Ajay Kumar Mishra

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21/07/2023

घंटों मन की बात करने वाले पी एम मणिपुर की घटना पर मात्र 36 सेकेंड बोले!!
यही तो है नया भारत 😡

26/05/2023

राजदंड, लोकतंत्र का प्रतीक नहीं है.
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आजकल राजदंड की चर्चा है। यह राजदंड चोल राजाओं की विरासत थी, जिसे लॉर्ड माउंटबेटन ने ब्रिटिश सत्ता की समाप्ति के बाद, सत्ता के हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सौंपा था। ब्रिटिश सत्ता से एक लंबे संघर्ष के बाद मुक्त होने के प्रतीक के रूप में यह राजदंड अंतिम वायसराय लार्ड माउंटबेटन ने इसे जवाहरलाल नेहरु को सौंपा था। जब यह राजदंड सौंपा गया था, तब संविधान बन रहा था। संविधान की ड्राफ्ट कमेटी डॉ बीआर अंबेडकर के नेतृत्व ने संविधान का ड्राफ्ट तैयार कर रही थी। अंत में 26 नवंबर 1949 को, यह संविधान तैयार हुआ और 26 जनवरी 1950 को, 26 जनवरी 1930 के, लाहौर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में, पूर्ण स्वराज्य के संकल्प को, चिर स्थाई बनाए रखने के लिए, यह संविधान लागू हुआ।

खबर आ रही है कि, नए संसद भवन के उद्घाटन के अवसर पर, वह राजदंड फिर, संग्रहालय से मंगाया गया है और उस राजदंड को फिर से सौंपा जाएगा। लेकिन यह तय नहीं है कि, इस सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में, कौन किसे सत्ता सौंप रहा है। हमारा संविधान सत्ता के केंद्र में केवल 'वी द पीपुल ऑफ इंडिया', यानी 'हम भारत के लोग' को केंद्र में रखता है। लोककल्याण राज्य की अवधारणा संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में है और मौलिक अधिकार, संविधान के मूल ढांचे का अंग, जिसे सर्व शक्तिमान संसद भी नही बदल सकती है।

28 मई को, हम न किसी औपनेशिक सत्ता से मुक्त होने जा रहे हैं और न ही कोई नई संविधान सभा किसी नए संविधान का ड्राफ्ट तैयार कर रही है। न तो अनुच्छेद 79 के अंतर्गत कोई नई संसद गठित हो रही है। हो बस यह रहा है कि, भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक नए संसद भवन का लोकार्पण किया जा रहा है। यह अलग बात है कि, इस उद्घाटन के अवसर पर, संसद के अनिवार्य अंग के रूप में, न तो राष्ट्रपति को न्योता दिया गया और न ही संसद के ही उच्च सदन राज्यसभा के सभापति को, जो उपराष्ट्रपति होते हैं, उनको।

इतिहास की नकल हमेशा नहीं की जा सकती है। बहुत कुछ साम्य होते हुए भी, आप नदी में, एक ही जल में दो बार स्नान नही कर सकते हैं। जल आगे बढ़ जाता है। प्रवाह युक्त नदी, और काल कभी थमता नहीं है। संसद भवन का उद्घाटन हो, यह अच्छी बात है पर यह ऐसी संसद तो न बने जिसमें, माइक म्यूट कर के, ट्रेजरी बेंच के मनमाफिक विधेयक पास करा लिए जाय। ऐसी संसद तो न बने, जिसमें बिना किसी बात के विपक्षी नेताओं के, प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए जाने पर, भाषण, डिलीट कर दिए जाय। ऐसी संसद तो बने जिसमें ट्रेजरी बेंच सिर्फ इसलिए हंगामा कर के सदन बाधित करे कि, नेता सदन के पास, अडानी घोटाले के आरोपों पर, अपने बचाव में कहने के कुछ भी नहीं है। और ऐसी संसद तो न बने, जिसमें, लोकसभाध्यक्ष, विपक्ष के एक सांसद को सदन में बोलने के लिए समय तक न दे सकें। स्पीकर सर की ऐसी बेबसी, तकलीफदेह ही है।

गोल इमारत हो या तिकोनी, चौसठ योगिनी मंदिर से प्रेरित स्थापत्य हो या किसी और स्थान से प्रेरित स्थापत्य, सदन का महत्व स्वस्थ वाद विवाद संवाद से होता है। लोकहित से होता है। टेबल पीटने से नही होता है। लोकतंत्र, इमारतों में नही, लोक में बसता है। वह किसी राजदंड में नही बसता है। राजदंड कभी प्रतीक था, अब नहीं रहा। अब केवल संविधान है और हम भारत के लोग हैं।

Vijay Shanker Singh
#नयासंसदभवन

नोटबंदी एक संगठित लूट और कानूनी डाका है। - डॉ मनमोहन सिंह कोई झोलाछाप डॉक्टर बुखार को कैंसर साबित करने पर तुला हो तो अनज...
21/05/2023

नोटबंदी एक संगठित लूट और कानूनी डाका है। - डॉ मनमोहन सिंह

कोई झोलाछाप डॉक्टर बुखार को कैंसर साबित करने पर तुला हो तो अनजान लोग भरोसा कर सकते हैं, लेकिन असल डॉक्टर मरीज को देखकर ही असलियत समझ जाता है। जो कहते थे कि हमारी मंशा साफ है, कोई कमी हुई तो चौराहे पर आ जाऊंगा, उन्होंने खुद ही अपने द्वारा जारी नोट वापस लेकर साबित किया है कि मनमोहन सिंह ने सही कहा था। नोटबंदी क्यों की गई, नोटबंदी करने वाले अनर्थशास्त्री न तब बता पाए थे, न आज बता पा रहे हैं।

नोटबंदी को तब तक एक घोटाला माना जाना चाहिए, जब तक इसका स्पष्ट उद्देश्य न बताया जाए। इतना बड़ा देश चलाने के लिए आर्थिक फैसले यूं ही मौज लेने के लिए नहीं लिए जाते। उनका स्पष्ट उद्देश्य होता है। अगर वह उद्देश्य बताया नहीं जाता तो मतलब भारी गड़बड़ है।

बड़े नोटों से पैसे की जमाखोरी आसान होती है, छोटे नोट मुसीबत पैदा करते हैं। इसलिए हजार के नोट बंद करके दो हजार के नोट लाए गए। इसके अलावा नोटबंदी में क्या हुआ? जनता को बेवजह लाइन में लगाकर बताया गया कि महामानव कड़क फैसले ले सकते हैं। तमाम लोग लाइन में लगकर मारे गए।

बिना वजह लबालब भरे कुएं में कूद जाना भी कड़क फैसला होता है लेकिन ऐसा फैसला कौन लेता है, वही या तो जिसका दिमाग चल गया हो, या फिर वह बहुरुपिया जो लोगों को उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करने में माहिर हो।

न भ्रष्टाचार खत्म हुआ, न काला धन आया, न विदेशी धन आया, न आतंकवाद की कमर टूटी, न नक्सलवाद खत्म हुआ, कैश पहले से ज्यादा सर्कुलेशन में आ गया, तो नोटबंदी से हुआ क्या? अगर इससे सच में देश को कोई फायदा हुआ तो सरकार ने जनता को बताया क्यों नहीं?

असल फायदा देश के चोरों और लुटेरों का हुआ। देश की हर पार्टी काले धन से चलती है। भाजपा पहले संदिग्ध इलेक्टोरल बॉन्ड लाई और 95 फीसदी कॉरपोरेट चंदा अपने खाते में किया। फिर छोटी नोट बंद करके बड़ी नोट लाई गई। नोटबंदी के बाद भाजपा ने दिल्ली में फाइव स्टार दफ्तर बनवाया। देश के हर जिले में आलीशान कार्यालय बनवाया। सत्तर साल वाली पार्टी का कार्यालय दान के बंगले में और सात साल वाली पार्टी ने पूरे देश में हवामहल बनवा लिए। कैसे? पैसा कहां से आया?

नोटबंदी के बाद कोरोना आया। विदेशों से काला धन निकले चौकीदार के दोस्त ने विदेशों दर्जनों शेल कंपनियां बना डालीं। महामारी के दौरान मात्र दो साल में उसने 12 लाख करोड़ रुपये कमा डाले। जब देश की अर्थव्यवस्था माइनस में पहुंच गई, जब करोड़ों रोजगार चले गए, जब पूरे देश का व्यापार ठप था, इसके घर में कौन सा कुबेर का खजाना टपक रहा था?

नोटबंदी के बाद 2000 के नोटों की बड़े पैमाने पर जमाखोरी की बात आई थी। आपको याद होगा अप्रैल, 2018 में देश भर में एटीएम के बाहर लंबी लंबी कतारें लग गई थीं। सवाल उठा कि बाजार में नोटों की जमाखोरी हो रही है। सवाल उठा कि आखिर 2000 के नोट कहां गए? आज तक की खबर के मुताबिक, उस समय अकेले देवास प्रेस में ढाई हजार करोड़ कीमत के 2000 के नोट रोज छापे जा रहे थे। उस समय यह नोट बंद नहीं किए गए।

ऐसा लगता है कि सात साल की संगठित लूट के बाद सोच समझकर 2000 के नोट बंद किए हैं। नोटबंदी और 2000 के नोटों की लॉन्चिंग जिस मकसद से हुई थी, वह मकसद पूरा हुआ। वह मकसद क्या था? अगर यह कोई बड़ा खेल नहीं है तो सरकार ने आजतक इन फैसलों की कोई ठोस वजह क्यों नहीं बताई?

जनता हिंदू-मुसलमान में मगन है। देश के युवा खोपड़ी पर रामनामी बांधे चंदन लगाए मगन हैं, नीचे से उनका कट रहा है। उनके भविष्य को बधिया किया जा रहा है। वे न भगवान राम से प्रेरणा ले रहे हैं, न कृष्ण से, न अपनी आंख के सामने हो रहे अन्याय से। देश आराम से लुट रहा है। भाजपा समर्थक हिंदू बौराए हैं कि मुल्ले टाइट हैं, असल में अपने पुर्जे दशकों के लिए ढीले किए जा चुके हैं और पट्टा-बारदाना सब गायब कर दिया गया है।

इस देश में 50 सालों की ​रिकॉर्ड बेरोजगारी आई तो इसका असली भुक्तभोगी हिंदू ही है। जब तक तुम्हें पता चलेगा, लुटेरा झोला उठाकर जा चुका होगा- लंदन, एंटीगुआ, कतर, कुवैत, कैलासा। लुट-पिटकर तुम यहीं घुइया छीलना।
Krisna Kant

02/05/2023

संसद में मधु लिमये के सामने झूठ बोलने से डरती थी सरकार

अनिल जैन

भारतीय समाजवादी आंदोलन के महानायकों में से एक मधु लिमये का जन्म शताब्दी वर्ष सम्पन्न हो चुका है। आज उनका 101वां जन्मदिवस है। मधु जी ने देश के स्वाधीनता संग्राम में भी भाग लिया था और वे गोवा मुक्ति संग्राम के नायकों में से भी एक थे।

मधु लिमये का जन्म 1 मई, 1922 को महाराष्ट्र के पूना में हुआ था। कम उम्र में ही उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली थी। अपनी स्कूली शिक्षा के बाद मधु लिमये ने 1937 में पूना के फर्ग्युसन कॉलेज में उच्च शिक्षा के लिए दाखिला लिया और तभी से उन्होंने छात्र आंदोलनों में भाग लेना शुरू कर दिया। इसके बाद मधु लिमये एसएम जोशी, एनजी गोरे वगैरह के संपर्क में आए और अपने समकालीनों के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन और समाजवादी विचारधारा के प्रति आकर्षित हुए। समाजवादी आंदोलन में वे जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया के करीबी सहयोगी रहे।

मधु जी एक प्रतिबद्ध समाजवादी होने के साथ ही महान संसदविद्, चिंतक, विद्वान लेखक और भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रेमी भी थे। इस सबके अलावा उनके व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी- ईमानदारी और नैतिक मूल्यों में गहरी आस्था। यह विशेषता उन्हें अपने समकालीन राजनेताओं की जमात से एकदम अलग, विशिष्ट स्थान पर खड़ा करती थी।

मधु लिमये के संसदीय कौशल का आलम यह था कि जब वे दस्तावेजों का पुलिंदा और किताबों का गट्ठर लेकर सदन में प्रवेश करते थे तो सरकारी बैंचों पर बैठे लोगों के चेहरों पर यह सोच कर हवाइयां उड़ने लगती थीं कि पता नहीं आज किसकी शामत आने वाली है। संसद में उनकी मौजूदगी में प्रधानमंत्री और दूसरे मंत्री झूठ बोलने से यह सोचकर डरते थे कि उन्हें मधु लिमये कहीं विशेषाधिकार हनन के मामले में न फंसा दे।

संसदीय परंपराओं और नियमों का उनका ज्ञान भी इतना जबरदस्त था कि कई बार वे स्पीकर या उसकी आसंदी पर बैठे अन्य पीठासीन अध्यक्ष को भी अपनी दलीलों से लाजवाब कर देते थे। मधु लिमये को अगर संसदीय नियमों और परंपराओं के ज्ञान का चैंपियन कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। लोकसभा में उनके समय में सोशलिस्ट पार्टी को कुल 7-8 सदस्य ही होते थे लेकिन इसके बावजूद वे अपने संसदीय कौशल से भारी-भरकम बहुमत वाली सरकार पर बहुत भारी पड़ते थे।

नैतिकता के प्रति उनका आग्रह कितना प्रबल था, इसे एक ही उदाहरण से समझा जा सकता है। बात आपातकाल के दौर की है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1976 में संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया था। उस समय मधु लिमये भी लोकसभा के सदस्य थे और मध्य प्रदेश की जेल में बंद थे।

जयप्रकाश जी (जेपी) मुंबई के जसलोक अस्पताल में अपना इलाज करा रहे थे। उन्होंने अस्पताल से ही विपक्षी दलों के सभी लोकसभा सदस्यों के नाम एक अपील जारी कर इंदिरा सरकार के इस फैसले के विरोधस्वरूप लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने का अनुरोध किया। जेपी की इस अपील पर मधु लिमये ने बगैर कोई देरी किए जेल से अपना इस्तीफा लोकसभा स्पीकर को भेज दिया। उनका अनुसरण करते हुए इंदौर जेल मे बंद शरद यादव ने भी अपना इस्तीफा स्पीकर के पास पहुंचा दिया। उस समय शरद यादव को लोकसभा में आए महज 16 महीने ही हुए थे। वे मध्य प्रदेश के जबलपुर से उपचुनाव में जेपी के जनता उम्मीदवार के तौर पर जीत कर लोकसभा में पहुंचे थे। पूरे विपक्ष में ये मात्र दो सांसद ही रहे इस्तीफा देने वाले।

उस समय लोकसभा में जनसंघ (आज की भाजपा) की नैतिकता के शीर्ष पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी सहित जनसंघ के 22 सदस्य थे, लेकिन उनमें से किसी ने भी इस्तीफा नहीं दिया था। यानी वे सभी अनैतिक तरीके से बढ़ाई गई लोकसभा की अवधि के दौरान भी सांसद बने रहे और वेतन-भत्ते तथा अन्य सुविधाएं लेते रहे।

वाजपेयी उस समय इलाज के बहाने पैरोल पर जेल से बाहर थे (वैसे भी 19 महीने के आपातकाल के दौरान वे कुछ ही दिनों के लिए जेल गए थे और बाकी पूरा समय इलाज के बहाने जेल से बाहर थे। खैर, यह एक अलग ही कहानी है)। वाजपेयी ने दलीय अनुशासन से बंधे होने की दुहाई देते हुए इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था।

मधु लिमये ने सिर्फ लोकसभा की सदस्यता से ही इस्तीफा नहीं दिया, बल्कि कई मौकों पर उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता भी ठुकराई। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई चाहते थे कि मधु लिमये भी सरकार में शामिल हों लेकिन मधु लिमये ने मंत्री बनने के बजाय संगठन में बने रहने को प्राथमिकता दी।

मधु लिमये ने स्वाधीनता सेनानियों और पूर्व सांसदों को मिलने वाली पेंशन भी कभी नहीं ली। मधु लिमये का स्पष्ट मानना था कि सांसदों और विधायकों को पेंशन नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने न सिर्फ स्वाधीनता सेनानी और सांसद की पेंशन नहीं ली, बल्कि अपनी पत्नी चम्पा लिमये को भी कह दिया था कि उनकी मृत्यु के बाद वे पेंशन के रूप में एक भी पैसा न लें।

हालांकि वे ऐसा नहीं कहते तो भी उनकी मृत्यु के बाद चम्पा जी पेंशन स्वीकार नहीं करतीं, क्योंकि वे भी अपने पति की तरह ही सादगी और समता के मूल्यों को जीने वाली महिला थीं। वैसे भी चम्पा जी प्राध्यापिका होने के नाते आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर थीं और मधु जी को परिवार की आर्थिक चिंता से मुक्त रखने में उनका भी बड़ा योगदान था।

सक्रिय और संसदीय राजनीति से निवृत्त होने के बाद वे अपनी किताबों की रायल्टी और अखबारी लेखन से मिलने वाले मानदेय से ही अपना रोजमर्रा का खर्च चलाते थे। उनकी सादगी का आलम यह था कि उनके घर में न तो फ़्रिज था, न एसी और न ही कूलर। कार भी नहीं थी उनके पास। हमेशा ऑटो या बस से चला करते थे।

भीषण गरमी में कूलर या एयरकंडीशनर की जगह पंखे से निकलती गरम हवा में सोना या खुद चाय, कॉफ़ी या खिचड़ी बनाना न तो उनकी मजबूरी थी और न ही नियति। यह उनकी पसंद थी। उनके लिए संक्षिप्त में यही कहा जा सकता है कि अधिकतम दिया, न्यूनतम लिया, मधु लिमये सा कौन जिया!

मधु लिमये जैसे राजनेताओं की जमात अब हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में लुप्त हो चुकी है। आज जब सड़क गूंगी, संसद नाकारा और राजनीति आवारा होकर पूरी तरह जनद्रोही हो चुकी है, ऐसे में मधु लिमये बहुत याद आते हैं और आते रहेंगे। उनकी स्मृति को सादर नमन।

समस्त मित्रों और शुभेच्छुओं को हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं।यह पवित्र पर्व आप सभी के जीवन को सुख, शांति और विद्या ...
06/04/2023

समस्त मित्रों और शुभेच्छुओं को हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं।

यह पवित्र पर्व आप सभी के जीवन को सुख, शांति और विद्या से परिपूर्ण करे।

13/03/2023

मेघालय- कितने आदमी थे 😂 सरकार दो 😂 विधायक दो और तुम तीन फिर भी शपथ ग्रहण में पहुँच गये 😂 क्या समझे थे जनता बहुत ख़ुश होगी 😂😂जनता को मूर्ख समझे क्या 😂ये तो जबरन ताक़त दिखा कर सरकार हड़पने का कार्य है ।

भाजपा 60 पर लड़ी 02 जीती और जिसको पानी पी पी कर कोस रही थी उसके साथ 02 सीट ले कर शामिल हुई और उस दो सीट की पूंछ वाली सरकार में शामिल होने और शपथ गृहण समारोह में भाजपा की ओर से मोदी (प्रधानमन्त्री) अमित साह (ग्रह मन्त्री) और जे पी नड्डा(भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष)शामिल हुए गजब की सरकार है 😂😂😂
मेघालय में आखिर भाजपा की सरकार बन गई l मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा शामिल हुए l तीनों फूलकर कुप्पा हुए जा रहे हैं कि देखो नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, अमित शाह की चाणक्य नीति और जेपी नड्डा के कुशल नेतृत्व का परिणाम है कि आज मेघालय में भाजपा की सरकार है l
आप पूछेंगे कि मुख्यमंत्री कौन बने हैं ? मुख्यमंत्री बने हैं कानराड संगमा l जी हां वही कानराड संगमा जिनके लिए मोदी और अमित शाह चुनाव प्रचार की रैलियों में यह कहते घूम रहे थे कि ये देश के सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री हैं और मेघालय की सरकार सबसे भ्रष्ट सरकार है l विधानसभा चुनाव में मेघालय की सभी 60 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने प्रत्याशी खड़े किए थे जिनमें से 58 हार गए l केवल 2 प्रत्याशी जीते l यह इसके बावजूद था कि पार्टी ने प्रचार में पूरी ताकत झोंकी I प्रधानमंत्री और गृहमंत्री तक ने जाकर वोट मांगे I और मेघालय के भाजपा अध्यक्ष ने यहां तक ऐलान कर दिया कि मेघालय में गोमांस की सप्लाई में कोई कमी नहीं आने दी जाएगी I
भाजपा के केवल 2 विधायक जीते l कानराड संगमा की पार्टी को दोबारा पूर्ण बहुमत मिल गया l भाजपा झट से उस मुख्यमंत्री की सरकार में शामिल हो गई जिसे देश का सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री बता रही थी l अब भाजपा को यह तसल्ली है कि कम से कम मेघालय में भी उनकी सरकार है l आप इसे सत्ता लोलुपता कहें I बेशर्मी कहें, या राजनीति का पतन I वह आपकी मर्जी है l
साभार 🙏❤

क्षमा प्रार्थना के साथ...🙏चूंकि एक लंबे समय के बाद पुनः अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया है इसलिए 🙏भारतीय किसान यूनियन के राष...
02/03/2023

क्षमा प्रार्थना के साथ...🙏
चूंकि एक लंबे समय के बाद पुनः अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया है इसलिए 🙏
भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश सिंह टिकैत के साथ बेबाक बातचीत 👍

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश सिंह टिकैत का कहना है कि बिहार में किसान बेहाल है और उसकी सु...

पुरुष दिवस...   होने के लिए तो इस धरती पर चार अरब के आसपास पुरुष हैं, फिर भी इस सृस्टि में सबसे कठिन कोई कार्य है, तो वह...
19/11/2022

पुरुष दिवस...

होने के लिए तो इस धरती पर चार अरब के आसपास पुरुष हैं, फिर भी इस सृस्टि में सबसे कठिन कोई कार्य है, तो वह है पुरुष होना। पुरुष होने के लिए सचमुच 56 इंच का कलेजा चाहिए...
जो विपरीत परिस्थितियों में अपने परिवार और समाज की रक्षा के लिए विपदाओं के सामने छाती खोल कर खड़ा हो जाए और सारे कष्ट स्वयं अपने कंधे पर उठा ले, वह होता है पुरुष।
पुरुष होता है वह पिता, जो अपनी संतान की रक्षा के लिए अपनी मरियल सी देह लेकर भी हर विपत्ति में सबसे आगे खड़ा रहता है। व्यक्ति शरीर से नहीं, साहस से पुरुष बनता है।
पुरुष थे वे राम, जिन्होंने बालि के वध के बाद उसकी पत्नी तारा को माता कहा। लङ्का युद्ध समाप्त होने के बाद रावण के शव पर विलाप करती विधवा मंदोदरी के हृदय में राम को देख कर तनिक भी भय नहीं उपजा, क्योंकि वे जानती थीं कि राम उन्हें क्षति नहीं पहुचायेंगे। एक तरह से देखें तो रावण को मारने से अधिक कठिन था, मंदोदरी के हृदय के भय को मारना। राम उसमें भी सफल रहे। यही पुरुषार्थ है।
यदि कोई स्त्री विपत्ति के क्षण में आपको देखते ही यह सोचकर निश्चिंत हो जाये कि इसके रहते कोई मेरा अहित नहीं कर सकता, तो समझिए कि आप पौरुष प्राप्त कर चुके।
इस जगत में एक ही व्यक्ति पूर्ण पुरुष कहलाया है, वे थे भगवान श्रीकृष्ण। नरकासुर की कैद में पड़ी सोलह हजार बंदी राजकुमारियों को जब भगवान श्री कृष्ण ने अपने नाम का भरोसा दिया, तब वे पूर्ण पुरुष कहलाए। कैसा अद्भुत क्षण रहा होगा न! कोई स्त्री अपने पति के साथ किसी अन्य स्त्री को स्वीकार नहीं कर पाती, पर श्रीकृष्ण को एक साथ सोलह हजार स्त्रियों ने चुना। यदि विश्वास की कोई सीमा भी है तो वह भगवान श्रीकृष्ण पर आ कर समाप्त हो जाती है। अद्भुत था हमारा कन्हैया...
कभी काशीजी-अयोध्याजी के मेले में नहान करने निकले बुर्जुग जोड़े को देखिएगा। सत्तर वर्ष के हो चुके काँपते पति के साथ चलती बुजुर्ग पत्नी जिस भरोसे से उसका हाथ पकड़ कर चलती है, उस भरोसे का नाम पौरुष है। बूढ़ा व्यक्ति तो स्वयं की भी रक्षा नहीं कर सकता, पत्नी की क्या कर पायेगा? फिर भी, पत्नी का भरोसा उसे पुरुष बना देता है और वह भीड़ को ढकेलता हुआ पार कर जाता है।
त्योहारों के समय घर से दस हजार रुपये लेकर कपड़ा खरीदने निकला मेरे जैसा व्यक्ति जब बारी-बारी से पूरे परिवार का कपड़ा बेसह लेने के बाद देखता है कि उसके लिए मात्र साढ़े पाँच सौ रुपये बचे हैं, तो मॉल के सस्ते शर्ट वाले हिस्से में जा कर बार-बार मूल्य वाला स्टीकर निहारते समय उसके चेहरे पर जो मुस्कान उभरती है, उस मुस्कान को हर पुरुष समझ सकता है। यह भी पौरुष ही है न...
पुरुष दिवसों में नहीं बंध सकता, पर यदि कोई दिवस पुरुष के नाम से बंधा है तो जयजयकार हो उस दिवस की! कभी जयशंकर प्रसाद ने कहा था, "नारी तुम केवल श्रद्धा हो" मैं उनके स्वर में स्वर मिला कर कहता हूँ, "पुरुष! तुम केवल विश्वास हो..."

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।
Sarvesh Tiwari Shreemukh जी

मडुआ रोटी खाय खायराज खातिर जान दिया...वीर बिरसा... नमन..🙏🙏 जय हो।
15/11/2022

मडुआ रोटी खाय खाय
राज खातिर जान दिया...
वीर बिरसा... नमन..🙏🙏 जय हो।

सादर नमन, विनम्र श्रद्धांजलि😢🙏
06/11/2022

सादर नमन, विनम्र श्रद्धांजलि😢🙏

छठ....🙏    जब विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता की स्त्रियां अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ सज-धज कर अपने आँचल में फल ले कर निकलती...
30/10/2022

छठ....🙏

जब विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता की स्त्रियां अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ सज-धज कर अपने आँचल में फल ले कर निकलती हैं तो लगता है जैसे संस्कृति स्वयं समय को चुनौती देती हुई कह रही हो, "देखो! तुम्हारे असँख्य झंझावातों को सहन करने के बाद भी हमारा वैभव कम नहीं हुआ है, हम सनातन हैं, हम भारत हैं। हम तबसे हैं जबसे तुम हो, और जबतक तुम रहोगे तबतक हम भी रहेंगे।"
जब घुटने भर जल में खड़ी व्रती की सुपलि में बालक सूर्य की किरणें उतरती हैं तो लगता है जैसे स्वयं सूर्य बालक बन कर उसकी गोद में खेलने उतरे हैं। स्त्री का सबसे भव्य, सबसे वैभवशाली स्वरूप वही है। इस धरा को "भारत माता" कहने वाले बुजुर्ग के मन में स्त्री का यही स्वरूप रहा होगा। कभी ध्यान से देखिएगा छठ के दिन जल में खड़े हो कर सूर्य को अर्घ दे रही किसी स्त्री को, आपके मन में मोह नहीं श्रद्धा उपजेगी।
छठ वह प्राचीन पर्व है जिसमें राजा और रंक एक घाट पर माथा टेकते हैं, एक देवता को अर्घ देते हैं, और एक बराबर आशीर्वाद पाते हैं। धन और पद का लोभ मनुष्य को मनुष्य से दूर करता है, पर धर्म उन्हें साथ लाता है।
अपने धर्म के साथ होने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि आप अपने समस्त पुरुखों के आशीर्वाद की छाया में होते हैं। छठ के दिन नाक से माथे तक सिंदूर लगा कर घाट पर बैठी स्त्री अपनी हजारों पीढ़ी की अजियासास ननियासास की छाया में होती है, बल्कि वह उन्ही का स्वरूप होती है। उसके दउरे में केवल फल नहीं होते, समूची प्रकृति होती है। वह एक सामान्य स्त्री सी नहीं, अन्नपूर्णा सी दिखाई देती है। ध्यान से देखिये! आपको उनमें कौशल्या दिखेंगी, उनमें मैत्रेयी दिखेगी, उनमें सीता दिखेगी, उनमें अनुसुइया दिखेगी, सावित्री दिखेगी... उनमें पद्मावती दिखेगी, उनमें लक्ष्मीबाई दिखेगी, उनमें भारत माता दिखेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनके आँचल में बंध कर ही यह सभ्यता अगले हजारों वर्षों का सफर तय कर लेगी।
छठ डूबते सूर्य की आराधना का पर्व है। डूबता सूर्य इतिहास होता है, और कोई भी सभ्यता तभी दीर्घजीवी होती है जब वह अपने इतिहास को पूजे। अपने इतिहास के समस्त योद्धाओं को पूजे और इतिहास में अपने विरुद्ध हुए सारे आक्रमणों और षड्यंत्रों को याद रखे।
छठ उगते सूर्य की आराधना का पर्व है। उगता सूर्य भविष्य होता है, और किसी भी सभ्यता के यशश्वी होने के लिए आवश्यक है कि वह अपने भविष्य को पूजा जैसी श्रद्धा और निष्ठा से सँवारे... हमारी आज की पीढ़ी यही करने में चूक रही है, पर उसे यह करना ही होगा... यही छठ व्रत का मूल भाव है।
मैं खुश होता हूँ घाट जाती स्त्रियों को देख कर, मैं खुश होता हूँ उनके लिए राह बुहारते पुरुषों को देख कर, मैं खुश होता हूँ उत्साह से लबरेज बच्चों को देख कर... सच पूछिए तो यह मेरी खुशी नहीं, मेरी मिट्टी, मेरे देश, मेरी सभ्यता की खुशी है।
मेरे देश की माताओं! परसों जब आदित्य आपकी सिपुलि में उतरें, तो उनसे कहिएगा कि इस देश, इस संस्कृति पर अपनी कृपा बनाये रखें, ताकि हजारों वर्ष बाद भी हमारी पुत्रवधुएँ यूँ ही सज-धज कर गंगा के जल में खड़ी हों और कहें- "उगs हो सुरुज देव, भइले अरघ के बेर..."
जय हो....🙏🙏🌅
साभार🙏

29/10/2022

जिस को लगातार पप्पू कहा गया , पार्ट टाइम राजनेता कहा गया, वो पिछले 50 दिन से नफ़रत के खिलाफ पर हैं ,

और जिस ने राजनीति बदलने के सपने दिखाए, वो वोट के लिए नोट पर लक्ष्मी-गणेश की फ़ोटो चाहते हैं

8 साल में राजनीति ये बदली है!! 😊

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