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|| यतो धर्मस्ततो जयः ||🔱

अयिकलि कल्मष नाशिनि कामिनी, वैदिक रूपिणि वेदमयेक्षीर समुद्भव मंगल रूपणिमन्त्र निवासिनी मन्त्रयुते।मंगलदायिनि अम्बुजवासिन...
05/06/2026

अयिकलि कल्मष नाशिनि कामिनी,
वैदिक रूपिणि वेदमये
क्षीर समुद्भव मंगल रूपणि
मन्त्र निवासिनी मन्त्रयुते।
मंगलदायिनि अम्बुजवासिनि
देवगणाश्रित पादयुते
जय जय हे मधुसूदन कामिनी
धान्यलक्ष्मी परिपालय माम्।।

अर्थात्: हे धान्यलक्ष्मी तुम प्रभु की प्रिय हो कलि युग के दोषों का नाश करती हो तुम वेदों का साक्षात् रूप हो तुम क्षीरसमुद्र से जन्मी हो तुम्हारा रूप मंगल करने वाला है मंत्रो में तुम्हारा निवास है और तुम मन्त्रों से ही पूजित हो।

रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारंजलांतर्विहारं धराभारहारम्।चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपंधृतानेकरूपं भजेहं भजेहम्॥अर्थात्: जिनके ग...
04/06/2026

रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं
जलांतर्विहारं धराभारहारम्।
चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं
धृतानेकरूपं भजेहं भजेहम्॥

अर्थात्: जिनके गले के हार में देवी लक्ष्मी का चिन्ह बना हुआ है जो वेद वाणी के सार हैं जो जल में विहार करते हैं और पृथ्वी के भार को धारण करते हैं जिनका सदा आनंदमय रूप रहता है और मन को आकर्षित करता है जिन्होंने अनेकों रूप धारण किये हैं उन भगवान विष्णु को मैं बारम्बार भजता हूँ।।

यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यतःसम्पदो भक्तसन्तोषिकाः स्यु:।यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिःसदा तं गणेशं नमामो भजामः॥अर्...
03/06/2026

यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यतः
सम्पदो भक्तसन्तोषिकाः स्यु:।
यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः
सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥

अर्थात्:जिनसे मुमुक्षु को बुद्धि प्राप्त होती है और अज्ञान का नाश होता है जिनसे भक्तों को संतोष देने वाली सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं तथा जिनसे विघ्नों का नाश और समस्त कार्यों की सिद्धि होती है उन गणेश का हम सदा नमन एवं भजन करते हैं।।

आज देखने में आता है की कुछ कौल शिष्य को सप्तवर्ष में पूर्णाभिषेक तक पहुंचाने के नियम की तो बात करते हैं परन्तु अघोर/ श्म...
31/05/2026

आज देखने में आता है की कुछ कौल शिष्य को सप्तवर्ष में पूर्णाभिषेक तक पहुंचाने के नियम की तो बात करते हैं परन्तु अघोर/ श्मशान पीठ से साधन हेतु तत्संबंधी योग्य साधक के पास सीखने नहीं भेजते जैसा की नियम सर्वत्र कौलागमों में मिलता है।कालानुकूल कारणों से अघोर क्रम में महासिद्ध योगी गुरु मत्स्येंद्रनाथ जी द्वारा योगिनी कौल में प्रणीत त्रयक्षर से सब तत्व की शुद्धि कथित है।
सिद्ध तो सदैव - सर्वदा भावशुद्ध है ही!

व्याप्तचराचरभावविशेषंचिन्मयमेकमनन्तमनादिम्।
भैरवनाथमनाथशरण्यंतन्मयचित्ततया हृदि वन्दे॥
त्वन्मयमेतदशेषमिदानींभाति मम त्वदनुग्रहशक्त्या।
त्वं च महेश! सदैव ममात्मास्वात्ममयं मम तेन समस्तम्॥
स्वात्मनि विश्वगते त्वयि नाथे तेन न संसृतिभीतिः कथाऽस्ति।
सत्स्वपि दुर्धरदुःखविमोह-त्रासविधायिषु कर्मगणेषु॥
अन्तक! मां प्रति मा दृशमेनां क्रोधकरालतमां विदधीहि।
शङ्करसेवनचिन्तनधीरो भीषणभैरवशक्तिमयोऽस्मि॥
इत्थमुपोढ़भवन्मयसंवि-द्दीधितिदारितभूरितमिस्रः।
मृत्युर्यमान्तककर्मपिशाचै-र्नाथ! नमोऽस्तु न जातु बिभेमि॥
प्रोदितसत्यविबोधमरीचि-प्रोक्षितविश्वपदार्थसतत्त्वः।
भावपरामृतनिर्भरपूर्णे त्वय्यऽहमात्मनि निर्वृत्तिमेमि॥
मानसगोचरमेति यदैव क्लेशदशाऽतनुतापविधात्री।
नाथ! तदैव मम त्वदभेद-स्तोत्रपराऽमृतवृष्टिरुदेति॥
शङ्कर! सत्यमिदं व्रतदान-स्नानतपो भवतापविनाशि।
तावकशास्त्रपराऽमृतचिन्तास्यन्दति चेतसि निर्वृत्तिधाराम्॥
नृत्यति गायति हृष्यति गाढं संविदियं मम भैरवनाथ!।
त्वां प्रियमाप्य सुदर्शनमेकं दुर्लभमन्यजनैः समयज्ञम्॥
वसुरसपौषे कृष्णदशम्या-मभिनवगुप्तः स्तवमिदमकरोत्।
येन विभुर्भवमरुसन्तापं शमयति झटिति जनस्य
दयालुः॥

गरुड़ गायत्री मंत्र भगवान गरुड़ को समर्पित एक अत्यंत दिव्य और प्रभावशाली वैदिक मंत्र है। गरुड़ देव भगवान विष्णु के वाहन,...
31/05/2026

गरुड़ गायत्री मंत्र भगवान गरुड़ को समर्पित एक अत्यंत दिव्य और प्रभावशाली वैदिक मंत्र है। गरुड़ देव भगवान विष्णु के वाहन, वेदों के ज्ञाता तथा नागों के शत्रु माने जाते हैं। सनातन धर्म में उन्हें शक्ति, साहस, तेज, रोगनाश और विषनाश के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णवर्णाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात्॥”

इस मंत्र में साधक भगवान गरुड़ के स्वर्ण समान तेजस्वी स्वरूप का ध्यान करता है और उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसकी बुद्धि को प्रकाशित करें, जीवन के अंधकार को दूर करें तथा उसे धर्म, ज्ञान और सफलता के मार्ग पर प्रेरित करें।
गरुड़ गायत्री मंत्र का नियमित जप भय, नकारात्मक शक्तियों, विषबाधा, सर्पदोष तथा अदृश्य बाधाओं से रक्षा करने वाला माना गया है। ज्योतिष में कालसर्प दोष, राहु-केतु के अशुभ प्रभाव और नागदोष की शांति के लिए भी इस मंत्र का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा विश्वास है कि गरुड़ देव की कृपा से साधक में आत्मविश्वास, निर्भीकता और आध्यात्मिक तेज का विकास होता है।
शास्त्रों में वर्णित है कि गरुड़ देव केवल भगवान विष्णु के वाहन ही नहीं, अपितु धर्म और भक्ति के महान प्रतीक भी हैं। उनकी उपासना से जीवन में आने वाली अनेक प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं तथा साधक को संरक्षण, सफलता और दिव्य कृपा की प्राप्ति होती है।
गरुड़ स्तुति।
कुङ्कुमाङ्कितवर्णाय कुन्देन्दुधवलाय च। विष्णुवाह नमस्तुभ्यं पक्षिराजाय ते नमः॥
अर्थात्, हे पक्षिराज गरुड़! आपको नमस्कार है। आप भगवान विष्णु के दिव्य वाहन हैं, तेजस्वी हैं और अपने भक्तों की रक्षा करने वाले हैं। आपकी कृपा से भय, विष और समस्त बाधाओं का नाश होता है।

विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्‌।लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम॥ अर्थात्: भगवान विष्णु की प्र...
29/05/2026

विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्‌।
लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम॥

अर्थात्: भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी माधवप्रिया भगवान अच्युत की प्रेयसी क्षमा की मूर्ति लक्ष्मी देवी मैं आपको बारंबार नमन करता हूँ।।

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं।नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥अर्थात्...
27/05/2026

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

अर्थात्: विघ्नेश्वर वर देनेवाले देवताओं को प्रिय लम्बोदर कलाओंसे परिपूर्ण जगत् का हित करनेवाले गजके समान मुखवाले और वेद तथा यज्ञ से विभूषित पार्वतीपुत्र को नमस्कार है हे गणनाथ आपको नमस्कार है।।

श्री हनुमानजी का 5मुख वाला विराट स्वरूप 5 दिशाओं में हैं।हर रूप 1मुख वाला त्रिनेत्रधारी यानि 3आंखों और  2भुजाओं वाला है।...
26/05/2026

श्री हनुमानजी का 5मुख वाला विराट स्वरूप 5 दिशाओं में हैं।
हर रूप 1मुख वाला त्रिनेत्रधारी यानि 3आंखों और 2भुजाओं वाला है।
यह पांच मुख “नरसिंह” “गरुड” “अश्व” “वानर” और “वराह” रूप है।
हनुमान के 5 मुख क्रमश:
“पूर्व” “पश्चिम” “उत्तर” “दक्षिण” और “ऊर्ध्व” दिशा में प्रतिष्ठित माने गएं हैं।
पंचमुखी हनुमान का अवतार भक्तों का कल्याण करने के लिए हुआ हैं।
पंचमुखी हनुमानजी का अवतार मार्गशीर्ष कृष्णाष्टमी को माना जाता हैं।
रुद्र के अवतार हनुमान ऊर्जा के प्रतीक माने जाते हैं। इनकी आराधना से बल कीर्ति आरोग्य और निर्भीकता बढती है।
पंचमुखी हनुमानजी के “पूर्व की ओर” का मुख “वानर” का हैं ,जिसकी प्रभा करोडों सूर्यों के तेज समान हैं।
पूर्व मुख वाले हनुमान का पूजन करने से समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है।
“पश्चिम” दिशा वाला मुख “गरुड” का हैं जो भक्तिप्रद संकट विघ्न बाधा निवारक माने जाते हैं।
गरुड की तरह हनुमानजी भी अजर-अमर माने जाते हैं।
हनुमानजी का “उत्तर की ओर” मुख “वाराह” का है और इनकी आराधना करने से अपार धन-सम्पत्ति ऐश्वर्य यश दीर्घायु प्रदान करने वाल व उत्तम स्वास्थ्य देने में समर्थ हैं।
हनुमानजी का “दक्षिण मुखी” स्वरूप भगवान “नृसिंह” का है जो भक्तों के भय चिंता परेशानी को दूर करता हैं।

अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥अर्थात्:मैं अंजनी के वीर पुत्र और माता जानकी के दुख...
26/05/2026

अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।
कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥

अर्थात्:मैं अंजनी के वीर पुत्र और माता जानकी के दुखों को दूर करने वाले वानरों के स्वामी लंका के अक्षकुमार रावण के पुत्र का वध करने वाले हनुमान जी की पूजा करता हूं।।

देवि सुरेश्वरि भगवति गंगे त्रिभुवनतारिणि तरलतरंगे।शंकरमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले॥ श्री गंगा दशहरा की आपक...
25/05/2026

देवि सुरेश्वरि भगवति गंगे त्रिभुवनतारिणि तरलतरंगे।शंकरमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले॥
श्री गंगा दशहरा की आपको अनेक अनेक मंगलमय शुभ कामनाये
🌹हर हर गंगे 🌹

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