21/06/2026
पिता घर की दीवार नहीं होते,
वे वह नींव होते हैं
जो दिखाई कम देती है,
पर पूरे घर का भार
अपने कंधों पर उठाए रहती है।
वे अक्सर अपने सपनों को
चुपचाप तह करके रख देते हैं,
ताकि बच्चों की इच्छाएँ
खुले आसमान में उड़ सकें।
उनके हाथों की कठोरता में
बरसों की मेहनत छिपी होती है,
और आँखों की गहराई में
अनगिनत चिंताओं की परछाइयाँ।
वे कम बोलते हैं,
पर उनका हर संघर्ष कहता है—
“तुम आगे बढ़ो,
मैं तुम्हारे पीछे खड़ा हूँ।”
जब हम हारने लगते हैं,
पिता विश्वास बनकर साथ चलते हैं;
जब रास्ते कठिन होते हैं,
वे हौसला बनकर हाथ थाम लेते हैं।
अपने हिस्से की धूप सहकर
वे हमारे लिए छाँव बचाते हैं,
अपने हिस्से की खुशियाँ छोड़कर
हमारे चेहरे पर मुस्कान सजाते हैं।
पिता का प्यार
नदी की तरह शांत होता है—
बहुत शोर नहीं करता,
पर जीवन भर
अपनी स्नेह-धारा से
हमारे अस्तित्व को सींचता रहता है।
सच तो यह है कि
पिता केवल एक रिश्ता नहीं,
त्याग, समर्पण और प्रेम का
वह मौन महाकाव्य हैं
जिसे समझने में
अक्सर पूरी उम्र लग जाती है।
रश्मि अभय