07/06/2020
किसानो की ऋण माफ़ी करने की बजाय सरकार को किसानो की आर्थिक दशा सुधारने के क्या उपाय करने चाहिये?
जहाँ भारतीय गाँव, किसान और खेती बाड़ी की बात होती हैं, वहां किसान मसीहा पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की बात ना हो यह संभव नहीं है।
जब चौधरी चरण सिंह का जिक्र कर ही लिया तो उन्ही से शुरू करते हैं, किसान कर्ज माफी। 1937 में अंग्रेजी शासनकाल में बनी अंतरिम सरकार में जब चरण सिंह विधायक बने तो उन्होंने 1939 में कर्जमाफी विधेयक पास करवाया और 1941 में कर्ज माफी करवायी।[1] 1979 में वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक [नाबार्ड] की स्थापना की।[2]लेकिन कहीं भी इस तथ्य का उल्लेख नहीं है की उन्होंने कर्ज माफी की मांग आजाद भारत में की।
आजाद भारत में पहली बार 1990 में वीपी सिंह सरकार ने देशभर में किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा की थी! तब कुल कर्ज की लागत 10,000 करोड़ रुपये थी! उस वक्त की जनता ने आगामी आम चुनाव में वीपी सिंह को नकार दिया था।[3]
कृषि ऋण माफी का सर्व प्रथम एक योजना के रूप में प्रयास केंद्र सरकार से UPA के समय हुआ! भारत सरकार ने कृषि ऋण माफी और ऋण राहत योजना को वर्ष 2008 में शुरू किया जिसका लाभ 3 करोड़ 60 लाख से अधिक किसानों को हुआ। इस योजना के तहत किसानों द्वारा बकाया ऋण मूलधन और ब्याज का हिस्सा बंद करने के लिए कुल 653 अरब रुपये खर्च किए गए थे।[4]
कृषि ऋण माफी आज चौधरी चरण सिंह जयंती पर की जाती है, जो उन्होंने अंग्रेजो के समय अंग्रेजी शासन से करवाई उसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए। उन्ही के जन्म दिन को राष्ट्रीय किसान दिवस के रूप में मनाया जाता है। वर्तमान उसके सरकारें आजाद भारत में उनके आदर्शों को भूल जाती है। चरण सिंह ने नाबार्ड की स्थापना किसानों को स्थायी समाधान प्रदान करने के लिए की ना कि कर्ज माफी जैसे अल्पकालिक समाधान प्रदान करने के लिए। इसी तथ्य से सिद्ध हो जाता है, की कृषि ऋण माफी स्थायी समाधान नहीं है, इसके लिए हम कुछ तथ्यों का सहारा लेते हैं।
कृषि ऋण माफी नहीं है समाधान -
कुछ किसानो को फायदा - नीति आयोग के सदस्य (कृषि) रमेश चंद ने ऋण माफी पर कहा कि कृषि कर्ज माफी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इससे किसानों के केवल एक तबके को लाभ (जिन्होंने ऋण लिया है) होगा। उन्होंने कहा, ‘‘जो गरीब राज्य हैं, वहां केवल 10 से 15 प्रतिशत किसान कर्ज माफी से लाभान्वित होते हैं क्योंकि ऐसे राज्यों में बैंकों या वित्तीय संस्थानों से कर्ज लेने वाले किसानों की संख्या बहुत कम है। वहीं दूसरी और ऐसे किसान मजदूरों को कोई फायदा नहीं होगा जिनके पास कृषि भूमि नहीं है।[5]
अर्थव्यवस्था को नुकसान - भारतीय रिजर्व बैंक ने राज्य वित्त पर एक रिपोर्ट में कहा, "यदि कर्ज माफी जैसी योजनाओं को कुशलतापूर्वक लागू नहीं किया गया तो महंगाई बढ़ने के साथ वित्तीय घाटा बढ़ सकता है!" ऐसे में अर्थव्यवस्था के समक्ष कठिन परिस्थिति खड़ी हो सकती है, साथ ही GDP पर भी बुरा असर हो सकता है, इसका समर्थन पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी किया है।[6]
उत्पादन पर विपरीत प्रभाव - कृषि ऋण माफी से किसान कृषि कार्यो पर अपना ध्यान पूरा केन्द्रित करे ये इसकी गारंटी नहीं देता है, वहीं किसानों को उपज के लिए बेहतर मूल्य प्रदान करना किसान को उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए जरूर आकर्षित करता है, इसलिये ऋण माफी की बजाय बेहतर मूल्य देने पर सरकारों को अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए।[7]
उपर्युक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि सरकार को अपना ध्यान ऋण माफी की बजाय संस्थागत विकास और बेहतर मूल्य पर करना चाहिए, बजाय ऋण माफी के।
विशेष - सभी तथ्यों को मेरे लिए लिखना संभव नहीं है, क्योंकि कई तथ्य मेरे ध्यान में नहीं है, इसलिये आप कुछ तथ्यों को कमेंट बॉक्स में अवश्य बताए ताकि पाठकों को पूरी और सही जानकारी प्राप्त हो सके।
अनुरोध के लिए धन्यवाद।
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