28/08/2026
रक्षाबंधन एक पवित्र बंधन
श्रावण मास की पूर्णिमा को अपने यहाँ रक्षाबंधन उत्सव मनाया जाता है। रक्षाबंधन पर्व बहुत पुरातन समय से चला आ रहा है। इसके कई सन्दर्भ देखने को मिलते है। समय-समय पर आवश्यकता अनुसार समाज ने कुछ परिवर्तनों का स्वीकार भी किया है। आज हम इसके महत्व को समझते हुए थोडा चिंतन करेंगे।
रक्षासूत्र अर्थात् मौली धागे का कलाई पर बांधा जाना सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इससे बाहरी संकटों से तो बचाव होता ही है। हिन्दु धर्म में किसी भी अनुष्ठान और पूजा के पश्चात पवित्र मौली बंधन की परम्परा है, बिना रक्षा सूत्र के कोई पूजा पूरी नहीं मानी जाती है। रक्षासूत्र मंत्र-
येनबद्धो बलिराजा, दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेनत्वाम् अनुबद्धनामि रक्षे माचल माचल।।
इस मंत्र का सामान्यतः यह अर्थ लिया जाता है कि दानवीर राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं, हे रक्षे ! (रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। धर्मशास्त्र के अनुसार जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किए गये थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं, यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं।
पुरातन समय में कभी माता ने पुत्र को (माता कुंती ने अभिमन्यु को), पत्नी ने अपने पति को (इन्द्राणी ने राजा इंद्रा को) युद्ध पर जाने से पूर्व सुरक्षा की कामना करते हुए रक्षा सूत्र बांधे थे। अपनी संस्कृति समयानुकूल, परिवर्तनशील है। बीच में एक कालखण्ड ऐसा गया कि समाज में बहनों की सुरक्षा के बारे में विशेष चिंता करने की आवश्यकता देखने को मिली। तब यही रक्षासूत्र बहन अपने भाई को बांध कर सुरक्षा की मांग करते देखाई देने लगी। आज भी समाज में यही परम्परा अधिक प्रचलित है। तभी तो यह पर्व घर-घर में मनाया जाता है। परन्तु सम्पूर्ण समाज को जोड़ने के आशय से हम सभी एक दूसरे को रक्षासूत्र बांध कर उत्सव मनाए यह वर्तमान समय की आवश्यकता है। यानि भाई को बहन अवश्य रक्षा बांधे परन्तु साथ-साथ समाज में एक दूसरे को रक्षा बांध कर एकता का भाव जगाने में भी यह उत्सव उपयुक्त है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संध के कार्यकार्ता इस निमित्त भगवत् ध्वज को रक्षा सूत्र बांधते हुए एक दूसरे को राखी बांधते है। मानो ! यह समय की आवश्यकता है कि भाई-भाई को रक्षा बांध कर - *हम सब एक है* - के संदेश को दृढ करें।
वनवासी कल्याण आश्रम के वर्ष भर के उत्सवों में से एक महत्वपूर्ण उत्सव है ‘रक्षाबंधन’। महिला-पुरूष सभी कार्यकर्ता इस निमित्त समाज को संपर्क करते हुए राखी बांधते है। यह एक स्नेह सूत्र है। जनजाति समाज और गैर-जनजाति समाज दोनों एक ही परिवार का अंग है। भेद है ही नहीं। इसलिए परिवार के नाते सभी एक दूसरे को राखी बांधते है। इस निमित्त नगर समिति के कार्यकर्ता सुदूर वनवासी गांवों में विशेष रूप से जाते है और इस उत्सव को सामाजिक रूप में मनाते है।
आज जहाँ जनजाति समाज को सम्पूर्ण समाज से तोडने के प्रयास चल रहे है एसे में इस उत्सव मनाने का अपने आप में विशेष महत्व है। हमारा विचार है कि *हम समाज को जोड़ने का काम करते है।* इस विचार का कृति के रूप में अनुभव है हमारा ‘रक्षाबंधन उत्सव’।
एकात्मता की अनुभूति करने का यह एक सुवर्ण अवसर है। वैसे भी *वनवासी कल्याण आश्रम का सूत्र है ‘तू-र्मैं एक रक्त’* अर्थात प्रेम भाव, स्नेह भाव को व्यक्त करने का संदेश। रक्षाबंधन उत्सव एकता सूत्र में सभी को जोड़ने का अवसर है। हृदय की शुद्धता प्रगट होती है।
- आनंद