23/04/2025
"ख़ामोशी चीख़ती रही"
ख़ामोशी चीख़ती रही, पर्वतों ने रो दिया,
फूलों की घाटी में आज, लहू ने रंग बो दिया।
ना देखा मज़हब किसी ने, ना समझा क्या सही,
इंसानियत को मार कर, क्या हासिल हो गई जीत कहीं?
माँ की गोदें सूनी हुईं, बच्चों की आँखें सूखी,
किससे पूछें क्यों हुआ ये, ज़िंदगी क्यों इतनी रूखी?
जिन हाथों ने नमाज़ पढ़ी, उन्हीं ने बंदूक उठाई,
कैसी ये सियासत है, जो मासूमों की जान ले जाए?
दुआओं में अब सिसकियाँ हैं, और तसल्ली का नाम नहीं,
क्या कोई बताएगा हमें, अब बचा कौनसा ईमान है सही?
चलो उठाओ दीप शांति के, नफ़रत की आंधी थामें,
एकता का गीत गाएँ, ताकि फिर से अमन लौट आए।
"ख़ामोशी चीख़ती रही, पर्वतों ने रो दिया,फूलों की घाटी में आज, लहू ने रंग बो दिया।ना देखा मज़हब किसी ने, ना समझा क्या स.....