श्री आई माताजी मंदिर बिलाड़ा

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श्री आई माताजी मंदिर बिलाड़ा सीरवी समाज
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श्री आई माताजी मंदिर बिलाड़ा

मां दुर्गा का अवतार श्रीआई माता गुजरात के अंबापुर में अवतरित हुई थी। अंबापुर देवी के चमत्कारों का साक्षी रहा है। देवी भ्रमण करते हुए ग्राम अल्हेड़ पहुंची थीं। अल्हेड़ में देवी का मंदिर है जहां 560 साल से देवी की तस्वीर का पूजन व अखंड ज्योति भी जल रही है। इसमें काजल की बजाय केसर गिरती है।

आई माता में देश के अलग अलग राज्यों में मंदिर है। राजस्थान के बिलाड़ा और मप्र के अल्

हेड़ का मंदिर प्रसिद्ध है। राजस्थान के जोधपुर जिले का बिलाड़ा गांव श्री आई माता जी की पवित्र नगरी है। मंदिर में दीपक से काजल की जगह केसर निकलता है। ऐसा ही चमत्कार अल्हेड़ के आई माता मंदिर में भी होता है। मान्यता है माता बिलाड़ा से अल्हेड़ आई थी और तभी से मां इस मंदिर में उनकी एक तस्वीर विराजित है। मंदिर में अखंड दीपक करीब 560 वर्षों से जल रहा है। लोगों का मानना है कि दीपक की लौ से निकलने वाला पदार्थ केसर है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार 560 साल पहले आई जी माता ने स्वयं इस ज्योत को जलाया था। तभी से यह देशी घी की अखंड ज्योत जलती आ रही है। माता की मात्र तस्वीर है जो गद्दी पर विराजित हैं। माता के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते है। नवरात्रि और भादवा बीज में भक्तों का तांता लगा रहता है।

अल्हेड़ में स्थित श्री आईजी माता मंदिर में जलती अखंड ज्योत।

बाल्यकाल में ही जीजी के चमत्कार देखकर लोग नमन करने लगे थे

संवत 1472 में गुजरात के दांता राज्य अंबापुर में श्री बीकाजी डाबी (राजपूत) रहते थे। जो जोगमाया के परम भक्त थे। बीकाजी को विवाह के 10-12 वर्ष भी संतान प्राप्ति नहीं हुई थी। निसंतान होने के कारण वे दुःखी थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर जोगमाया ने स्वप्न में दर्शन दिए और कहा बीका तुम्हारी भक्ति पूर्ण है वरदान मांग। बीकाजी ने संतान प्राप्ति का वरदान मांगा, इस पर जोगमाया ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया मैं तुम्हारे यहां अवतार लेकर तुम्हारा एवं जनसाधारण का दुःख दूर करूंगी। विक्रम संवत् 1472 भाद्रपद शुक्ल द्वितीय वार शनिवार की शुभ प्रातःवेला में एक नवजात कन्या बीकाजी को महकते हरे-भरे उद्यान में मिली। मां जगदम्बा कन्या रुप में उनके घर पधारी है। पति-प|ी दोनों ही कन्या का पालन- पोषण करने लगे। राजा ने पंडित को कन्या के नामकरण करने के लिए बुलाया गया। उन्होंने कन्या का नाम ‘‘जीजी’’ रखा। बाल्यकाल में जीजी के चमत्कार देखकर लोग नमन करने लगे तथा उनके चमत्कारों की बातें सर्वत्र फैलने लगी। जीजी ने आजीवन ब्रह्मचर्य रहने का संकल्प किया था। कुछ समय गुजरात में रहने के बाद जीजी ने पिता से आज्ञा लेकर मेवाड़ की ओर प्रस्थान किया। अपने साथ कुछ धार्मिक ग्रंथ एवं साहित्य को एक नंदी पर लाद कर मेवाड़ के गांव-गांव में अपने सदविचारों करती रही। श्रद्धालु उन्हें आईजी माता कहने लगे। देवी के चमत्कार राजस्थान से मध्यप्रदेश में सुनाई देने लगे। बिलाड़ा और अल्हेड़ में देवी के मंदिर में श्रद्धालु आस्था के साथ पूजन करते हैं।

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