्धर्व वास करते थे। उनमें से एक जगह ललिता और ललित नाम के दो स्त्री-पुरुष अत्यंत वैभवशाली घर में निवास करते थे। उन दोनों में अत्यंत स्नेह था, यहाँ तक कि अलग-अलग हो जाने पर दोनों व्याकुल हो जाते थे।

एक समय पुण्डरीक की सभा में अन्य गंधर्वों सहित ललित भी गान कर रहा था। गाते-गाते उसको अपनी प्रिय ललिता का ध्यान आ गया और उसका स्वर भंग होने के कारण गाने का स्वरूप बिगड़ गया। ललित के मन के भाव जानकर कार्कोट नामक नाग ने पद भंग होने का कारण राजा से कह दिया। तब पुण्डरीक ने क्रोधपूर्वक कहा कि तू मेरे सामने गाता हुआ अपनी स्त्री का स्मरण कर रहा है। अत: तू कच्चा माँस और मनुष्यों को खाने वाला राक्षस बनकर अपने किए कर्म का फल भोग।

पुण्डरीक के श्राप से ललित उसी क्षण महाकाय विशाल राक्षस हो गया। उसका मुख अत्यंत भयंकर, नेत्र सूर्य-चंद्रमा की तरह प्रदीप्त तथा मुख से अग्नि निकलने लगी। उसकी नाक पर्वत की कंदरा के समान विशाल हो गई और गर्दन पर्वत के समान लगने लगी। सिर के बाल पर्वतों पर खड़े वृक्षों के समान लगने लगे तथा भुजाएँ अत्यंत लंबी हो गईं। कुल मिलाकर उसका शरीर आठ योजन के विस्तार में हो गया। इस प्रकार राक्षस होकर वह अनेक प्रकार के दुःख भोगने लगा।

जब उसकी प्रियतमा ललिता को यह वृत्तान्त मालूम हुआ तो उसे अत्यंत खेद हुआ और वह अपने पति के उद्धार का यत्न सोचने लगी। वह राक्षस अनेक प्रकार के घोर दुःख सहता हुआ घने वनों में रहने लगा। उसकी स्त्री उसके पीछे-पीछे जाती और विलाप करती रहती। एक बार ललिता अपने पति के पीछे घूमती-घूमती विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई, जहाँ पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम था। ललिता शीघ्र ही श्रृंगी ऋषि के आश्रम में गई और वहाँ जाकर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी।

उसे देखकर श्रृंगी ऋषि बोले कि हे सुभगे! तुम कौन हो और यहाँ किस लिए आई हो? ‍ललिता बोली कि हे मुने! मेरा नाम ललिता है। मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से विशालकाय राक्षस हो गया है। इसका मुझको महान दुःख है। उसके उद्धार का कोई उपाय बतलाइए। श्रृंगी ऋषि बोले हे गंधर्व कन्या! अब चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसका नाम कामदा एकादशी है। इसका व्रत करने से मनुष्य के सब कार्य सिद्ध होते हैं। यदि तू कामदा एकादशी का व्रत कर उसके पुण्य का फल अपने पति को दे तो वह शीघ्र ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा और राजा का श्राप भी अवश्यमेव शांत हो जाएगा।

मुनि के ऐसे वचन सुनकर ललिता ने चैत्र शुक्ल एकादशी आने पर उसका व्रत किया और द्वादशी को ब्राह्मणों के सामने अपने व्रत का फल अपने पति को देती हुई भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करने लगी - हे प्रभो! मैंने जो यह व्रत किया है इसका फल मेरे पतिदेव को प्राप्त हो जाए जिससे वह राक्षस योनि से मुक्त हो जाए। एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त होकर अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त हुआ। फिर अनेक सुंदर वस्त्राभूषणों से युक्त होकर ललिता के साथ विहार करने लगा। उसके पश्चात वे दोनों विमान में बैठकर स्वर्गलोक को चले गए।

वशिष्ठ मुनि कहने लगे कि हे राजन्! इस व्रत को विधिपूर्वक करने से समस्त पाप नाश हो जाते हैं तथा राक्षस आदि की योनि भी छूट जाती है। संसार में इसके बराबर कोई और दूसरा व्रत नहीं है। इसकी कथा पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

07/04/2025

प्रख्यात लेखक, साहित्यकार डा. सूर्यकांत बाली जी के देहावसान का दुःखद समाचार है। डॉक्टर सूर्यकांत बाली ने अपने प्रखर राष्ट्रवादी चिंतन से हिन्दी साहित्य का पोषण किया। उनकी रचनाओं से साहित्यिक व पत्रकारिता के क्षेत्र में नई रोशनी आयी। हिंदी और संस्कृत भाषा के वे मूर्धन्य ज्ञाता थे। डा. बाली की विद्वत्ता के प्रति आदर व सम्मान से मैं नतमस्तक हूँ।
उनकी स्मृति में भावपूर्ण श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि दिवंगत आत्मा को सद्गति प्रदान करें।
उनके परिवारजनों एवं मित्रों को मेरी गहरी संवेदनाएं। ईश्वर शोकाकुल परिवार को यह दुख सहन करने की शक्ति प्रदान करे।
ॐशान्तिः॥

दत्तात्रेय होसबाले
सरकार्यवाह, रा.स्व.संघ

जय श्री राधे
07/04/2025

जय श्री राधे

कल का व्रत
11/11/2024

कल का व्रत

19/08/2024
18/08/2024

आज के पूजा का आरती

13/08/2024
13/08/2024

जय महाकाल
साथियों किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के लिए आप इस पेज पर संपर्क कर सकते हैं।
जैसे - श्री मद्भागवत कथा, श्री - रामकथा , श्री शिवमहापुराण
पूजा पाठ के क्रम में सभी प्रकार के कर्मकांड हमारे प्रसिद्ध आचार्य द्वारा शुभ मुहूर्त में कराया जाता है।

कुंडली विशेषज्ञ से कुंडली की विवेचना करवाए निशुल्क
समस्यायों का उपाय पाएं।
यदि आप इक्षुच्क हैं तो संपर्क करें।
7393034034

Address

Delhi
222138

Telephone

+919730356181

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when महाराज गंगेश चौबे जौनपुर posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share