18/01/2023
युवाशक्ति कोरकू समाज मध्यप्रदेश
____ भाइयों बहनों! युवाशक्ति कोरकू समाज मध्यप्रदेश सामाजिक विचारधारा पर आधारित ऐसा समूह है जिसका उदय 22 दिसम्बर 2019 दिन रविवार को एक छोटे से गाँव रामुढाना ब्लाक सौसर जिला छिंदवाड़ा में हुआ।
साथियों! कहते हैं जब दो या दो से अधिक लोगों के विचार एक साथ मिल जाते हैं तो वहां एक विचारधारा बन जाती है। युवा शक्ति कुरकू सेना का उदय भी विचारधारा से ही हुआ है। वह विचारधारा जो समाज को संगठित कर संघर्ष की प्रेरणा देती है, जीवन जीने की नई कला दिखाती हैं।
हम एक दूसरे को अपनी भाषा में "कुरकू" बोलते हैं। कोई दूसरे समुदाय का भी है तो भी हम "कुरकू" शब्द से संबोधित करते हैं। जैसे- "ननकू अबुआ कुरकू होय " ये हमारे कोरकू है। "हनकू अबुआ कुरकू बा होय"। वह हमारे कोरकू नहीं है।
हम मानव जाति के इतिहास में जन्मे पहली पीढ़ी हैं तो हमारी परंपरा भी सही और सबसे पुरानी है। बीच बीच में हमारे लोगों ने गैरो के बहकावे में आकर अपनी परंपरा का सत्यानाश कर दिया।
हमारे क्षेत्र विशेष में जबतक हमारा अपना शासन चलता रहा, सब कुछ अच्छा चलता रहा। परिवर्तन समय की मांग है। धीरे धीरे वक्त बदलता गया। हमारे साम्राज्य में घुसपैठिये आते गये। बाहरी दुनिया से हमें क्या लेना। हम तो ठहरे भगवान भोलेनाथ के भक्त, भोले-भाले सीधे-साधे। हमें इतना भी सीधा नहीं बनना चाहिए क्योंकि जंगल में जो लकड़ी सीधी होती है उसे पहले ही काट दिया जाता है तहड़ी लकड़ी को कोई भी नहीं छेड़ता।
एक कहावत है "दूर के ढोल सुहावने लगते हैं "।मतलब दूर की हर चीज अच्छी लगती हैं। जो हमारे पास है वो हमे अच्छी नही लगती।
मतलब हम अपनी संस्कृति से नफरत करने लगे। हमारी यही गलती हमें आज भुगतनी पड़ रही हैं। अपना अपना होता है पराया पराया होता हैं। महंगाई के दौर में हमारी अपनी संस्कृति ही हमें गरीबी के जंजाल से मुक्त कर सकती है, गैरो की संस्कृति अपनाए रहोगे तो हम कभी गरीबी से मुक्ति नहीं हो उपायेगे, अपनी पहचान नहीं बना पाएंगे।
उदाहरण के तौर पर जंगल के कानून में एक जानवर जीने के लिए दूसरे जानवर का शिकार करता है, समंदर में बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है ठीक इसी प्रकार मानव समाज में भी जीने के लिए, तरक्की करने के लिए, सरकार की योजनाओं का लाभ लेने के लिए हमें भ्रमित किया जा रहा है। आदिवासियों में जो समुदाय बलवान है, बुद्धिमान है, जिसकी सत्ता में पकड़ है, वही समुदाय सरकारी योजनाओं का लाभ ले रहा है और ऐसा हो रहा है।
हम अपने लोगों को घर की मुर्गी दाल बराबर समझते हैं हमारा कोई भाई कितना ही भी अच्छा विचार हमें बताएं हम उसके विचारों को तवज्जो नहीं देते और दूसरों की हां में हां मिलाते हैं। सरनेम, रिती-रिवाज आदि अन्य चीजे गैरों का इस्तेमाल करेंगे तो हम कहां से बढ़ेंगे और हम भ्रमित हो रहे हैं। हमें इस भ्रम से दूर निकलना होगा।
यदि हम सोचेंगे की सोलवीं सदी जैसा हरियागढ का वीर योद्धा कोरकू जाड़वा राजा और 18 वीं सदी जैसा पचमढी का राजा भभूतसिंह कोरकू एवं वीर क्रांतिकारी रेंगा कोरकू महान, वीर बिरसा मुंडा जैसा आज के दौर में भी कोई वीर क्रांतिकारी वीर योद्धा आएगा और हमें इस दलदल से बाहर करेगा, यह असंभव है। ऐसे ऐतिहासिक वीर महापुरुषों से प्रेरणा लेकर हमें स्वयं संघर्ष करना पड़ेगा। घर-घर रेंगा कोरकू जगाना पड़ेगा। आज का दौर संगठित होकर लड़ने का दौर है। सरकार एक हाथ से देती है और दोनों हाथ से वसूली होती है ऐसे में हम कहां से आगे बढ़ेंगे। जो जल जंगल जमीन हमारी थी उसे सरकार ने संरक्षण के नाम पर अभ्यारण के नाम पर अपने कब्जे में ले लिया है और हमें वहां से बेदखल कर दिया है भारत में जितनी सरकारी जमीन है वह हमारे आजा पुरखों की संपत्ति है। संविधान देश चलाने के लिए बनाया गया है समाज चलाने के लिए नहीं। हमारा समाज हमारी रूढ़ी प्रथा, हमारी कस्टमरी लाॅ से चलता है जिसका हमारे लोगों को जरा सा भी ज्ञान नहीं है।
कोरकू समुदाय को संगठित करने की, सामाजिक जन जागरूकता की जो लहर वर्तमान समय में देखने को मिल रही है यह पुनः कोरकु साम्राज्य के पुनर्स्थापना की ओर इशारा कर रहा है। इसलिए प्रदेश की वीर कोरकु सेनानियों से अपील की जाती है, जो विचारधारा युवाओं के मन में हिलोरें ले रही है, उसे एक नई शक्ति का रूप देना है और वह है युवाशक्ति कोरकू समाज मध्यप्रदेश। यह संगठन एक विचारधारा है, वह विचारधारा जो एक निश्चित उद्देश्य के तहत समाज को नई पहचान दिलाने के लिए अन्य आदिवासी समुदाय की तुलना में स्वयं की पहचान के लिए, विकसित समाज के रूप में गिने जाने के लिए संघर्षरत है। आओ मेरे युवा साथियों हम सभी के मन में समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जुनून है। जो कार्य वर्षों से हमारे वरिष्ठ जनों ने प्रयास करने के बावजूद नहीं कर पाए उस लक्ष्य को हमें पूरा करना है, हमें आवश्यकता थी एक ऐसी क्रांति की जो समाज को एक नई दिशा दे सके।
हम प्रकृति पुत्र हैं। चंद्रमा और सूर्य देवता प्रकृति से अलग नहीं है।
भारत देश के प्रथम ध्वज से कोई भी वाकिफ नहीं है जब 1902 में पहली बार गुलाम भारत की राजधानी कलकत्ता में देश के क्रांतिकारियों ने फहराया था वह ध्वज भी मध्य भारत के आदिवासियों से प्रेरित होकर ही बनाया गया था, RRR फिल्म में भारत के प्रथम ध्वज का कुछ अंश दिखाया गया है जिसमें सबसे नीचे के लाल पट्टी में चांद और सूरज बना हुआ था। आज वही ध्वज हमें पुनः समाज को संगठित करने की ओर प्रेरित कर रहा है, एक दैवीय शक्ति हमें संगठित होने की ओर इशारा कर रही है, जो सदैव हमारे साथ रहती है किंतु हम उसे पहचान नहीं पा रहे हैं। कोरकु समुदाय में जन्मे हमारे पूर्वज दिव्य शक्तियों से सुसज्जित और वीर हुआ करते थे उनका आशीर्वाद आज हमारे साथ है हम वीर महापुरुषों की संताने हैं हमारे आजा पुरखा दादा एक जमाने में वीर और महान हुआ करते थे तब इस स्थिति में आज के दौर में हम भी उन्हीं पूर्वजों से शिक्षा लेकर उन्हीं की राह पर चलते हुए समाज को नई दिशा देंगे।
वक्त है बदलाव का बदल दो इतिहास को।
याद रहे साथियों! अभी नहीं, तो कभी नहीं ।
वीर बिरसा मुंडा की आवाज- "अबुआ देशोंन अबुआ राज"।
इतिहास उधर मुड़ जाता है जिधर जवानी चलती है।
समाज का विकास कब? हमारा युवा जागगा तब।
✍युवाशक्ति कोरकू समाज मध्यप्रदेश🚩🚩