Mithila Research Foundation

Mithila Research Foundation मैथिली भाषा एवं साहित्यक लेल समर्पित स्वयंसेवी संस्थान

प्राचीन काल से उल्लिखित शब्द ' मिथिला ' भारतवर्ष और नेपाल का वह भू-भाग है, जहाँ’ मैथिली’ लोकभाषा और साहित्यिक भाषा दोनों रूप में चिरकाल से प्रयोग होती आ रही है | आज के भारतीय भाषा मंडली में मैथिली की स्थिति , मैथिली साहित्य रूपी धरोहर की स्थिति किसी से छुपी नहीं है |


हमारे मैथिली साहित्य के अनमोल धरोहरो से संपूर्ण विश्व में फैले हुए सभी मैथिली प्रेमी तथा नई पीढी को अवगत कराने के लिए इस वेब पोर्ट

ल की शुरूआत हो रही है | हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि हम अपने तमाम साहित्यिक , सांस्कृतिक और अन्य धरोहरों का संरक्षण और संवर्धन करें |


मैथिली भाषा हमारी पहचान है ! इस भाषा के लिखित साहित्य में हमारा इतिहास , हमारी परंपराएँ , हमारी संस्कृति ,हमारी आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि बहुत कुछ समाहित है | इसका अध्ययन - मनन होना चाहिए |


इस सुमधुर भाषा के प्रचार -प्रसार द्वारा इसके पुराने गौरवशाली रूप को पुनःस्थापित करना एक मात्र उद्देश्य हो हमारा,मैथिली भाषा का ज्यादा से ज्यादा पाठक वर्ग तैयार करना , जिनको पुस्तक अध्ययन के लिए नहीं मिल रहा है उनको पुस्तक उपलब्ध करवाना , मैथिली में स्तरीय*** पत्रिकारिता को बढावा देना , नये रचनाकारों को प्रोत्साहित करना , इस तरह के छोटे-छोटे प्रयास द्वारा हम अपनी मातृभाषा और मातृभूमि की सेवा कर सकें ! आप सबों का सहयोग और मार्गदर्शन हमेशा कि तरह मिलता रहेगा , इसी आशा के साथ !

विनम्र श्रद्धांजलि!साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत वरिष्ठ साहित्यकार,अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद्कभूतपूर्व अध्यक्ष, विशु...
30/05/2024

विनम्र श्रद्धांजलि!

साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत वरिष्ठ साहित्यकार,
अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद्क
भूतपूर्व अध्यक्ष, विशुद्ध सनातन परम्पराक पोषक,
मिथिला राज्य अभियानक
प्रखर सेनानी ,
अति विनम्र ओ साहसी, मैथिलीक विशिष्ट विद्वान
#प्रो०_कमलकांत_जी आइ हमरा
सभक मध्य नहि रहलाह !

13/03/2024
हार्दिक आभार!आगन्तुक समस्त  #सहभागी  #श्रोता  #संचालक  #संयोजिका  ैथिली
09/03/2024

हार्दिक आभार!
आगन्तुक समस्त
#सहभागी #श्रोता
#संचालक #संयोजिका

ैथिली

सहर्ष सूचनार्थसादर हकार!
07/03/2024

सहर्ष सूचनार्थ
सादर हकार!

चरित आ रचना *************     गोविन्द झाक जीवनवृत्त नाम - गोविन्द झा, पिता दीनबन्धु झा, माता यागेश्वरी देवी, पत्नी सीता ...
18/10/2023

चरित आ रचना
*************
गोविन्द झाक जीवनवृत्त
नाम - गोविन्द झा, पिता दीनबन्धु झा, माता यागेश्वरी देवी, पत्नी सीता देवी।
जन्मतिथि - 10.10.1923 ( दस अक्टूबर उन्नीस सौ तेईस )
मोक्षतिथि-18-10-2023।
जन्मस्थान - गाँव सनकोर्थु, मशहूर इसहपुर, डाकघर सरिससब-पाही, जिला मधुबनी, विहार। निवास - 104 सती चित्रकूट एपार्टमेंट्स, गंगा पथ, पटेल लगर, पटना, बिहार, 800 023।
सम्पर्क - 947186690 ।
जीवनचरित का सीडी – साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली।
शिक्षा - लक्ष्मीवती संस्कृत विद्यालय, सरिसब, मधुबनी, बिहार। गुरु महावैयाकरण दीनबन्धु झा तथा पं. मधुसूदन मिश्र ।
डिग्री - बिहार संस्कृत समिति से व्याकरणाचार्य, 1947, बिहार विश्वविज्यालय से बी.ए.हिन्दी मे, 1948, आइ.ए अंग्रेजी में 1951, बिहार संस्कृत समिति से साहित्याजार्य, 1952, वेदाचार्य, 1954।
भाषा - मैथिली ( मातृभाषा ), संस्कृत, हिंदी और अँग्रेजी मे प्रवीणता। साधारण ज्ञान बंगला, असमिया, ओडिया, नेपाली, उर्दू।
सेवा - (1) शब्दकोश-सहायक, न्यूज पेपर्स ऐंड पब्लिकेशन्स प्रा. लि. पटना, 1950 । (2) शब्दावली सहायक, उपनिदेशक, राजभाषा विभाग, बिहार सरकार, 1951-1978 । (3) उपनिदेशक, मैथिली अकादमी, पटना, 1978-85 । (4) पुस्तकाध्यक्ष, सुलभ इंटरनेशनल, पटना-दिल्ली, 1986-88.
संगोष्ठी – (1) अनुवाद कर्मशाला, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1951-52 । (2) इंडिअन एयर लाइन्स, ईस्टर्ल जोन, भारतीय लिपि, पटना, 1982 । (3) लिपिशक्षण कर्मशाला, तिब्बतन इन्स्टच्यूट, सारनाथ, 1992 । (4) मैथिली भाषा के विकास की कार्ययोजना, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, 2004 ।(5) मैथिली शिक्षण पुस्तक रचना कर्मशाला, भुवनेश्वर, 2006 ।
मीट दि ऑथर – साहित्य अकादेमी, कोलकाता, 2001 ।
संमान – (1) साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 1993 । (2) साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार, 1993 । (3) कामिल बुल्के पुरस्कार, बिहार सरकार, 1988 । (4) ग्रियर्सन पुरस्कार, बिहार सरकार, 2001 । (5) चेतना समिति सम्मान, पटना, 1989 । (6) विशिष्ट पंडित सम्मान, दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा, 2009 । (7) प्रबोध साहित्य सम्मान, 2005 ।
अभिनन्दन ग्रन्थ – पंडित श्री गोविन्द झा अर्चा ओ चर्चा, पटना, 1997.।
रचनाएँ – देखें संलग्न सूची।


गोविन्द झाक रचना
1. मालविकाग्निमित्र – संस्कृत से अनूदित, मैथिली साहित्य परिषद्, दरभंगा 1944.
2. बसात – नाटक, दरभंगा प्रेस कं. दरभंगा, 1954.
3. मैथिली छन्दशास्त्र - दरभंगा प्रेस कं., दरभंगा, 1960
4. लघुविद्योतन - मैथिली व्याकरण, दरभंगा प्रेस कं., दरभंगा, 1963.
5. मैथिलीक समस्या – विवेचन, चेतना समित, पटना 1968
6. मैथिलीक उद्गम ओ विकास – मिथिला सांस्कृतिक परिषद् कोलकाता 1968
7. वातावरणम् -मूल बसात, अनुवादक, शशिनाथ झा, संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा, 1970
8. व्याकरण-रचना-विजय - भारती भवन, पटना, 1971
9. अपन घर अपन लोक, सहलेखक गोपालज झा ओ बदरी दास, भारती भवन, पटना, 1971
10. अपन घर अपन पाठशाला ,,
11. अपन घर अपन समाज ,,
13. अन्तिम प्रणाम - नाचक चेतना समिति, पटना,1973
14. मैथिली भाषा का विकास – हिन्दी ग्रन्थ अकादेमी, पटना 1973
15. राजा शिवसिंह – नाटक, उर्वशी प्रकाशन, पटना 1973
16. विभागसार – धर्मशास्त्र, विद्यापतिकृत, सम्पादन, मैथिली अगादमी, पटना,1979.
17. उच्चतर मैथिली व्याकरण - मैथिली अगादमी, पटना, 1979
18. वर्णरत्नाकर – व्याख्या और सम्पादन, मैथिली अगादमी, पटना, 1980
19. विद्यापति-गीतावली – सम्पादन, मैथिली अगादमी, पटना, 1981
20. गोविन्ददास – जीवनी, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1982
21. चण्डीदास – जीवनी, मूल सुकुमार सेन, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1983
22. उमेश मिश्र – जीवनी, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1983
23 मैथिली नाटक अधुनातन सन्दर्भ – समीक्षा, मैथिली अगादमी, पटना, 1988
24. पूर्वकालीन भारतीय समाज – इतिहास, मूल राम शरण शर्मा, मोतीलाल बनारसीदास, पटना 1985 25. पूर्वांचलीय गीति-साहित्य – सम्पादन, चेतना समिति, पटना, 1989
26. सामाक पौती – कथा-संग्रह, भाखा प्रकाशन, पटना, 1990
27. रुक्मिणी-हरण – नाटक, चेतना समिति, पटना, 1990
28 प्राचीन भारत – इतिहास, अनुवाद, मूल राम शरण शर्मा, एनसीईआरटी, नई दिल्ली, 1990
29. नेपाली साहित्यक इतिहास – अनुवाद, साहित्य अकीदेमी, नई दिल्ली, 1991
30. कीर्तिलता – मूल विद्यापति, सम्पादन, मैथिली अकादमी, पटना, 1992
31. कीर्तिपताका – मूल विद्यापति, सम्पादन डा. शशिनाथ झा के साथ, नाग प्रकाशक, दिल्ली 1992 32. विद्यापतिक आत्मकथा – ऐतिहासिक उपन्यास, अखियासल प्रकाशन, पटना, 1992
33. शिखरिणी – समीक्षा, सम्पादन, चेतना समिति, पटना, 1992
34. मैथिली शब्दकोश – मैथिली अकादमी, पटनी, 1993
35. भनइ विद्यापति – विद्यापतिक आतमकथा का हिन्दी अनुवाद तारानन्द वियोगी, आधार प्रकाशन, पंचकूला, 1893
36. नखदर्पँण – कथा संग्रह, शेखर प्रकाशन, पटना, 1995
37. पाताल भैरवी – असमिया उपन्यास का अनुवाद, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1997
38. मैथिली-अंग्रेजी कोश - कल्याणी फाउंडेशन, दरभंगा,1999
39. गोविन्ददास – जीवनी, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1999
40. अओ बाबा की बौआ – बालकथा, असमिया से अनूदित, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 2000
41. प्रलाप – कविता-संग्रह, नन्दन प्रकाशन, पटना, 2001
42. भूषणसारदीपिका – संस्कृत शब्दशास्त्र भूषणसार की संस्कृत व्याख्या, आंशिक योगदान, मिथिला संस्कृत विद्यापीठ, दरभंगा,2002
43. आत्मालाप – सरस इतिहास, अखियासल प्रकाशन, पटना, 2002
44. झाँपि – सामाक पौती का वंगला अनुवाद, गौरी मिश्र, साहित्य अकादेमी, कोलकाता, 2003
45. भाषा आ समाज – सम्पादन, चेतना समिति, पटना,2003
46. पाणिनीयं शब्दानुशासनम्, हृद्या व्याख्या – संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा, 2004
47. अतीतालोक – निबम्ध-संग्रह, अखियासल प्रकाशन, पटना, 2004,
48. लिंग्विस्टिक इनफॉर्मेशन -- –अंग्रेजी-मेंथिली, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, 2005
49. कीर्ति-किरण – सम्पादन, साहित्यिकी, सरिसब-पाही, मधुबनी, 2006
46. मैथिली परिचायिका – भाषा-शिक्षण, शेखर प्रकाशन, पटना, 2006
50. मैथिली परिशीलन – व्याकरण-सह-भाषाविज्ञान, मैथिली अकादमी, पटना, 2007
51. नखदर्पण – हिन्दी अनुवाद, प्रतिमा पांडेय, सरस्वती प्रेस, पटना, 2009
52. गोविन्ददास – जीवनी, हिन्दी अनुवाद प्रेम शंकर सिंह, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 2009
53. जनम अबधि हम – आत्मकथा, नवारम्भ प्रकाशन, पटना, 2010
54. कहानी विदेह जनपद की – आत्मालाप का हिन्दी अनुसर्जन, योगेन्द्र प्रसाद मिश्र, नवारम्भ प्रकाशन, पटना, 2010
55. अनुचिन्तन – निबन्ध-संग्रह, नवारम्भ प्रकाशन, पटना, 2010
56. जयकान्त-जयन्तिका – स्मृतिग्रन्थ, सम्पादन, शेखर प्रकाशन, पटना, 2010
57. गीत दीनाभद्रीक ओ गीत नेबारक – मैथिली अनुवाद, मूल ग्रियर्सन, सम्पादक रमानन्द झा रमण, अखियासल प्रकाशन, 2010
58. भाषाशास्त्र-प्रवेशिका – दीनबन्धु प्रकाशन, पटना, 2011
59. विद्यापति शब्दकोश ( अवहट्ठ खंड ) – बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, 2012
60. ग्रियर्सनकृत मैथिली व्याकरण - अनुवाद, सम्पादक रमानन्द झा, चेतना समिति, पटना, 2012
61. बांला-मैथिली अभिधान – बंगला-मैथिली शब्दकोश, साहित्य अकादेमी, कोलकाता, 2012,
62. विद्यापति-गीत-समग्र – सम्पादन और अनुवाद, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, 2012
63. मिथिलाक सामाजिक इतिहास – साहित्यिकी प्रकाशन, सरिसब-पाही, मधुबनी, 2013.
64. श्रोत्रिय समाज आ पाण्डित्य-परम्परा – अखियासल प्रकाशन, लालगंज, 2014
65. नवरंग,, साहित्यिकी, 2015
66. सात रेखा सात रंग साहित्यिकी, 2015
67. विद्यापतिकृतं गयापत्तलक, व्याड़ीभक्तितरंगिणी तथा वर्षकृत्यम् अप्रकाशित कृति
1. अभिज्ञानशाकुन्तल –सरलीकृत चारिम कधरि
2. लीरध्वज का व्य अपूर्ण
3. तित्रांगदा मै, अनु. पूर्ण
4. स्वप्नवासवदत्त मै. अनु. मैथिली अकादमी मे प्रकाशनाधीन
5. वीरागना बंगला सँ मैथिली
6. को दात् कसमा अदात – संस्कृत कथा।
7. ढोलक कथा, हिंदी मासिक कहीनी मे प्रकाशित
8. पहला विवाह ततिरैव प्रकाशित
9. स्टोरी ऑफ द बोट ऐंड कार्ट
10.. आब अपूर्ण कथा
11. शरण अपूर्ण कथा
12. दही मे मूसर कथा
13. मुक्ति कथा
14. कुकुर सँ सावधाल ओड़िआ कथाक अनुवाद
5. हमर इसकुल तोहर इसकुल नाटिका
16. कालकूट नाटक पूर्ण
17य अतिथिदेवो भव कथा
18. मुक्ति कथा
19. दही मे मूसर तथा
20. मनुष्यक मूल्य
21. रूदल काका एकांकी
22. मोछसंहार
23. बरदेखी
24. उपचार
25. सौभाग्यम् संस्कृत कथा
26. एकदा नारदो योगी
27. दैड़ि चली, ठेसि खसी कथा
28. मैथिली साहित्य का परिचय
29. रमानन्द रेणुक भाषा
30. इंडिअन लिटरेरी सीन ए हेजी रिफ्लेक्शन
31. समकालीन कविताक भाषा
32. मैथिली कतेक भारतीय कतेक नेपालीय
33. रचनाप्रक्रिया
34. कनेक अपन मुह तँ गेखल जाए सामाजिक
35. नागार्जुन और इनकी मातृभाषा
36. बिहारक भाषिक परिदृश्य मे कतए अछि मैथिली।
37. जयदेव ओ अभिनव जयदेव
38. भीमनाथक कविचूड़ामणिक काव्यसाधना केर समीक्षा
39. शतक पर्व रमानाथ झाक
40. मैथिली भाषाक संग अन्य भाषाक अन्तःसम्बन्ध
41. मैथिली नाटक आरम्भ सँ अन्त तक
42. पंजी प्रथाक उद्भव ओ विकास
43. कतेक दीर कतेक लग, मायानन्द मिश्रक स्मृति मे
44. मिथिला7रक प्रसंग किछु विवेचन
45. रवीन्द्रजयन्तीक अवसर पर भाषँ
46. रजभाषाक सरलीकरण ( देखू 61 )
47. कलम उठएबा सँ पहिने
48. मैथली आ कोङ्कणी
49. गिकाक प्रसंग चकोर सँ पाक्षात्कार
50. मैथिलीक एक प्रच्छन्म सेवक उमापति सिंह
51 गृहस्थरत्नाकरक भूमिसा
52. मीट द ऑथरक भाषण
53. विद्यापतिक रूप
54. विद्यापतिक एक गीतक पाठोद्धार
55. अभिनन्दनोत्तर कृतज्ञता
56. संसकृते पर्यायवाचिवाहुल्यम्
7. तोहर सदृश एक ( यन्त्रनाथक कथा)
58. उदयनाचार्य एक परिचय, रेडिओ
59. विसरए चाहिअ योगेन्द्र प्रसादक शोकोद्गार
60. हिन्दी मे लेकभाषा का अवदान
61. प्रबोधसम्मान, कृतज्ञता
62. ते हि नो दिवसा गताः श्रीकान्त-संस्मरण
63. कारकमधिकृत्य केचन विचाराः
64. हर्षदेव माधव – समीक्षा
65, गङ्गानाथचरितम्
66, विद्यापतिक प्रसंग किछु विचारणीय प्रसंग
69. हरिमोहन झाक आँखि
70. मैथिली महाभारतक उग्रासपर्व – लो,से. आयो
71. विद्यापति संगीत
72. पंडित काश्मीरक आ मिथिलाक
73. मिथिलाक्षर एक मृगमरीचिका
74. कुछ धार्मिक शब्द
75. भारतीय चिन्तन मे मिथिलाक योगदान
76. Sanskrit drama in Maithili
77. नामार्थ के विषय में
78. पुरा यत्र स्रोतः, हर्षदेव माधव
79. अष्टाध्याय्याः सरलीकरणम्
80. New Light on the Karnata Kings
81. Metre in Maithili Ramayana
82. वर्णक्रमिक विन्यास
83. कलम उठएबा सँ पहिने
84. कालिन्दीक पत्र
85. एकोहं बहु स्याम
86. अकादमी पुरस्कार कृतज्ञता
87. मैथिलीक मासिक पत्रिका
88, विद्यापतिक गीतक पाठोद्धार
89. राँटी मे बीजभाषण
90. विद्यापति की भाषा
81. संस्कृत नाटकक संरचनात्मक स्वरूप
92. कतेक डारि पर – समीक्षा
तीन पुस्तक प्रकाशकक ओतए
1, विज्ञान-कोश, वाणी प्रकाशन
2. हिन्दी-मैथिली कोश, मैसूर
3. तुलनात्मक व्याकरण, चौखम्बा

मैथिली : कल, आज और कल --------------------------भारतीय भाषाओँ में मैथिली एक समृद्ध और प्रतिष्ठित भाषा है,जिसका अति-प्राच...
05/07/2023

मैथिली : कल, आज और कल
--------------------------
भारतीय भाषाओँ में मैथिली एक समृद्ध और प्रतिष्ठित भाषा है,जिसका अति-प्राचीन लिखित साहित्य, शब्द भंडार और अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव भी भूतकाल मे बहुत व्यापक रहा है । जिस वर्ण-रत्नाकर का संदर्भ अन्यभाषा-भाषी भी देते नहीं अघाते वह मैथिली का ज्ञातव्य आदि ग्रंथ है । साक्ष्य तो इससे पूर्व के भी उपलब्ध हैं, किन्तु विवेचना का विषय यह नहीं ।

१३वीं सदी मे ज्योतिरीश्वर ठाकुर रचित वर्ण-रत्नाकर एक ऐसा ग्रंथ है, जो गागर मे सागर है । इसके बाद सेही मैथिलीसाहित्य का समृद्ध इतिहास रहा है ।महाकवि विद्यापति की
चर्चा किए बिना समस्त उत्तर भारतीय भाषा (हिन्दी सहित)का इतिहास अपूर्ण ही रहेगा । हिन्दी , बांग्ला , असमिञा , उड़िया, नेपाली आदि विभिन्न भाषाओं पर महाकवि रचित
साहित्य विशेष कर मैथिली गीत और पदावली का प्रचूर प्रभाव परिलक्षित होता है । असमिञा साहित्य के श्रीमन्तशंकरदेव पर मैथिली का बहुत प्रभाव पड़ा. बुरुन्जी और पंजी से यह पता चलता है कि श्रीमन्तशंकरदेव के पितामह मिथिला से असम गए थे । बांग्ला साहित्यकार तो विद्यापति की रचना में सरोबोर थे। स्वयं गुरू टैगोर विद्यापति से बहुत प्रभावित थे और विद्यापति के शैली में भानु सिंहेर गान लिखते थे ।हाल तक यह पता नहीं था कि विद्यापति मैथिलीभाषा के कवि थे, मैथिल थे ।
क्योंकि इनकी रचना बांग्ला लिपि मे भी उपलब्ध है । प्रसिद्ध भाषाविद सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय तो बंगला लिपि का उद्भव तिरहुता अथवा मिथिलाक्षर से मानते हैं ।उड़िया भाषा
के शाब्दिक उच्चारण, मैथिली के सबसे निकट है ऐसा सुभद्र झा कहते हैं । नेपाल मे तो मैथिली भाषी अपार जनसमूह निवास करते हैं । अब अगर हम मैथिली भाषी क्षेत्र और मैथिली भाषा-साहित्य प्रभावित क्षेत्र का अध्ययन करें तो काफी विस्तृत क्षेत्र हमे दृष्टिगोचर होता है ।

वास्तव मे १९वीं सदी तक , जबतक कि अँगरेजी शिक्षा बहु प्रचलन मे नहीं थी , देशभर के संस्कृत छात्र मिथिला मे पढने आते थे । लिखित भाषा संस्कृत होते हुए भी (जिसकी
लिपि देवाक्षर और मिथिलाक्षर भी होती थी ) बोलचाल की भाषा मैथिली ही थी । वर्षों रहकर शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र स्वत: मैथिली सीख जाते थे और जब लौटते थे तो उनके साथ मैथिली भी सुदूर क्षेत्रों तक पहुँच जाती थी ।
मैथिली लिपि और साहित्य भी उनके साथ दूर दूर तक चली जाती थी । इसप्रकार से मैथिली समृद्ध ही नहीं हुई ,बल्कि अपना क्षेत्र विस्तार भी करती रही । काल की गति बहुत निर्मम होती है । आधुनिकता का दौर आया । हस्तलिखित प्रति से छापाखाना की ओर जब जाना हुआ तो समस्या आनी आरंभ हुई ।
किसी भी भाषा के लिए शासक वर्ग का
प्रश्रय बहुत मूल्यवान होता है । भारतवर्ष की आजादी मे एकीकृत भाषा की आवश्यकता , एकीकृत लिपि की जरूरत बनी । एक आह्वान सा हुआ और तिरहुताक्षर की बलि राष्ट्र
भक्ति के नाम पर तत्कालीन 'मिथिला' शासक वर्ग ने दे दिया, जो कदाचित उस सम़य की मांग भी थी । किन्तु यह निर्णय बहुत भारी था । इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मराठी और मैथिली के अतिरिक्त किसी भी अन्य भाषा ने अपनी लिपि का त्याग हिन्दी के लिए नहीं किया । अस्तु । दैवो दुर्बल घात करिष्य...! जो हुआ सो हुआ लेकिन आधुनिक मैथिली के उत्थान मे कलकत्ता विवि और सर आशुतोष मुखर्जी का योगदान अतुलनीय है । कलकत्ता विवि के कुलाधिपति बनने के बाद सर मुखर्जी (श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता )
ने भारतीय भाषा के संवर्धन और संरक्षण हेतु जिन पाँच भाषाओ की पढाई कलकत्ता विश्व
विद्यालय मे आरंभ करवाई , उनमें एक मैथिली भी थी ।
तत्कालीन पड़ोसी जमींदारों ने शिक्षकों का वेतन देना स्वीकार किया और मैट्रिक से लेकर एमए तक मैथिली की पढाई आरंभ हो गई ।
यह एक बहुत ही परिवर्त्तन लाने वाली घटना मैथिली के लिए साबित हुई । जबतक कि
पटना विश्वविद्यालय का गठन नहीं हुआ , तब तक सब ठीक था किन्तु 'मिथिला' क्षेत्र का पटना विश्वविद्यालय मे आ जाना जैसे फिर ग्रहण बन कर आया । बहुत सारे आन्दोलन जिसमे मैथिल छात्र संघ , PEN आदि हैं , के
आन्दोलन स्वरूप पटना विश्वविद्यालय मे मैथिली पाठ्यक्रम मे आयी ।
इसी मध्य १९६६ ई० की बात है । बिहार सरकार , शिक्षा विभाग के निर्णय से , शिक्षा विभाग के ही बजट से ग्रंथालय प्रकाशन से सभी विषयों की मैथिली मे पाठ्यक्रम की पुस्तकें छपी । मात्र एक या दो वर्ष । इसी समय मे मैथिली साहित्य अकादमी में भी स्वीकृत हो गई । इससे पहले मिथिला राज्य की मांग भी रह-रहकर उठती रही । ज्ञात हो कि १९५६ से पहले राज्यों का गठन भाषा के आधार पर होता था और मैथिली ने अपनी लिपि का जो त्याग किया ,समान लिपि का हवाला देकर , मैथिली को हिन्दी की बोली कह कर खूब प्रचारित किया गया । लेकिन भला हो सुभद्र बाबू जैसे विद्वानों का जिन्होंने यह प्रमाणित कर दिया कि मैथिली एक स्वतंत्र भाषा है । एक तो करेला ऊपर से नीम चढा । साहित्य अकादमी मे मैथिली का आना और बिहार के प्राथमिक शिक्षा से जाना दोनों एक साथ ही हो गया ।
रक्ष मात्र इतना की उच्च कक्षा मे (९ -१० में ) और कॉलेज मे मैथिली की पढाई होती रही । लेकिन ९० के दशक मे एक प्रखर मैथिली पुत्र डॉ० जयकान्त मिश्र (जो स्वयं मैथिली के विद्वान भी थे )ने पटनाउच्चन्यायालय मे याचिका दाखिल कर दी । तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इससे चिढकर बिहार लोकसेवा आयोग से मैथिली को हटा दिया। मैथिली अष्टम अनुसूची मे आई । जयकान्त बाबू की जीत हुई । इनकी याचिका मैथिली माध्यम से ,मैथिली भाषी क्षेत्र मे पढाई की थी । बिहार सरकार ने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट मे अपील किया । अपील खारिज हो गई ।
इतना सब कुछ होने के बावजूद , मैथिली माध्यम से पढाई की बात तो दूर २००८ मे बिहार सरकार ने मैथिली को मातृभाषा खँड
से ही बाहर कर दिया । बिहार के मैथिली
भाषी क्षेत्र मे जो कक्षा ९-१० मे मैथिली पहले अनिवार्य मातृभाषा के रूप मे पढाई जाती थी , उसे एच्छिक विषय बना दिया गया ।
मैथिली भाषी क्षेत्र मे बांग्ला , उर्दू आदि
भाषा के शिक्षकों की बहाली होती है लेकिन मैथिली शिक्षक की बहाली , मैथिली भाषा की पढाई प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों मे नहीं होती । एनसीईआरटी के नियमानुसार भी इस भाषा की पढाई पहली से दसवीं कक्षा तक
होनी चाहिए जो नहीं होती । २००७ मे जो एससीईआरटी पुस्तक निर्माण कमिटी बनी , जिसने पाठ्यक्रम की पहली
कक्षा से लेकर आठवीं तक पुस्तक बना कर दी , वो २००७ से अब तक छप कर बाहर नहीं आई । लोकतांत्रिक सरकार‌ संवैधानिक अधिकार
का ऐसा हनन कर सकती है , सुप्रीम
और हाइकोर्ट के फैसले की अवहेलना कर सकती है , यह कोई साधारण सी घटना नहीं
है ।संविधान की धारा ३५०क में स्पष्ट निर्देश है।
वस्तुत: भाषा किसी समाज के अभिव्यक्ति का
माध्यम मात्र नहीं , संस्कृति का वाहक तत्व होती है । मिथिला शब्द से जैसे बिहार सरकार
को घृणा है । कोई अँगरेजी बोलने वाले को जैसे हम अँगरेज कहते हैं , बंग्ला भाषी को बंगाली , पंजाबी , गुजराती आदि को जैसे हम उसके भाषा से पहचान देते हैं , उसी तरह मैथिली भाषी जन मैथिल हुए , 'मिथिला' के हुए ।
बिहार सरकार जबरन अपनी बिहारी पहचान हम मैथिली भाषी जनता पर थोपना चाहती है और इस क्रम मे वो संविधान ,अदालत , कानून सबको धता बता रही है । क्योंकि जैसे ही
मैथिली समृद्ध होगी , पाठक बढेंगे , तो रोजगार बढेगा ।
अखबार , सिनेमा , प्रिंटिंग प्रेस आदि नाना प्रकार के अवसर उत्पन्न होंगे । और यह बिहार रूपी सत्ता के औपनिवेशिक सोच को स्वीकार नहीं शायद । मैं हैरान होकर सोचता हूँ ।
संविधान की शपथ खाकर अपने राज्य के लोगों से बिना किसी राग-द्वेष के शासन का वचन लेने वाले , अपनी नैतिकता किस तरह विस्मृत कर देते हैं ।
आज मैथिली भाषी क्षेत्र मे मैथिली भाषा के साथ जो हो रहा है , कदाचित लोगों की उदासीनता का भी उसमे कुछ योगदान है , हो सकता है । लेकिन अगर चीजें उपलब्ध होंगी तभी सामाजिक जागरूकता के द्वारा उसको लोगों तक पहुँचाया जा सकता है । ना पाठ्यपुस्तक , ना शिक्षक तो छात्र कहाँ से ?
जो हैं वो भी मजबूरी वश दूसरी विषयों
की ओर जाने को विवश हैं । ११वीं कक्षा से मैथिली भाषा की पढाई होती है । कम से कम दस विश्वविद्यालय मे मैथिली भाषा की पढाई होती है या होकर बंद। संघ लोक सेवा आयोग ,
बिहार लोक सेवा आयोग , साहित्य अकादमी आदि संस्थान मे मैथिली है । इससे बडी विडम्बना और मजाक और क्या होगा कि वही मैथिली जो उपरोक्त संस्थानो मे है , उसकी
पढाई प्राथमिक , माध्यमिक और उच्च विद्यालय मे मातृभाषा के रूप मे नही होती है । नींव तो बनाई नहीं जा रही लेकिन छत और दीवार की चिन्ता है । यह बहुत ही सुनियोजित प्रकार की साजिश लगती है । क्योंकि इस तरह से किसी भाषा का विकास हो ही नहीं सकता । इसलिए जो सबसे आवश्यक है वो यह कि
१. मातृभाषा के रूप मे अविलंब कक्षा एक से
दस तक
मैथिली की पढाई आरंभ हो ।
२. पाठ्यपुस्तक की तत्काल छपाई हो और
३.पर्याप्त संख्या मे मैथिली भाषा के शिक्षकों की बहाली हो
यह तीन ऐसे कार्य हैं जो बिहार सरकार को तत्काल करने चाहिए । केंद्र सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है जैसे सभी भाषा के टीवी-रेडियो चैनल इत्यादि हैं उसी तरह मैथिली भाषा के भी रेडियो , टीवी आदि की स्थापना करने के अतिरिक्त राज्य सरकार की अपेक्षित सहायता करे और राज्य सरकार को भी अगर आवश्यकता पड़े तो केन्द्र से नि:संकोच अनुदान माँगे । भारत के विकसित से अति पिछड़े पायदान पर आ चुके क्षेत्र मे , जागरूकता लाना
विकास के लिए परमावश्यक है । और विकास मे क्षेत्रीय भाषा का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है । किसी भाषा का लुप्त होना , मात्र एक भाषा का लुप्त होना मात्र नहीं होता। उसकेसाथ इतिहास , संस्कृति और सभ्यता भी उस भाषा क्षेत्र की लुप्त हो जाती है । और मैं मानता हूँ कि देश के किसी भी संस्कृति का लुप्त होना वास्तव मे , देश का ही नुकसान होता है । जिसका मूल्य बहुत अधिक होता है जो कोई भी देश चुकाने मे असमर्थ तुल्य होता है ।

नीरज कुमार झा

Address

WZ 434 Naraina Village
Delhi
110028

Telephone

9953335747

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Mithila Research Foundation posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Mithila Research Foundation:

Share

Category