21/06/2026
चौहानों का अजमेर से हाड़ोती में आगमन व अन्य क्षेत्रों में पलायन -
तराइन के द्वितीय युद्ध में छल द्वारा मोहम्मद गौरी ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय को पराजित कर दिया था।
500वर्षों से चौहानों से लड़ रहे विदेशी आक्रांताओ को यह स्पष्ट हो चूका था कि चौहानो के होते हुए भारत पर शासन नही किया जा सकता।
इसलिए उन्होंने चौहानो के समूल नाश का प्रण कर लिया।
इसके बाद चौहानो ने विपरीत परिस्थितियों से हार जाने के स्थान पर राजस्थान के अलग-अलग भागो में पलायन कर अपनी शक्ति को संचित किया तथा कालांतर में जालौर, सिरोही, हाड़ोती (बून्दी, कोटा), गागरोन, नाडोल, रणथम्भोर जैसी रियासतों का उदय हुआ।
इसी दौरान कुछ चौहान सिरदार उपरमाल/बम्बावदा में आए तथा चौहानो कि हाडा शाखा कि स्थापना की तथा राव देवराज हाडा ने सन 1241में वृंदावती, वर्तमान बून्दी में हाड़ोती राज्य की नीव रखी।
साम्भर में 551ई. में चौहान राजवंश की स्थापना से लेकर लगभग 1200 वर्षों तक चौहानो ने भारत भूमि की रक्षा की है।
712ई. से 1192 तक चौहानो ने विदेशी आक्रमणकारियो से भारत की रक्षा में अग्रणी भूमिका निभाई।
उदाहरणस्वरूप -
गोविन्द तृतीय गजनी से लड़े,
दुर्लभराज -इब्राहिम से लड़े,
विग्रहराज-शहाबुद्दीन से लड़े,
पृथ्वीराज -बगुलीशाह से लड़े,
अजयराज -बहलिम से लड़े,
अर्णोराज -तुर्को से लड़े,
विग्रहराज -खुसरो मलिक से लड़े,
पृथ्वीराज द्वितीय -खुसरो मलिक से लड़े,
पृथ्वीराज तृतीय-मोहम्मद गौरी से लड़े।
हम्मीरदेव (1301) और कान्हड़देव चौहान (1311) -अलाउद्दीन खिलजी से लड़े,
गागरोन के अचलदास खींची -होशंगशाह से लड़े (1421),
रणथम्बोर के युद्ध में राव सुर्जन हाडा -अकबर से लड़े,
दत्ताणी के युद्ध में सुरताण देवड़ा(1583)- अकबर से लड़े।
इतनी गर्दने कटी है, राजस्थान लड़ा है, तब ये धर्म और संस्कृति बची है।
इतिहास गवाह है चौहानो ने अपनी मातृभूमि, धर्म संस्कृति की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
चौहानो के शौर्य और साहस से प्रभावित होकर कवि ने कहा है -
जग जाणी रे शूरमा,मुच्छा तणी आन।
रमणी रमता रम रमी,झुक्या न हाडा चौहान।।
चहुदिश आन, चक्रवती चौहान
।