08/05/2026
मरने के डर से बोलना बंद करने वाले भी एक दिन मर ही जाते हैं
इतिहास गवाह है कि दुनिया में बदलाव हमेशा उन लोगों ने किया है जिन्होंने डर के बावजूद सच बोलने का साहस किया। जो लोग अन्याय, झूठ और अत्याचार के सामने चुप रहे, वे शायद कुछ समय के लिए अपने आपको सुरक्षित समझते रहे होंगे, लेकिन अंत में वे भी मारे ही गए। असल में सवाल यह नहीं है कि “मरना है या नहीं”, सवाल यह है कि “जीना कैसे है?” मेरा मानना है कि कायर और डरपोक की सौ साल की ज़िन्दगी से बेहतर होती है शेर की तरह दिलेर की एक दिन की ज़िन्दगी।
असर में व्यक्ति का मरने के डर से बोलना बंद कर देना उसके आत्मसम्मान को धीरे-धीरे खत्म कर देना है। जब कोई व्यक्ति सच जानते हुए भी चुप रहता है तब केवल उसकी आवाज़ नहीं मरती, उसके भीतर का साहस, उसका आत्मविश्वास और उसका ज़मीर भी मर जाता है।
कहते हैं न कि कुछ लोगों का शरीर मर जाता है परन्तु आत्मा भटकती रहती है, परन्तु जो अन्याय और अत्याचार देखते हुए भी चुप रह जाते हैं वे वे लोग हैं जिनका केवल शरीर भटक रहा है, उनकी आत्मा मर चुकी है।
आज समाज में बहुत से लोग सही को सही और गलत को गलत कहने से डर रहे हैं, देश के व्यापारी क़र्ज़ के कारण बर्बाद हो रहे हैं, पढ़े लिखें लोग बेरोजगार बैठे हैं, गाँव की महिलाओं को क़र्ज़े के कारण गलत काम करने पर मजबूर किया जा रहा है, परिवार के परिवार सरकार की गलत नितियों के कारण क़र्ज़े की दलदल में फँसकर आत्महत्या कर रहे हैं और आप चुप बैठे हैं। किसी को कुछ को नौकरी जाने का डर है, कोई समाज क्या कहेगा इस डर से चुप है, कोई सत्ता में बैठे लोगों के दबाव से चुप है।
लेकिन याद रखिए, अन्याय की सबसे बड़ी ताकत अत्याचारी नहीं होता, बल्कि अच्छे लोगों की खामोशी होती है, जब अच्छे लोग डरकर बैठ जाते हैं, तब गलत लोग और अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं।
वैसे भी सच बोलना, सही को सही और गलत को गलत बोलना कभी भी आसान नहीं होता है। इसके लिए साहस चाहिए, त्याग चाहिए और कई बार अकेले चलने की ताकत भी चाहिए, परन्तु यह भी सच है कि इतिहास में सम्मान भी उन्हीं लोगों को मिला जिन्होंने कठिन रास्ता चुना।
अगर भगत सिंह अंग्रेजों के डर से चुप हो जाते, अगर महात्मा गांधी अन्याय के सामने झुक जाते, अगर बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर समाज की बुराइयों के खिलाफ आवाज़ न उठाते, यदि मान्यवर कांशीराम जी डर से काम न करते तो शायद आज भारत का इतिहास बिल्कुल अलग होता।
इन महान लोगों ने यह समझ लिया था कि डरकर जीने से बेहतर है साहस के साथ संघर्ष करते हुए मर जाना। वैसे भी ज़िन्दा वही है जिसका ज़मीर ज़िन्दा है, जिसकी अंतरात्मा ज़िन्दा है, केवल सांस लेने वाले को ज़िन्दा नहीं कहा जा सकता।
हर युग में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सच बोलने वालों को पागल, बागी या मुसीबत पैदा करने वाला कहते हैं, लेकिन समय गुजरने के बाद वही लोग समाज के लिए उदाहरण बनते हैं। वैसे भी सच की आवाज़ को कुछ समय के लिए दबाया तो जा सकता है परन्तु उसे हमेशा के लिए खत्म नहीं किया जा सकता।
जो लोग आज डर के कारण चुप हैं, उन्हें यह समझना होगा कि खामोशी कभी सुरक्षा की गारंटी नहीं होती, गलत के सामने चुप रहना, कहीं न कहीं उस गलत को ताकत देना है। अगर आपकी आवाज़ किसी कमजोर के लिए न्याय बन सकती है, किसी पीड़ित को हिम्मत दे सकती है, किसी समाज को जागरूक कर सकती है, तो ऐसी जगह पर आपका चुप रहना भी एक अपराध ही है।
इसलिए बोलिए, सच के साथ खड़े रहिए, डर लगे तो भी अपनी आत्मा की आवाज़ मत दबाइए। क्योंकि मरना तो एक दिन सबको है, लेकिन इतिहास केवल उन्हीं को याद रखता है जिन्होंने डर के बावजूद सच बोलने का साहस किया। भले ही हम सफल न हो पाए, भले ही हम हार जाए परन्तु हमसे यह संतोष कौन छीनेगा कि हमने सच को सच कहा था, हम में गलत को गलत कहने की हिम्मत थी।
वैसे भी यदि आप इतना भी नहीं कर सकते, आपने गलत को गलत कहने की हिम्मत खो दी है तो माफ कीजिए आप ज़िन्दा नहीं है, आप कब के मर चुके हैं बस आपका अंतिम संस्कार होना बाकी है।
जय हिन्द, जय भारत
शाहनवाज चौधरी भारतीय