05/04/2021
महाराव खंगार जी : ( जयंती विशेषांक - चैत्र बदी अष्ठमी , संवत् 1581 )
497 वीं जयंती पर कोटिश: नमन !
आमेर के कछवाहों राजपूतों की खंगारोत शाखा के प्रवर्तक राव खंगार जी जगमाल जी कच्छवाहा के ज्येष्ठ पुत्र और आमेर नरेश राजा पृथ्वीराज सिंह जी ( राणा सांगा के साथ खानवा युद्ध में भाग लेने वाले ) के पौत्र थे जो संवत् 1632 में नारायणा की गद्दी पर बैठे।
राव खंगार बहुत वीर और पराक्रमी हुए। इनका जीवन निरंतर युद्धों व संघर्षों में बीता। अकबर के गुजरात अभियान से लेकर इब्राहिम हुसैन की बगावत को रौंदने और हल्दीघाटी युद्ध में अहम भूमिका निभाने तक इनका सफर काफी कठिनाइयों से भरा रहा।
हल्दीघाटी युद्ध में भूमिका ( 1576 ):
In 1576 Prince Khangar ( RAO KHANGAR JI ) was sent with Man Singh of Amer against Maharana Pratap. Rao Bagha, a popular poet has said -
*कलहणि करिथाट कलल उकलतै सिखर पाव सजिसार।*
*वोवड़ि राणा प्रताप ऊपरा, खीमियो खांडा धार खंगार ।।1*
*ऊतर अकल अचल घण उरड, हूंकल कल बिजूजल हाम।*
*माथै लोह निहसी मेवाड़ै , बूठौ जगड़ तणौ वीरयाम।।2*
*किरमिर सैन कूंतत कलपूरा, मेह छेह अरि ऊर सिरमौर।*
*कलहणि रहवि किया नछवा है, खल डल पल चीखल खमणौर ।।3*
Rao khangar was counted among the prominent mansabdars during Akbar's reign.
He played a prominent role in the battle of Haldighati ( 1576 ) with Mansingh of Amer , Raja Jagannath Khangarot of Toda Bhim and Madhav Singh ( brother of Man singh ) against Maharana Pratap. He helped the Mughal army to gain victory over the powerful ruler of Mewar. It is said that Maharana Pratap came within attacking distance of Rao Khangar and Raja Jagannath But as the proverb goes blood being thicker than water, they did not take him. they allowed him to escape to Gogunda under the protection of Rana Bida of Badi Sadri ( Delwara
Thus they helped the Maharana to save his life.
When Akbar came to know of this he reduced the Mansabs Bhagwandas and his son Man Singh considerably. They were also asked not to enter the the Mughal court for some time.
अकबर के शासनकाल के दौरान राव खंगार जी की गणना प्रमुख मनसबदारों में की जाती थी । उन्होंने अकबर की शाही सेना में रहते हुए गुजरात अभियान , कांगड़ा अभियान में शौर्य का प्रदर्शन किया। साथ ही इब्राहिम हुसैन के दिल्ली आक्रमण को निष्फल कर दिया ।
राजपूताना के प्रसिद्ध युद्ध हल्दीघाटी युद्ध में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
आमेर के मानसिंह, टोडा भीम के राजा जगन्नाथ खंगारोत और माधव सिंह (मान सिंह के भाई) के साथ महाराणा प्रताप के खिलाफ हल्दीघाटी (1576) की लड़ाई में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई। उन्होंने मेवाड़ के शक्तिशाली शासक पर विजय पाने के लिए भरसक प्रयास किया ।
ऐसा कहा जाता है कि युद्ध के दौरान एक घड़ी महाराणा प्रताप राव खंगार और राजा जगन्नाथ पर हमला करने काफी नजदीक आ गए थे, लेकिन जैसा कि कहावत है कि - पानी की तुलना में खून गाढ़ा होता है, उन्होंने राणा प्रताप पर हमला नहीं किया। महाराणा प्रताप इस समय काफी घायल अवस्था में थे इसलिए उन्होंने उनको युद्ध स्थल से बाहर निकलते समय उनका पीछा नहीं किया। बल्कि उन्होंने उन्हें बड़ी सादड़ी (देलवाड़ा) के राणा बीदा के संरक्षण में गोगुन्दा की पहाड़ियों की और निकलने दिया। इस प्रकार महाराणा जी का जीवन बचाने में महत्त्वपूर्ण फ़र्ज़ अदा किया और मेवाड़ी सूर्य को बुझने नहीं दिया ।
जब अकबर को इस घटना का पता चला तो उसने भगवानदास और उनके पुत्र मान सिंह का मनसब कम कर दिया और कुछ समय के लिए मुगल दरबार में प्रवेश न करने के लिए कह उन पर प्रतिबंध लगा दिया।
Compilation : Bh. Devendra Singh Rahlana ( Member Of Khangana Sangh )
Sources :
1. The Jaipur album | Jagirs and Jagirdars, page 34
2. Rawal Narendra Singh | Thirty decisive battles of Jaipur, page 4-10
3. Thikana records Jobner by Rawal Narendra Singh ji
4 ( i )Akbarnama by H. Beveridge Vol - III, Page 274 - 275
( ii ) . OJHA G.S.| Udaipur Rajya ka itihaas Vol. -I page - 447