वास्तविक भारत

वास्तविक भारत सनातन संस्कृति एवं जीवन मूल्यों के प्रति सजगता,आधुनिक समय में उनकी प्रासंगिकता personal bloger

25/01/2024

कई साल से हम लोग इंपोर्टेड दाल खा रहे थे। 2 साल पहले मोदी ने इस पर रोक लगानी शुरू कर दी और अब पूरी तरह से बंद कर दिया।

कृषि बिल तो बहाना था असली किस्सा कुछ यूं है। 2005 में मनमोहन ने दाल पर दी जा रही सब्सिडी को खत्म कर दी। उसके 2 साल के बाद सरकार ने नीदरलैंड ऑस्ट्रेलिया और कनाडा से समझौता कर दाल आयात करना शुरू कर दिया। कनाडा ने अपने यहां लेंटील(तूर) दाल के बड़े-बड़े फार्म स्थापित किए जिसकी जिम्मेदारी वहां रह रहे पंजाबी सिखों के हवाले किया। कनाडा से भारत में बड़े पैमाने पर दाल आयात होने लगा। बड़े आयातकों में अमरिंदर, कमलनाथ जैसे कांग्रेसी भी थे। बादल भी थे ।

जैसे ही मोदी ने आयात पर रोक लगाई इनका खेल शुरू हुआ। इनके कनाडा के फार्म सूखने लगे। खालिस्तानियों की नौकरी जाने लगी इसीलिए जस्टिन ट्रुडो ने किसानों के आंदोलन का समर्थन किया था। अब धमकी दी जा रही है कनाडा के खालिस्तानी सिखों को पंजाब वापस भेजा जाएगा। वैसे भी खालिस्तानी कांग्रेसियों की ही देन है। कृषि कानून का सबसे ज्यादा विरोध विदेशी ताकते और खालिस्तानी सिख कर रहे थे।

अब भारत का किसान अमीर होगा तो इन्हें तो कष्ट होगा ही।

मोदी जी ने भारत को विकसित करने का बीडा उठाया है और जनता भी साथ दे रही है, जल्द ही भारत की आर्थिक हालत विश्व मे सबसे अच्छी होगी क्योंकि जिस देश में अन्न बाहर से खरीदना नहीं पड़ता वही देश सबसे जल्द् विकसित होते है!

अदानी और अंबानी ने जो भी व्यापार शुरू किया वहां मोनोपली का खात्मा करते हुए भारतीय ग्राहकों को जबरदस्त फायदा कराते हुए मुनाफा कमाया है। अब सोचिए कि पहले कितनी लूट मची हुई थी...??

उदाहरण:- जियो नहीं था तब आपका बिल कितना आता था? कितनी लूट चलती थी... अब हर कंपनी दाम घटाने पर मजबूर है ।

अदानी एग्रो प्रगति कर रही है तो विरोध हो रहा है... अदानी गोडाउन क्यों बना रहा है...? जब अपने देश में पेप्सिको, वॉलमार्ट, हिन्दुस्तान यूनीलीवर, आईटीसी जैसी विदेशी कंपनियों ने पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र में बड़े-बड़े गोडाउन खड़े कर लिए तब कोई विरोध नहीं हुआ... तो अब अदानी का ही विरोध क्यों???

रिलायंस रिटेल, रिलायंस डिजिटल अब सारे देश में पहुंच रहे हैं, तो अमेज़न और फ्लिपकार्ट को तकलीफ़ होना स्वाभाविक है... स्वदेशी पतंजलि के आने से हिन्दुस्तान यूनीलीवर (कोलगेट, लक्स, पाँड्स) का एकाधिकार समाप्त हो गया, तो उन्हें तकलीफ़ तो होनी ही थी... चीन दुनिया भर के साथ भारत में भी 5G तकनीक बेचने को उतावला हो रहा है, ऐसे में जियो की संपूर्ण स्वदेशी 5G तकनीक से उसे तकलीफ़ होगी ही... अदानी पोर्ट्स और अदानी एंटरप्राइज़ के कारण सबकी मोनोपली बंद हो गई है।

अब जब अपने देश के उद्योगपति आगे बढ़ रहे हैं, देश को फायदा पहुंचा रहे हैं, तो अपने ही देश के कतिपय लोग उनका विरोध क्यों कर रहे हैं?

क्या अदानी, अंबानी या पतंजलि आपको जबरदस्ती अपना सामान बेच रहे हैं, या आपसे कुछ ले रहे हैं...?

खेल समझिए:

अब पंजाब के किसान नेता उनके विरोध में आ गए हैं... अदानी गोडाउन क्यों बना रहा है...?? हमारी ज़मीन हड़प लेगा... आदि-आदि...

पंजाब में देशी-विदेशी कंपनियों के गोडाउन बरसों से मौजूद हैं, वह चलता है... अब अदानी बनवा रहा है तो कहा जा रहा है कि जमाखोरी होगी और कीमतें बढ़ेंगी...

हकीकत तो यह है कि अब तक जो लाखों टन अनाज, सब्ज़ियां और फल सड़ जाते थे, वे अब इनके गोडाउन में सही तरह से भंडारित हो सकेंगे। तकलीफ़ यह है कि अब महंगाई काबू में रहेगी और बिचौलियों को मिलने वाली मोटी मलाई बंद हो जाएगी।

महंगाई तो सालों से बढ़ती आ रही है, तो अब ही अफवाहें क्यों फैलाई जा रही हैं...? क्योंकि अदानी-अंबानी से कई विदेशी एजेंटों को तकलीफ़ हो रही है, और कई लोग तो कुछ भी जाने-समझे बगैर सिर्फ और सिर्फ मोदी-विरोध में ये अफवाहें फ़ैला रहे हैं और अपने साथ-साथ सबके पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं...!!

इस सच्चाई का पूरे देश को पता चलना ही चाहिये। पाठकगण कृपया इस सत्य को उजागर करते रहें। किसान कानून जो उनके ही हित मे था उसका विरोध करने वाले उत्तर भारत के विशेषकर खालिस्तान समर्थक किसानो ने अपने ही किसान भाइयों का अत्याधिक नुक्सान करवा कर देश का भी नुक्सान किया है। ऐसे लोगों को चिन्हित कर कड़ी सज़ा मिलनी ही चाहिये।

यह सच्चाई भी सब तक पहुंचाएं।

साभार

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04/12/2023

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 #ब्रिटेन_का_साहसआज चर्चिल अपनी कब्र में बेचैनी से कसमसा रहे होंगे जिन्होंने कभी कहा था कि भारतीयों में प्रशासनिक योग्यत...
14/11/2023

#ब्रिटेन_का_साहस

आज चर्चिल अपनी कब्र में बेचैनी से कसमसा रहे होंगे जिन्होंने कभी कहा था कि भारतीयों में प्रशासनिक योग्यता है ही नहीं।

आज एक भारतीय और ऊपर से 'प्राउड हिंदू' 10 डाउनिंग स्ट्रीट से पूरे ब्रिटेन के प्रशासन का संचालन कर रहा है।

लेकिन इसीलिये मैं अंग्रेजों का प्रशंसक भी हूँ।

ऋषि सुनक से पूर्व बेंजामिन डिजेरिली के रूप में गैर ब्रिटिश मूल के व यहूदी प्रधानमंत्री बनाने का साहस ब्रिटेन में ही था जबकि उस समय में यूरोप में यहूदियों के विरुद्ध घृणात्मक विचार थे।

लेकिन ऋषि सुनक के रूप में एक 'काले' 'भारतीय' और ऊपर से 'मूर्तिपूजक हिन्दू' को चुनकर उन्होंने इस बात को सिद्ध किया कि वे कैसे और क्यों दुनियाँ के सबसे बड़े व विश्वव्यापी साम्राज्य के स्वामी बने।

इसीलिये भारत में कुछ अनपढ़ जाहिल भले ही 'शास्त्रों में मिलावट' करने का आरोप उनपर लगाएं लेकिन इतिहास का सच यह है कि -

-हमें 'ब्राह्मी लिपि' को पुनः पढ़ना उन्होंने ही सिखाया,
-मोएंजोदारो व हड़प्पा की खोज भी उन्होंने की,
-खजुराहो, कोणार्क जैसे कई पुरास्थलों की खोज व संरक्षण भी उन्होंने किया,
-आधुनिक विज्ञान की शिक्षा औरआधुनिक संस्थानों का निर्माण भी उन्होंने ही किया।
-आई पी सी, आधुनिक भारतीय सेना और आई ए एस जैसे स्टील फ्रेमवर्क का निर्माण भी उन्होंने किया।

यह भी सत्य है कि--

निःसंदेह उन्होंने भारत का आर्थिक शोषण भी किया,
निःसंदेह उन्होंने भारतीयों पर कई अत्याचार भी किये,
निःसंदेह उन्होंने भारतीयों में फूट के बीज भी डाले,
निःसंदेह भारत विभाजन के लिए सबसे बड़े दोषी भी वही थे।

लेकिन.....

लेकिन....

लेकिन...

दिल पर हाथ रखकर सोचिये कि इसका असली जिम्मेदार कौन था?

वे या हम स्वयं?

उनकी संख्या तो यहाँ मात्र एक लाख दस हजार भर थी फिर वे कौन थे जो इस दास तंत्र का सबसे बड़ा हिस्सा थे?

वे हम ही थे।

यह भी ध्यान रखिये कि मुस्लिमों की धर्मांध व बर्बर नीतियों के विपरीत यह उनका अनुशासन तथा लॉ एंड ऑर्डर ही था जिसके कारण पूरे भारत पर राज कर पाये।

इसका प्रमाण यह है कि अंग्रेज जिन राज्यों को जीत नहीं पाये या उन्हें अलग थलग कर गए वह आज भी भारत की राजनैतिक सीमाओं से बाहर हैं, उदाहरण नेपाल।

भारत में हिंदी फिल्मों व साहित्य में ब्रिटिशों को भारत की समस्याओं का मूल कारण दिखाने की कांग्रेसी-वामी तंत्र की कोशिशों के पीछे असली वजह है 'मुस्लिमों का बचाव' जिन्होंने मंदिर, मठ, विहार, विद्यालय ही नहीं तोड़े बल्कि लगभग सात करोड़ हिंदुओं की हत्या कर हिंदुओं का जेनोसाइड किया।

बिना किसी मुकदमे के औरंगजेब की तरह तेरह दिन तक शम्भाजी को तड़पा तड़पाकर मारने जैसे घृणित कृत्य नहीं किये। भले ही दिखावा सही लेकिन उन्होंने पूरी कानूनी कार्यवाहियां की, खुले मुकदमे चलाये और अगले पक्ष को अपने मोटिव तक को सबके सामने रखने का मौका दिया।

पिछले अस्सी वर्षों में ब्रिटिश विरोधी नैरेटिव ही इसीलिये रचा गया।

लेकिन एक क्रिश्चियन देश में राजा के बाद सबसे शक्तिशाली संस्थान में हिंदू का होना सारी कहानी बयान कर देता है।

लक्ष्यबद्ध हो संगठन रूप में राम काज करते रहें | राम राज्य साकार हो उठे | हम इस मिशन से जुड़े क्यों हैं पुनः स्मरण करेंदीप...
12/11/2023

लक्ष्यबद्ध हो संगठन रूप में राम काज करते रहें | राम राज्य साकार हो उठे | हम इस मिशन से जुड़े क्यों हैं पुनः स्मरण करें

दीपावली की शुभकामनाएं आप सभी परिवार सदस्यों को

कुँआ  #ठाकुर का था पर कभी लोग राजतंत्र में प्यासे नहीं मरे,बाजरे का खेत ठाकुर का पर कोई भूखा नहीं मरता था ,बैल ठाकुर के ...
25/09/2023

कुँआ #ठाकुर का था पर कभी लोग राजतंत्र में प्यासे नहीं मरे,
बाजरे का खेत ठाकुर का पर कोई भूखा नहीं मरता था ,
बैल ठाकुर के हल ठाकुर का हल की मूठ पर हाथ किसान का पर किसान आत्महत्या नही करते थे, उनकी हर ज़रूरत पूरी की ठाकुर ने उसके परिवार को पालने का एक मात्र साधन था ठाकुर के बैल और हल

गाँव ठाकुर के, शहर ठाकुर के, देश ठाकुर का, क्योकी मातृभूमि के लिए अपना और अपने बच्चों तक का खून देने वाला ठाकुर अपने देश और जनता के लिए ही जीता था,आक्रांताओ के आगे खडा होकर कई पीढ़ियों को बलिदान कर देता था ठाकुर! जिसकी वजह से लोग उनके उनकी आवाज़ को अपना लक्ष्य बना लेते थे l 🙏🚩

आप गाड़ी लेकर निकलिए किसी भी त्यौहार पर, तो ये दृश्य आपको बहुतायत में मिल जायेंगे खासकर भाई-बहन वाले त्यौहारों पर, फिर चा...
02/09/2023

आप गाड़ी लेकर निकलिए किसी भी त्यौहार पर, तो ये दृश्य आपको बहुतायत में मिल जायेंगे खासकर भाई-बहन वाले त्यौहारों पर, फिर चाहे वो भैया-दूज हो या रक्षाबन्धन ।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सड़कों पर तो जैसे मोटरसाइकिलो कि बाढ़ सी आ जाती है । कोई बहन पति को के पीछे बैठकर भाई के घर जा रही है तो कोई भाई अपने परिवार के साथ बहन के घर जा रहा है ।

चूँकि इन त्यौहारों में भेंटों का आदान प्रदान बहुत ज्यादा होता है तो पूरी बाइक सामान से भरी होती है । कभी स्त्री थैले पकड़कर बैठती है तो कभी सारा सामान बाइक पर बांध लिया जाता है । जहाँ बच्चे भी चलने की जिद पकड़ ले तो स्त्री की जिम्मेदारी बच्चे के लिए हो जाती है और पुरुष थैले को पेट से बांध लेता है और पूरे रास्ते कमर सीधे किये हुए सधकर बाइक चलाता है ।

कार में बैठे हुए व्यक्ति को 100-120 की गति में ये सब लोग बहुत ही खतरनाक लगते है क्योकि ये उसकी गति के सामने बार बार आते है । अक्सर वो इनके उत्साह को देखकर चिढ़ता हुआ भी निकलता है । कुछ कार वालो के मन मे चिंता का भाव भी होता है और वो ये सोचता है कि ये लोग कैसे सुरक्षा को दाँव पर लगाकर इतना लोड होकर निकल रहे है ।

इस मिक्स से भावों में अक्सर वो इन्हें लापरवाह भी समझ लेता है और अगर वो कोई लन्दन या अमेरिकी रिटर्न्स MRRR या #जातिविज्ञानी_गिरोह से हो तो इन सबके साथ साथ भारत के त्यौहारो की निंदा करते हुए लंबी सी पोस्ट भी लिख सकता है और इसे इस सब मे यूरोप की तारीफ करने का मौका भी मिल जाता है ।

पर सड़को पर उमड़ा ये बाइकर्स का जनसैलाब इन सबसे इतर है जिसमे न कोई सुरक्षा के बारे में सोचता, न ही कोई धूल मिट्टी की चिंता करता और न ही कोई 2-3 घण्टे अकड़कर बैठने की । सबको बस अपने भाई - बहन के पास पहुँचने की ललक है सबको मोह है अपने सहोदर के परिवार के पास जाने का । वहाँ जायेंगे तो बहन भाई मिलेंगे, सुख दुःख बांटेंगे और जीजा-साले बैठकर गप्पे मारेंगे तो ये सब थकान उतर जायेगी ।

इस सब आपाधापी में सिर्फ भाव ही बड़ा है जिसके सामने सब गौण दिखता है । इन दोनों त्यौहारों में न कोई दीवाली जैसी अतिरिक्त चमक और न ही कोई होली जैसी मस्ती पर दायित्वबोध का ये भाव इनका सक्सेस रेट बाकी त्यौहारो से ऊपर रखता है ।

ये त्योहार केवल राखी भर बांधने का नही है, बल्कि अब के समय में टूटते रिश्तों को जीवंत बनाने का भी है

जो भाई बहन बरसो परिवार की शक्ल तक नही देख पाते वे केवल एक दिन के लिए बहन उसी पुराने घर में आती है भाई को राखी बांधने या भाई उनके घर जाता है

त्योहार तो बहाना है मूल तो अपने परिवारों से पुनः मिलकर पुराने वाद विवाद को समाप्त करने का है

अब शहरी बुद्धि वाले बुद्धिजीवी जिन्होंने पूरे परिवार के सिस्टम को तोड़ दिया और आज सभी एकल रह रहे है और मां बाप वृद्धाश्रम में

वैसे में एक भाई या बहन पुनः अगर भेंट करने जाती है तो नमन करो गुस्सा मत करो गाड़ी वालों 2 दिन की बात है

राष्ट्र अपने वास्तविक वीरों को पहचानने लगा है ..हालाँकि मेरा वॉलीबुड से कभी लगाव नहीं था और सिनेमा टिकट के लिये बचपन में...
01/09/2023

राष्ट्र अपने वास्तविक वीरों को पहचानने लगा है ..

हालाँकि मेरा वॉलीबुड से कभी लगाव नहीं था और सिनेमा टिकट के लिये बचपन में लोगों को लंबी लाइन में खड़ा देखकर या टिकट के लिये मार मरौझा करते देखकर हंसी भी आती थी , परन्तु वॉलीबुड की बनावटी कहानियों से दूर रह पाना असंभव था ।

वॉलीबुड या उसका इकोसिस्टम सदैव से झूठी सहानुभूति उत्पन्न कराके झूठा नैरेटिव सेट करता था ।

हकले की माँ , दिल्ली की मुख्य मजिस्ट्रेट थी , इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत मित्र थी । हकला , दिल्ली के सुविख्यात सेंट कोलंबस में पढ़ता था पर बताया गया कि कैसे हकला ग़रीबी से उपर उठा । हकले को सरकार से इकोसिस्टम से और झूठी सहानुभूति से और उपर उठाया गया । भारत का किंग खान बनाया गया । और यह सब हमारी आपकी आँखों के सामने हुआ ।

दूसरी ओर उसी भारत में नागालक्ष्मी, जब बाकू में सतरंज की विश्व चैम्पियनशिप के लिये तैयारी कर रहे प्रग्यानंद के लिये इडली सांबर बना रही थी तब भी किसी साक्षात्कार में उसने अपनी निर्धनता का रोना नहीं रोया । दोनों बच्चों को पालने में होने वाली कठिनाइयों के लिये सहानुभूति नहीं माँगी ।

सनातन हिन्दू धर्म, पुरुषार्थ में विश्वास और परिणाम को ईश्वर के अधीन छोड़ देता है और नारी तू नारायणी नागालक्ष्मी ने वही किया ।

ठीक है विश्व नंबर २ और विश्व नंबर ३ को हराकर फ़ाइनल में पहुँचने के बाद टाई ब्रेकर तक मैच को प्रज्ञानंद विश्व नम्बर १ से ले गया और अंततः इस बार जीत नहीं पाया पर उसको देश भर से इतना प्यार और सम्मान मिलता हुआ देखकर मैं आश्वस्त हो रहा हूँ कि छुटपुट घटनाओं को छोड़कर देश अब अपने वास्तविक वीरों को पहचान रहा है और धूर्त वॉलीबुड और इकोसिस्टम को लगातार झटका दे रहा है ।

विश्वनाथन आनंद के बाद प्रग्यानंद का विश्व चैंपियनशिप के फ़ाइनल में पहुँचना कम उपलब्धि नहीं है और पूरा राष्ट्र के सद्भावनाओं का असर अवश्य होगा और वह एक न एक दिन विश्व नंबर १ भी बनेंगे ।

नागालक्ष्मी ….माँ तुझे प्रणाम 🙏

नोटः तिलक चंदन देखकर जलें फुँकें नहीं , तिलक चंदन सनातन हिन्दू धर्म की पहचान है।

30/08/2023

रक्षाबंधन
इस अवसर पर रक्षासूत्र बांधा जाता है। क्या यह सबल द्वारा दुर्बल की रक्षा करने का वचन है?
अथवा क्या यह सुरक्षित रखने/होने की कोई गारंटी का अनुष्ठान है?
सिद्धांत एक के अनुसार जब कोई किसी के रक्षा सूत्र बांधता है तो बांधने वाला यह अपेक्षा करता है कि बंधवाने वाला मेरी रक्षा करेगा। जैसे ब्राह्मण क्षत्रिय के सूत्र बांधते थे। बहिन भाई के बांधती है, आदि।

दूसरे सिद्धांत के अनुसार रक्षा सूत्र इसलिए बांधा जाता है क्योंकि जिसके बांधा जा रहा है वह सुरक्षित रहे। जिम्मेदार पद पर बैठा व्यक्ति यदि असुरक्षित हो गया तो पूरा समूह खतरे में पड़ जायेगा। किसान हल और बैल के राखी बांधते थे। कृषक पत्नी किसान के बांधती थी। यज्ञ का पुरोहित यजमान के बांधता है। युद्ध में जाने से पूर्व महिलाएं और नागरिक, नीरांजन करके हस्ती, घोड़े, पैदल और शस्त्रों के राखी बांधती थी।

धागे को सूत्र कहते हैं। प्राचीन काल से ही धागे में गांठें लगाकर उसका उपयोग कुछ कोड निर्माण में किया जाता रहा है। आज भी कहीं कहीं गणना के लिए, कलेंडर जानने के लिए, विशिष्ट बंधनों के लिए, रहस्य को एक दूसरे तक पहुंचाने के लिए धागे में ग्रंथियों का उपयोग किया जाता है। यही सूत्र बाद में फॉर्मूले के रूप में विख्यात हो गए।
व्याकरण में भी सूत्र होते हैं, उसकी परिभाषा है "अल्पाक्षर, असंदिग्ध, सुष्पष्ट और संक्षेप में किसी निश्चित सत्य को कहना!"
जैसे ब्याज का सूत्र, ऊर्जा और द्रव्यमान के सम्बंध का सूत्र।
रासायनिक सूत्र तो प्रसिद्ध ही हैं।
संस्कृत साहित्य में वेदों के रहस्यों को सूत्रों में व्यक्त करने की लंबी परम्परा रही है, जैसे कल्पसूत्र। बोधायन प्रमेय, योग सूत्र, नारद भक्ति सूत्र, शुल्ब सूत्र इत्यादि।

तीसरे सिद्धांत के अनुसार रक्षा, #सुरक्षा_के_कुछ_फॉर्मूले हैं। मध्यकाल में ये सूत्र छिन्न विच्छिन्न हो गए। इनको ठीक से डीकोड नहीं किया जा सका। ये गुरु परम्परा से, अंतःकरण की प्रज्ञा से पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर होते थे उसमें कहीं व्यवधान आ गया। लेकिन ये हैं, इन्हें अब भी समझने वाले हैं। कुछ लोगों ने इन्हें डीकोड किया है। आप इन्हें फॉलो कीजिए। यह विशेषज्ञता का मामला है। जैसे गणित में सूत्र होते हैं, विज्ञान और शास्त्रों में भी सूत्र होते हैं वैसे ही रक्षा के भी कुछ सूत्र हैं। उन सूत्रों को समझना और उनका रहस्योद्घाटन ही रक्षासूत्र है। इसका भाई बहिन, पति पत्नी अथवा लेनदेन से सम्बंध नहीं है। यह विशुद्ध शास्त्रीय विषय है।
#कुमारsचरित

कुमार एस

अगर कोई इतिहास हिंदी संस्कृत उर्दू गुजराती साहित्य भूगोल तमिल साहित्य जैसे विषयों से सिविल सर्विसेज पास हुआ है फिर आप उस...
30/08/2023

अगर कोई इतिहास हिंदी संस्कृत उर्दू गुजराती साहित्य भूगोल तमिल साहित्य जैसे विषयों से सिविल सर्विसेज पास हुआ है फिर आप उसे किसी ऐसे बोर्ड या निगम का चार्ज दे देते हैं जहां टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है तब आप उस विभाग को बर्बाद कर देते हैं

IAS जिस भी संस्था में जाता है उसे अपनी बाबू गिरी से बर्बाद कर देता है ... किसी एक विषय को लेकर जो IAS बनता है वह सिर्फ रट्टा मार कर बनता है उसे किसी भी तरह का ना तो सामाजिक ज्ञान होता है ना व्यवहारिक ज्ञान होता है ना टेक्नोलॉजी का ज्ञान होता है

मैं कुछ उदाहरण आपको देता हूं

दिल्ली में मेट्रो और कोंकण रेलवे अपने निर्धारित समय से भी पहले बनकर तैयार हुए और बेहद शानदार तरीके से बने इसमें कोंकण रेलवे को तो अमेरिका और ब्रिटेन की कई कंपनियों ने संभव बताकर मना कर दिया था पूरे कोंकण रेलवे में और दिल्ली मेट्रो में कोई IAS नहीं था .बड़े से छोटे पदों तक सब टेक्नोक्रेट थे या सिविल इंजीनियर थे या स्ट्रक्चरल इंजीनियर थे या मैकेनिकल इंजीनियर थे

और श्रीधरन साहब ने यह शर्त रखी थी कि उनके नीचे या उनके ऊपर कोई आईएएस अधिकारी नहीं होगा तभी वह काम करेंगे

वही जब नरेंद्र मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उनसे एक ऐसी भारी भूल हुई जिसके लिए वह आज भी पछताते हैं

मोदी जी ने अहमदाबाद मेट्रो का जोर-जोर से ऐलान किया और एक IAS संजय गुप्ता को अहमदाबाद मेट्रो का चीफ बना दिया और संजय गुप्ता ने 200 करोड़ का भ्रष्टाचार कर दिया और परियोजना को पूरे 6 साल लेट कर दिया

खुद मोदी जी के मुख्यमंत्री रहते ही संजय गुप्ता को गिरफ्तार किया गया और वह पिछले 9 सालों से जेल में है फिर पता चला कि उन्होंने तीन फाइव स्टार होटल और एक शानदार रिसोर्ट अपनी पत्नी के नाम बनवा दिया है

यूरोप और अमेरिका का प्रशासनिक मॉडल इसलिए श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि वहां पर सिविल सर्विसेज यानी बाबू गिरी जैसा कोई पद नहीं होता वहां टेक्नोक्रेट या मेडिकल स्पेशलिस्ट सिविल प्लानर सिविल इंजीनियर आर्किटेक्ट यानी जिसका जो ज्ञान होता है उसे उसे विभाग का प्रमुख बनाया जाता है

कई बार ऐसा होता है कि स्वास्थ्य विभाग का सचिव इतिहास से IAS बना है अब आप सोचिए कि वह स्वास्थ्य विभाग को चलाएगा कि उसे बर्बाद करेगा फिर पता चलता है कि पीडब्ल्यूडी विभाग का मुख्य सचिव हिंदी साहित्य से IAS बना है

इसीलिए आपने नोटिस किया होगा कि अंग्रेजो के जमाने के बने हुए पुल और आज के जमाने के बने हुए पुल दोनों में क्या अंतर है और क्यों आज के जमाने के बने हुए पुल 5-10 सालों में ही बर्बाद हो जाते हैं

जब हमें रटाया जाता है कि पेशवाओं के राज में दलित गले में मटकी और पीठ पर झाड़ू बांध कर घूमते थे ऐसे में हमें चंद्रपुर के ...
28/08/2023

जब हमें रटाया जाता है कि पेशवाओं के राज में दलित गले में मटकी और पीठ पर झाड़ू बांध कर घूमते थे ऐसे में हमें चंद्रपुर के आदिवासी क्रांतिवीर ‘बाबुराव पुल्लेसूर शेडमाके’ को पढ़ना चाहिए।

बाबुराव आदिवासी गोंड जाति से आते थे। उनका परिवार एक जमींदार परिवार था लेकिन 1818 में तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध में मराठों की हार के बाद उनका पूरे क्षेत्र मराठों से अंग्रेजों के पास चला गया जिसके बाद अंग्रेजों ने नई नीतियां बनाकर उनके जीवन में घुसपैठ शुरू कर दी।

बिल्कुल वैसे ही जैसे वो झारखंड के संथाल में कर रहे थे। बाद में 1857 के समय में अपने साथियों के साथ बाबूराव ने अंग्रेज़ो के खिलाप संघर्ष शुरू किया जो एक साल तक चला बाद में 1857 की क्रांति असफल होने पर बाबूराव को फांसी पर चढ़ा दिया गया।

आज दलितवादी जश्न मनाते हैं कि कैसे भीमा कोरेगांव में अंग्रजों ने मराठा सेना को हरा दिया था और फिर अंग्रेजों का राज आया जिससे मनुवाद से आजादी मिली।

वो अलग बात कि बाद में अंग्रेजों ने ही मार्शल रेस थ्योरी लाकर उन्हीं महारों के ही सेना में भर्ती होने पर रोक लगा दी जिनकी वजह से वे कोरेगांव युद्ध जीते थे।

और सच्चाई यह है कि उस पेशवा राज में बाबूराव जमींदार यानि राजा भी थे और वनवासी हिन्दू भी और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाला क्रान्तिकारी भी।

आज इन्ही गोंड जाति को दो बोरा चावल पर मुस्लिम और ईसाई बनाया जा रहा है, क्योंकि उन्हें रटा दिया गया कि हिन्दू धर्म में तुम्हारा शोषण हुआ है।

जबकि गोंड जाति के राजा और जमींदार हुआ करते थे जिनका बाद में शोषण वो अंग्रेज कर रहे थे, जिसकी जीत का जश्न मनाया जाता है।

बाबूराव हमारे हीरो है
#सनातनभारत #सनातनहमारीपहचान #सनातनविचार #सनातन

"      चंद्रयान, चरौदा और भरत कुमार    "आज शाम 6.04 बजे चंद्रयान 3 का लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) वाला एलएम चंद्रम...
24/08/2023

" चंद्रयान, चरौदा और भरत कुमार "

आज शाम 6.04 बजे चंद्रयान 3 का लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) वाला एलएम चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के पास उतरेगा। चाँद में इस जगह उतरनेवाला भारत पहला देश होगा। यह भारतीय प्रतिभा का एक अनुपम उदाहरण है जो ISRO के माध्यम से साकार हो रहा है।

अब जरा धरती के एक कस्बे चरौदा (छत्तीसगढ़) पहुंचते हैं। यहां एक लड़का था के. भरत कुमार। भरत के पिता बैंक में सुरक्षा गार्ड हैं और बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते थे। इसके लिए आर्थिक समस्या आड़े आती थी सो भरत की माँ ने चरौदा में एक टपरी पर इडली चाय बेचने का काम शुरू किया। चरौदा में रेलवे का कोयला उतरता चढ़ता है। कोयले की इसी काली गर्द के बीच भरत मां के साथ यहां चाय देकर, प्लेट्स धोकर परिवार की जीविका और अपनी पढ़ाई के लिए मेहनत कर रहा था।

भरत की स्कूली पढ़ाई केंद्रीय विद्यालय चरौदा में होने लगी। जब भरत नौवीं में था, फीस की दिक्कत से टीसी कटवाने की नौबत आ गयी थी पर स्कूल ने फीस माफ की और शिक्षकों ने कॉपी किताब का खर्च उठाया। भरत ने 12 वीं मेरिट के साथ पास की और उसका IIT धनबाद के लिए चयन हुआ। फिर आर्थिक समस्या आड़े आई तो रायपुर के उद्यमी अरुण बाग और जिंदल ग्रुप ने भरत का सहयोग किया। यहाँ भी भरत ने अपनी प्रखर मेधा का परिचय दिया और 98% के साथ IIT धनबाद में गोल्ड मेडल हासिल किया।

जब भरत इंजीनियरिंग के 7 वें सेमेस्टर में था तब ISRO ने वहां अकेले भरत का प्लेसमेंट में चयन किया और आज भरत इस चंद्रयान 3 मिशन का हिस्सा है।

आज मात्र 23 साल का हमारा यह युवा चंद्रयान 3 की टीम के सदस्य के रूप में 'गुदड़ी के लाल' कहावत को सही साबित कर रहा है।

हम सब भारतवासियों के तरफ से #चंद्रयान3के लिए इसरो को बधाई 💐 शुभकामनाएं💐 अभिनंदन🌷

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