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युवा संन्यासी(श्री रामतीर्थ जी के संन्यासोपलक्ष्य में)गुणनिधान मतिमान् सुखी सब भाँति एक लवपुरवासी,युवा अवस्था बीच विप्रक...
30/08/2026

युवा संन्यासी
(श्री रामतीर्थ जी के संन्यासोपलक्ष्य में)

गुणनिधान मतिमान् सुखी सब भाँति एक लवपुरवासी,
युवा अवस्था बीच विप्रकुल केतु हुआ है संन्यासी।
विविध रीति से उस विरक्त को सुहृद बन्धु समझाय थके,
गंगा जी के प्रवाह पर ज्यों, उसे न वे सब रोक सके ॥१॥

वृद्ध पिता माता को आशा, बिन ब्याही कन्या का भार,
शिक्षाहीन सुतों की ममता, पतिव्रता नारी का प्यार।
सन्मित्रों की प्रीति और कालेज वालों का निर्मल प्रेम,
त्याग एक अनुराग किया, उसने विराग में तज सब नेम॥२॥

प्राणनाथ, बालक, सुत, दुहिता, यों कहती प्यारी छोड़ी,
हाय! वत्स!! वृद्धा के धन!!! यों रोती महतारी छोड़ी।
चिर सहचारी रियाजी छोड़ी, रम्य तटी रावी छोड़ी,
शिखा-सूत्र के साथ हाय! उन बोली पंजाबी छोड़ी॥३॥

धन्य पंचनद भूमि जहाँ इस बड़भागी ने जन्म लिया,
धन्य जनक जननी जिनके घर इस त्यागी ने जन्म लिया।
धन्य सती जिसका पति मरने से पहले हो जाय अमर,
धन्य धन्य सन्तान पिता जिनका जगदीश्वर पर निर्भर॥४॥

शोकाकुल हो गई लवपुरी उसकी हुई विदाई जब,
द्रवीभूत कैसे न हो मन संन्यासी हो भाई जब।
खिन्न अश्रुमुख वृद्ध लगे कहने मंगल तव मार्ग हो,
जीवनमुक्ति सहाय ब्रह्मविद्या में सत्वर पारग हो॥५॥

कुछ मित्रों ने हृदय थाम कर, कहा कि प्यारे सुन लेना;
बात एक भ्रान्ति की आज हमारी, ध्यान जरा इस पर देना।
समदर्शी ऋषि-मुनियों को भी भारत प्यारा लगता था,
इस कारण यह विद्याबल में जग से न्यारा रहता था॥६॥

सर्वत्याग कर महाभाग्य जो देशोन्नति में दे जीवन,
धन्यवाद देते हैं देवगण भी उसका हो प्रमुदित मन।
अपनी भाषा भेष भाव अरु भोजन प्यारे भाइयों को,
नहीं समझता उत्तम समझो उससे भली लुगाई को॥७॥

‘एवमस्तु’ करी उच्चारण इन सबके उसने उत्तर में,
कहा ‘अलविदा’ और चला वह मनभावन उस अवसर में।
लगे वर्षने पुष्प और जय-जय की तब हो उठी ध्वनि,
मानो भिक्षुक नहीं वहाँ से चला विश्व का कोई धनी॥८॥

ज्यों नगरी में होय स्वच्छता जब आता है कोई लाट,
त्यों वन-पर्वत प्रकृति परिष्कृत हुए समझ मानो सम्राट।
निष्कण्टक पथ हुआ पवन से, वारिद ने जल छिड़क दिया,
कड़क तड़ित् ने दी सलामी, आतपत्र वृक्षों ने किया॥९॥

विहंगकुल ने निज कलरव से उसका स्वागत-गान किया,
श्वापद शांत हुए, मृगगण ने दक्षिण में आ मान किया।
श्रेणीबद्ध कलित तरुओं ने उसको झुककर किया प्रणाम,
कुसुमित लता और विटपों ने पुष्प बिछाये राह तमाम॥१०॥

खड़ा हिमालय निज उन्नत पर मस्तक तत्पद धारण को,
हुई तरंगित सुरधुनि तब अभिषेक पुनीति करावन को।
शिक्षा देती मानो सबको जननी सरीखी प्रकृति सारी,
विषय-विरक्त ब्रह्मचिन्तन-रत नर के सब आज्ञाकारी॥११॥

27/06/2026

Watch Premiere of Kashmir 1947
on, DD NATIONAL
at, 10.30.PM on June 28, 2026 (Sunday)

Directed & Produced by;
Hemant Goswami & Dr. Amarpreet Kour

Thanks for the Selection in 'Dada Saheb Phalke Film Festival.'
11/04/2026

Thanks for the Selection in 'Dada Saheb Phalke Film Festival.'

अरुण आंचल की धरती, उगते सूरज की शान,संस्कृति, इतिहास और सुंदर लोग, इसकी पहचान।
10/04/2026

अरुण आंचल की धरती, उगते सूरज की शान,
संस्कृति, इतिहास और सुंदर लोग, इसकी पहचान।

  has so many fine nuances that one has to make deep efforts to understand them.
21/02/2026

has so many fine nuances that one has to make deep efforts to understand them.

08/01/2026

मैं बचपन से कुतुब मीनार जाता रहा हूँ, पर तीन वर्ष पूर्व की एक यात्रा ने मेरे भीतर गहरी हलचल पैदा की।

कुव्वत-उल-इस्लाम परिसर में मैंने छतों और स्तंभों पर लगी, खंडित देव, यक्ष और द्वारपाल की मूर्तियाँ देखीं। साथ ही अधूरी खुदाई में पड़े उन सत्ताइस तोड़े गए मंदिरों के अवशेष और टूटी हुई देव-प्रतिमाएँ भी मेरी दृष्टि में आईं।

यह सब देखकर मुझे पहली बार यह बोध हुआ कि स्कूल और बचपन में हमें कुतुब मीनार का इतिहास कितना अधूरा और चयनित रूप में पढ़ाया गया था। वहाँ खड़े होकर सच और मौन दोनों साथ दिखाई देते हैं।

ऐसा प्रतीत हुआ मानो कुछ ऐतिहासिक तथ्य इस भय से दबा दिए गए हों कि वे किसी को विचलित न कर दें।

उसी क्षण, वहीं बैठे-बैठे, मेरे मन से चार पंक्तियाँ अपनेआप निकल आईं। यह कविता उन्हीं पंक्तियों का विस्तार है। न आरोप के रूप में, न विरोध के स्वर में, बल्कि स्मृति, संवेदना और इतिहास के प्रति एक मौन प्रश्न के रूप में।

हेमन्त गोस्वामी

24/12/2025

In his poem "Tat Tvam Asi," reflects on the journey from individuality to universality. A drop does not disappear when it merges and expands. The poem reminds us that identity dissolves, not to end, but to awaken. The self realizes it was always infinite and complete in all respect; etc.
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कविता तत् त्वम् असि में हेमन्त गोस्वामी व्यक्ति से समष्टि की यात्रा को अभिव्यक्त करते हैं। एक बूंद जब विलीन होती है, तो नष्ट नहीं होती वह विस्तार पाती है। यह कविता बताती है कि पहचान का लय अंत नहीं, बल्कि जागरण है। आत्मा समझती है कि वह सदा से ही अनंत थी।

#कविता #अद्वैत

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