'भरवाड़ा' शब्द सुनते ही एक रोमांचक अनुभव होता है। अपनी जन्मभूमि का सुखद अहसास मन को उद्वेलित करता है। यह वो धरा है जिसने अनेक ऐतिहासिक पुरूष को जन्म दिया है। यहां गोनू झा जैसे युगपूरूष का जन्म हुआ है। जिनके नाम पर इस गाँव को गोनू ग्राम भी कहा जाता है। दक्षिण भारत के इतिहास में जो स्थान तेनालीराम का है और उत्तरी भारत के इतिहास में जो स्थान बीरबल का है वही स्थान मिथिला में गोनू झा को प्राप्त है। कहा
जाता है कि उनपर माँ भगवती काली की कृपा—दृष्टि सदैव बनी रहती थी।
मिथिला क्षेत्र में कबीरपंथ को लाने वाले ऐतिहासिक पुरूष श्रीयुत् गिरिवर लाल जिन्हें लोग मिर्चाई लाल के नाम से अधिक जानते हैं, की जन्मभूमि यही धरती है। जब समाज अनेक कुप्रथाओं से जकड़ा हुआ था तो उन्होंने सद्गुरू कबीर साहब के विचारों के माध्यम से जन—जन में नवचेतना का संचार किया।
उनके इस कार्य में अपना अथक योगदान देते हुए उनके सुपूत्र परम पूज्य गुरूदेव श्रीयुत् बौआ साहब जू ने कबीर साहब के विचारों को जन—जन तक पहुँचाने में अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने कबीर विचार प्रचार संघ की स्थापना कर भरवाड़ा ग्राम का नाम इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों से लिख दिया। यहाँ कबीर आश्रम भरवाड़ा में कबीर साहब के विचारों को जन—जन तक पहुँचाने के साथ—साथ दीन—दु:खियों की नि:स्वार्थ भाव से सेवा की जाती है। सभी रोगियों की आयुर्वेदिक जड़ी—बूटियों के माध्यम से नि:शुल्क सेवा की जाती है। करीब 124 वर्षों से यहां हर वर्ष अग्रहण पुर्णिमा के अवसर पर विशाल भण्डारा का आयोजन किया जाता है, जिसमें लाखों संतों का समागम होता है।
ऐसे महापुरूषों की जननी हे मातृभूमि तुम्हें कोटि—कोटि नमन।