Bundi Riyasat

Bundi Riyasat ●Glorious History of Bundi & Hadauti
●City of Stepwells ● Vintage Bundi
●Hada Chauhan Dynasty ● Invincible Hadendra

26/06/2026

चौहान आ रहा है...

हाडा-चौहान राजवंश, बून्दी के संरक्षक/गादीपति
ब्रिगेडियर भूपेश सिंह, शौर्य चक्र, विशिष्ट सेवा मेडल, पराक्रम मेडल

भारतीय सेना में सर्वाधिक पदकों से अलंकृत सैन्य अधिकारीयों में से एक।

जिस भी संवेदनशील इलाके में पोस्टिंग मिली, वहाँ आतंकवादियों कि लाशें बिछा दी।

।। चहुदिश आन, चक्रवती चौहान ।।

26/06/2026

बून्दी में लेज़र साउंड फाउंटेन शो के दौरान पूर्ण रूप से गलत इतिहास प्रदशित किया जा रहा है।

अस्थिपाल जी का उस समय बून्दी से कोई संबंध नही था।
न सथूर में आशापुरा का मंदिर है, वहाँ रक्तदन्तिका माता जी का मंदिर है।

शो कि शुरुआत राव देवराज हाडा द्वारा जोगणिया माता के आशीर्वाद से बून्दी कि स्थापना करने से होनी चाहिए थी।

प्रशासन इतना अज्ञानी कैसे हो सकता है?

प्रशासन प्रमाणित इतिहास ही प्रदर्शित कर सकता है। फाउंटेन शो के माध्यम से दंतकथाएँ व बून्दी के इतिहास को विकृत रूप से प्रदर्शित करना निंदनीय है।

सही इतिहास के चयन के लिए इतिहासकारो, ट्यूरिस्ट गाइड, हाडा-चौहान राजवंश से जुड़े लोगों आदि कि कमेटी से विचार विमर्श के बाद प्रमाणित इतिहास प्रदर्शित करना चाहिए।

बून्दी स्थापना दिवस के अवसर पर प्रकाशित समाचार पत्र।
24/06/2026

बून्दी स्थापना दिवस के अवसर पर प्रकाशित समाचार पत्र।

बून्दी स्थापना दिवस के अवसर पर प्रकाशित समाचार पत्र।
24/06/2026

बून्दी स्थापना दिवस के अवसर पर प्रकाशित समाचार पत्र।

बून्दी के 785वें स्थापना दिवस पर आप सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएंबून्दी नगर तथा हाड़ौती राज्य के संस्थापक "राव देवराज...
24/06/2026

बून्दी के 785वें स्थापना दिवस पर आप सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं
बून्दी नगर तथा हाड़ौती राज्य के संस्थापक "राव देवराज हाड़ा" को कोटि-कोटि नमन

इतिहास-
बम्बावदा ठिकाने के शासक राव देवराज हाड़ा ने विक्रम संवत 1298 आषाढ़ कृष्ण नवमी,मंगलवार (24 जून 1241) को बन्धु घाटी में जैता मीणा को पराजित कर बून्दी की स्थापना की थी।
राव देवराज हाडा की पुत्री के विवाह में जोगणिया माता, जोगण का वेश धारण कर पधारी थी अतः वे जोगणिया माता के नाम से प्रसिद्ध हुई। जोगणिया माता के आदेशानुसार राव देवराज हाडा ने बंधु घाटी के क्षेत्र को जीतकर बून्दी की स्थापना की थी।

प्रसिद्ध इतिहासकार जेम्स टॉड, सूर्यमल्ल मिश्रण व जगदीश सिंह गहलोत के अनुसार बून्दी स्थापना से पूर्व यहाँ मीणा जनजाति का कबीला निवास करता था।जिसके सरदार जैता मीणा थे। इस स्थान के पहाड़ी क्षेत्र को बन्धु घाटी व वर्तमान बून्दी जहाँ बसी है उसे बन्धु का नाल कहा जाता था।

राणा कुम्भा के रणकपुर के अभिलेख में बून्दी के तत्कालीन नाम वृंदावती का उल्लेख है।

राव देवराज हाडा द्वारा उमरथूना में महल, बावड़ी और हिंगलाज माता के मंदिर का निर्माण करवाया तथा उमरथूना के समीप वर्तमान भवानीपुरा में बांगा माता के मंदिर व बावड़ी का निर्माण करवाया गया।

स्थापना-
किसी शहर की स्थापना का अर्थ है वहाँ प्रशासन कायम करना तथा उस भूभाग की सुरक्षा के दायित्व का निर्वहन करना।किसी शहर को स्थापित करते समय वहाँ सभी जाति-वर्गों के लोगों को वहाँ लाकर बसाया जाता था जैसे ब्राह्मण,वैश्य,सैनी,धोबी,हरिजन आदि सभी समाज।उस समय सभी लोग नए भूभाग में तभी रह सकते थे जब उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए।

राव देवराज हाडा द्वारा बून्दी शहर एवं रियासत की स्थापना के बाद उनके सभी हाड़ा वंशजो ने कठिन परिश्रम से बन्धु नाल के भयानक जंगल को काटकर इस शहर में लगातार सुधार किया, नाल में तालाब गाँव के पहाड़ को काटकर भरती भरवाई गयी व नाळ के प्रवाह को रोककर नवलसागर झील का निर्माण भी करवाया गया।इसके पश्चात अधिकाधिक लोगों को यहाँ बसाया गया इस प्रकार बून्दी शहर की स्थापना हुई।

तारागढ़ व गढ़ पैलेस-
सन 1354 में राव बर सिंह हाड़ा ने बढ़ते बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा हेतु पहाड़ी पर तारागढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया।

16वीं शताब्दी के बाद तारागढ़ किले के नीचे तलहटी में भव्य महलों का निर्माण करवाया गया, जो समस्त राजस्थान में राजपूत स्थापत्यकला का अनूठा उदाहरण है।

जग जाणी रे शूरमा,मुच्छा तणी आन।
रमणी रमता रम रमी,झुक्या न हाडा चौहान।।

चौहानों का अजमेर से हाड़ोती में आगमन व अन्य क्षेत्रों में पलायन -तराइन के द्वितीय युद्ध में छल द्वारा मोहम्मद गौरी ने सम्...
21/06/2026

चौहानों का अजमेर से हाड़ोती में आगमन व अन्य क्षेत्रों में पलायन -

तराइन के द्वितीय युद्ध में छल द्वारा मोहम्मद गौरी ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय को पराजित कर दिया था।

500वर्षों से चौहानों से लड़ रहे विदेशी आक्रांताओ को यह स्पष्ट हो चूका था कि चौहानो के होते हुए भारत पर शासन नही किया जा सकता।
इसलिए उन्होंने चौहानो के समूल नाश का प्रण कर लिया।
इसके बाद चौहानो ने विपरीत परिस्थितियों से हार जाने के स्थान पर राजस्थान के अलग-अलग भागो में पलायन कर अपनी शक्ति को संचित किया तथा कालांतर में जालौर, सिरोही, हाड़ोती (बून्दी, कोटा), गागरोन, नाडोल, रणथम्भोर जैसी रियासतों का उदय हुआ।

इसी दौरान कुछ चौहान सिरदार उपरमाल/बम्बावदा में आए तथा चौहानो कि हाडा शाखा कि स्थापना की तथा राव देवराज हाडा ने सन 1241में वृंदावती, वर्तमान बून्दी में हाड़ोती राज्य की नीव रखी।

साम्भर में 551ई. में चौहान राजवंश की स्थापना से लेकर लगभग 1200 वर्षों तक चौहानो ने भारत भूमि की रक्षा की है।

712ई. से 1192 तक चौहानो ने विदेशी आक्रमणकारियो से भारत की रक्षा में अग्रणी भूमिका निभाई।

उदाहरणस्वरूप -
गोविन्द तृतीय गजनी से लड़े,
दुर्लभराज -इब्राहिम से लड़े,
विग्रहराज-शहाबुद्दीन से लड़े,
पृथ्वीराज -बगुलीशाह से लड़े,
अजयराज -बहलिम से लड़े,
अर्णोराज -तुर्को से लड़े,
विग्रहराज -खुसरो मलिक से लड़े,
पृथ्वीराज द्वितीय -खुसरो मलिक से लड़े,
पृथ्वीराज तृतीय-मोहम्मद गौरी से लड़े।

हम्मीरदेव (1301) और कान्हड़देव चौहान (1311) -अलाउद्दीन खिलजी से लड़े,
गागरोन के अचलदास खींची -होशंगशाह से लड़े (1421),

रणथम्बोर के युद्ध में राव सुर्जन हाडा -अकबर से लड़े,

दत्ताणी के युद्ध में सुरताण देवड़ा(1583)- अकबर से लड़े।

इतनी गर्दने कटी है, राजस्थान लड़ा है, तब ये धर्म और संस्कृति बची है।

इतिहास गवाह है चौहानो ने अपनी मातृभूमि, धर्म संस्कृति की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

चौहानो के शौर्य और साहस से प्रभावित होकर कवि ने कहा है -

जग जाणी रे शूरमा,मुच्छा तणी आन।
रमणी रमता रम रमी,झुक्या न हाडा चौहान।।

चहुदिश आन, चक्रवती चौहान

फूलसागर पैलेस के कक्ष में विराजमान महाराव राजा श्री रणजीत सिंह जी।सामने दिवार पर महाराव राजा उम्मेद सिंह जी, HH बहादुर स...
20/06/2026

फूलसागर पैलेस के कक्ष में विराजमान महाराव राजा श्री रणजीत सिंह जी।
सामने दिवार पर महाराव राजा उम्मेद सिंह जी, HH बहादुर सिंह जी, HH ईश्वरी सिंह जी की पेंटिंग्स लगी हुई है।

आपके अनुसार मध्य में लगी महाराव राजा उम्मेद सिंह जी पेंटिंग अभी कहाँ है?

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18/06/2026

मुंबई में महाराणा साहब मेवाड़ श्री Vishvaraj Singh Mewar , हाड़ा-चौहान राजवंश, बून्दी के ब्रिगेडियर Brig Bhupesh Singh, SC, VSM सिंह जी एवं श्री राजवीर सिंघ चलकोई की तस्वीरों को पैरों तले रौंदकर उसे “उग्र विरोध” का नाम देना लोकतांत्रिक असहमति नहीं, बल्कि अपनी मानसिकता और संस्कारों का सार्वजनिक प्रदर्शन है।

तस्वीरों को पैरों से कुचलकर उसे “उग्र विरोध” बताकर celebrate करना - यह केवल विचारहीनता नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के लिए लड़ने वाले राजपूत राजघरानों के प्रति गहरी कुंठा एवं नफरत का प्रदर्शन है।

विचारों का प्रतिवाद तर्कों से किया जाता है, इन बचकानी हरकतों से नहीं।

जब किसी के पास संवाद और तथ्य समाप्त हो जाते हैं, तब वह प्रतीकों और व्यक्तित्वों के अपमान का सहारा लेता है।

किसी से असहमति होना स्वाभाविक है, परंतु तस्वीरों को रौंदना न तो साहस का परिचायक है और न ही वैचारिक मजबूती का। यह केवल बौद्धिक दिवालियापन और असहिष्णुता को उजागर करता है।

Delulu is the solulu!

ईश्वर इन बुद्धिहीन नमूनों को सद्बुद्धि दें ताकि वे संवाद, मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों का महत्व समझ सकें। 🙏

मोती महल (रावला), बून्दी यदि इसका जीर्णोद्धार हो तो कुछ ऐसा दिखेगा।रावले के विभिन्न महलो और भागो का निर्माण बूंदी के अलग...
16/06/2026

मोती महल (रावला), बून्दी

यदि इसका जीर्णोद्धार हो तो कुछ ऐसा दिखेगा।

रावले के विभिन्न महलो और भागो का निर्माण बूंदी के अलग अलग हाडा शासको के शासन काल के दौरान हुवा है।
इन महलो में हाडा शासको की रानिया और उनके परिवार के सदस्य तथा सेवक रहते थे।

सर्व प्रथम राव नारायण दास (1503-1527 ई.) ने रावले के प्राचीन महलों का विस्तार करते हुए नवीन महलों का निर्माण करवाया था। रावले की प्रमुख इमारत "मोती महल तथा निकट ही स्थित बारहदरी का निर्माण राव भावसिंह (1658-1681 ई.) के युवराज काल में 1645 ई. को हुआ था।बून्दी नरेश ईश्वरी सिंह व बहादुर सिंह का राजतिलक भी मोती महल में क्रमशः 1927 ई. व 1945 ई. को हुआ था।

अन्दर प्रवेश करने पर एक के बाद एक तीन खुले आंगन दिखाई पड़ते है, जिनके चारो ओर अद्वितीय महलों की लम्बी श्रृंखलाएँ है। महलों में अन्न रखने के लिए भण्डार व आयुद्ध शालाएँ भी बनी हुई है। रावले के महलों में ही हाडा राजपूतों की कुलदेवी माँ भगवती आशापुरा जी का मन्दिर स्थित है जिसका निर्माण बून्दी के प्रतापी नरेश उम्मेदसिंह ने करवाया था। मन्दिर के चारो ओर बून्दी शैली के सुन्दर चित्रों का अंकन किया गया है।

रावले के अन्तिम दक्षिण छोर पर कुएँ का रावला स्थित है, जिसका निर्माण भी बून्दी नरेश उम्मेद सिंह ने ही करवाया था। वर्तमान में इसमें राजपूत छात्रावास संचालित है।

मोती महल के सामने एक ओर घुडसाल बनी हुई है जिसे नरेश विष्णुसिंह ने पक्का करवाया था, जिसके ऊपर ही एक कक्ष में किलाधारी जी का मन्दिर स्थित है जो पूर्व में तारागढ़ दुर्ग में स्थित था। किन्तु समाज कंटकों के सम्भावित खतरे के कारण फरवरी 1985 ई. को प्रतिमा रावले में स्थानान्तरित कर दी गई। किलाधारी जी की प्रतिमा श्यामवर्णीय पाषाण की है।

रावले के पूर्वी प्रवेशद्वार से लगी हुई एक इमारत स्थित है, जो बून्दी राज्य की कौन्सिल के रूप में प्रसिद्ध थी। कौन्सिल की स्थापना 1821 ई. में बून्दी नरेश महाराव राजा विष्णुसिंह की मृत्यु के उपरान्त उनके अल्प वयस्क पुत्र श्री रामसिंह की सहायतार्थ कम्पनी सरकार द्वारा की गई थी।

Address

तारागढ़ बूंदी
Bundi
323001

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