31/05/2026
गरुड़ गायत्री मंत्र भगवान गरुड़ को समर्पित एक अत्यंत दिव्य और प्रभावशाली वैदिक मंत्र है। गरुड़ देव भगवान विष्णु के वाहन, वेदों के ज्ञाता तथा नागों के शत्रु माने जाते हैं। सनातन धर्म में उन्हें शक्ति, साहस, तेज, रोगनाश और विषनाश के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णवर्णाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात्॥”
इस मंत्र में साधक भगवान गरुड़ के स्वर्ण समान तेजस्वी स्वरूप का ध्यान करता है और उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसकी बुद्धि को प्रकाशित करें, जीवन के अंधकार को दूर करें तथा उसे धर्म, ज्ञान और सफलता के मार्ग पर प्रेरित करें।
गरुड़ गायत्री मंत्र का नियमित जप भय, नकारात्मक शक्तियों, विषबाधा, सर्पदोष तथा अदृश्य बाधाओं से रक्षा करने वाला माना गया है। ज्योतिष में कालसर्प दोष, राहु-केतु के अशुभ प्रभाव और नागदोष की शांति के लिए भी इस मंत्र का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा विश्वास है कि गरुड़ देव की कृपा से साधक में आत्मविश्वास, निर्भीकता और आध्यात्मिक तेज का विकास होता है।
शास्त्रों में वर्णित है कि गरुड़ देव केवल भगवान विष्णु के वाहन ही नहीं, अपितु धर्म और भक्ति के महान प्रतीक भी हैं। उनकी उपासना से जीवन में आने वाली अनेक प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं तथा साधक को संरक्षण, सफलता और दिव्य कृपा की प्राप्ति होती है।
गरुड़ स्तुति।
कुङ्कुमाङ्कितवर्णाय कुन्देन्दुधवलाय च। विष्णुवाह नमस्तुभ्यं पक्षिराजाय ते नमः॥
अर्थात्, हे पक्षिराज गरुड़! आपको नमस्कार है। आप भगवान विष्णु के दिव्य वाहन हैं, तेजस्वी हैं और अपने भक्तों की रक्षा करने वाले हैं। आपकी कृपा से भय, विष और समस्त बाधाओं का नाश होता है।