23/05/2026
बाबा गबसरा और गोमसी माता की कहानी
बाबा गबसरा जी का यह ऐतिहासिक एवं पवित्र धाम श्रद्धा, आस्था, त्याग और चमत्कारों का अद्भुत प्रतीक माना जाता है। यह पावन स्थल जम्मू-कश्मीर के जिला रियासी की तहसील भोमाग के गाँव गब्बर में स्थित है। लोक मान्यताओं के अनुसार इस गाँव का नाम माता गोमासी और बाबा गबसरा जी के नाम पर “गब्बर” रखा गया था, जबकि “सरोटे” नाम सरोतिया (सुदा) जाति के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
बुजुर्गों और लोक कथाओं के अनुसार माता गोमासी भगवान के प्रति अटूट विश्वास और गहरी भक्ति रखती थीं। कहा जाता है कि उस समय कश्मीर का क्रूर शासक दामोदर, जो कंस का रिश्तेदार और मित्र माना जाता था, माता गोमासी की भक्ति और विश्वास को तोड़ना चाहता था। उसने माता पर दबाव डाला कि वे भगवान को न मानकर कंस को भगवान स्वीकार करें, लेकिन माता अपने विश्वास और भक्ति पर अडिग रहीं।
मान्यता है कि माता की आस्था को तोड़ने के लिए दामोदर ने उनके सातों पुत्रों की एक-एक कर बलि चढ़ा दी। कहा जाता है कि जब सातवें पुत्र का बलिदान हुआ, उसी समय अचानक तेज वर्षा और भयंकर बिजली गिरी। उसी दौरान वहाँ स्थित पवित्र शहतूत का पेड़ सात हिस्सों में फट गया था। आज भी उस पेड़ के सात भाग स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं और लोग उन्हें उस दिव्य घटना का प्रतीक मानते हैं।
लोक मान्यता है कि उसी समय माता गोमासी की अटूट भक्ति और विश्वास को देखकर भगवान स्वयं एक छोटे बालक के रूप में माता के सामने प्रकट हुए थे। यह घटना आज भी यहाँ की आस्था और श्रद्धा का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है।
इस मंदिर के पास आज भी उस महान बलिदान के प्रमाण मौजूद बताए जाते हैं। यहाँ पत्थरों से बनी एक प्राचीन बावली स्थित है, जिस पर सात पत्थरों के नल लगे हुए हैं। मान्यता है कि जब एक पुत्र का बलिदान दिया जाता था, तब उसके नाम पर एक नल लगाया जाता था। ये सातों नल आज भी उस पावन इतिहास की जीवंत गवाही देते हैं।
इस पवित्र वृक्ष को स्थानीय लोग आज भी अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजते हैं। ऐसी मान्यता है कि महिलाएँ इस पेड़ पर कभी नहीं चढ़तीं और न ही इस वृक्ष को कभी काटा जाता है। इस पवित्र पेड़ के भीतर एक पत्थर की पिंडी भी स्थित है, जिसके श्रद्धालु दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
कहा जाता है कि यहाँ रहने वाले एक बुजुर्ग, जो राजस्थान के अलवर जिले से आए थे, उन्हें माता गोमासी और बाबा गबसरा जी ने स्वप्न में दर्शन दिए थे। स्वप्न में उन्हें आदेश मिला कि वे इस पवित्र स्थान पर आकर इसे पुनः स्थापित और आबाद करें। इसके बाद वे अलवर से पैदल चलकर इस पावन धाम तक पहुँचे और यहीं बस गए।
मान्यता है कि यहाँ आने के बाद माता गोमासी और बाबा गबसरा जी ने उन्हें अनेक चमत्कार दिखाए। कहा जाता है कि उनके घर के पास भी उसी पवित्र पेड़ की भाँति सात भाग दिखाई दिए तथा पानी पर स्थापित सात नालों जैसी संरचना बनी हुई थी।
लोक मान्यताओं के अनुसार उन्हीं के नाम से आगे चलकर सात वंश उत्पन्न हुए, जिन्हें आज सरोतिया (सुदा) जाति के नाम से जाना जाता है। इन सात वंशों के नाम इस प्रकार बताए जाते हैं — सिंगो, मोध, ग्रीबा, गुग्गा, चिंगी, सरबन और अंकरू।
कहा जाता है कि एक समय यहाँ के लोगों से कोई बड़ी गलती हो गई थी, जिसके कारण बाबा गबसरा जी क्रोधित हो गए। अचानक बहुत तेज वर्षा हुई, बादल फट गया और भयंकर बाढ़ आ गई। उस बाढ़ में पवित्र बावली दब गई थी। तब गाँव के लोगों ने बाबा से क्षमा माँगी। कहा जाता है कि उसी घटना में बावली के दो नल टूट गए और पवित्र पेड़ की दो डालियाँ भी सूख गईं। लोक मान्यता है कि उसी प्रकार सात वंशों में से दो वंश भी समय के साथ समाप्त हो गए।
तब से लेकर आज तक हर वर्ष जून महीने में यहाँ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। पिछले लगभग 15 वर्षों से इस पावन धाम में दिन के समय बाबा गबसरा जी के दरबार में मेला लगता है, जिसमें इन वंशों के लोग और दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु अपनी हाजिरी लगाते हैं। रात के समय माता के नाम का गुणगान, भजन-कीर्तन और जागरण किया जाता है।
आज जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग की ओर से इस ऐतिहासिक स्थल को विकसित किया जा रहा है, ताकि यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं और यात्रियों को बेहतर सुविधाएँ मिल सकें तथा इस पवित्र धाम को और भी सुंदर एवं आकर्षक बनाया जा सके।
इसके साथ ही यहाँ माता रानी के भव्य मंदिर का निर्माण भी वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की ओर से कराया जा रहा है, जिससे इस पवित्र स्थान की धार्मिक महत्ता और अधिक बढ़ रही है।
आज भी यह पावन धाम त्याग, भक्ति, आस्था और चमत्कारों का जीवंत केंद्र माना जाता है, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु पहुँचते हैं।
जय बाबा गबसरा जी 🙏
जय माता गोमासी माता 🙏