14/11/2022
कोटरियात- कोटरियात शब्द कोटरी का बहुवचन है।जिसका अर्थ है कोटरियो का समूह।
राज्यों से विशेष अधिकार प्राप्त जागीरों को कोटरी कहा जाता था इनके अधिकार अन्य जागीरो से अधिक होते थे इन्हें अलग राजचिन्ह,न्याय,सेना,पुलिस,वन,आबकारी के अधिकार प्राप्त थे।
कोटरियात- इन्द्रगढ़,खातोली,बलवन,आन्तरदा,ढिपरी,पुसोद,पीपल्दा,करवाड़,गैंता,फलोदी,करवर,आवा दूनी आदि।
जब रावराजा सुर्जन हाड़ा ने रणथम्भौर पर अधिकार किया तब यह क्षेत्र बून्दी के अधिकार में आया।
1569 में अकबर से संधि दौरान रणथम्भौर दुर्ग अकबर को दे दिया गया। बाद में राव राजा रतन सिंह जी ने जहांगीर से रणथम्भौर के क्षेत्र में से भी अपने पुत्रों को जागीरें दिलवाई।
इस क्षेत्र की आय से ही रणथंभौर दुर्ग की मरम्मत व अन्य कार्य सम्पन्न होते थे।पूर्व में ये राज्य रणथम्भौर के किलेदार को खिराज देते थे।
1736ई के बाद इस क्षेत्र पर मराठों की लूट बढ़ने लगी। राजपूताना में प्रवेश करते समय व लौटते समय दोहरी लूटपाट।
सभी कोटरियातो के शासकों ने बून्दी नरेश उम्मेद सिंह जी से सहायता मांगी परन्तु परिस्थितिवश वे मदद करने में असमर्थ थे।
फिर किलेदार (मुगल) से सहायता मांगी तो बादशाह अहमदशाह ने रणथम्भौर पूर्ण रूप से 1748 में जयपुर नरेश माधो सिंह को दे दिया।
माधो सिंह जी भी इन राज्यो से खिराज की मांग करने लगे जो पहले किलेदार को दिया जाता था।पहले तो सभी जयपुर के सैनिकों को भगा दिया करते थे।
बाद में जयपुर ने इस क्षेत्र पर चढ़ाई कर दी
तब यहाँ के राजाओं ने कोटा से सहायता मांगी व सैन्य सन्धि की ,कि दोनों पक्ष एक दूसरे युद्धों में सैन्य सहायता देंगे।
1761 में भटवाड़ा के मैदान में जयपुर vs कोटा+ कोटरियात की सेनाओं के मध्य युद्ध हुआ।
इस युद्ध मे जयपुर की सेना को बुरी तरह परास्त होकर भागना पड़ा।
अपने झंडे ,निशान भी छोड़ने पड़े।
1761 से 1782 तक जयपुर ने इस क्षेत्र पर लगातार आक्रमण किये परन्तु हर बार उन्हें परास्त कर दिया गया।
1754 से 1817 तक इन राज्यो ने किसी भी राज्य को खिराज नही दिया व स्वतंत्र शासन किया।
1817 में कोटा दीवान झाला जालिम सिंह ने 1758 के समझौते का उल्लंघन करते हुए कूटनीति पूर्वक अंग्रेजों से सन्धि कर इन्हें कोटा के साथ सम्बद्ध कर दिया।
बून्दी नरेश विष्णु सिंह जी व कोटरियातो के राजाओं ने अपना दावा प्रस्तुत किया परन्तु कोई हल नही निकला। कर्नल टॉड ने अपनी पुस्तक में इस घटना की निंदा की है।
अब ये कोटरियाते अपना खिराज ब्रिटिश सरकार के पास देवली में जमा करवाने लगे।इन्हें महाराजा के स्थान पर कोटरी सरदार कहा जाने लगा जबकि खुद बादशाह ने इन्हें महाराजा की पदवी प्रदान की थी ।इनके राज्य का दर्जा घटाकर कोटरी(पिंसिपेलिटी) कर दिया गया।
परन्तु ये राज्य स्वयं को स्वतंत्र ही मानते थे।
इन्द्रगढ़ व बलवन के महाराजाओ को कोटरी सरदार कहने से चिढ़ थी अतः उनका कोटा से व्यवहार खराब होने लगा था तब महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय ने उनसे सम्बन्ध मधुर बनाये व महाराजा से सम्बोधित करने लगे।
इन्द्रगढ़,खातोली,बलवन,आन्तरदा का बून्दी में आना जाना अधिक रहता था जबकि पीपल्दा,करवाड़,गेता,पुसोद के सरदारों का कोटा में आगमन अधिक था।
कोटा व बून्दी के साथ कोटरियातो के राजाओं के सम्बंध एक से थे।हर उत्सव में इन्हें आमंत्रित किया जाता था।